Donation Appeal Download Our App
Saadhana Paada / Means / 1
Choose Sutra
Saadhana Paada / Means / 1

तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥१॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 1

In Hindi:

पदपाठ : तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : उद्दिष्टः समाहितचित्तस्य योगः। कथं व्युत्थितचित्तोऽपि योगयुक्तः स्यादित्येतदारभ्यते—

हिंदी में अर्थ : (समाहितचित्तस्य) समाहित = स्थिर = एकाग्र चित्त वाले के लिए (योगः) योग का (उद्दिष्टः) उपदेश पूर्व पाद में किया गया। (व्युत्थितचित्तः) चञ्चल चित्त = विक्षिप्त चित्त वाला पुरुष (अपि) भी (कथम्) कैसे (योगयुक्तः) योग से युक्त (स्यात्) हो सके (इति) इसके लिए (एतत्) इस साधनपाद का (आरभ्यते) आरम्भ किया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि) तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान (क्रियायोगः) क्रियायोग है ॥

व्यास भाष्य : नातपस्विनो योगः सिद्ध्यति। अनादिकर्मक्लेशवासनाचित्रा प्रत्युपस्थितविषयजाला चाशुद्धिर्नान्तरेण तपः सम्भेदमापद्यत इति तपस उपादानम्। तच्च चित्तप्रसादनमबाधमानमनेनाऽऽसेव्यमिति मन्यते। स्वाध्यायः प्रणवादिपवित्राणां जपो मोक्षशास्त्राध्ययनं वा। ईश्वरप्रणिधानं सर्वक्रियाणां परमगुरावर्पणं तत्फलसंन्यासो वा॥

हिंदी में अर्थ : (अतपस्विनः) अपतस्वी पुरुष का (योगः) योग (न सिद्ध्यति) सिद्ध नहीं होता। (अनादिकर्मक्लेशवासनाचित्रा) प्रवाह से अनादि शुभाशुभ-मिश्रित कर्मों एवम् अविद्यादि क्लेशों की वासनाओं से चित्रित = युक्त चित्त में (च) और (प्रत्युपस्थितविषयजाला) विषयजाल = बन्धन के कारण विषयों को उपस्थित करने वाली = चित्त को विषयजाल की ओर उन्मुख करने वाली, जो (अशुद्धिः) अशुद्धि = मलिनता है वह (तपः अन्तरेण) तप = तपस्या के बिना (सम्भेदम्) छिन्न-भिन्न = शिथिल होकर विनाश को (न आपद्यते) प्राप्त नहीं होती। (इति) इस कारण से सर्वप्रथम (तपः) तप का (उपादानम्) ग्रहण किया है। (च) और (तत्) वह तप (चित्तप्रसादनम्) चित्त की प्रसन्नता = निर्मलता = स्थिरता प्रदान करने वाला हो, न कि (अबाधमानम्) उसे बाधित करने वाला हो, इस प्रकार (अनेन) उस साधक द्वारा यह तप (आसेव्यम्) सेवन किया जाना चाहिए; (इति) ऐसा (मन्यते) योगियों द्वारा माना जाता है।

(प्रणवादिपवित्राणाम्) प्रणव आदि पवित्र मन्त्रों का (जपः) जप (वा) और (मोक्षशास्त्राध्ययनम्) मोक्ष = कैवल्य का उपदेश करने वाले वेद, दर्शन, उपनिषदादि शास्त्रों का अध्ययन करना (स्वाध्यायः) स्वाध्याय है। (सर्वक्रियाणाम्) साधक का अपनी सभी क्रियाओं = मन, वाणी और शरीर की क्रियाओं को (परमगुरौ) परम गुरु परमात्मा को (अर्पणम्) अर्पित कर देना (वा) और (तत्फलसंन्यासः) उनके फल की कामना = इच्छा न करना (ईश्वरप्रणिधानम्) ईश्वरप्रणिधान है॥

