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Samveda/1843

अभि वाजी विश्वरूपो जनित्र हिरण्ययं बिभ्रदत्क सुपर्णः। सूर्यस्य भानुमृतुथा वसानः परि स्वयं मेधमृज्रो जजान॥१८४३

Veda : Samveda | Mantra No : 1843

In Hindi:

ऋषि : सुपर्णः | देवता : अग्निः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में अग्नि नाम से जगदीश्वर के गुण-कर्मों का वर्णन है।

पदपाठ : अभि । वाजी । विश्वरुपः । विश्व । रुपः । जनित्रम् । हिरणययम् । विभ्रत् । अत्कम् । सुपर्णः । सुपर्णः । सु । पर्णः । सूर्यस्य । भानुम् । ऋतुथा । वसानः । परि । स्वयम् । मेधम् । ऋज्रः । जजान॥

पदार्थ : (वाजी) बलवान् (विश्वरूपः) सब रूपों को देनेवाला, (सुपर्णः) श्रेष्ठ पालनकर्ता, (ऋज्रः) सर्वव्यापक वह अग्निनामक परमेश्वर (जनित्रम्) वृष्टि के उत्पादक, (हिरण्ययम्) सुनहरे (अत्कम्) विद्युद्रूप वज्र को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ, (ऋतुथा) ऋतुओं के अनुकूल (सूर्यस्य) सूर्य के (भानुम्) तेज को (वसानः) बसाता हुआ (स्वयम्) अपने आप (मेघम्) सृष्टि-यज्ञ को (जजान) चला रहा है ॥१॥

भावार्थ : संसार में जो कुछ भी प्राकृतिक घटना-चक्र चल रहा है, उस सबको परमेश्वर ही सञ्चालित करता है ॥१॥