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Samaadhi Paada / Trance / 2
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Samaadhi Paada / Trance / 2

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥२॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 2

In Hindi:

पदपाठ : योगः चित्तवृत्तिनिरोधः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तस्य लक्षणाभिधित्सयेदं सूत्रं प्रववृते —

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस योग का (लक्षणाभिधित्सया) लक्षण प्रतिपादन करने की इच्छा से (इदम् सूत्रम्) यह सूत्र (प्रववृते) प्रवृत्त होता है —

हिंदी में अर्थ : (योगः) योग (चित्तवृत्तिनिरोधः) चित्त की वृत्तियों का निरोध अर्थात् रुक जाना है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : १. उपासनासमये व्यवहारसमये वा परमेश्वरादतिरिक्तविषयादधर्मव्यवहाराच्च मनसो वृत्तिः सदैव निरुद्धा रक्षणीयेति॥

चित्त की वृत्तियों को सब बुराईयों से हटाके शुभ गुणों में स्थिर करके परमेश्वर के समीप में मोक्ष को प्राप्त करने को योग कहते हैं और वियोग उसको कहते हैं कि परमेश्वर और उसकी आज्ञा से विरुद्ध बुराईयों में फँसके उससे दूर हो जाना॥ (ऋ०भू॰ उपासनाविषय)

२. “मनुष्य रजोगुण तमोगुणयुक्त कर्मों से मन को रोक शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त कर्मों से भी मन को रोक, शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त हो, पश्चात् उसका निरोध कर एकाग्र अर्थात् एक परमात्मा और धर्मयुक्त कर्म इनके अग्रभाग में चित्त का ठहरा रखना निरुद्ध अर्थात् सब ओर से मन की वृत्ति को रोकना॥ (सत्यार्थप्रकाश नवम् समुल्लास)

व्यास भाष्य : सर्वशब्दाग्रहणात् संप्रज्ञातोऽपि योग इत्याख्यायते। चित्तं हि प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलत्वात् त्रिगुणम्।

प्रख्यारूपं हि चित्तसत्वं रजस्तमोभ्यां संसृष्टमैश्वर्यविषयप्रियं भवति। तदेव तमसाऽनुविद्धम- धर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्योपगं भवति। तदेव प्रक्षीणमोहावरणं सर्वतः प्रद्योतमानमनुविद्धं रजोमात्रया धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपगं भवति। तदेव रजोलेशमलापेतं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धर्ममेघध्यानोपगं भवति। तत्परं प्रसंख्यानमित्याचक्षते ध्यायिनः।

चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च सत्त्वगुणात्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिरिति। अतस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्यातिं निरुणद्धि। तदवस्थं संस्कारोपगं भवति। स निर्बीजः समाधिः। न तत्र किञ्चित्सम्प्रज्ञायत इत्यसम्प्रज्ञातः। द्विविधः स योगश्चित्तवृत्तिनिरोध इति॥

हिंदी में अर्थ : (सर्वशब्दः अग्रहणात्) सूत्र में सर्व शब्द का ग्रहण न होने से अर्थात् “सर्ववृत्तिनिरोधः” न कह कर “वृत्तिनिरोधः” मात्र कहने से (संप्रज्ञातोऽअपि) सम्प्रज्ञात समाधि भी (योगः) योग है; (इति आख्यायते) ऐसा कहा जाता है। (चित्तम् हि) चित्त ही (प्रख्याप्रवृत्तिस्थितिशीलत्वात्) प्रख्या अर्थात् प्रकाशशील (सत्त्वगुण), प्रवृत्ति अर्थात् क्रियाशील (रजोगुण), और स्थिति अर्थात् गुरुता = जड़ता (तमोगुण) स्वभाव वाला होने से (त्रिगुणम्) तीन गुणों वाला कहा है।