वैदिक योग मीमांसा : समाहित = स्थिर = एकाग्र चित्त वाले साधक के लिए योग, योग के उपाय — अभ्यास, वैराग्य, श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञा, तीव संवेग आदि पूर्वक ईश्वरप्रणिधान का निर्देश और उनके फल स्वरूप सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि से स्थूल भूतों से मूलप्रकृति पर्यन्त एवं जीवात्मा और परमात्मा के सम्प्रज्ञान = साक्षात्कार होने तथा कैवल्य प्राप्ति रूप फल का विधान पहले पाद में किया गया है।

योगसूत्र १.१ के भाष्य में महर्षि व्यास कहते हैं कि “तत्र विक्षिप्ते चेतसि विक्षेपोपसर्जनीभूतः समाधिर्न योगपक्षे वर्त्तते” अर्थात् विक्षिप्त अवस्था वाले चित्त में विक्षेपों के कारण अर्थात् रजोगुण से गौण होने वाली समाधि योग पक्ष में नहीं मानी जाती। एकाग्रावस्था से इतर क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त अवस्था वाले चित्त को व्युत्थान अवस्था वाला कहा जाता है। व्युत्थान अवस्था वाला चित्त होने की स्थिति में, पुरुष किस प्रकार से योगमार्ग पर अग्रसर हो सकेगा ? इसके लिए महर्षि पतञ्जलि ने क्रियायोग के रूप में तीन साधन बताए हैं। व्युत्थित अवस्था से युक्त चित्त वाला पुरुष - तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान का दैनिक जीवन में सम्पादन करता हुआ योगमार्ग पर अग्रसर हो सकता है। ये तीनों ही आगे अष्टांगयोग के दूसरे अंग नियम के अन्तर्गत अन्तिम तीन नियमों के रूप में भी गिने गए हैं।

तप — तप का विधान करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि अतपस्वी पुरुष, जो तप नहीं करता अथवा तप करने में असमर्थ है, को योग के दिव्य मार्ग पर किसी प्रकार की सिद्धि = सफलता की प्राप्ति नहीं हो सकती। पुरुष = आत्मा की अनन्त जन्मों की यात्रा में शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्मों तथा अविद्या आदि क्लेशों की वासनाओं से रंगा = युक्त हुआ हुआ, चित्त होता है; और ऐसे चित्त की अविद्या रूपी अशुद्धि उसे वर्त्तमान जन्म में भी सांसारिक = बाह्य = प्रकृति के विकारों रूपी विषयों की ओर ही उन्मुख करती है, जिससे कर्म और क्लेशों की वासनाओं का बन्धन और भी सुदृढ हो जाता है। यह अशुद्धि तप के बिना शिथिल नहीं होती = नष्ट नहीं होती। मनुस्मृति १२.१०४ में भी कहा है — तपसा किल्विषं हन्ति। अर्थात् साधक तप से पापभावना एवम् अविद्या को नष्ट करता है।

तप क्या है ? इसके विषय में महर्षि व्यास योगसूत्र २.३२ के भाष्य में लिखते हैं — तपो द्वन्द्वसहनम्। द्वन्द्वं च जिघत्सापिपासे शीतोष्णे स्थानासने काष्ठमौनाकारमौने च। व्रतानि चैषां यथायोगं कृच्छ्रचान्द्रायणसान्तपनादीनि। अर्थात् तप द्वन्द्व = भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, स्थान-आसन और काष्ठ-मौन-आकार-मौन आदि को सहना तथा कृच्छ चान्द्रायणादि व्रतों का अनुष्ठान करना है। भोज ने भी दूसरे शास्त्रों में कहे हुए कृच्छ, चान्द्रायणादि व्रतों को तप कहा है। कृच्छ, चान्द्रायण व्रतों का वर्णन मनुस्मृति के प्रायश्चित्त प्रकरण में आया है। यथा ११.२११ में प्राजापत्य व्रत; ११.२१२-२१४ में कृच्छ सान्तपन व्रत; तथा ११.२१६-२१७ में चान्द्रायण व्रत की विधियों का वर्णन है।

