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Samaadhi Paada / Trance / 3
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Samaadhi Paada / Trance / 3

तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥३॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 3

In Hindi:

पदपाठ : तदा द्रष्टुः स्वरूपे अवस्थानम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तदवस्थे चेतसि विषयाभावाद् बुद्धिबोधात्मा पुरुषः किंस्वभाव ? इति।

हिंदी में अर्थ : (तदवस्थे चेतसि) निरुद्ध अवस्था वाले चित्त में (विषयाभावात्) विषयों के अभाव होने से (बुद्धिबोधात्मा पुरुषः) बुद्धि = चित्त का प्रतिसंवेदन करने वाला पुरुष (किंस्वभाव इति) किस स्वभाव वाला होता है ? —

हिंदी में अर्थ : (इस सूत्र के दो अर्थ हो सकते है पहले अर्थ में “द्रष्टुः” का ‘स्वरूपे’ पद के साथ सम्बन्ध है और दूसरे अर्थ में “द्रष्टुः” का ‘अवस्थानम्’ पद के साथ सम्बन्ध है।)

प्रथम अर्थ :— तदा जीवात्मनः द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् भवति। (तदा) तब निरुद्धावस्था में (जीवात्मनः) चितिशक्ति = जीवात्मा की (द्रष्टुः) द्रष्टा = सर्वसाक्षी, सर्वान्तर्यामी परमात्मा के (स्वरूपे) स्वरूप में (अवस्थानम्) अवस्थित = विराजमानता (भवति) हो जाती है।

द्वितीय अर्थ :— तदा द्रष्टुः अवस्थानम् स्वरूपे भवति। (तदा) तब निरुद्धावस्था में (द्रष्टुः) द्रष्टा = चितिशक्ति = जीवात्मा की (अवस्थानम्) अवस्थिति = विराजमानता (स्वरूपे) निजरूप में (भवति) हो जाती है। (यहाँ प्रथम अर्थ ही शास्त्रानुकूल है।)

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : १. निरुद्धासती सा क्वावतिष्ठत इत्यत्रोच्यते —

यदा सर्वस्माद् व्यवहारान्मनोऽवरुध्यते, तदास्योपासकस्य मनो द्रष्टुः सर्वज्ञस्य परमेश्वरस्य स्वरूपे स्थितिं लभते॥

“(प्रश्न) जब वृत्ति बाहर के व्यवहारों से हटा के स्थिर की जाती है, तब कहाँ पर स्थित होती है? इसका उत्तर यह है कि (तदा द्र०) जैसे जल के प्रवाह को एक ओर से दृढ बाँध के रोक देते हैं, तब वह जिस ओर नीचा होता है, उसी ओर चल के स्थिर हो जाता है। इसी प्रकार मन की वृत्ति भी जब बाहर से रुकती है, तब परमेश्वर में स्थिर हो जाती है”। (ऋ० भू॰ उपासना विषय)

२. जब चित्त एकाग्र और निरुद्ध हो जाता है तब सबके द्रष्टा ईश्वर के स्वरूप में जीवात्मा की स्थिति हो जाती है। (सत्यार्थप्रकाश नवम् समुल्लास)

व्यास भाष्य : स्वरूपप्रतिष्ठा तदानीं चितिशक्तिर्यथा कैवल्ये॥

हिंदी में अर्थ : (तदानीम्) उस निरुद्धावस्था में = असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में (चितिशक्तिः) जीवात्मा = पुरुष (स्वरूपप्रतिष्ठा) अपने स्वरूप में प्रतिष्ठ = स्थित हो जाता है (यथा कैवल्ये) जैसे वह कैवल्य अर्थात् मोक्ष दशा में स्थित रहता है।

