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Samaadhi Paada / Trance / 16
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Samaadhi Paada / Trance / 16

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥१६॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 16

In Hindi:

पदपाठ : तत् परम् पुरुषख्यातेः गुणवैतृष्ण्यम्॥

हिंदी में अर्थ : (पुरुषख्यातेः) पुरुष = जीवात्मा का साक्षात् होने से जो (गुणवैतृष्ण्यम्) सत्त्व, रज और तम गुणों के प्रति तृष्णा = वासना का अभाव होना है, (तत्परम्) वह पर-वैराग्य कहलाता है।

व्यास भाष्य : दृष्टानुश्रविकविषयदोषदर्शी विरक्तः। पुरुषदर्शनाभ्यासात्तच्छुद्धिप्रविवेकाप्यायितबुद्धिर्गुणेभ्यो व्यक्ताव्यक्तधर्मकेभ्यो विरक्त इति। तद् द्वयं वैराग्यम्। तत्र यदुत्तरं तज्ज्ञानप्रसादमात्रम्। यस्योदये सति योगी प्रत्युदितख्यातिरेवं मन्यते — प्राप्तं प्रापणीयं, क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशाः, छिन्नः श्लिष्टपर्वा भवसंक्रमः, यस्याविच्छेदाज्जनित्वा म्रियते मृत्वा च जायत, इति। ज्ञानस्यैव परा काष्ठा वैराग्यम्। एतस्यैव हि नान्तरीयकं कैवल्यमिति॥

हिंदी में अर्थ : (दृष्टानुश्रविकविषयदोषदर्शी) दृष्ट और आनुश्रविक विषयों में दोषों = नश्वरता, परिणाम, राग, द्वेष और दुःख आदि को देखने वाला (विरक्तः) विषयों से विरक्त = रागद्वेष से रहित = अपर वैराग्य को प्राप्त हुआ (पुरुषदर्शनाभ्यासात्) पुरुष = आत्म दर्शन के अभ्यास से (तत् शुद्धेः) उस पुरुष = जीवात्मा की शुद्धि अर्थात् निर्मलता के द्वारा (प्रविवेकः) प्रकृष्ट विवेकज्ञान से (आप्यायितबुद्धिः) परिपूर्ण = विकसित बुद्धिवाला होकर (व्यक्ताव्यक्तधर्मकेभ्यः गुणेभ्यः) अभिव्यक्त धर्मवाले और अनभिव्यक्त धर्म वाले सत्त्व, रज और तम गुणों से (विरक्तः इति) विरक्त हो जाता है, अर्थात् पर-वैराग्य को प्राप्त हो जाता है। (तद्) वह (द्वयम्) दो प्रकार का (वैराग्यम्) वैराग्य है — १. अपर और २. पर॥ (तत्र) उन दोनों वैराग्यों में (यत्) जो (उत्तरम्) दूसरा वैराग्य है (तत्) वह (ज्ञानप्रसादमात्रम्) ज्ञान का चरमकोटि विकास है। (यस्य उदये) जिस (ज्ञानप्रसाद) के उदय होने पर (प्रत्युदितख्यातिः सति) उदित हो गई है परमात्मदर्शन से ख्याति जिसकी अर्थात् (योगी) परमात्मदर्शी योगी (एवम् मन्यते) यह मानता है कि (प्राप्तम् प्रापणीयम्) प्राप्त करने योग्य प्राप्त हो गया है; (क्षीणाः क्षेतव्याः क्लेशाः) क्षीण करने योग्य पाँचों क्लेश नष्ट हो गये हैं (श्लिष्टपर्वा) जकड़े हुए = सम्मिलित पर्वो वाला (भवसंक्रमः) संसार चक्र = एक देह से दूसरे देह की प्राप्ति रूप संसार का आवागमन का चक्र (छिन्नः) छिन्न-भिन्न हो गया है (यस्य) जिस संसार चक्र के (अविच्छेदात्) विच्छेद = छिन्न-भिन्न न होने से प्राणी (जनित्वा) उत्पन्न होकर (म्रियते) मरता है (च) और (मृत्वा) मरकर (जायत इति) जन्म लेता रहता है।

