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Samveda/1835

शिक्षेयमस्मै दित्सेयँ शचीपते मनीषिणे। यदहं गोपतिः स्याम्॥१८३५

Veda : Samveda | Mantra No : 1835

In Hindi:

ऋषि : गोषूक्त्यश्वसूक्तिनौ काण्वायनौ | देवता : इन्द्रः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : शिक्षेयम् । अस्मै । दित्सेयम् । शचीपते । शची । पते । मनीषिणे । यत् । अहम् । गोपतिः । गो । पतिः । स्याम्॥

पदार्थ : हे (शचीपते) सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर ! (यदि अहम्) यदि मैं (गोपतिः) भूमियों वा धेनुओं का स्वामी हो जाऊँ, तो उन भूमियों वा धेनुओं को (दित्सेयम्) मैं दान करने का सङ्कल्प लूँ और (अस्मै मनीषिणे) इस मेधावी विद्वान् को (शिक्षेयम्) उनका दान कर दूँ ॥२॥

भावार्थ : धनपतियों का यह कर्तव्य है कि वे जिस धन के स्वामी हों,उस धन का कम से कम शतांश सत्पात्रों को अवश्य दान करें ॥२॥