१. (हि) यद्यपि (चित्तसत्त्वम्) चित्त सत्त्वरूप ही होता हुआ = प्रकृति का सात्त्विक परिणाम होता हुआ (प्रख्यारूपम्) प्रकाशशील = ज्ञानस्वरूप है तथापि (रजस्तमोभ्याम्) रजोगुण और तमोगुण से (संसृष्टम्) मिलकर, सम्बद्ध होकर (ऐश्वर्यविषयप्रियम्) ऐश्वर्य और विषयों का इच्छुक (भवति) होता है। (यह क्षिप्त अवस्था वाले चित्त की स्थिति है)।

२. (तदेव) वही चित्तसत्त्व जब (तमसा) सत्त्व और रजोगुण की न्यूनता होकर तमोगुण से (अनुविद्धम्) युक्त होता है, तब (अधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्योपगम्) अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य में मग्न (भवति) होता है। (यह मूढ अवस्था वाले चित्त की स्थिति है)।

३. (तदेव) वही चित्तसत्त्व जब (प्रक्षीणमोहावरणम्) तमोगुण = मोह के आवरण से रहित होने से (सर्वतः) सब ओर से (प्रद्योतमानम्) प्रकाशमान, (रजोमात्रया) रजोगुण से (अनुविद्धम्) युक्त होता है, तब (धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्योपगम्) धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य आदि विषयों की ओर अभिमुख (भवति) हो जाता है। (यह विक्षिप्त अवस्था वाले चित्त की स्थिति है)।

४. (तदेव) वही चित्तसत्त्व जब (रजोलेशमलापेतम्) रजोगुण के सम्पर्क रूप मल से पृथक होकर (स्वरूपप्रतिष्ठम्) अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित = निजरूप वाला शुद्ध होता है तब (सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रम्) सत्त्व और पुरुष अर्थात् चित्तसत्त्व और चेतनशक्ति = पुरुष की भिन्नता के विवेकज्ञान से युक्त हो (धर्ममेघध्यानोपगम्) धर्ममेघध्यान = सर्वथा विवेकख्याति की प्राप्ति रूप धर्ममेघ समाधि को प्राप्त (भवति) होता है। (यह एकाग्र अवस्था वाले चित्त की स्थिति है।)। (तत्) उस धर्ममेघ समाधिनिष्ठ चित्त को (ध्यायिनः) ध्यानी = योगी लोग (परम् प्रसंख्यानम्) परम् प्रसंख्यान अर्थात् उत्कृष्ठ ज्ञान (इति) ऐसा (आचक्षते) कहते हैं।

५. (चितिशक्तिः) चेतना शक्ति = चेतन पुरुष = आत्मा (अपरिणामिनी) उपरोक्त सत्त्वादि गुणों के परिणाम से रहित तथा धर्म, लक्षण और अवस्था (योगसूत्र ३.१३) रूप तीन प्रकार के परिणामों से रहित (अप्रतिसंक्रमा) निर्लेप (बुद्धि आदि के मिश्रण से रहित) एवं अविचल अर्थात् किसी पदार्थ में घुलने मिलने के स्वभाव से रहित (दर्शितविषया) चित्त द्वारा दिखाये जाने वाले विषयों का द्रष्टा और उन विषयों से भी उपरत हो जाने वाला (शुद्धा च) शुद्ध = पवित्र और (अनन्ता) अन्त अर्थात् नाश रहित है।