उपर्युक्त द्वन्द्वों को सहन किस हेतु किया जाना चाहिए ? क्या अधर्माचरण हेतु ? क्या शास्त्रों में निषिद्ध एवं अविहित कर्मों को करने हेतु ? नहीं। शास्त्रों में तप के विषय में जो कहा है उसे ही पालन करने हेतु उपरोक्त द्वन्द्वों को सहन करना तप कहा जायेगा। यथा —

— सदा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होकर धर्मानुष्ठान करना तप है। (स० प्र० चतुर्थ समुल्लास)

— ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः शान्तं तपो दमस्तपश्शमस्तपो दानं तपो यज्ञस्तपो ब्रह्मभूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैतदुपास्वैतत्तपः॥ तैत्तिरीय० प्रपा॰ १०। अनु॰ ८। व० १॥

अर्थात् जो यथार्थ का ग्रहण, सत्य मानना, सत्य बोलना, वेदादि सत्य शास्त्रों का सुनना, अपने मन को अधर्माचरण में न जाने देना, श्रोत्रादि इन्द्रियों को दुष्टाचार से रोक श्रेष्ठाचार में लगाना, क्रोधादि के त्याग से शान्त रहना, विद्या आदि शुभ गुणों का दान करना, अग्निहोत्रादि और विद्वानों का संग कर जितने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्यादि लोकों में पदार्थ हैं, उनका यथाशक्ति ज्ञान कर और योगाभ्यास, प्राणायाम, एक ब्रह्म परमात्मा की उपासना कर, ये सब कर्म करना ही तप कहाता है॥ (संस्कारविधि वेदारम्भप्रकरण)

— वेदाभ्यासो हि विप्रस्य तपः परमिहोच्यते॥ मनु॰ २.१४१॥

निश्चयरूपेण ब्राह्मण = विद्वान् जन के लिए इस संसार में वेदाभ्यास करना परम तप कहा है।

— आ हैव स नखाग्रेभ्यः परमं तप्यते तपः।

यः स्रग्व्यपि द्विजोऽधीते स्वाध्यायः शक्तितोऽन्वहम्॥ मनु॰ २.१४२॥

जो द्विज गृहस्थी होकर भी प्रतिदिन पूर्ण शक्ति से = प्रयत्नपूर्वक वेदों का अध्ययन करता रहता है वह निश्चय ही पैरों के नाखून के अग्रभाग तक अर्थात् पूर्णतः श्रेष्ठ तप करता है।

— प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृता।

व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः॥ मनु॰ ६.७०॥

ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवित् पुरुष के द्वारा जो विधि के अनुसार प्रणव अर्थात् ओङ्कारपूर्वक और “भूः भुवः स्वः” आदि सप्त व्याहृतियों के द्वारा जप सहित तीन प्रकार के बाह्य, आभ्यान्तर और स्तम्भवृत्ति प्राणायाम किए जाते हैं, वह इसका परम तप होता है।

उपर्युक्त प्रकार का आचरण में लाया हुआ तप चित्त की प्रसन्नता = स्थिरता प्रदान करने वाला होता है। और कृच्छ, चान्द्रायण आदि व्रतों के सम्बन्ध में यह जानना चाहिए कि ये सभी व्रत यथाशक्ति ही करने चाहिए, जिससे शरीर में रोग-दोष आदि उत्पन्न होकर चित्त की स्थिरता को नष्ट न कर देवें। इसलिए महर्षि व्यास ने “अबाधमानम्” शब्द कहा है अर्थात् वे तपानुष्ठान चित्त की स्थिरता में बाधा उत्पन्न करने वाले न हों।

स्वाध्याय — स्वाध्याय में महर्षि व्यास ने प्रणव आदि पवित्र मन्त्रों का जप तथा मोक्षशास्त्रों का अध्ययन कहा है। प्रणव = ओङ्कार के जप के साथ अर्थभावना का भी निर्देश महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.२८ में दिया है। अर्थात् इस जप के साथ-साथ परमात्मा रूपी अर्थ का विचार भी करना चाहिए। ओ३म् के जप और अर्थभावना का वर्णन योगसूत्र १.२८ की व्याख्या में कर चुके हैं। स्वाध्याय में महर्षि व्यास ने मोक्षशास्त्रों के अध्ययन को भी कहा है। इसीप्रकार “अधिपूर्वक इङ् अध्ययने” से निष्पन्न “अध्याय” शब्द का अर्थ “स्वस्य अध्ययनं स्वाध्यायः” अर्थात् आत्म-चिन्तन भी स्वाध्याय के अन्तर्गत ही आता है।

