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Samaadhi Paada / Trance / 26
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Samaadhi Paada / Trance / 26

स एषः पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥२६॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 26

In Hindi:

पदपाठ : स एषः पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेन अनवच्छेदात्॥

हिंदी में अर्थ : (कालेन) काल के द्वारा (अनवच्छेदात्) नष्ट = बाधित न होने के कारण से (स एषः) वह यह ईश्वर (पूर्वेषाम्) पूर्व में उत्पन्न ऋषियों = गुरुओं का (अपि) भी (गुरुः) गुरु = धर्म और ज्ञान का उपदेष्टा है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “यः पूर्वेषां सृष्ट्यादावुत्पन्नानामग्निवाय्वादित्यांगिरोब्रह्मादीनां प्राचीनानामस्मदादीनामिदानीं-तनानामग्रे भविष्यतां च सर्वेषामेव ईश्वर एव गुरुरस्ति। गृणाति वेदद्वारोपदिशति सत्यानर्थान् स गुरुः। स च सर्वदा नित्योऽस्ति। तत्र कालगतेरप्रचारत्वात्॥”

“(स एष०) जो कि प्राचीन अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा और ब्रह्मादि पुरुष सृष्टि की आदि में उत्पन्न हुए थे, उनसे लेके हम लोग पर्य्यन्त और हम से आगे जो होने वाले हैं, उन सबका गुरु परमेश्वर ही है, क्योंकि वेद द्वारा सत्य अर्थों का उपदेश करने से परमेश्वर का नाम गुरु है। सो ईश्वर नित्य ही है, क्योंकि ईश्वर में क्षणादि काल की गति का प्रचार ही नहीं है।” (ऋ० भू॰ वेदानां नित्यत्व०)

“जैसे वर्त्तमान समय में हम लोग अध्यापकों से पढ़ ही के विद्वान् होते हैं, वैसे परमेश्वर सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए अग्नि आदि ऋषियों का गुरु अर्थात् पढ़ानेहारा है। क्योंकि जैसे जीव सुषुप्ति और प्रलय में ज्ञानरहित हो जाते हैं, वैसा परमेश्वर नहीं होता। उसका ज्ञान नित्य है। इसलिये यह निश्चित जानना चाहिये कि बिना निमित्त के नैमित्तिक अर्थ सिद्ध कभी नहीं होता।” (स० प्र० सप्तम समु॰)

व्यास भाष्य : पूर्वे हि गुरवः कालेनावच्छिद्यन्ते। यत्रावच्छेदार्थेन कालो नोपावर्त्तते स एष पूर्वेषामपि गुरुः। यथास्य सर्गस्यादौ प्रकर्षगत्या सिद्धस्तथातिक्रान्तसर्गादिष्वपि प्रत्येतव्यः॥

हिंदी में अर्थ : (हि) निश्चय से (पूर्वे) पूर्व काल के = आदि सृष्टि से वर्त्तमान काल तक के (गुरवः) अग्नि, वायु, आदित्य, अङ्गिरा और ब्रह्मादि गुरुओं से लेकर वर्त्तमान काल तक के गुरु = उपदेष्टा (कालेन) काल से (अवच्छिद्यन्ते) अवच्छिन्न = नष्ट हो गये हैं। (यत्र) जहाँ (अवच्छेदार्थेन) अवच्छेद = नाश के लिए (कालः) काल (न उपावर्त्तते) प्रवृत्त नहीं होता = उपस्थित नहीं होता (सः) वह (एषः) यह ईश्वर (पूर्वेषाम्) पूर्ववर्त्ती गुरुओं का (अपि) भी (गुरुः) गुरु है। (यथा) जैसे ईश्वर (अस्य) वर्त्तमान (सर्गस्य) सर्ग = सृष्टि के (आदौ) आदिकाल में (प्रकर्षगत्या) निरतिशय प्रकृष्ट ज्ञानादि का आधार होने से धर्म और ज्ञान का वेद द्वारा उपदेष्टा होने के कारण (सिद्धः) सिद्ध है; (तथा) वैसे ही (अतिक्रान्तसर्गादिषु) पिछली सृष्टियों में (अपि) भी ईश्वर को (प्रत्येतव्यः) विद्यमान जानना चाहिए॥