(च) और (अतः) इस चेतना शक्ति से (विपरीता) विपरीत = विरुद्ध अथवा भिन्न स्वभाव वाली (इयम्) यह (सत्त्वगुणात्मिका) चित्त के सत्त्वस्वरूप में प्राप्त बुद्धि वृत्ति रूप (विवेकख्यातिः इति) विवेकख्याति है। (अतः) इसलिए (तस्याम्) विवेकख्याति के प्रति (विरक्तम्) विरक्त = रागरहित हुआ (चित्तम्) चित्त (तामपि ख्यातिम्) उस विवेकख्याति का भी (निरुणद्धि) निरोध कर देता है। (तदवस्थम्) इस निरोध अवस्था वाला चित्त (संस्कारोपगम्) संस्कारमात्र शेष स्थिति वाला (भवति) होता है। (स) वह अवस्था (निर्बीजः) निर्बीज (समाधिः) समाधि है। (तत्र) इस अवस्था में (किञ्चित् सम्प्रज्ञायत) सम्प्रज्ञात स्थिति में जाने हुए किसी भी पदार्थ का ज्ञान अर्थात् अब तक सम्यक् प्रकार से जाने हुए किसी पदार्थ का ज्ञान (न) नहीं होता (इति) अतः (असम्प्रज्ञातः) इस निर्बीज समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। (सः) वह (चित्तवृत्तिनिरोधः) चित्तवृत्ति निरोध रूप (योगः) योग (द्विविधः) दो प्रकार का = सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेद से (इति) है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में योग, चित्त, वृत्ति, निरोध ये चार पद हैं। योग “युज् समाधौ” धातु से बना है, जिससे योग का अर्थ समाधि महर्षि व्यास ने प्रथम सूत्र में किया है। चित्त पद ‘चिती संज्ञाने’ तथा ‘चिति स्मृत्याम्’ धातुओं से ‘क्त’ प्रत्यय होने पर सिद्ध होता है। इससे चित्त पद में ज्ञान का होना तथा निरन्तर स्मरण का साधन होने का भाव निहित है। किसी अर्थतत्त्व का निश्चय कराने का मुख्य साधन बुद्धि होने से यहाँ बुद्धि को चित्त पद से कहा है। वृत्ति को हम इस प्रकार कह सकते हैं — “गुणैः युक्तः चित्तस्य व्यापारः वृत्तिः, एतदेव निरोधव्यः॥” अर्थात् सत्त्वादि गुणों से युक्त चित्त का (बाह्य और आन्तर) व्यापार ही वृत्ति हैं, जोकि निरोध करने योग्य है। चित्त हमेशा किसी न किसी वृत्ति से संलग्न रहता है इन वृत्तियों के निरोध को योग कहा है।

योगशास्त्र में मुख्य अर्थ का तात्पर्य परमात्मा से है। अतः महर्षि दयानन्द सरस्वती इस सूत्र का अर्थ करते हुए कहते हैं — “उपासना के समय और व्यवहार के समय में परमेश्वर से अतिरिक्त विषय और अधर्मव्यवहार से मन की वृत्ति को सदैव निरुद्ध = रोक कर के रखना चाहिए।” अर्थात् उपासना के समय में ईश्वर के अतिरिक्त विषयों से और व्यवहार के समय में अधर्मव्यवहार से मन की वृत्तियों को रोकना चाहिए, यह योग है। इस प्रकार से चित्त की निरुद्धावस्था अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में परमात्मा का साक्षात्कार सम्भव हो पाता है।

यजुर्वेद ११.१ में चित्त को समाहित करने का उपदेश दिया गया है —

यु॒ञ्जा॒नः प्र॑थमं॒ मन॑स्त॒त्त्वाय॑ सवि॒ता धियः॑। अ॒ग्नेर्ज्योति॑र्नि॒चाय्य॑ पृथि॒व्याऽअध्याभ॑रत्॥

अर्थात् — जो ऐश्वर्य की कामना करने वाला मनुष्य, परमेश्वर आदि पदार्थों के विज्ञान के लिए (प्रथमम्) आदि में मननात्मक अन्तःकरण की वृत्ति को और धारणात्मक अन्तःकरण की वृत्तियों को योगाभ्यास में युक्त करता हुआ ... ... योग विद्या का ज्ञाता होवे। (महर्षि दयानन्द सरस्वती कृत भाष्य)

यहाँ परमेश्वर की कामना करने वाले मनुष्य के लिए चित्त की वृत्तियों को सर्वप्रथम निरोध करने का उपदेश है, किसके लिए ? तत्त्वाय — अर्थात् तत्त्वज्ञान के लिए = ब्रह्मज्ञान के लिए; और उसका फल — वह परमात्मा के प्रकाश को निश्यात्मक रूप से जानकर यथावत् धारण करे और परमात्मा उस योगी की बुद्धि को अपनी कृपा से अपने में युक्त कर लेता है। अतः योग का आरम्भ सर्वप्रथम वृत्तिनिरोध से ही होता है।