वैदिक योग मीमांसा : चित्त की निरुद्धावस्था में जब प्रकृति और उसके विकार रूप सभी बाह्य विषयों का सर्वथा अभाव हो जाता है एवं पुरुष के लिए आलम्बन हेतु चित्त का भी आश्रय = आधार समाप्त हो जाता है, (चित्त का आधार समाप्त क्यों हो जाता है ? क्योंकि वृत्ति निरोध होने पर संसार चक्र का आश्रयभूत चित्त कृतकार्य हुआ आत्मा के समान पवित्र होकर रहता है। तो इस अवस्था में पुरुष किस स्वभाव वाला होता है अर्थात् जब पुरुष को बुद्धि से किसी भी बाह्य विषय का बोध नहीं होता तब उसकी क्या स्थिति होती है ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा है कि उस समय पुरुष अपने स्वरूप में स्थित होता है जैसा कि कैवल्य = मोक्ष की अवस्था में होता है। तब उस अवस्था में प्रकृति से किसी प्रकार का सम्बन्ध अथवा सम्पर्क नहीं रहता और पुरुष अपने चेतन स्वरूप में स्थित होता है। प्रकृति और पुरुष का भेदज्ञान हो जाने पर पुरुष प्रकृति के सम्पर्क से छूटकर अपने चेतन स्वरूप में स्थित होता है।

सूत्र १.२ के भाष्य में महर्षि व्यास ने जीवात्मा के बारे में “चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसङ्क्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता” कहा है। वस्तुतः आत्मा स्वरूपतः चैतन्यमात्र है; और उसके स्वरूप का नाश कभी नहीं होता। अतः पुरुष का चैतन्यस्वरूप समाधि और व्युत्थान दशा में समान रहता है। आत्मा की स्वरूपस्थिति होने का अभिप्राय यह है कि आत्मा असम्प्रज्ञात समाधि अवस्था में केवल चेतनता का अनुभव करता है; बुद्धि द्वारा दिखाये गये प्रकृति के अन्य किसी विषय का नहीं। जबकि निरुद्धावस्था से अन्य अवस्था में आत्मा अपने से भिन्न विषयों का ही मुख्यता से अनुभव करता है, जिसको अगले सूत्र में “वृत्तिसारूप्यमितरत्र” कहा है। आत्मा को अन्य विषयों का अनुभव प्रकृति सम्पर्क होने से होता है। व्युत्थान दशा में चित्त के सक्रिय होने से आत्मा को अन्य विषय उपलब्ध होते है; दूसरी ओर असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में, चित्त के निष्क्रिय होने से, अन्य विषय उपलब्ध नहीं होते और आत्मा अपने चैतन्य स्वरूप को अनुभव करता है। आत्मा की स्वरूपस्थित का यही तात्पर्य है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार जीवात्मा की स्वरूपस्थिति यहाँ तक ही नहीं है, वरन् जीवात्मा की स्थिति उस समय सर्वसाक्षी, सर्वान्तर्यामी परमात्मा के स्वरूप में हो जाती है; जैसे कि मोक्ष की अवस्था में होती है। यहाँ पर सूत्र के प्रथम अर्थ के सन्दर्भ में व्यासभाष्य का अर्थ निम्न प्रकार से हो सकता है —

(तदानीम्) उस निरुद्धावस्था में = असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में (चितिशक्तिः) जीवात्मा (यथाकैवल्ये) जैसे कैवल्य = कैवल्य के समान (द्रष्टु = परमात्मा के) (स्वरुपप्रष्ठिा) स्वरुप में स्थित हो जाता है।

सांख्यदर्शनकार महर्षि कपिल के अनुसार —

समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता॥ सांख्य० ५.११६॥

अर्थात् जीवात्मा भोक्तृभाव से वियुक्त हुआ जब समाधि में, सुषुप्ति में, मोक्ष में अवस्थित होता है तब उसकी ब्रह्मगुण सम्पन्न स्थिति हो जाती है॥ अर्थात् उस समय अपने स्वरूप में स्थित होने से उसे सांसारिक सुखदुःख प्राप्त नहीं होते।

