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Samveda/1850

सङ्क्रन्दनेनानिमिषेण जिष्णुना युत्कारेण दुश्च्यवनेन धृष्णुना। तदिन्द्रेण जयत तत्सहध्वं युधो नर इषुहस्तेन वृष्णा॥१८५०

Veda : Samveda | Mantra No : 1850

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : आगे पुनः वही विषय है।

पदपाठ : संक्रन्दनेन । सम् । क्रन्दनेन । अनिमिषेण । अ । निमिषेण । जिष्णुना । युत्कारेण । युत् । कारेण । दुश्च्यवनेन । दुः । च्यवनेन । धृष्णुना । तत् । इन्द्रेण । जयत् । तत् । सहध्वम् । युधः । नरः । इषुहस्तेन । इषु । हस्तेन । वृष्णा॥

पदार्थ : हे (युधः नरः) योद्धा नरो ! तुम (सङ्क्रन्दनेन) शत्रुओं को रुलानेवाले, (अनिमिषेण) लक्ष्य पर अपलक दृष्टि रखनेवाले, (जिष्णुना) विजयशील, (युत्कारेण) युद्ध करनेवाले, (दुश्च्यवनेन) विपक्षियों से विचलित न किये जा सकनेवाले, (धृष्णुना) स्वयं विपक्षियों को विचलित कर देनेवाले, (इषुहस्तेन) हाथ में बाण आदि शस्त्रास्त्र धारण करनेवाले, (वृष्णा) अस्त्रों की वर्षा करनेवाले, (इन्द्रेण) सेनापति के समान वीर जीवात्मा के द्वारा (तत्) उस युद्ध को (जयत) जीत लो, (तत्) उस आन्तरिक तथा बाह्य शत्रुदल को (सहध्वम्) पराजित कर दो ॥२॥

भावार्थ : जैसे शस्त्रास्त्रधारी वीर सेनापति के नेतृत्व में योद्धा लोग सङ्ग्राम को जीत लेते हैं, वैसे ही अपने जीवात्मा को उद्बोधन देकर, उसे नेता बनाकर सब आन्तरिक तथा बाहरी युद्धों को सब लोग जीतें ॥२॥