महर्षि मनु ने २.१४२ में वेदों के स्वाध्याय को परम तप कहा है। वेद परमात्मा का ज्ञान होने से मोक्षविद्या के भी ग्रन्थ है। अतः वेदाध्ययन स्वाध्याय का परमावश्यक अंग है। ऋषियों ने स्वाध्याय के महत्त्व को समझते हुए इसे जीवन के प्रत्येक कर्मानुष्ठान के साथ जोड़ दिया है। यथा —

— ऋतं च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यं च स्वाध्यायप्रवचने च। तपश्च स्वाध्यायप्रवचने च। दमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। शमश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्नयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। अग्निहोत्रं च स्वाध्यायप्रवचने च। अतिथयश्च स्वाध्यायप्रवचने च। मानुषं च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजनश्च स्वाध्यायप्रवचने च। प्रजातिश्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यमिति सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः। स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि तपः॥ तैत्तिरीय आरण्यक ७.९॥

(ऋतं च०) यह सब मनुष्यों को उचित है कि अपने ज्ञान और विद्या को बढ़ाते हुए एक ब्रह्म ही की उपासना करते रहें। उसके साथ वेदादि शास्त्रों का पढ़ना-पढ़ाना भी बराबर करते जायें (सत्यं च०) प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से ठीक-ठीक परीक्षा करके जैसा तुम अपने आत्मा में ज्ञान से जानते हो, वैसा ही बोलो और उसी को मानो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (तपश्च०) विद्या-ग्रहण के लिए ब्रह्मचर्य आश्रम को पूर्ण करके सदा धर्म में निश्चित रहो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (दमश्च०) अपनी आँख आदि इन्द्रियों को अधर्म और आलस्य से छुड़ा के सदा धर्म में चलाओ। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (शमश्च०) अपने आत्मा और मन को सदा धर्म सेवन में ही स्थिर रखो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (अग्नयश्च०) तीनों वेद और अग्नि आदि पदार्थों से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को सिद्ध करो तथा अनेक प्रकार से शिल्प-विद्या की उन्नति करो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (अग्निहोत्रं च०) वायु और वृष्टिजल की शुद्धि द्वारा अग्निहोत्र से लेके अश्वमेघ पर्यन्त यज्ञों से सब सृष्टि का उपकार सदा करते रहो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (अतिथयश्च०) जो सब जगत् के उपकार के लिए सत्यवादी, सत्यकारी, पूर्ण विद्वान्, सबका सुख चाहने वाले हों, उन सत्पुरुषों के संग से करने के योग्य व्यवहारों को सदा बढ़ाते रहो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (मानुषं च०) सब मनुष्यों के राज्य और प्रजा के ठीक ठीक प्रबन्ध से धन आदि पदार्थों को बढ़ा के, रक्षा करके और अच्छे कामों में खर्च करके, उनसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारों फल की सिद्धि द्वारा अपना जन्म सफल करो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (प्रजा च०) अपने सन्तानों का यथायोग्य पालन, शिक्षा से विद्वान् करके, सदा धर्मात्मा और पुरुषार्थी बनाते रहो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (प्रजनश्च०) जो सन्तानों की उत्पत्ति करने का व्यवहार है उसको ‘पुत्रेष्टि’ कहते हैं, उसमें श्रेष्ठ भोजन और औषध सेवन सदा करते रहो तथा ठीक ठीक गर्भ की रक्षा भी करो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (प्रजातिश्च०) पुत्र और कन्याओं के जन्म समय में स्त्री और बालकों की रक्षा युक्तिपूर्वक करो। उसके साथ पढ़ना-पढ़ाना भी कभी न छोड़ो। (ऋ० भू॰ वेदोक्तधर्मविषय)

