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Saadhana Paada / Means / 35
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Saadhana Paada / Means / 35

अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः॥३५॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 35

In Hindi:

पदपाठ : अहिंसाप्रतिष्ठायाम् तत् सन्निधौ वैरत्यागः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : प्रतिपक्षभावनाहेतोर्हेया वितर्का यदाऽस्य स्युरप्रसवधर्माणस्तदा तत्कृतमैश्वर्यं योगिनः सिद्धिसूचकं भवति। तद्यथा —

हिंदी में अर्थ : (यदा) जब (अस्य) इस योगी के (प्रतिपक्षभावनाहेतोः) प्रतिपक्ष भावना के कारण (हेयाः) त्याग करने योग्य = छोड़ने योग्य (वितर्काः) हिंसादि वितर्क (अप्रसवधर्माणः स्युः) अप्रसवधर्मी = कार्योत्पादन करने में असमर्थ हो जाते हैं (तदा) तब उस वितर्क रहित अवस्था में (तत्कृतम् एश्वर्यम्) यमनियम के पालन से प्राप्त होने वाला ऐश्वर्य (योगिनः) योगी की (सिद्धिसूचकम्) सिद्धि का सूचक (भवतिः) होता है। (तद् यथा) वह जैसे —

हिंदी में अर्थ : (अहिंसाप्रतिष्ठायाम्) अहिंसा की प्रतिष्ठा होने पर (तत्सन्निधौ) उस अहिंसा पालन करने वाले योगी की सन्निधि में (वैरत्यागः) (तदनुकूल आचरण करने पर संग करने वाले का) वैर का त्याग हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (अहिंसा प्र०) अर्थात् जब अहिंसा धर्म निश्चय हो जाता है, तब उस पुरुष के मन से वैरभाव छूट जाता है, किन्तु उसके सामने वा उसके संग से अन्य पुरुष का भी वैरभाव छूट जाता है। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : सर्वप्राणिनां भवति॥

हिंदी में अर्थ : (सर्वप्राणिनाम् भवति) (उस योगी के संग से) सभी प्राणियों का वैरभाव छूट जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं कि “जब अहिंसा धर्म निश्चय हो जाता है, तब उस पुरुष के मन से वैरभाव छूट जाता है, किन्तु उसके सामने वा उसके संग से अन्य पुरुष का भी वैरभाव छूट जाता है।” योगी का तो, अहिंसाव्रत के पालन से ही, सभी प्राणियों के प्रति वैरभाव छूट जाता है, क्योंकि अहिंसा का अर्थ ही कि “सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः” अतः सभी भूतों = प्राणियों के प्रति, सब प्रकार से और सब काल में द्रोह = वैर की भावना का ही त्याग होने से, उस योगी का तो सभी प्रणियों के प्रति वैरत्याग स्वाभाविक रूप से हो जाता है। सूत्रकार इस अहिंसाव्रत के परिपालन से उस योगी की सन्निधि में वैरत्याग रूपी फल को कहते हैं और महर्षि व्यास उसपर भाष्य करते हुए कहते हैं कि “सर्वप्राणिनां भवति” अर्थात् उस अहिंसाव्रत पालक की सन्निधि = संग से सभी प्राणियों का वैरत्याग हो जाता है।

अहिंसा का पालन करते हुए जब योगी हिंसा रूपी वितर्क के दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फलों को जानकर, उस हिंसा के सर्वरूपों का सर्वथा और सर्वदा के लिए परित्याग करता हुआ, अहिंसा को ही अपना लेता है, तो उसके चित्त में सभी प्राणियों के प्रति वैरभाव का त्याग हो जाता है। ऐसा साधक अहिंसा के अभ्यास में इतना परिपक्व हो जाता है कि वह अपने आचरण से दूसरों पर भी प्रभाव को छोड़ता है, तथा उसके उपदेशानुसार आचरण करने वाले अन्य व्यक्तियों का भी वैरभाव छूटने लगता है।

सामान्य रूप से भाष्यकारों ने इसका अभिप्राय इस प्रकार से कहा है — उस योगी की सन्निधि में आने वाले हिंसक स्वभाव के व्यक्ति अथवा प्राणी भी, उसकी अहिंसा सिद्धि के प्रभाव से उसके और दूसरों के प्रति वैर का त्याग कर देते हैं, और कोई भी उस योगी के प्रति किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता और न ही उसके समीप में दूसरे प्राणियों से ही वैर करते हैं। इससे जनसामान्य में इस प्रकार की भ्रान्ति भी उत्पन्न हो गई कि जिस किसी साधक के प्रति दूसरे प्राणी वैर रखते हैं, उसका अहिंसाव्रत अभी सिद्ध नहीं हुआ और वह योगी नहीं है। परन्तु यह मान्यता सत्य नहीं है, अतः इसके वास्तविक रहस्य को समझने हेतु इस सूत्र के दो पदों के रहस्य को समझना आवश्यक है — १. वैरत्याग और २. सन्निधि।