इस असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में पुरुष अपने स्वरूप में तो स्थित हो जाता है; परन्तु यह भी सत्य है कि ब्रह्मज्ञान के बिना मोक्ष का होना सम्भव नहीं है, जिसको महर्षि कपिल ने प्रकृति-पुरुष विवेक कहा है —

विवेकान्निःशेषदुःखनिवृत्तौ कृतकृत्यता नेतरान्नेतरात्॥ सांख्य ३.८४॥

अर्थात् पूर्ण विवेक से समस्त दुःखों की निवृत्ति होती है। तब ही पुरुष कृतकृत्य होता है, विवेक को छोड़कर अन्य किसी साधन से कृतकृत्यता = मुक्ति सम्भव नहीं।

और पूर्ण विवेक परमात्म-ज्ञान के बिना सम्भव नहीं, ऐसा वेद और उपनिषदों में स्थान-स्थान पर कहा गया है —

तमे॒व वि॑दि॒त्वाति॑ मृ॒त्युमे॑ति॒ नान्यः पन्था॑ विद्य॒तेऽय॑नाय॥ यजु॰ ३१.१८॥

अर्थात् उसी परमात्मा को जान के विद्वान् दुःखदायी मरण को पार कर जाते हैं, इससे भिन्न कोई मार्ग मोक्ष के लिए नहीं है।

अतः वेद के प्रमाण से भी स्पष्ट है कि दुःखों से छूटने का उपाय ब्रह्मज्ञान है न कि मात्र जीवात्मा की स्वरूपस्थिति। यह भी सत्य है कि आत्म-स्वरूप को जाने बिना परमात्म-स्वरूप को जाना ही नहीं जा सकता। अतः जीवात्मा अपने स्वरूप में स्थित होता हुआ, अपने में व्याप्त परमात्मा के स्वरूप में जाकर स्थित हो जाता है। परमात्मा के सर्वव्यापक होने से, जीवात्मा की स्वरूपस्थिति होने पर, जीवात्मा की वस्तुतः परमात्मा के चैतन्य स्वरूप में अवस्थिति, चैतन्य के द्वारा चैतन्य में, ज्ञानपूर्वक होती है। व्युत्थान दशा में ज्ञान न होने से ऐसा अनुभव नहीं होता। सुषुप्ति में भी, चाहे अज्ञान पूर्वक ही, परमात्मा में अवस्थिति तो होती ही है। दोनों अवस्थाओं में जीवात्मा की स्थिति तो परमात्मा में ही है; समाधि और मोक्ष में ज्ञानपूर्वक होती है जबकि व्युत्थान में अज्ञान पूर्वक ही रहती है। जीवात्मा को अपनी स्वरूपस्थिति के लिए ही सर्वप्रथम प्रयत्न करना होता है, फिर अपने चैतन्य स्वरूप से ही चैतन्य परमात्मा में ज्ञानपूर्वक स्थित होता है। ऐसा क्यों ? क्योंकि जड़ प्रकृति और उनके विकार चित्त = बुद्धि के माध्यम से चैतन्य परमात्मा में स्थिति सम्भव ही नहीं होती। मात्र यही स्थिति सभी प्रकार के दुःखों तथा बन्धनों से छूटने की है; अन्य किसी भी स्थिति में ऐसा होना सम्भव ही नहीं है।

इस सन्दर्भ में कठोपनिषद् में यमाचार्य द्वारा नचिकेता को यह उपदेश द्रष्टव्य है —

य इमं मध्वदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्। ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते। एतद्वै तत्॥४.५॥