शतपथ ब्राह्मण में स्वाध्याय की प्रशंसा निम्न प्रकार से की है —

अथातः स्वाध्यायप्रशᳬसा। प्रिये स्वाध्यायेप्रवचने भवतो युक्तमना भवत्यपराधीनोऽहरहरर्थान् साधयते सुखं स्वपिति परमचिकित्सक आत्मनो भवतीन्द्रियसंयमश्चैकारामता च प्रज्ञावृद्धिर्यशोलोकपक्तिः॥१॥

ये ह वै के च श्रमाः। इमे द्यावापृथिवीऽअन्तरेण स्वाध्यायो हैव तेषां परमता काष्ठा य एवं विद्वान्त्स्वाध्यायमधीते तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ॥२॥

यदि ह वा अप्यभ्यक्तः। अलंकृतः सहितः सुखे शयने शयानः स्वाध्यायमधीतऽआ हैव स नखाग्रेभ्यस्तप्यते य एवं विद्वान् स्वाध्यायमधीते तस्मात्स्वाध्यायोऽध्येतव्यः ॥४॥ शतपथ० ११.५.७.१,२,४॥

अर्थात् स्वाध्याय और प्रवचन, ये दोनों प्रिय वस्तु हैं क्योंकि इस कर्म से उसका मन तत्त्वयुक्त होता, किसी के अधीन नहीं रहता। प्रतिदिन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को सिद्ध करता, सुख से जीवन व्यतीत करता, अपने आत्मा का परमवैद्य बनता, इन्द्रियों का संयम होता और ब्रह्म में अनवच्छिन्न विश्रान्ति लाभ करता। इसप्रकार प्रज्ञा की वृद्धि होती और यश, ऐहिक और पारलौकिक सुख की परिपक्वता होती॥ १॥ इस द्यावापृथिवी के मध्य जो कोई श्रम = तपस्यायें हैं, उन तपस्याओं में स्वाध्याय ही परमकाष्ठा है, जो ऐसा जानता हुआ स्वध्याय करता है, इस हेतु स्वाध्याय = वेद का अध्ययन करना चाहिए॥२॥ यदि वह शरीर में तैलादि युक्त हो, विविध भूषणों से अलंकृत हो, अथवा समाहित हो, अथवा अच्छे शयन पर सोता हुआ अर्थात् किसी अवस्था को प्राप्त हो, किसी समय में वेद को पढ़ता है वह अध्येता शिर से लेकर नख पर्यन्त तपस्या ही करता है॥४॥ इसका भाव यह है कि येन केन प्रकरेण वेदशास्त्र अवश्य पढ़ना चाहिए। इसके लिये यदि व्रत हो सके तो अच्छा है, यदि व्रत न हो, भूषणादि का त्याग न कर सके, गृह को भी न छोड़ सके, पृथिवी पर न शयन करके अच्छे आसन पर शयन करे, तब भी कोई क्षति नहीं, परन्तु स्वाध्याय अवश्य करे। स्वाध्याय का किसी भी अवस्था में परित्याग न करे, क्योंकि यही एक बड़ी भारी सबसे श्रेष्ठ तपस्या है।

वेदोपकरणे चैव स्वाध्याये चैव नैत्यके। नानुरोधोऽस्त्यनध्याये होममन्त्रेषु चैव हि॥ मनु॰ २.८०॥

वेद के पठन-पाठन में और नित्यकर्म = सन्ध्योपासन में तथा यज्ञ करने में अनध्याय का विचार या आग्रह नहीं होता अर्थात् इन्हें प्रत्येक स्थिति में करना चाहिए।

स्वाध्याय से कृतकृत्यता दिखाते हुए कहा है —

सर्वान्परित्यजेदर्थान्स्वाध्यायस्य विरोधिनः। यथातथाऽध्यापयंस्तु सा ह्यस्य कृतकृत्यता॥ मनु॰ ४.१७॥

जो स्वाध्याय और धर्म विरोधी व्यवहार वा पदार्थ हैं उन सबको छोड़ देवे; जिस किसी प्रकार से विद्या को पढ़ाते रहना ही गृहस्थ का कृतकृत्य होना है।