१. वैरत्याग का अभिप्राय यह है कि किसी भी प्राणी के प्रति द्रोह = वैर की भावना का न होना। यदि वह व्यक्ति बिना किसी द्रोह = वैर के किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति अधिकारपूर्वक, क्रोध (=मन्यु) करता हुआ, अथवा दण्ड आदि देता हुआ उसे कष्ट देता है अथवा उसकी मृत्यु भी कारित कर देता है, तो ऐसा क्रोध (=मन्यु) एवं दण्ड, हिंसा की श्रेणी में नहीं आता। जैसे कि पिता द्वारा अपने बालक को उसके दोष पर दण्ड देना; अथवा सामाजिक न्यायव्यवस्था में मृत्यु दण्ड प्राप्त व्यक्ति को वधिक (जल्लाद) द्वारा फाँसी पर चढ़ाना। इन दोनों ही स्थितियों में दोनों ही व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को, अधिकारपूर्वक शारीरिक कष्ट प्रदान करते हुए भी हिंसक नहीं कहलाते, क्योंकि उनका ऐसा कार्य वैरपर्वूक नहीं है। अतः यहाँ हिंसा का पालन नहीं हो रहा।

वस्तुतः योगसूत्र २.३० की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि अनभिद्रोह = वैरत्याग का अभिप्राय है कि लोभ, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि पूर्वक अन्य प्राणियों का अनिष्ट, हानि का न करना तथा न ऐसी कोई भावना ही चित्त में रखना।

२. सन्निधि का अभिप्राय सामान्य रूप से समीपता और वह भी देशिक समीपता ही माना जाता है। महर्षि दयानन्द ने इसके लिए “संग” शब्द का भी प्रयोग किया है, जिसका अभिप्राय है कि उसकी संगति से। उस योगी की ज्ञानपूर्वक संगति से ऐसा होना असंभव नहीं है। अतः यहाँ मात्र देशिक सन्निधि = समीपता नहीं, वरन् मानसिक एवं बौद्धिक सन्निधि = संगति का होना ही महत्त्वपूर्ण है।

अतः केवल मात्र उस योगी की देशिक सन्निधि = समीपता से किसी हिंसक प्राणी या व्यक्ति का वैरभाव सामान्यतः नहीं छूटता। यदि देशिक सन्निधि से ही सभी प्राणियों का वैरत्याग माना जाये तो इस पक्ष में निम्न दोष आते हैं —

१. परमात्मा को वेद में अहिंसक कहा है। यथा —

अरुषम् = अहिंसकं (ईश्वरम्) (ऋ० १.६.१);

अदब्धः = अहिंसिता = अहिंसक (ईश्वरः) (ऋ० १.८९.५);

अदब्धः = हिंसारहित (परमात्मा) (यजु॰ २५.१८)।

परमात्मा के सर्वव्यापक होने से, सभी प्राणी = जीवात्मा, सर्वकाल में ही उसकी देशिक सन्निधि में हैं। सभी जीवों के, अहिंसक परमात्मा की अत्यन्त सन्निधि में होते हुए भी हम देखते हैं कि हिंसा करने वाले मनुष्यों का दूसरों प्राणियों और मनुष्यों के प्रति अत्याचार, वैर आदि नहीं छूटते। इसी प्रकार विभिन्न योनियों में मांसभक्षी पशु-पक्षी परमात्मा की व्यवस्था के अनुसार ही जातिगत स्वाभाविक हिंसा आदि का आचरण करते हुए, अपने कर्मफलों को भोग रहे हैं, जैसे कि सर्प और नेवले का वैर, सिंह आदि प्राणियों का दूसरे प्राणियों को अपने आहार हेतु मारना आदि। मानवों द्वारा भी मांस के भक्षण आदि हेतु विभिन्न प्राणियों की हिंसा, अथवा अपने निहित स्वार्थों हेतु दूसरे मनुष्यों के प्रति वैरपूर्वक हिंसा की जाती है। अतः सर्वव्यापक परमात्मा की अत्यन्त देशिक समीपता होते हुए भी, इन सभी प्राणियों का अन्य प्राणियों के प्रति वैर भाव नहीं छूटता, तो क्या परमात्मा का अहिंसक न माना जाए?

