Donation Appeal Download Our App
Saadhana Paada / Means / 36
Choose Sutra
Saadhana Paada / Means / 36

सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्॥३६॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 36

In Hindi:

पदपाठ : सत्यप्रतिष्ठायाम् क्रियाफलाश्रयत्वम्॥

हिंदी में अर्थ : (सत्यप्रतिष्ठायाम्) मन, वाणी और शरीर से सत्य की वितर्करहित प्रतिष्ठा हो जाने पर (क्रियाफलाश्रयत्वम्) योगी की क्रिया में फल का आश्रय हो जाता है अर्थात् उसके कर्म सफल = उत्तम फल वाले होते हैं॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (सत्यप्र०) तथा सत्याचरण का ठीक-ठीक फल यह है कि जब मनुष्य निश्चय करके केवल सत्य ही मानता, बोलता और करता है, तब वह जो-जो योग्य काम करता और करना चाहता है, वे-वे सब सफल हो जाते हैं। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : धार्मिको भूया इति भवति धार्मिकः। स्वर्गं प्राप्नुहीति स्वर्गं प्राप्नोति। अमोघास्य वाग्भवति॥

हिंदी में अर्थ : योगी द्वारा सत्य प्रतिष्ठा हो जाने पर अन्य पुरुष को (धार्मिकः भूयाः) धार्मिक हो जाओ = धर्माचरण करने वाले बनो (इति) इस प्रकार कहने पर, वह व्यक्ति (धार्मिकः भवति) धार्मिक हो जाता है। और यदि वह कहे कि (स्वर्गम् प्राप्नुहि) स्वर्ग = सुख को प्राप्त करो (इति) इस प्रकार कहने पर, वह व्यक्ति (स्वर्गम् प्राप्नोति) स्वर्ग = सुख को प्राप्त करता है। इस प्रकार (अस्य) इस योगी की (वाक्) वाणी (अमोघा) यथार्थ = व्यर्थ न होने वाली (भवति) होती है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में सत्य की प्रतिष्ठा का फल कहा है। जो योगी मन, वाणी और शरीर से सर्वथा और सर्वदा = सभी कालों में बिना किसी प्रकार के वितर्क = अपवाद के सत्य का पालन करता है, उस योगी की वाणी यथार्थ = अमोघ फल वाली हो जाती है। महर्षि व्यास कहते हैं कि ऐसा योगी अगर अन्य किसी पुरुष को यह कहता है कि “तुम धार्मिक बन जाओ, धर्माचरण करो” तो वह व्यक्ति उस योगी के प्रभाव से धार्मिक हो जाता है। इसी प्रकार योगी यदि किसी को कहता है कि स्वर्ग = सुख को प्राप्त करो तो वह व्यक्ति सुख को प्राप्त करता है।

क्रियाफलाश्रयत्वम् की भावना वेद में निम्न प्रकार से मिलती है —

— जो मनुष्य सत्य का आचरण करते हैं उनकी कामना की पूर्त्ति कभी विघ्नयुक्त नहीं होती है॥ (ऋ० ६.१६.१८ का भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती)

— जो सत्य बोलने वाले, सत्य करने और सत्य मानने वाले होते हैं, वे पूर्ण कामना वाले होकर सब मनुष्यों को विद्वान् बना सकते हैं॥ (ऋ० ७.४३.४ का भावार्थ — महर्षि दयानन्द सरस्वती)

अतः वेद में सत्याचरण करने वाले योगियों की कामना की निर्विघ्न पूर्त्ति की भावना को महर्षि व्यास ने क्रियाफलाश्रयत्वम् के रूप में कहा है।

परन्तु इसमें यह विचारना चाहिए कि — क्या सत्यप्रतिष्ठा युक्त योगी के कहने मात्र से किसी भी मनुष्य में धार्मिकता आ जायेगी ? अथवा क्या कोई भी पापी मनुष्य योगी के वचन मात्र से सुख को भी प्राप्त कर लेगा? ऐसा कहना और मानना किस सीमा तक उचित है ? महाभारत काल में भी श्रीकृष्ण और महर्षि व्यास जैसे योगियों द्वारा कहने, समझाने और विनाश का भय दिखाने के बाद भी धृतराष्ट और दुर्योधन आदि में धार्मिकता नहीं आयी और महाभारत का युद्ध होने से भयंकर विनाश हो गया। तो क्या श्रीकृष्ण और महर्षि व्यास सत्यप्रतिष्ठा वाले योगी नहीं थे ? ऐसा कहना तो मात्र दुराग्रह ही होगा !!!

