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Samveda/1847

ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थात्प्रत्यङ्चित्रा बिभ्रदस्यायुधानि। वसानो अत्क सुरभिं दृशे क स्वार्ण नाम जनत प्रियाणि॥१८४७

Veda : Samveda | Mantra No : 1847

In Hindi:

ऋषि : वेनो भार्गवः | देवता : वेनः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब मुक्तावस्था में जीवात्मा का स्वरूप वर्णित करते हैं।

पदपाठ : ऊर्ध्वः । गन्धर्वः । अधि । नाके । अस्थात् । प्रत्यङ्व । प्रति । अङ् । चित्रा । विभ्रत । अस्य । आयु । धानि । वसानः । अत्कम् । सुरभिम् । सु । रभिम् । दृशे । कम् । स्वः । न । नाम । जनत् । प्रियाणि॥

पदार्थ : (ऊर्ध्वः) जागरूक और उन्नत, (गन्धर्वः) वाणी वा इन्द्रियों को धारण करनेवाला जीवात्मा (नाके अधि) मोक्षावस्था में (अस्थात्) स्थित होता है। वेन अर्थात् कमनीय परमेश्वर (अस्य) इस जीवात्मा के (प्रत्यङ्) अभिमुख होकर (चित्रा) विविध (आयुधा) रक्षा-साधनों को (बिभ्रत्) धारण करता है। तब मोक्षावस्था में जीवात्मा (दृशे कम्) परमात्मा के दर्शन के लिए (सुरभिम्) सद्गुणों से सुरभित (अत्कम्) स्वरूप को (वसानः) धारण करता हुआ (स्वः न) सूर्य के समान (प्रियाणि नाम) प्रिय तेजों को (जनत) प्रकट करता है ॥२॥यहाँ उपमालङ्कार है ॥२॥

भावार्थ : मुक्तावस्था में जीवात्मा की लौकिक आकाङ्क्षाएँ समाप्त हो जाती हैं, तेजोमय होकर वह परमात्मा के साहचर्य से दिव्य आनन्द का अनुभव करता है ॥२॥