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Samaadhi Paada / Trance / 32
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Samaadhi Paada / Trance / 32

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः॥३२॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 32

In Hindi:

पदपाठ : तत् प्रतिषेधार्थम् एकतत्त्वाभ्यासः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथैते विक्षेपाः समाधिप्रतिपक्षास्ताभ्यामेवाभ्यासवैराग्याभ्यां निरोद्धव्याः। तत्राभ्यासस्य विषयमुपसंहरन्निदमाह —

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (एते विक्षेपाः) ये सभी व्याधि आदि विघ्न = चित्त के विक्षेप (समाधिप्रतिपक्षाः) समाधि के शत्रु = विरोधी हैं; अतः (ताभ्याम् एव) उन को भी (अभ्यासवैराग्याभ्याम्) पूर्वोक्त अभ्यास और वैराग्य रूपी उपायों के द्वारा (निरोद्धव्याः) निरोध करना चाहिए। (तत्र) उन दोनों में से (अभ्यासस्य) अभ्यास के (विषयम्) विषय का (उपसंहरन्) उपसंहार करते हुए (इदम्) इस सूत्र को (आह) कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (तत्) उन विक्षेपों की (प्रतिषेधार्थम्) निवृत्ति = विनाश के लिए (एकतत्त्वाभ्यासः) एक तत्त्व = ईश्वर = ब्रह्म के ध्यान का अभ्यास करना चाहिए॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (तत्प्रतिषेधा॰) जो केवल एक अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व है, उसी में प्रेम और सर्वदा उसी की आज्ञा पालन में पुरुषार्थ करना है, वही एक उन विघ्नों के नाश करने को वज्ररूप शस्त्र है, अन्य कोई नहीं। इसलिये सब मनुष्यों को अच्छी प्रकार प्रेमभाव से परमेश्वर के उपासना योग में नित्य पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे वे सब विघ्न दूर हो जायें॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : विक्षेपप्रतिषेधार्थमेकतत्त्वावलम्बनं चित्तमभ्यसेत्।

यस्य तु प्रत्यर्थनियतं प्रत्ययमात्रं क्षणिकं च चित्तं तस्य सर्वमेव चित्तमेकाग्रं नास्त्येव विक्षिप्तम्। यदि पुनरिदं सर्वतः प्रत्याहृत्यैकस्मिन्नर्थे समाधीयते तदा भवत्येकाग्रमित्यतो न प्रत्यर्थनियतम्।

योऽपि सदृशप्रत्ययप्रवाहेण चित्तमेकाग्रं मन्यते तस्यैकाग्रता यदि प्रवाहचित्तस्य धर्मस्तदैकं नास्ति प्रवाहचित्तं क्षणिकत्वात्। अथ प्रवाहांशस्यैव प्रत्ययस्य धर्मः स सर्वः सदृशप्रत्ययप्रवाही वा विसदृशप्रत्ययप्रवाही वा प्रत्यर्थनियतत्वादेकाग्र एवेति विक्षिप्तचित्तानुपपतिः। तस्मादेकमनेकार्थमवस्थितं चित्तमिति।

यदि च चित्तेनैकेनानन्विताः स्वभावभिन्नाः प्रत्यया जायेरन्नथ कथमन्यप्रत्ययदृष्टस्यान्यः स्मर्त्ता भवेत्। अन्यप्रत्ययोपचित्तस्य च कर्माशयस्यान्यः प्रत्यय उपभोक्ता भवेत्। कथञ्चित्समाधीयमान-मप्येतद्गोमयपायसीयन्यायमाक्षिपति।

किञ्च स्वात्मानुभवापह्नवश्चित्तस्यान्यत्वे प्राप्नोति। कथम्? यदहमद्राक्षं तत्स्पृशामि यच्चास्प्राक्षं तत्पश्याम्यहमिति प्रत्ययः सर्वस्य प्रत्ययस्य भेदे सति प्रत्ययिन्यभेदेनोपस्थितः। एकप्रत्ययविषयोऽयमभेदात्माऽहमिति प्रत्ययः कथमत्यन्तभिन्नेषु चित्तेषु वर्त्तमानं सामान्यमेकं प्रत्ययिनमाश्रयेत्।

स्वानुभवग्राह्यश्चायमभेदात्माऽहमिति प्रत्ययः। न च प्रत्यक्षस्य माहात्म्यं प्रमाणान्तरेणाभिभूयते। प्रमाणान्तरं च प्रत्यक्षबलेनैव व्यवहारं लभते। तस्मादेकमनेकार्थमवस्थितं च चित्तम्॥

हिंदी में अर्थ : (विक्षेपप्रतिषेधार्थम्) व्याधि आदि चित्त के विक्षेपों के लिए (एकतत्त्वावलम्बनम्) एक तत्त्व = ईश्वर के आलम्बन = आश्रय के द्वारा (चित्तम् अभ्यसेत्) चित्त का अभ्यास करे॥