अर्थात् — (यः) जो पुरुष (मध्वदम्) रोचक कर्मफलों के भोगने वाले, (जीवम्) प्राणों के धारक, (इमम्) इस देह के अभिमानी (आत्मानम्) जीवात्मा को (वेद) जानता और उस जीव के (अन्तिकात्) चेतन होने से निकटवर्त्ती (भूतभव्यस्य) भूत में हुए, भविष्यत में होने वाले जगत् के (ईशानम्) स्वामी परमात्मा को जानता है, वह विज्ञानी पुरुष, (ततः) उस ज्ञान के होने से फिर (न विजुगुप्सते) ग्लानि को प्राप्त नहीं होता। (एतद्वैतत्) यही उसके ज्ञान का फल है॥ अतः केवल जीवात्मा के ज्ञान से मनुष्य का कृतकृत्य होना सम्भव नहीं है। किन्तु अपने आत्मस्वरूप को जानकर अपने रक्षक एवं सब सुखों के हेतु, सब काल में सबके स्वामी परमात्मा को जानकर ही वह संसार चक्र से छूटता है, अन्यथा नहीं।

अतः परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जीवात्मा दुःखों से अत्यन्त छूट जाता है यह भाव ही मुख्य है। अगर स्वरूपस्थिति से महर्षि पतञ्जलि का अभिप्राय मात्र जीवात्मा की स्वरूपस्थिति तक का ही होता तो—

१. ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥ योग० १.२३॥

अर्थात् सब सामर्थ्य, सब गुण, प्राण, आत्मा और मन के प्रेमभाव से आत्मादि द्रव्यों का ईश्वर के समर्पण करना॥ (ऋ०भू॰ उपासना विषय), तथा

२. तज्जपस्तदर्थभावनम्॥ योग० १.२८॥

अर्थात् इसी नाम (प्रणव = ओ३म्) का जप अर्थात् स्मरण और उसी का अर्थ विचार सदा करना चाहिए जिससे उपासक का मन एकाग्रता, प्रसन्नता और ज्ञान को यथावत् प्राप्त होकर स्थिर हो, जिससे उसके हृदय में परमात्मा का प्रकाश और परमेश्वर की प्रेम-भक्ति सदा बढ़ती जाए। (ऋ० भू॰ उपासना विषय)

— महर्षि पतञ्जलि इन सूत्रों के द्वारा परमात्मा के प्रति समर्पण और उसी के नाम जप तथा उसके स्वरूप एवं गुणों का विचार करने का विधान न करते।

जीवात्मा अपने चैतन्यस्वरूप से ही परमात्मा के चैतन्यस्वरूप में स्थित होता है। इस सिद्धान्त को महर्षि व्यास ने वेदान्तसूत्रों में औडुलोमि आचार्य के मत के रूप में कहा है —

चिति तन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः॥ वेदान्त ४.४.६॥

इस सूत्र का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती सत्यार्थप्रकाश के ग्याहरवें समुल्लास में लिखते हैं “जब अविद्यादि दोषों से छूट शुद्ध चैतन्य मात्र स्वरूप से जीव स्थित होता है तभी ‘तदात्मकत्व’ अर्थात् ब्रह्मस्वरूप के साथ सम्बन्ध को प्राप्त होता है।” अतः जीवात्मा की स्वरूपस्थिति होने पर जीवात्मा की परमात्मा में ज्ञानपूर्वक स्थिति होती है। ऋग्वेद में इस स्थिति का वर्णन इस प्रकार से किया है —

स म॑र्मृजा॒न आ॒युभिः॒ प्रय॑स्वा॒न्प्रय॑से हि॒तः। इन्दु॒रत्यो॑ विचक्ष॒णः॥ ऋ० ९.६६.२३॥

अर्थात् वह परमात्मा समाधि-योग से साक्षात् होता है। इसी के अभिप्राय को आर्यमुनि जी भावार्थ में इस प्रकार से कहते है “योगी लोग जब परमात्मा का ध्यान और समाधि करते हैं तब परमात्मा उन्हें आत्मस्वरूपवत् भान होता है।”

शंका :— बृहदारण्यकोपनिषद् में याज्ञवल्क्य “आत्मा” के ज्ञान को कहते हैं — “आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेयात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्।” (२.४.५) अर्थात् अरे मैत्रेयि ! निश्यच, आत्मा ही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य है। अयि मैत्रेयि ! निश्चय से आत्मा के दर्शन से, श्रवण से, मनन से और विज्ञान से यह सब विदित होता है॥

यहाँ पूरा प्रकरण आत्मा का चल रहा है, अतः स्वरूपस्थिति से आत्मसाक्षात्कार ही लक्षित जानना चाहिए, ना कि परमात्म-साक्षात्कार ?