अतः जब तक मनुष्य परमात्मा को सर्वव्यापक जानते हुए, सर्वस्थानों में उसकी उपस्थिति एवं प्रत्यक्षता को अनुभव नहीं करता, तथा परमात्मा की न्यायव्यवस्था को न जानता होने से, उसका दूसरे प्राणियों के प्रति वैरत्याग नहीं हो सकता। जबकि उपर्युक्त प्रकार से परमात्मा की बौद्धिक सन्निधि = संगति ही, मनुष्यों के लिये, सभी प्राणियों प्रति वैरत्याग का आधार बनती है।

२. इस प्रकार से मानवेतर योनियों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए। मांसभक्षी परजीवी प्राणी भी, केवल किसी भी अहिंसाव्रत पालक योगी की देशिक सन्निधि मात्र से, अपने आहार आदि हेतु दूसरे प्राणियों का वध करना नहीं छोड़ते; वरन् क्षुधा पीडि़त होने पर, आहार हेतु किसी को मारकर खाना उनका स्वाभाविक गुण, परमात्मा की व्यवस्था में ही है। दूसरी ओर यह तो सम्भव है कि किसी अहिंसक योगी की समीपता में रहते हुए, उसके अपने प्रति प्रेमपूर्वक व्यवहार को जानते हुए, वे हिंसक प्राणी उसके प्रति हिंसा न करें। इस विषय में पंचतन्त्र का यह श्लोक द्रष्टव्य है —

सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान् प्रियान्पाणिनेर्मीमांसाकृतमुन्ममाथ सहसा हस्ती मुनिं जैमिनिम्।

छन्दोज्ञाननिधिं जघान मकरो वेलातटे पिङ्गलम् अज्ञानावृतचेतसामतिरुषां कोऽर्थस्तिरश्चां गुणैः ?

॥ पंचतन्त्र मित्रसम्प्राप्ति ३६॥

अर्थात् व्याकरणशास्त्र के कर्त्ता पाणिनि मुनि को सिंह ने मार डाला था। मीमांसा के रचयिता जैमिनि मुनि को एक हाथी ने कुचल डाला था, और छन्दशास्त्र के प्रवर्तक पिङ्गल को समुद्र के किनारे ग्राह = मगरमच्छ ने मार डाला था। अतः इससे सिद्ध है कि अज्ञानी अविवेकी तथा क्रोधी पशुओं को किसी के गुणों से क्या प्रयोजन हो सकता है ?

क्या इन सभी शास्त्रों को रचने वाले आचार्यों को भी हिंसा आदि में प्रवृत्त अयोगी मान लें? यहाँ भी देशिक सन्निधि मात्र होते हुए भी, दूसरे प्राणियों द्वारा इन अहिंसाव्रत पालक योगियों / विद्वानों की मृत्यु हो गयी।

३. इसी प्रकार महर्षि दयानन्द जी का जीवन भी द्रष्टव्य है। वे स्वयं एक उच्च कोटि के योगी थे। उन्होंने सभी प्राणियों के प्रति हमेशा दया रखी, किसी से भी किसी प्रकार का वैरभाव उनके हृदय में नहीं था। परन्तु उनके जीवनकाल में बहुत से मनुष्य उनके प्रति, निजी स्वार्थों के कारण, वैरभाव रखते थे जिसके कारण उन्हें कई बार विष दिया गया तथा अन्त में इस विष के कारण ही उनकी मृत्यु भी हो गयी। ये सभी हन्ता, वैरभाव पाले हुए व्यक्ति, स्वामी जी की देशिक सन्निधि में होते हुए भी, अपने वैर का त्याग स्वामीजी के प्रति ही न कर सके, दूसरों की तो कथा ही क्या? ऐसे में क्या स्वामी जी का अहिंसा व्रत असिद्ध माना जाये; जबकि उन्होंने अपने किसी भी विषदाता को किसी प्रकार का न तो दण्ड दिया और न ही दण्ड दिलाने का प्रयास किया; और तो और अपने अन्तिम विषदाता को तो स्वयं ही धन देकर उसे दूर भगा दिया। इसी प्रकार अन्य वैरभाव रखने वाले मनुष्यों को भी वे हमेशा क्षमा ही करते रहे।

अतः जो-जो व्यक्ति उस अहिंसा पालक योगी की मानसिक और बौद्धिक स्तर पर जितनी अधिक सन्निधि = संगति को प्राप्त होता है, और उसके गुणों को जितना-जितना आत्मसात् करता है उसके चित्त में उतना-उतना वैरत्याग होता जाता है।