Donation Appeal Download Our App
Choose Mantra
Samveda/1854

गोत्रभिदं गोविदं वज्रबाहुं जयन्तमज्म प्रमृणन्तमोजसा। इम सजाता अनु वीरयध्वमिन्द्र सखायो अनु स रभध्वम् (हे)।। [धा. । उ नास्ति । स्व. ।]॥१८५४

Veda : Samveda | Mantra No : 1854

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब जीवात्मा के नेतृत्व में विजयलाभ करने के लिए वीरों को प्रोत्साहन देते हैं।

पदपाठ : गोत्रभिदम् । गोत्र । भिदम् । गोविदम् । गो । विदम् । वज्रबाहुम् । वज्र । बाहुम् । जयन्तम् । अज्म । प्रमृणन्तम् । प्र । मृणन्तम् । ओजसा । इमम् । सजाताः । स । जाताः । अनु । वीरयध्वम् । इन्द्रम् । सखायः । स । खायः । अनु । सम् । रभध्वम्॥

पदार्थ : (गोत्रभिदम्) अविद्या, अस्मिता आदि क्लेश रूप पर्वतों को तोड़नेवाले, (गोविदम्) विवेक-प्रकाश की किरणों को प्राप्त करनेवाले, (वज्रबाहुम्) अशुद्धि के क्षय तथा ज्ञान की दीप्ति के लिए यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि रूप वज्र को ग्रहण करनेवाले, (अज्म) देवासुरसङ्ग्राम को (जयन्तम्) जीतनेवाले, (अजोसा) बल से (प्रमृणन्तम्) आन्तरिक शत्रुओं को कुचलनेवाले (इमम् अनु) इस जीवात्मा का अनुसरण करके, हे (सजाताः) शरीर के साथ उत्पन्न मन, बुद्धि, प्राण, आदियो ! तुम (वीरयध्वम्) वीरता दिखाओ। हे (सखायः) मित्रो ! तुम (इन्द्रम् अनु) जीवात्मा का अनुसरण करते हुए (संरभध्वम्) वीरतापूर्ण कार्यों को आरम्भ करो ॥३॥

भावार्थ : शरीर के अन्दर जीवात्मा नाम का महापराक्रमी सेनापति पूरी रणसज्जा के साथ विद्यमान है, जिसे सब विघ्नों को पराजित करके देवासुरसङ्ग्राम में विजय पाना योग्य है ॥३॥