— स्वाध्याये चैव युक्तः स्यान्नित्यमात्महितेषु च॥ मनु॰ ४.३५॥

व्यक्ति को चाहिए कि प्रतिदिन वेदों के स्वाध्याय और अपनी आत्मा की उन्नति में लगा रहे।

— स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दैवे चैवेह कर्मणि॥ मनु॰ ३.७५॥

मनुष्य को चाहिए कि वह पढ़ने-पढ़ाने और सन्ध्योपासन अर्थात् ब्रह्मयज्ञ में नित्य लगा रहे।

— स्वाध्यायेन जपैर्होमैस्त्रैविद्येनेज्यया सुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥ मनु॰ २.३॥

(स्वाध्यायेन) पढ़ने-पढ़ाने (जपैः) विचार करने-कराने, नानाविध होम के अनुष्ठान, सम्पूर्ण वेदों को शब्द, अर्थ, सम्बन्ध, स्वरोच्चारणसहित पढ़ने-पढ़ाने ... ... से यह शरीर ब्राह्मण का किया जाता है॥

— यथा यथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।

तथा तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते॥ मनु॰ ४.२०॥

क्योंकि जैसे-जैसे मनुष्य शास्त्रों को यथावत् जानता है, वैसे-वैसे उस विद्या का विज्ञान बढ़ता जाता, उसी में रुचि रहती है।

इस प्रकार स्वाध्याय के अनुष्ठान के बिना योगमार्ग पर आगे बढ़ना किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है।

ईश्वरप्रणिधान — क्रियायोग के तीसरे साधन के रूप में परम महत्त्वपूर्ण ईश्वरप्रणिधान का विधान किया गया है। यह न केवल उच्चस्तर के साधकों के लिए समाधि सिद्धि का साधन है, वरन् यह आरम्भिक साधकों = योग में प्रवेश हेतु इच्छुक पुरुषों के लिए भी अत्यन्त आवश्यक है। ईश्वर प्रणिधान का अर्थ है “पुरुष अपनी सभी क्रियाओं को परम गुरु परमात्मा के समर्पित कर देवे तथा उसके फल की चाहना = अभिलाषा = कामना को भी त्याग देवे।” पुरुष के लिये हृदय में आसक्ति, राग, द्वेष, लोभ आदि दोषों के निराकरण हेतु, इससे अधिक सुगम उपाय नहीं हो सकता। ईश्वरप्रणिधान द्वारा पुरुष लौकिक आकर्षणों, ऐषणाओं, द्वन्द्वों, क्लेशों से मुक्त हो जाता है। यह ईश्वरप्रणिधान पूर्णरूपेण तभी सम्भव हो सकता है, जब पुरुष ईश्वर को अपना लक्ष्य मानता हुआ, उसे ही अपना परम गुरु मानकर, उसकी आज्ञा के अनुकूल होने के लिए प्रयत्नशील हो जाता है। जितना-जितना वह ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल होता जाता है, जितना-जितना ईश्वर का ज्ञान उसके हृदय में बढ़ता जाता है, उतना-उतना ईश्वरप्रणिधान का स्तर बढ़ता जाता है।

जब कर्मों के फल का परित्याग हो जाता है, तो लौकिक आकर्षण, प्रकृति का आकर्षण छूट जाता है; इस प्रकार द्वन्द्वों = सुख-दुःख, मान-अपमान, लाभ-हानि से भी छूट जाता है। और जब ईश्वर परमप्रिय हो जाता है तो लोकैषणा, वित्तैषणा, पुत्रैषणा भी छूट जाती हैं; और जब ऐषणायें ही छूट जाती हैं, तो ईश्वर ही लक्ष्य एवं आधार हो जाता है। ईश्वर-प्रणिधान पर विशेष व्याख्यान योगसूत्र १.२३ की व्याख्या में देखें।

महर्षि पतञ्जलि इस क्रियायोग का फल अगले सूत्र में कहते हैं — इससे अविद्यादि क्लेशों को सूक्ष्म किया जाता है, और समाधि को उत्पन्न किया जाता है।