शंका :— असम्प्रज्ञात समाधि के काल में चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध कहा जाता है और भाष्यकार महर्षि व्यास भी कहते हैं “न तत्र किञ्चित्संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः” और भोजवृत्ति में कहा है “निरुद्धे च सर्वासां वृत्तीनां संस्काराणां प्रविलय इति।” अतः असम्प्रज्ञात समाधि के काल में चित्त की सभी वृत्तियों का निषेध हो जाता है और कुछ भी सम्यक् प्रकार से ज्ञात नहीं होता। ऐसी अवस्था में परमेश्वर सम्बन्धी वृत्तियों के रहते हुए असम्प्रज्ञात समाधि तो होगी ही नहीं। क्या इस प्रकार महर्षि दयानन्द द्वारा उपर्युक्त अर्थ महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास की भावना से विपरीत नहीं है ?

समाधान :— उपर्युक्त दोनों स्थलों का अनुवाद ऊपर पदार्थ में किया है। व्यासभाष्य का पूर्वापर सम्बन्ध न समझने से ऐसा हुआ है। वास्तव में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में, सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था तक जाने हुए किसी भी विषय = स्थूल भूत, तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, मन, अंहकार, बुद्धि तथा मूलप्रकृति, का सम्यक् ज्ञान लक्ष्य नहीं होता। इन सब वृत्तियों का चित्त में विलय = लीन होने से चित्त उस अवस्था से पार हो चुका होता है। इसी प्रकार भोजवृत्ति में भी एकाग्र अवस्था में बाह्य वृत्तियों के निषेध को कहा है, और उस काल में बनी सभी आन्तरिक वृत्तियों और उनके संस्कारों का निषेध निरुद्धावस्था में कहा है।

आत्मा के लिए परमात्मा ही मुख्य लक्ष्य है, तथा वेद, दर्शन और उपनिषदों आदि सत्यशास्त्रों में परमात्म-ज्ञान = ब्रह्मज्ञान को मोक्ष प्राप्ति का उपाय बताया है; यथा —

तमे॒व वि॑दि॒त्वाति॑ मृ॒त्युमे॑ति॒ नान्यः पन्था॑ विद्य॒तेऽय॑नाय॥ यजु॰ ३१.१८॥

उसी परमात्मा को जान के विद्वान् दुःखदायी मरण को पार कर जाते हैं इससे भिन्न कोई मार्ग मोक्ष के लिए नहीं है।

मनसै वेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन्।

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति॥ कठ० ४.११॥

इस ब्रह्म को शास्त्राभ्यास से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ही प्राप्त होना चाहिए। इस ब्रह्मज्ञान के विषय में कुछ भी भेदभाव, अर्थात् भिन्न-भिन्न अवयव वाला दीखना, नहीं है। जो पुरुष इस विषय में अनेकता = भेदभाव, भिन्नता आदि देखता है वह मृत्यु से फिर मृत्यु को प्राप्त होता है।

इसी कठोपनिषद् में नचिकेता के तीसरे प्रश्न के उत्तर में, यमाचार्य विस्तार से ब्रह्मज्ञान का उपदेश करते हैं, और ब्रह्म को ही जीव का परम् लक्ष्य बताते हैं। इसी प्रकार —

यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः॥ बृहदारण्यक० ३.८.१०॥

जो इस अक्षर ब्रह्म को न जानकर इस लोक से सिधार जाता है वह कृपण है, और हे गार्गि जो इस अक्षर ब्रह्म को जानकर इस लोक से सिधारता है वही ब्राह्मण है।

