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Samveda/1859

अस्माकमिन्द्रः समृतेषु ध्वजेष्वस्माकं या इषवस्ताजयन्तु। अस्माकं वीरा उत्तरे भवन्त्वस्मा उ देवा अवता हवेषु॥१८५९

Veda : Samveda | Mantra No : 1859

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : इन्द्रः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अब विजय की प्रार्थना करते हैं।

पदपाठ : अस्माकम् । इन्द्र । समृतेषु । सम् । ऋतेषु । ध्वजेषु । अस्माकम् । याः । इषवः । ताः । जयन्तु । अस्माकम् । वीराः । उत्तरे । भवन्तु । अस्मान् । उ । देवाः । अवत । हवेषु॥

पदार्थ : (अस्माकम् इन्द्रः) हमारा सेनापति-तुल्य जीवात्मा (ध्वजेषु समृतेषु) हमारे ध्वजों के शत्रु-ध्वजों से टकराने पर (जयतु) विजय-लाभ करे। (अस्माकं याः इषवः) हमारे जो बाण हैं,(ताः जयन्तु) वे विजय-लाभ करें। (अस्माकं वीराः) हमारे रण-कुशल वीर योद्धा (उत्तरे भवन्तु) विजयी हों। हे (देवाः) जीतने के अभिलाषी मन, बुद्धि आदियो ! (अस्मान् उ) हमारी (हवेषु) देवासुरसङ्ग्रामों में (अवत) रक्षा करो ॥२॥

भावार्थ : जैसे सेनापति से प्रोद्बोधन पाकर रणबाँकुरे सैनिक शीघ्र ही शत्रुओं को जीत लेते हैं, वैसे ही अपनी अन्तरात्मा को प्रोत्साहन देना वीरों के विजय में हेतु बनता है ॥२॥