वैदिक योग मीमांसा : ईश्वर में निरतिशय ज्ञान होने से वह सर्वज्ञ है, तथा सृष्टि की उत्पत्ति का उसका कोई स्वप्रयोजन न होते हुए भी जीवों पर अनुग्रह करना, तथा धर्म और ज्ञान के उपदेश द्वारा उनका उद्धार करना ही बारम्बार सृष्टि निर्माण का प्रयोजन है। अतः निरतिशय ज्ञानवान् होने से ईश्वर प्रत्येक सृष्टि के आदि में वेद द्वारा धर्म और ज्ञान का आदि उपदेष्टा होने से प्रथम गुरु है। इस विषय में वेदादि सत्यशास्त्रों के निम्न प्रमाण हैं—

तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुत॒ ऋचः॒ सामा॑नि जज्ञिरे।

छन्दा॑ᳬसि जज्ञिरे॒ तस्मा॒द्यजु॒स्तास्मा॑दजायत॥ यजुः० ३१.७॥

अर्थ — हे मनुष्यों! तुमको चाहिए कि उस पूर्ण अत्यन्त पूजनीय जिसके अर्थ सब लोग समस्त पदार्थों को देते वा समर्पण करते उस परमात्मा से ऋग्वेद, सामवेद उत्पन्न होते; उस परमात्मा से अथर्ववेद उत्पन्न होता और उस पुरुष से यजुर्वेद उत्पन्न होता है, उसको जानो। (यजुभाष्य — महर्षि दयानन्द सरस्वती)

ऋ॒चो अ॒क्षरे॑ पर॒मे व्यो॑म॒न् यसि्॑मन् दे॒वा अधि॒ विश्वे॑ निषे॒दुः। (ऋ० १.१६४.३९)

अर्थात् जिस अविनाशी परमात्मा में सर्वविद्यामय ऋगादि चारों वेद और सूर्यादि लोक स्थित हैं ...

यस्मा॒दृचो॑ अ॒पात॑क्ष॒न् यजु॒र्यस्मा॑द॒पाक॑षन्।

सामा॑नि॒ यस्य॒ लोमा॑न्यथर्वाङ्गि॒रसो॒ मुख॑म्।

स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः सि्॑वदे॒व सः॥ अथर्व० १०.७.२०॥

अर्थात् — (यस्मादृचो अपा॰) जो सर्वशक्तिमान् परमेश्वर है, उसी से (ऋचः) ऋग्वेद (यजुः) यजुर्वेद (सामानि) सामवेद (आङ्गिरसः) अथर्ववेद, ये चारों उत्पन्न हुए हैं। इसी प्रकार रूपकालङ्कार से वेदों की उत्पत्ति का प्रकाश ईश्वर करता है कि अथर्ववेद मेरे मुख के तुल्य सामवेद लोम के समान, यजुर्वेद हृदय के समान और ऋग्वेद प्राण की नाईं है। (ब्रूहि कतमः स्विदेव सः) कि चारों वेद जिससे उत्पन्न हुए हैं सो कौन सा देव है, उसको मुझसे कहो ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि — (स्कम्भं तं॰) जो सब जगत् का धारणकर्त्ता परमेश्वर है उसका नाम स्कम्भ है, उसी को तुम वेदों का कर्त्ता जानो, और यह भी जानो कि उसको छोड़ के मनुष्यों को उपासना करने के योग्य दूसरा कोई इष्टदेव नहीं है। (ऋ० भू॰ वेदोत्पत्तिविषय)

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण में भी आया है —

एवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः॥

॥ बृहदा॰ ४.४.१०; श० १४.५.४.१०॥

महर्षि याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को उपदेश देते हुए कहते है कि हे मैत्रेयि! जो आकाशादि से भी बड़ा सर्वव्यापक परमेश्वर है, उससे ही ऋक्, यजु, साम और अथर्व ये चारों वेद उत्पन्न हुए हैं, जैसे मनुष्य के शरीर से श्वास बाहर को आके फिर भीतर को जाता है इसी प्रकार सृष्टि के आदि में ईश्वर वेदों को उत्पन्न करके संसार में प्रकाश करता है, और प्रलय में वेद नहीं रहते, परन्तु उसके ज्ञान के भीतर वे सदा बने रहते हैं, बीजाङ्कुरवत्! जैसे बीज में अङ्कुर प्रथम ही रहता है, वही वृक्षरूप होके फिर भी बीज के भीतर रहता है, इसी प्रकार से वेद भी ईश्वर के ज्ञान में सब दिन बने रहते हैं, उनका नाश कभी नहीं होता, क्योंकि वह ईश्वर की विद्या है, इससे इसको नित्य जानना। (ऋ० भू॰ वेदोत्पत्तिविषय)