इहैव सन्तोऽथ विद्मस्तद्वयं न चेदवेदिर्महती विनिष्टः।

य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्त्यथेतरे दुःखमेवापियन्ति॥ बृहदा॰ ४.४.१४॥

यदि हम लोग इसी शरीर, इसी मनुष्य लोक में रहते हुए किसी प्रकार से ब्रह्म को जानते हैं तो ठीक है, यदि यहाँ रहकर नहीं जानते तब हम लोग अज्ञानी रहेंगे और इससे बड़ी हानि होगी क्योंकि शास्त्र की यह मर्यादा है कि जो परमात्मा को जानते हैं वे अमर होते हैं और जो लोग नहीं जानते वे दुःख को पाते हैं॥

आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदꣳसर्वं विदितम्॥ बृहदा॰ २.४.५॥

आत्मा के ज्ञान से, दर्शन से, श्रवण से, मनन से, पूर्णतया जान लेने से यह चराचर जगत् ज्ञात हो जाता है, सब कुछ प्राप्त हो जाता है॥ इस प्रकार हम देखते हैं कि शास्त्रों में जीव का लक्ष्य ब्रह्म कहा गया है।

असम्प्रज्ञात समाधि के साधन परवैराग्य का स्वरूप बताते हुए कहा है —

तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतष्ण्यम्॥ योग० १.१६॥

पर-वैराग्य वह है जिसमें पुरुष-साक्षात्कार होने से सत्त्वादि गुणों के प्रति तृष्णा रहित हो जाना। यहाँ अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में पुरुष-साक्षात्कार करने से योगी प्रकृति के गुणों से तृष्णा रहित हो जाता है जिससे वह असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है। यहाँ गुणों से प्रकृति के सत्त्व, रज और तमोगुण ही अभिप्रेत है। इसी सूत्र पर भाष्य करते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं “ज्ञानस्यैव पराकाष्ठा वैराग्यम्।” अर्थात् ज्ञान की चरम सीमा ही वैराग्य है। और ज्ञान की चरम सीमा ब्रह्मज्ञान के बिना नहीं होती। इसी विषय में मुण्डक उपनिषद् में शौनक महर्षि अङ्गिरा से पूछता है—

कस्मिन्नुभगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति॥ मुण्डक १.१.३॥

अर्थात् हे भगवन् ! किस के ज्ञान से यह सब जान लिया जाता है ? अर्थात् वह ज्ञान कौन सा है, जिसके बाद किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती ? इस प्रश्न के उत्तर में महर्षि अङ्गिरा शौनक को ब्रह्मज्ञान का उपदेश करते हैं। अतः ब्रह्मज्ञान ही अन्तिम लक्ष्य है।

इसी प्रकार समाधि के शीघ्र लाभ का एक उपाय बताते हुए कहा है —

ईश्वरप्रणिधानाद्वा ॥ योग० १.२३॥

अर्थात् सब सामर्थ्य, सब गुण, प्राण, आत्मा और मन के प्रेमभाव से आत्मादि द्रव्यों का ईश्वर के लिए समर्पण करना।

हमने व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के आधार पर असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्म-साक्षात्कार को भूमिका में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया है। अतः असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मा के ज्ञान का निषेध नहीं है वरन् असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मा ही लक्ष्य है। इसी अवस्था में ही परमात्मा का साक्षात्कार करने पर जीवात्मा मोक्ष का अधिकारी बनता है; जो कि योग का मुख्य फल कहा गया है। अस्तु।

चित्त की वृत्तियाँ सत्त्वादि गुणों के आधार पर सात्त्विक वृत्तियाँ, राजसिक वृत्तियाँ और तामसिक वृत्तियाँ कहलाती है। इन वृत्तियों को रोकना और योग की अवस्था निम्न प्रकार से जानी जाती है —

१. केवल राजसिक; केवल तामसिक या केवल सात्त्विक वृत्तियों का निरोध योग की श्रेणी में नहीं आता। क्योंकि इसमें राजसिक अथवा तामसिक अथवा दोनों प्रकार की वृत्तियाँ बनी रहने से प्रवृत्ति = चञ्चलता, दुःख और अज्ञान बने रहने से कैवल्य सम्भव नहीं है।

