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Samveda/1842

यददो वात ते गृहेऽ.ऽमृतं निहितं गुहा। तस्य नो धेहि जीवसे (पौ)।। [धा. । उ । स्व. नास्ति ।]॥१८४२

Veda : Samveda | Mantra No : 1842

In Hindi:

ऋषि : उलो वातायनः | देवता : वायुः | छन्द : गायत्री | स्वर : षड्जः

विषय : आगे पुनः उसी विषय का कथन है।

पदपाठ : यत् । अदः । वात । ते । गृहे । अमृतम् । अ । मृतम् । निहितम् । नि । हितम् । गुहा । तस्य । नः । धेहि । जीवसे॥

पदार्थ : हे (वात) जीवात्मा-सहित प्राण ! (यत् ते गृहे) जो तुम्हारे शरीर रूप घर में (गुहा) हृदय-गुहा के अन्दर (अदः) यह (अमृतम्) अक्षय परमात्मा-रूप ज्योति (निहितम्) रखी हुई है, (जीवसे) जीवन के लिए (तस्य नः धेहि) उसकी हमें प्राप्ति कराओ ॥३॥

भावार्थ : प्राणायाम द्वारा प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाने पर, मन में धारणाओं की योग्यता उत्पन्न हो जाने पर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि से हृदय में निहित परमात्म-ज्योति प्रकाशित हो जाती है ॥३॥