Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1817

पावकवर्चाः शुक्रवर्चा अनूनवर्चा उदियर्षि भानुना। पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे॥१८१७

Veda : Samveda | Mantra No : 1817

In Hindi:

ऋषि : अग्निः पावकः | देवता : अग्निः | छन्द : विष्टारपंक्ति | स्वर : पञ्चमः

विषय : अब परमात्मा कैसा है और क्या करता है, यह कहते हैं।

पदपाठ : पावकवर्चाः । पावक । वर्चाः । शुक्रवर्चाः । शुक्र । वर्चाः । अनूनवर्चाः । अनून । वर्चाः । उत् । इयर्षि । भानुना । पुत्र । पुत् । त्रः । मातरा । विचरन् । वि । चरन् । उप । अवसि । पृणक्षि । रोदसीइति । उभेइति॥

पदार्थ : हे अग्रनायक जगदीश्वर ! (पावकवर्चाः) पवित्रकारी तेजवाले, (शुक्रवर्चाः) उज्ज्वल और पवित्र तेजवाले, (अनूनवर्चाः) अन्यून तेजवाले आप (भानुना) ज्योति के साथ, उपासकों के अन्तरात्मा में (उदियर्षि) उदित होते हो। (मातरा) माता-पिता के समीप (विचरन्) विचरण करते हुए (पुत्रः) पुत्र के समान (मातरा) द्युलोक और भूलोक में (विचरन्) विचरण करते हुए आप उनकी (उपावसि) रक्षा करते हो। साथ ही (रोदसी) द्युलोक और भूलोक (उभे) दोनों को (पृणक्षि) आपस में संयुक्त करते हो ॥२॥यहाँ तीसरे चरण में शिलष्ट लुप्तोपमा अलङ्कार है। ‘वर्चा’ की आवृत्ति में लाटानुप्रास है ॥२॥

भावार्थ : परमेश्वर सूर्य के समान अपने दिव्य तेज से स्तोताओं के हृदय को पवित्र करता है, द्यावापृथिवी की रक्षा करता है और उनके मध्य आपस का सामञ्जस्य स्थापित करता है ॥२॥