२. राजसिक और सात्त्विक वृत्तियों का निरोध भी योग की श्रेणी में नहीं आता, क्योंकि तमोगुण के प्रभाव से दुःख और अज्ञान बना रहता है।

३. तामसिक और सात्त्विक वृत्तियों का निरोध भी योग की श्रेणी में नहीं आता क्योंकि रजोगुण के प्रभाव से प्रवृत्ति, चञ्चलता बनी रहती है।

४. राजसिक और तामसिक वृत्तियों का निरोध योग की श्रेणी में आता है क्योंकि सात्त्विक वृत्तियों के उदय होने से, सम्प्रज्ञात समाधि सम्भव होती और विवेकख्याति की प्राप्ति सम्भव होती है।

५. तीनों प्रकार की वृत्तियों का निरोध तो असम्प्रज्ञात समाधि को तथा अपने उत्तम फल मोक्ष को प्राप्त कराता है।

सूत्र में सर्व शब्द का ग्रहण न होने से सम्प्रज्ञात समाधि को भी योग की श्रेणी में माना गया है। चित्त को प्रख्या, प्रवृत्ति और स्थितिशील बताते हुए त्रिगुणात्मक कहा गया है। चित्त प्रकृति का परिणाम होने से त्रिगुणात्मक ही है। चित्त सत्त्वगुण की प्रधानता के कारण ही प्रख्या = प्रकाश = ज्ञान बहुल है। चित्त में रजोगुण के प्रभाव से प्रवृत्ति तथा रजोगुण के अन्य लक्षण परिताप, शोक, राग, द्वेष, निरन्तर विषय सेवा में मग्न रहना आदि भी प्रकट होते रहते हैं। और तमोगुण के प्रभाव से स्थिति तथा तमोगुण के अन्य लक्षण गुरुता, काम, क्रोध, लोभ, आलस्य, क्रूरता, धैर्यनाश तथा नास्तिकता का होना आदि भी उभरते रहते हैं। चित्त की पाँच अवस्थाएँ निम्न प्रकार से समझनी चाहिए :—

क्षिप्तावस्था :— इस अवस्था वाला चित्त रजोगुण और तमोगुण के प्रभाव से विविध ऐश्वर्यो तथा शब्दादि विषयों का इच्छुक रहता है। इस अवस्था में चित्त की वृत्तियाँ अति चञ्चल रहती है। व्यक्ति, विभिन्न सुख-दुःख आदि प्रदान करने वाले, बाह्य विषयों की ओर, कल्पित सुख की भावना = अभिलाषा से प्रेरित रहता है।

मूढावस्था :— इस अवस्था में तमोगुण की प्रबलता के कारण चित्त अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य में मग्न रहता है। व्यक्ति तमोगुण के प्रभाव के कारण कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का बोध न करता हुआ काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग, द्वेष, हिंसा आदि अशुभ कर्मों में ही संलग्न रहता है।

विक्षिप्तावस्था :— इस अवस्था में तमोगुण के क्षीण होने तथा सत्त्वगुण के उभार के साथ चित्त रजोगुण से युक्त रहता है और व्यक्ति इस काल में धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य की ओर प्रेरित रहता है। व्यक्ति इस अवस्था में दुःख के साधनों को दूर कर सुखमय विषयों को ही ग्रहण करता है।

इन तीनों ही अवस्थाओं में योग सम्भव नहीं है। क्योंकि इन अवस्थाओं में क्लेशों का क्षीण होना, कर्मबन्धनों का शिथिल होना तथा पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का प्रकाशन नहीं होता अतः यह तीनों अवस्थाएँ योग के लिए उपयोगी नहीं मानी गयी है (योगसूत्र १.१ पर व्यासभाष्य)। चित्त की शेष दोनों अवस्थाओं में योग सम्भव होता है।

