Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1851

स इषुहस्तैः स निषङ्गिभिर्वशी सस्रष्टा स युध इन्द्रो गणेन। स सृष्टजित्सोमपा बाहुशर्ध्यूऽ.ग्रधन्वा प्रतिहिताभिरस्ता (फे)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१८५१

Veda : Samveda | Mantra No : 1851

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : आगे फिर उसी विषय का वर्णन है।

पदपाठ : सः । इषुहस्तैः । इषु । हस्तैः । सः । निषङ्गिभिः । नि । सङ्गिभिः । वशी । सस्रष्टा । सम् । स्रष्टा । सः । युधः । इन्द्रः । गणेन । ससृष्टजित् । ससृष्ट । जित् । सोमपाः । सोम । पाः । बाहुशर्द्धी । बाहु । शर्द्धी । उग्रधन्वा । उग्र । धन्वा । प्रतिहिताभिः । प्रति । हिताभिः । अस्ता॥

पदार्थ : (सः) वह देह में जन्मा हुआ जीवात्मा (इषुहस्तैः) शरपाणि योद्धाओं द्वारा, (सः) वह जीवात्मा (निषङ्गिभिः) तूणीरधारी योद्धाओं द्वारा (वशी) शत्रुओं को वश में करनेवाला होता है। (स इन्द्रः) वह वीर जीवात्मा (युधः) युद्धकर्ता शत्रु के (गणेन) दल के साथ (संस्रष्टा) टक्कर लेनेवाला होता है। (संसृष्टजित्) मुठभेड़ करनेवालों का विजेता, (सोमपाः) वीररस का पान करनेवाला, (बाहुशर्धी) बाहुबल से युक्त, (उग्रधन्वा) प्रचण्ड धनुषवाला और (प्रतिहिताभिः) प्रेरित बाणों से (अस्ता) शत्रुओं को धराशायी कर देनेवाला होता है ॥३॥

भावार्थ : कुशल सेनाध्यक्ष जैसे अपने शस्त्रास्त्रधारी योद्धाओं द्वारा बलवान् भी शत्रुओं को धराशायी कर देता है, वैसे ही देहधारी वीर जीवात्मा अपने पक्ष के वीरों को उद्बोधन देकर आन्तरिक और बाह्य सङ्ग्राम को शीघ्र ही जीत ले ॥३॥