Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1846

नाके सुपर्णमुप यत्पतन्त हृदा वेनन्तो अभ्यचक्षत त्वा। हिरण्यपक्षं वरुणस्य दूतं यमस्य योनौ शकुनं भुरण्युम्॥१८४६

Veda : Samveda | Mantra No : 1846

In Hindi:

ऋषि : वेनो भार्गवः | देवता : वेनः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम ऋचा पूर्वार्चिक में ३२० क्रमाङ्क पर सूर्य के दृष्टान्त से परमात्मा के विषय में व्याख्यात हो चुकी है। यहाँ जीवात्मा का विषय कहते हैं।

पदपाठ : नाके । सुपर्णम् । सु । पर्णम् । उप । यत् । पतन्तम् । हृदा । वेनन्तः । अभ्यचक्षत । अभि । अचक्षत । त्वा । हिरण्यपक्षम् । हिरण्य । पक्षम् । वरुण्स्य । दूतम् । यमस्य । योनौ । शकुनम् । भुरण्युम्॥

पदार्थ : हे वेन ! हे परमेश्वर की कामना करनेवाले जीवात्मन् ! (हिरण्यपक्षम्) ज्ञान-कर्म-रूप सुनहरे पंखोंवाले, (वरुणस्य दूतम्) वरणीय मन को सन्मार्ग पर प्रेरित करनेवाले, (यमस्य) नियन्ता प्राण के (योनौ) देहरूप घर में (शकुनम्) शक्ति से शोभित, (भुरण्युम्) देह के धारक-पोषक, (सुपर्णम्) अष्टाङ्गयोग-रूप शुभ पंखों से युक्त तथा (नाके) मोक्ष के निमित्त (उपपतन्तम्) प्रयत्नशील (त्वा) तुझे (यत्) जब (अभ्यचक्षत) प्रभु-प्रेमी लोग देखते हैं, तब वे (हृदा) हृदय से (वेनन्तः) तुमसे प्रेम करने लगते हैं ॥१॥

भावार्थ : देह के अधिष्ठाता जीवात्मा की जब अध्यात्म-मार्ग में रूचि हो जाती है, तब वह अष्टाङ्गयोग के अभ्यास से मोक्ष पा सकता है ॥१॥