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Samveda/1861

अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि। अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैरन्धेनामित्रास्तमसा सचन्ताम्॥१८६१

Veda : Samveda | Mantra No : 1861

In Hindi:

ऋषि : अप्रतिरथ ऐन्द्रः | देवता : अप्वा | छन्द : त्रिष्टुप् | स्वर : धैवतः

विषय : प्रथम मन्त्र में शत्रुओं को व्याधि वा भय से पीड़ित करने का वर्णन है।

पदपाठ : अभीषाम् । चित्तम् । प्रतिलोभयन्ती । प्रतिलोभयन्ती । गृहाण । अङ्गानि । अप्वे । परा । इहि । अभि । प्र । इहि । निः । दह । हृत्सु । शोकैः । अन्धेन । अमित्राः । अ । मित्राः । तमसा । सचन्ताम्॥

पदार्थ : हे (अप्वे) व्याधि वा भीति ! (परेहि) शत्रुदल में जा। (अमीषाम्) इन शत्रुओं के (चित्तम्) चित्त को (मोहयन्ती) मोहित करती हुई (अङ्गानि) इनके अङ्गों को (गृहाण) जकड़ दे। (अभिप्रेहि) शत्रुओं के प्रति जा, उनके (हृत्सु) हृदयों में (शोकैः) शोकों से (निर्दह) दाह उत्पन्न कर दे। (अमित्राः) शत्रु (अन्धेन) घने (तमसा) मोह के अन्धकार से (सचन्ताम्) संयुक्त हो जाएँ ॥१॥

भावार्थ : जैसे व्याधि वा भय से ग्रस्त शत्रु किंकर्तव्यविमूढ़ और दग्ध हृदयवाले होकर पराजित हो जाते हैं वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि वा व्याधि स्त्यान-संशय-प्रमाद-आलस्य आदि रिपु व्याधि-ग्रस्त वा भयोद्विग्न से होकर झट विनष्ट हो जाएँ ॥१॥