(यस्य तु) जिसके मत में (चित्तम्) चित्त (प्रत्यर्थनियतम्) प्रत्येक विषय = पदार्थ के लिए पृथक्-पृथक् नियत, (प्रत्ययमात्रम्) ज्ञानमात्र = प्रतीतिमात्र (च) और (क्षणिकम्) क्षणिक = एक क्षण मात्र तक रहने वाला है (तस्य) उसके मत में (सर्वम् एव) सभी (चित्तम्) चित्त (एकाग्रम्) एकाग्र हैं; और कोई भी चित्त (विक्षिप्तम्) विक्षिप्त (न अस्ति एव) हो ही नहीं सकता। (यदि) यदि (पुनः इदम्) पुनः यह चित्त (सर्वतः) सब विषयों की ओर से (प्रत्याहृत्य) योगाभ्यास द्वारा हटा कर = अलग करके (एकस्मिन् अर्थे) किसी एक विषय = पदार्थ में (समाधीयते) समाहित किया जाता है (तदा) तब (भवति एकाग्रम्) वह चित्त एकाग्र होता है (इति) इस लिए (अतः न प्रत्यर्थनियतम्) यह चित्त प्रत्येक विषय = पदार्थ के लिए पृथक्-पृथक् नियत नहीं है।

(योऽपि) जो कोई भी (सदृशप्रत्ययप्रवाहेण) सदृश प्रतीति = ज्ञान के प्रवाह के कारण से (चित्तम्) चित्त को (एकाग्रम्) एकाग्र (मन्यते) मानते हैं (तस्य) उनकी (एकाग्रता) सदृश प्रतीति = ज्ञान की प्रवाहशील एकाग्रता, (यदि) यदि (प्रवाहचित्तस्य) प्रवाह चित्त का (धर्मः) धर्म है, ऐसा मानने पर (तदा) तो (क्षणिकत्वात्) चित्त और चित्त का प्रवाह क्षणिक होने से (एकम्) एक (प्रवाहचित्तम्) प्रवाह चित्त (न अस्ति) नहीं है। (अथ) और यदि एकाग्रता (प्रवाहांशस्यैव प्रत्ययस्य) प्रतीति के प्रवाह के अंश का ही (धर्मः) धर्म है, ऐसा मानने पर तो (स सर्वः) इस प्रकार से सभी चित्त (सदृशप्रत्ययप्रवाही वा विसदृशप्रत्ययप्रवाही वा) चाहे वे सदृश प्रतीति के प्रवाही हो अथवा असदृश प्रतीति के प्रवाही हो (प्रत्यर्थनियतत्वात्) प्रत्येक विषय = पदार्थ के लिए अलग-अलग नियत होने से (एकाग्र एव) एकाग्र ही हुए, (इति) इस प्रकार भी (विक्षिप्तचित्तः) विक्षिप्त चित्त की (अनुपपतिः) उपपत्ति = सिद्धि नहीं होती। (तस्मात्) इसलिए (अनेकार्थम्) अनेक विषयों = पदार्थों के लिए (अवस्थितम्) अवस्थित = स्थिर = अक्षणिक (एकम्) एक ही (चित्तम्) चित्त है (इति) यह सिद्ध हुआ।

(यदि च) और यदि (चित्तेन एकेन) एक चित्त के साथ (अनन्विताः) असम्बद्ध (स्वभावभिन्नाः) स्वभाव से भिन्न-भिन्न (प्रत्ययाः) प्रतीतिरूप ज्ञान (जायेरन्) उत्पन्न होते हैं (अथ) तो (अन्य) अन्य चित्त के (प्रत्ययदृष्टस्य) देखे हुए प्रत्यय = ज्ञान = दृष्ट विषय का (अन्यः) अन्य चित्त (स्मर्त्ता) स्मरण करने वाला (कथम् भवेत्) किस प्रकार से होगा ? (च) और (अन्य प्रत्ययोपचित्तस्य) अन्य चित्त के द्वारा अर्जित (कर्माशयस्य) कर्माशय = कर्म और आशयों = संस्कारों का (उपभोक्ता) फलरूप उपभोग करने वाला (अन्यः) अन्य (प्रत्ययः) चित्त (भवेत्) होगा! (कथञ्चित्) किसी प्रकार इस दोष का (समाधीयमानमपि) समाधान करने पर भी (एतत्) यह सिद्धान्त = क्षणिक चित्त का सिद्धान्त (गोमयपायसीयन्यायम्) गोमयपायसनीय न्याय को भी (आक्षिपति) मात कर देता है।