(ज्ञानस्य) ज्ञान की (एव) ही (पराकाष्ठा) पराकाष्ठा = उत्कृष्ट सीमा (वैराग्यम्) वैराग्य है। (हि) क्योंकि (एतस्य एव) इसी पर-वैराग्य = ज्ञान का ही (न अन्तरीयकम्) अविनाभावी = अवश्यम्भावी होने वाला (कैवल्यम् इति) मोक्षरूप फल है॥

वैदिक योग मीमांसा : वृत्तिनिरोध के उपाय वैराग्य के उत्कृष्ठ स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा है कि साधक आत्मदर्शी होकर सत्त्व, रज और तम गुणों के प्रति भी तृष्णा रहित हो जाता है। अपर-वैराग्य, प्रकृति के कार्य = विकारों तथा जीव के कर्मबन्धनों के हेतु दृष्ट और आनुश्रविक विषयों से तृष्णा रहित होने का नाम है; तो परवैराग्य प्रकृति के मूलभूत रूप = सत्त्व रज और तम गुणों से भी तृष्णा रहित होने का नाम है। जब तक पुरुष इस कार्य और कारण प्रकृति के प्रति तृष्णा रहित नहीं होता तब तक उसके लिए अपने परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त करना सम्भव नहीं होता। वेद में इसी को सम्भूति और असम्भूति की उपासना के रूप में कह कर उसका परिणाम इस प्रकार बताया है —

अ॒न्धतमः॒ प्र वि॑शन्ति॒ ये ऽ सं॑भूतिमु॒पास॑ते।

ततो॒ भूय॑ऽइव॒ ते तमो॒ य ऽ उ॒ सम्भू॑त्याᳬर॒ताः॥ यजु॰ ४०.९॥

अर्थ — जो लोग परमेश्वर को छोड़कर असम्भूति अर्थात् अनादि, जिसकी उत्पत्ति कभी नहीं होती, सत्त्व, रज और तम गुण रूप प्रकृति नामक जड़ वस्तु को उपासनीय समझते हैं, वे ढकने वाले अन्धकार में अच्छी तरह से प्रविष्ट होते है। जो लोग सम्भूति अर्थात् महत्तत्त्वादि स्वरूप में परिणत हुई सृष्टि में रमण करने वाले हैं, वे निस्सन्देह उससे कहीं अधिक अविद्यारूप अन्धकार में प्रविष्ट होते हैं। (स्वामी दयानन्द सरस्वती)।

अर्थात् जब तक कार्य प्रकृति और कारण प्रकृति से जीवात्मा तृष्णारहित नहीं होता, और इन्हें ही लक्ष्य समझ कर इन्हीं के सेवन = भोग में संलग्न रहता है; तब तक जीवात्मा का कल्याण किसी भी दृष्टि से, किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं होता। इस प्रकार वह अविद्याग्रस्त रहता हुआ जन्म-मरण के संसारचक्र में लगा हुआ निरन्तर दुःखों को ही प्राप्त करता रहा है, और करता रहेगा।

