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Samveda/1860

असौ या सेना मरुतः परेषामभ्येति न ओजसा स्पर्धमाना। तां गूहत तमसापव्रतेन यथैतेषामन्यो अन्यं न जानात् (चु)।। [धा. । उ । स्व. ।]॥१८६०

Veda : Samveda | Mantra No : 1860

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : मरुतः | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : अगले मन्त्र में शत्रुओं को मोह में डालने की प्रेरणा दी गयी है।

पदपाठ : हवेषु । असौ । या । सेना । मरुतः । परेषाम् । अभ्येति । अभि । एति । नः । ओजसा । स्पर्धमाना । ताम् । गूहत । तमसा । अपव्रतेन । अप । व्रतेन । यथा । एतेघाम् । अन्यः । अन् । यः । अन्यम् । अन् । यम् । न । जानात्॥

पदार्थ : हे (मरुतः) प्राणो वा वीर सैनिको ! (असौ या) यह जो (ओजसा) अपने बल से (स्पर्धमाना) हमसे स्पर्धा करती हुई (परेषाम्) शत्रुओं की (सेना) सेना (नः अभ्येति) हमारी ओर बढ़ी आ रही है, (ताम्) उस सेना को (अपव्रतेन) जिसमें कार्य बन्द हो जाते हैं, ऐसे (तमसा) अन्धकार से (गूहत) आच्छन्न कर दो, (यथा) जिससे (एतेषाम्) इनमें (अन्यः) एक (अन्यम्) दूसरे को (न जानात्) न जान सके ॥३॥

भावार्थ : जैसे युद्ध में सम्मोहनास्त्र के प्रयोग द्वारा घोर अन्धकार के व्याप्त हो जाने पर शत्रु एक-दूसरे को ही नहीं देख पाते, वैसे ही जीवात्मा के प्राणायाम द्वारा प्रयुक्त सम्मोहन से सभी आन्तरिक काम-क्रोध आदि वा अविद्या-अस्मिता आदि शत्रु सर्वथा मोह को प्राप्त हो जाएँ ॥३॥