इसी प्रकार सत्यव्रत का आधार, सर्वदा सत्यनिष्ठ परम कारुणिक परमात्मा जीवों के कल्याण हेतु सत्यव्रत के आचरण द्वारा धार्मिक होने का आदेश वेद में देता है, और सभी मनुष्यों के हृदय में प्रत्येक कर्म के आरम्भ में ही उत्साह अथवा भय द्वारा, कर्म के शुभ = धर्मयुक्त और अशुभ = अधर्मयुक्त होने का निर्देश भी करता है; परन्तु क्या सभी जीव इतने मात्र से धार्मिक हो जाते हैं ? केवल वही जीव जो परमात्मा के उपदेश को वेद में पढ़ते, हृदय से सुनते और अपनाते, वही धार्मिक होते, शेष नहीं। अतः जो योगी के उपदेशों को सुनकर भी, अविद्यादि दोषों तथा कुसंस्कारों एवं कुसंगति के कारण तदनुकूल आचरण नहीं करता, वह धार्मिक नहीं हो सकता, सुखी नहीं हो सकता।

अतः इस सूत्र पर महर्षि दयानन्द ने कहा है कि “तब वह जो-जो योग्य काम करता और करना चाहता है, वे-वे सब सफल होते हैं।” अतः यहाँ उसके हो सकने योग्य सभी काम ही सफल होंगे। अतः योगी उन्हीं लोगों को “धार्मिक हो जाओ” कहेगा, जहाँ ऐसी सम्भावना होगी अन्यथा नहीं।

वेदादि सत्यशास्त्रों में विहित कर्मों को करने से मनुष्य को सुख की प्राप्ति होती है; परन्तु योगी को मन, वाणी और शरीर से सभी कालों में सत्यपालन से सभी प्रकार के सुखों की प्राप्ति वर्त्तमान और भावी जन्मों में होती है। क्योंकि सत्यव्रत के पालन को ही वेद में सर्वश्रेष्ठ व्रत कहा है। यथा यजुर्वेद १.५ के भावार्थ में महर्षि दयानन्द लिखते हैं — “परमेश्वर ने सब मनुष्यों को नियम से सेवन करने योग्य धर्म का उपदेश किया है जो कि न्याययुक्त परीक्षा किया हुआ सत्य लक्षणों से प्रसिद्ध और सब का हितकारी तथा इस लोक अर्थात् संसारी और परलोक अर्थात् मोक्षसुख का हेतु है, यही सब को आचरण करने योग्य है। ”

वेद में सत्याचरण के फलों को निम्न प्रकार से कहा है —

— जो सत्यभाषण आदि धर्म के अनुष्ठान करने वाले योगी, अभय दान देने वाले हैं, वे पाप और मोह का त्याग करके विज्ञान को प्राप्त होकर सुखी होते हैं। (ऋ० ६.३.२)

— परमात्मा से आनन्द की प्राप्ति साधक को सत्याचरण से ही होती है। (सामवेद १३९५)

— परमात्मा सत्य से प्रसिद्ध = युक्त हृदय में प्रकाशित होता है। (सामवेद ५४)

मुण्डकोपनिषद् का ऋषि इसको इस रूप में कहता है —

सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥ (मुण्डक० ३.१.५) अर्थात् परमात्मा सत्य से, तप से, सम्यक् ज्ञान से और ब्रह्मचर्य के निरन्तर सेवन से प्राप्त होता है।

अतः योगी को सत्यव्रत के आचरण से ही सभी प्रकार के लौकिक और पारलौकिक सुखों तथा परमात्मा और मोक्षसुख की प्राप्ति होती है।