समाधान :— महर्षिव्यास ने ऐसे प्रकरणों का समन्वय वेदान्त सूत्रों में किया है। इस प्रकरण में “आत्मा” शब्द से जीवात्मा लक्ष्य न होकर परमात्मा ही लक्ष्य है, इसको स्पष्ट करते हुए महर्षिव्यास कहते हैं — “वाक्यान्वयात्” (वेदान्त० १.४.१९) वाक्य के अन्वय से यहाँ ब्रह्म का वर्णन है, न कि जीवात्मा का। यहाँ प्रकरण यह था कि याज्ञवल्क्य के संन्यास ग्रहण करते समय मैत्रेयी ने पूछा कि हे भगवन्! आप कहाँ जाते हैं ? याज्ञवल्क्य — मैं संन्यास लेकर वन में जाता हूँ, और तेरा कात्यायनी से विभाग कर देता हूँ। मैत्रेयी — क्या इससे अमृत लाभ होगा ? याज्ञवल्क्य — अमृत = मुक्ति की आशा धन से नहीं हो सकती। मैत्रेयी — जिससे अमृता होने की सम्भावना नहीं, उस धन को मैं क्या करुँगी। अमृत का जो कारण आप जानते हैं, वह मुझे कहें। तब याज्ञवल्क्य ने कहा कि “ पति, स्त्री, पुत्र, वित्त, लोक आदि की कामना के लिए ये पदार्थ प्रिय नहीं होते, वरन् आत्मा की कामना के लिए ये सभी प्रिय होते हैं। ” .......... और अन्त में कहा कि “आत्मा वा अरे ....” अर्थात् आत्मा ही दर्शन के योग्य है ......। यहाँ पूरे प्रकरण में मुक्ति का कारण परमात्मदर्शन है, जीवात्मा नहीं। अतः याज्ञवल्क्य का यह कथन कि आत्मा के दर्शन, श्रवण, मनन और विज्ञान से सब कुछ जाना जाता है; यह लक्षण परमात्मा में घटता है, जीवात्मा में नहीं। अतः जीवात्मा के लिए परमात्मा ही लक्ष्य है, न कि मात्र स्वरूपस्थिति।

अतः मोक्ष की अवस्था में जिस प्रकार जीवात्मा अपने शुद्धस्वरूप को जानता हुआ, सब प्रकार के क्लेश, कर्म, विपाक और उनके आशय / संस्कारों से, सब प्रकार के दुःखों से छूटा हुआ परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है; उसी प्रकार योगी इसी शरीर में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में अपने शुद्धस्वरूप को जानता हुआ, परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो सभी दुःखों से छूट जाता है। यह अवस्था मात्र उसी काल तक ही होती है, जिस काल तक जीवात्मा उस अवस्था में रहता है। उस स्थिति से बाहर आते ही यह दुःख से छूटने की अवस्था भी समाप्त हो जाती है; और जीवात्मा व्युत्थान अवस्था में चित्त की वृत्तियों के समान प्रतीत होता है, जिसका वर्णन महर्षि पतञ्जलि ने अगले सूत्र में किया है। अतः समाधि और मोक्ष की समानता महर्षि कपिल ने कही हैै, जिसे महर्षि व्यास ने “यथाकैवल्ये” के द्वारा अभिव्यक्त किया है॥