तेभ्यस्तप्तेभ्यस्त्रयो वेदा अजायन्त, अग्नेर्ऋग्वेदो, वायोर्यजुर्वेदः, सूर्यात्सामवेदः॥ (श० ११.५.८.३)

अर्थात् — उन तपस्वी ऋषियों के माध्यम से परमात्मा ने अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद, सूर्य से सामवेद इस प्रकार त्रयीविद्यारूप चार वेद प्रकट किये॥ इसी प्रकार मनुस्मृति में भी आया है—

अग्निवायुरविभ्यस्तु त्रयं ब्रह्म सनातनम्। दुदोह यज्ञसिद्ध्यर्थमृग्यजुःसामलक्षणम्॥ मनु॰ १.२३॥

अर्थात् — उस परमात्मा ने (यज्ञसिद्ध्यर्थम्) जगत् में समस्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि व्यवहारों की सिद्धि के लिए अथवा जगत् की सिद्धि अर्थात् जगत् के समस्त रूपों के ज्ञान के लिए (अग्नि-वायु-रविभ्यः तु) अग्नि, वायु और रवि से अर्थात् उनके माध्यम से (ऋग्यजुःसामलक्षणं त्रयं सनातनं ब्रह्म) ऋग् = ज्ञान, यजुः = कर्म, साम = उपासना रूप त्रिविध ज्ञान वाले नित्य वेदों को (दुदोह) दुहकर प्रकट किया॥

इस प्रकार सर्वशास्त्र ईश्वर को धर्म और ज्ञान का उपदेष्टा सिद्ध करते हैं, क्योंकि उसमें ज्ञान की पराकाष्ठा है। अतः वह ही आदि एवं परम गुरु है। ईश्वर से ही वेदज्ञान को प्राप्त करके अग्नि, वायु, आदित्य और अङ्गिरा नामक महर्षियों ने आगे अन्य पुरुषों को वेद का ज्ञान दिया। इस प्रकार वेद का ज्ञान ब्रह्मादि ऋषियों से होता हुआ वर्त्तमान काल में हम तक पहुँचा है, और इसी प्रकार वर्त्तमान काल के गुरुओं द्वारा आगे आने वाली पीढि़यों तक पहुँचेगा। यह सब उत्पन्न हुए गुरु, आदि सृष्टि के अग्नि, वायु आदि महर्षियों से लेकर वर्त्तमान काल तक के गुरु, काल से बाधित है = नष्ट होने वाले हैं। परन्तु परमात्मा में काल की गति का सञ्चार न होने से वह सर्वकाल में सर्वदा एकरस रहता है। इसीलिए वह पूर्व सृष्टियों में भी वर्त्तमान सृष्टि के समान वेदज्ञान का उपदेष्टा था, और आगे होने वाली सृष्टियों में भी रहेगा। इसमें यह भी कारण है कि ईश्वर का ज्ञान नित्य है, और उसका ज्ञान निरतिशय है। भौतिक शरीरधारी गुरु चाहे ईश्वर के वेदज्ञान से शिक्षा प्राप्त कर, विद्वान् होकर, दूसरों को भी धर्म और ज्ञान का उपदेश देने वाले होते हैं, परन्तु जीवात्मा के अल्पज्ञता रूपी दोष से ग्रस्त होने के कारण उनका ज्ञान सातिशय है। अतः जीव कितने भी विद्वान् क्यों न हो जाये, तो भी ईश्वर के ज्ञान की समानता को प्राप्त नहीं कर सकते।

ऋषियों ने कहीं भी भौतिक देहधारी गुरु को परमात्मा के समकक्ष ही नहीं माना। और न ही भौतिक देहधारी गुरु के प्रति समर्पण, ईश्वर के स्थान में उसकी पूजा आदि का, किसी भी सत्यशास्त्र में कोई उपदेश किया गया है। हाँ, लोक में वेदादि शास्त्रों की शिक्षा हेतु भौतिक देहधारी गुरु को स्वीकार करना तथा उससे शिक्षा ग्रहण करना मानव मात्र के आवश्यक है। परन्तु ऐसा गुरु भी वेदादि शास्त्रों का यथार्थ ज्ञाता होना चाहिए, न कि वेदादि शास्त्रों की मान्यताओं और सिद्धान्तों से विपरीत शिक्षा देने वाला।

अतः महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने योगमार्ग के पथिक के लिए, काल से बाधित मनुष्य देहधारी गुरुओं की अपेक्षा सबके परम गुरु ईश्वर का ही आश्रय लेकर, ईश्वर प्रणिधान का उपदेश किया है।