एकाग्रावस्था :— इस अवस्था में सत्त्वगुण की प्रबलता के कारण, रजोगुण के मलों से भी सर्वथा रहित होने से, चित्त अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है; तथा साधक प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) के भेद को स्पष्ट रूप से जानता है। इसकी उच्चावस्था में साधक धर्ममेघ समाधि को प्राप्त होता है। धर्ममेघ समाधि का स्वरूप योगसूत्र ४.२९ में बताया गया है। इसी अवस्था को परम् प्रसंख्यान भी कहते हैं। प्रकृति और उसके विकार बुद्धि तथा जीवात्मा के भेदज्ञान का होना, विवेकख्याति कहाती है।

निरुद्धावस्था :— सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में प्राप्त हुई विवेकख्याति सत्त्वगुण की ही एक अवस्था है। परन्तु यह विवेकख्याति जीवात्मा की अपेक्षा से निकृष्ट ही है। योगी अब इस विवेकख्याति में भी दोष देखता हुआ वह उससे भी विरक्त हो जाता है, जिसे पर-वैराग्य कहते हैं। इसी पर-वैराग्य से योगी सत्त्वादि गुणों के प्रति भी तृष्णारहित हुआ, असम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है। इस अवस्था में चित्त की समस्त वृत्तियों तथा अब तक के अर्थात् सम्प्रज्ञात समाधि के काल तक के प्राप्त सभी ज्ञानों का भी निरोध हो जाता है। यह चित्त की निरुद्धावस्था कहलाती है।

असम्प्रज्ञात समाधि में मुख्य लक्ष्य परमात्मा रहता है और योगी परमात्मा का साक्षात्कार भी करता है। क्योंकि इस अवस्था में परमात्मा को छोड़ कर अन्य कोई (= प्रकृति या उसके विकार) बाह्यआलम्बन नहीं रहता अतः यह निर्बीज समाधि कहलाती है।

महर्षि व्यास ने इस सूत्र के भाष्य में चितिशक्ति अर्थात् जीवात्मा के स्वरूप को इस प्रकार स्पष्ट किया है —

१. अपरिणामी — चेतन पुरुष में किसी प्रकार का परिणाम या परिवर्तन नहीं होता अतः इसे अपरिणामी कहा गया है। चेतन शक्ति में किसी भी प्रकार का धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम नहीं होता। इस धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम को योग० ३.१३ में बताया गया है। अतः पुरुष को कूटस्थ नित्य कहते हैं। इससे विपरीत प्रकृति परिणामी है, यह समस्त जगत् प्रकृति का ही परिणाम अथवा विकार है।

२. अप्रतिसंक्रमा — चितिशक्ति को महर्षि व्यास ने अप्रतिसंक्रमा कहा है। महर्षि पतञ्जलि ने भी योगसूत्र ४.२२ में पुरुष को अप्रतिसंक्रमा ही कहा है। इसका अर्थ करते हुए विज्ञानभिक्षु ने कहा है “अथ वा नास्ति प्रतिसंक्रमः सङ्गो विषयेषु यस्या इति अप्रतिसंक्रमा, निर्लेपेति यावद्।” अर्थात् जिसका विषयों में संग नहीं है अतः अप्रतिसंक्रमा है, निर्लेप है। इसका एक अन्य अर्थ वाचस्पति मिश्र ने किया है “प्रतिसंक्रमः सञ्चार, स चितेनास्तीत्यर्थः” प्रतिसंचरण, संचार रहित। जिस प्रकार बुद्धि विषयों के पास तक संचार करती है वैसा संचार इसमें नहीं है। अर्थात् चितिशक्ति स्वरूपतः अविचल अर्थात् अन्य पदार्थ में घुलने मिलने के स्वभाव से रहित है। कुछ भाष्यकारों ने अप्रतिसंक्रमा विशेषण के आधार पर पुरुष को निष्क्रिय कहा है, जो कि शास्त्रविरुद्ध है। देखो, इस शरीर में समस्त क्रियाएँ, समस्त कर्म आत्मा = पुरुष की सत्ता के कारण हो रहे हैं परन्तु जिस प्रकार बुद्धि विषयों में घुल मिल जाती है वैसा घुलना-मिलना पुरुष में नहीं घटता। पुरुष की निर्लेपता के भाव को महर्षि व्यास ने भी आगे कहा है—