अतः महर्षि पतञ्जलि ने आरम्भ में दृष्ट और आनुश्रविक विषयों से तृष्णा रहित होने को वैराग्य कहा है। क्योंकि जीवात्मा जन्म-मरण रूपी संसार चक्र में, अनन्त काल से, भ्रमण करता हुआ इन्हीं विषयों में ही आकर्षित और संलग्न रहता हुआ, इन्हीं को भोगता हुआ, दुःखों से सन्तप्त रहा है। इस वैराग्य के आधार पर पुरुष सम्प्रज्ञात समाधि = वितर्कानुगत और विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधियों में प्रकृति के स्थूल विकारों पृथिवी आदि महाभूतों से लेकर प्रकृति के प्रथम एवं सूक्ष्मतम विकार महत्तत्त्व तथा मूल प्रकृति का सम्यक् ज्ञान प्राप्तकर; तदुपरान्त इनके सम्यक् ज्ञान = साक्षात्कार से उत्पन्न सुखविशेष के आश्रय से हुई आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि को भी प्राप्त कर; और उसे भी लक्ष्य न मानते हुए, अतः उससे भी विरक्त होकर, अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में स्वयं का = आत्मा का सम्प्रज्ञान प्राप्त करता है। इसी के सम्यक् अभ्यास से धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होती है। इस अवस्था में पुरुष को अपने चेतन स्वरूप के समक्ष जड़ प्रकृति और उसके विकार हेय लगते हैं; और ऐसी अवस्था में वह योगी अविद्यादि दोषों तथा शुभ-अशुभ-मिश्रित कर्मों से निवृत्त होकर प्रकृष्ट विवेकज्ञान के द्वारा व्यक्त और अव्यक्त धर्मवाले सत्त्व, रज और तम गुणों से भी तृष्णा रहित हो जाता है। इन गुणों से तृष्णारहित होने की स्थिति ही परवैराग्य है। इस अवस्था में जीवात्मा को पुरुषख्याति के समक्ष सत्त्वपुरुषान्यताख्यति = विवेकख्यति, जो कि शुद्ध सत्त्वगुण का ही परिणाम है, भी हेय लगती है और वह उससे भी विरक्त हो कर उसका भी निरोध कर देता है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अपरवैराग्य विषयों में दोषों = दुःखों को देखने से होता है; परन्तु परवैराग्य आत्मसाक्षात्कार होने पर, चैतन्य = चेतन पुरुष के गुणों की श्रेष्ठता की अनुभूति होने और जड़ प्रकृति के गुणों की तुच्छता स्पष्ट होने के कारण होता है। योगी आत्मा रूपी श्रेष्ठ पदार्थ को जानकर साध्य प्राप्ति में साधन = प्रकृति और उसके विकारों की निष्कृष्टता को जानता हुआ उससे दूर होता है। इसी कारण से परवैराग्य को उत्कृष्ट वैराग्य कहा गया है।

अतः वह प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों को भी लक्ष्य = उपादेय और उपासनीय न मानता हुआ, अपने परम लक्ष्य प्राप्ति में इनको बाधक मानता हुआ, इनसे भी विरक्त हो जाता है। इस अवस्था में जीवात्मा अपने शुद्ध चेतनस्वरूप में स्थित होता हुआ अपने में व्याप्त परमसूक्ष्म चेतन परमात्मा के स्वरूप में निमग्न हो जाता है। यह अवस्था निरोध = असम्प्रज्ञात समाधि की है जिसमें किसी बाह्य पदार्थ का आलम्बन नहीं रहता। इस अवस्था में जीवात्मा को परमात्मा का साक्षात्कार होने से उसके ज्ञान का चरमकोटिक विकास होता है, क्योंकि परमात्मा को जानने के पश्चात् अन्य किसी निकृष्ट पदार्थ को जानने की इच्छा ही नहीं रहती। इस प्रकार परमात्मज्ञान से जीवात्मा मोक्ष का अधिकारी बन जाता है। इस अवस्था को प्राप्त होकर योगी यह मानता है कि प्राप्त करने योग्य सभी कुछ प्राप्त कर लिया है; छीण करने योग्य सभी अविद्यादि क्लेश क्षीण = नष्ट कर दिये हैं; आवागमन रूपी संसार चक्र छिन्न-भिन्न हो गया है अर्थात् जिन अविद्यादि क्लेशों के कारण दोष, प्रवृत्ति और जन्म-मरण का अनवरत चक्र चल रहा था वह नष्ट हो गया है और इस जन्म-मरण के चक्र के नष्ट होते से सभी प्रकार के दुःख भी समाप्त हो गये हैं।

ज्ञान की पराकष्ठा = उत्कृष्ठ सीमा ही वैराग्य है और इसी परवैराग्य के परिणाम स्वरूप जीवात्मा को इसका अवश्यम्भावी फल मोक्ष = कैवल्य मिलता है।