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Samveda/1853

बलविज्ञायः स्थविरः प्रवीरः सहस्वान्वाजी सहमान उग्रः। अभिवीरो अभिसत्वा सहोजा जैत्रमिन्द्र रथमा तिष्ठ गोवित्॥१८५३

Veda : Samveda | Mantra No : 1853

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में फिर वही विषय है।

पदपाठ : बल । विज्ञायः । स्थविरः । स्थ । विरः । प्रवीरः । प्र । वीरः । सहस्वान् । वाजी । सहमानः । उग्रः । अभिवीरः । अभि । वीरः । अभिस्तवा । अभि । सत्वा । सहोजाः । सहः । जाः । जैत्रम् । इन्द्र । रथम् । आ । तिष्ठ । गोवित् । गो । वित्॥

पदार्थ : हे (इन्द्र) जीवात्मन् ! (बलविज्ञायः) ब्रह्मबल का ज्ञाता, (स्थविरः) अनुभव में वृद्ध, (प्रवीरः) अतिशय वीर, (सहस्वान्) उत्साही, (वाजी) विज्ञानवान् (सहमानः) सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को सहन करनेवाला, (उग्रः) प्रतापी, (अभिवीरः) मन, प्राण, आदि वीरों से युक्त, (सहोजाः) बल में प्रसिद्ध, (गोवित्) विवेक की किरणों को और श्रेष्ठ वाणियों को प्राप्त तू (जैत्रम्) विजयशील (रथम्) रथ पर (आतिष्ठ) बैठ ॥२॥

भावार्थ : जैसे स्वयं वीर तथा वीर योद्धाओं से युक्त सेनापति जयशील रथ पर चढ़कर भयङ्कर युद्ध को भी जीत लेता है, वैसे ही वेदज्ञ, ब्रह्मज्ञ, सहनशील, मन-बुद्धि-प्राण आदि वीरों से युक्त, प्रभाववान्, प्रतापी, देह-रथ के अधिष्ठाता जीवात्मा को योग्य है कि अपने प्रौढ़ मनोबल से सभी बाह्य और आन्तरिक सङ्ग्रामों को जीत लेवे ॥२॥