अविद्यादयः क्लेशाः कुशलाकुशलानि कर्माणि तत्फलं विपाकस्तदनुगुणावासना आशयाः ते च मनसि वर्त्तमानाः पुरुषे व्यपदिश्यन्ते स हि तत्फलस्य भोक्तेति॥ योग० १.२४॥

अर्थात् क्लेश, कर्म, उनका फल और उनकी वासनाएँ मन में रहती हुई पुरुष में उनका व्यवहार होता है क्योंकि पुरुष ही उस फल का भोक्ता है।

३. दर्शितविषया — जीवात्मा ही क्लेश, कर्म, कर्मफल आदि का भोक्ता होने से उसे दर्शितविषया कहा गया है। पुरुष ही वह तत्त्व है जिसे सकल विषय दर्शित किये जाते हैं, प्राप्त कराये जाते हैं। प्रकृति और उसके विकार बुद्धि आदि स्वयं जड़ होने से भोग को प्राप्त नहीं करते; वस्तुतः प्रकृति ही पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिए है। क्योंकि—

भोगापवर्गार्थं दृश्यम् ॥ योग० २.१८॥

इस समस्त कार्य प्रकृतिमय जगत् का = दृश्य का पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिए प्रवृत्त होना ही प्रयोजन है। इसी प्रकार —

संहतपरार्थत्वात् ॥ सांख्य १.१४०॥

अर्थात् शरीर आदि संहत हैं — खण्डों से युक्त हैं। संहत स्वार्थ नहीं होते उनके जड़ होने से, शय्या आदि के समान, किन्तु परार्थ हैं। यह “पर” पुरुष है जिसके लिए प्रकृति और उसके विकार है। अतः पुरुष को दर्शितविषया कहा है।

४. शुद्धा — पुरुष को यथार्थ रूप से शुद्ध कहा गया है। इसमें सत्त्वादि गुणों तथा अविद्या आदि के निमित्त से अशुद्धि आ जाती है परन्तु यह उस निमित्त के दूर होने पर शुद्ध रहता है। अशुद्धि का स्वरूप बताते हुए कहा है — “पञ्चपर्वणो विपर्ययस्याशुद्धिरूपस्य” पाँच प्रकार के क्लेशों को ही अशुद्धि कहा है और वे मन = चित्त में रहते हैं, ना कि पुरुष में। इस प्रकार सभी वृत्तियों को भी सुख, दुःख, मोहात्मक कहा है (योग० १.११ पर व्यासभाष्य)। ये सभी वृत्तियाँ चित्त में ही संचालित रहती है। इसी प्रकार त्रिगुणों से रहित होने से भी पुरुष को शुद्ध कहा गया है।

५. अनन्ता — चितिशक्ति अन्त रहित है; अविनश्वर है। अचेतन प्रकृति से बने पदार्थ नश्वर हैं परन्तु नित्य चेतन आत्मा अविनश्वर कही गयी है, क्योंकि इसका अन्त या नाश नहीं होता।

अतः इस स्वरूप वाले चेतन पुरुष को विवेकख्याति की अपेक्षा से श्रेष्ठ कहा गया है और इसका साक्षात्कार परमात्म-साक्षात्कार हेतु प्रथम सीढी है।

यह चित्तवृत्ति निरोध नामक योग सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात भेद से दो प्रकार का है॥

हिंदी में टिप्पणी : विशेष — यहाँ निरोध दो प्रकार का है (१) एकत्रीकरण = वृत्तियों को एक ओर लगाना और (२) सर्वथा निगूढ = अन्तर्लीन = विलुप्त कर देना।