(किम् च) और क्षणिक चित्त में यह भी दोष है कि (चित्तस्य अन्यत्वे) भिन्न-भिन्न अनेक चित्त होने पर = मानने से (स्वात्मानुभवः) अपने-अपने अनुभव का भी (अपह्नवः) अपलाप = विरोध (प्राप्नोति) हो जाता है। (कथम्) किस प्रकार से ? (यत् अहम्) जिसको मैंने (अद्राक्षम्) देखा था (तत् स्पृशामि) उसी को स्पर्श कर रहा हूँ, (च) और (यत् अहम्) जिसको मैंने (अस्प्राक्षम्) स्पर्श किया था (तत् पश्यामि) उसी को देख रहा हूँ; (इति प्रत्ययः) इस प्रकार की स्व अनुभव रूप प्रत्यभिज्ञा (सर्वस्य प्रत्ययस्य भेदे सति) सभी ज्ञानों के भिन्न-भिन्न होने पर भी (प्रत्ययिनि) एक ज्ञाता में (अभेदेन) एक रूप से = अभिन्न रूप से (उपस्थितः) उपस्थित = वर्त्तमान रहती है। (एकप्रत्ययविषयः) एक ज्ञान का विषय बनाने वाला = एक ही रूप में अनुभव में आने वाली (अयम्) यह (अभेदात्मा) अभेद रूप = एक रूप से होने वाली प्रत्यभिज्ञा (अहम् इति प्रत्ययः) “अहम्” = “मैं” इस प्रकार से होने वाली स्वानुभूति रूप ज्ञान (कथम्) किस प्रकार (अत्यन्तभिन्नेषु चित्तेषु) अत्यन्त भिन्न क्षणिक चित्तों में (वर्त्तमानम्) उपस्थित हुआ = रहा हुआ (सामान्यम् एकम् प्रत्ययिनम्) एक सामान्य ज्ञाता को (आश्रयेत्) आश्रय करेगा ?

(च) और (अयम्) यह (अभेदात्माऽहम् इति प्रत्ययः) अभेद रूप “अहम् = मैं” ऐसा ज्ञान प्रत्येक मनुष्य को (स्वानुभवग्राह्यः) अपने अनुभव से ग्राह्य है = प्रत्यक्ष रूप से अनुभूत है। (च) और (प्रत्यक्षस्य) स्वानुभूति रूप प्रत्यक्ष प्रमाण का (माहात्म्यम्) माहात्म्य = महत्त्व (प्रमाणान्तरेण) अन्य अनुमानादि प्रमाणों से (न अभिभूयते) दबाया नहीं जा सकता। (च) क्योंकि (प्रमाणान्तरम्) प्रत्यक्ष से भिन्न अन्य प्रमाण (प्रत्यक्षबलेनैव) प्रत्यक्ष प्रमाण के बल पर ही (व्यवहारम् लभते) व्यवहार को प्राप्त करते हैं = प्रामाणिक माने जाते हैं। (तस्मात्) इस कारण से (अनेकार्थम्) अनेक ज्ञानों का आश्रय (एकम्) एक (च) और (अवस्थितम्) स्थिर = अक्षणिक = कैवल्य प्राप्ति तक स्थित रहने वाला (चित्तम्) चित्त है॥

वैदिक योग मीमांसा : व्याधि आदि विघ्नों तथा दुःखादि उनके फलों के निरोध हेतु महर्षि पतञ्जलि ने एक तत्त्व ईश्वर के अभ्यास का उपदेश इस सूत्र द्वारा दिया है। इस एक तत्त्व ईश्वर की भावना, उसके स्वरूप का चिन्तन = ध्यान और उसी में समाहित होने से, योग के इन विघ्नों का नाश होता है। इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती स्पष्ट रूप से कहते हैं — “जो केवल एक अद्वितीय ब्रह्मतत्त्व है, उसी में प्रेम और सर्वदा उसी की आज्ञा पालन में पुरुषार्थ करना है, वही एक उन विघ्नों के नाश करने को वज्ररूप शस्त्र है, अन्य कोई नहीं। इसलिये सब मनुष्यों को अच्छी प्रकार प्रेमभाव से परमेश्वर के उपासना योग में नित्य पुरुषार्थ करना चाहिये कि जिससे वे सब विघ्न दूर हो जायें॥”

शंका — बहुत से भाष्यकारों के अनुसार यहाँ एक तत्त्व से किसी भी एक तत्त्व के अभ्यास को कहा है, न कि ईश्वर अथवा केवल और केवल मात्र ईश्वर का अभ्यास। भोज और विज्ञानभिक्षु ने भी इसी आशय को कहा है। भोज ने “एकस्मिन् कस्मिंश्चिदभिमते तत्त्वेऽभ्यासः” कहा है अर्थात् किसी एक अभीष्ट तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए। और विज्ञानभिक्षु ने “एकं स्थूलादि किञ्चित्....” कहा है अर्थात् एक से किसी स्थूल पदार्थ आदि को ग्रहण किया है। क्योंकि योगसूत्र १.२९ में ईश्वरप्रणिधान से अन्तरायों के अभाव का निर्देश हो चुका है, ऐसे में पुनः “एकतत्त्व” से ईश्वर का ग्रहण करना पुनरुक्ति दोष होगा।

समाधान — महर्षि पतञ्जलि ने योग सूत्रों में वेदादि सत्यशास्त्रों के अनुकूल तीन अनादि तत्त्वों को माना है — १. प्रकृति = दृश्य; २. जीवात्मा = चितिशक्ति = द्रष्टा; तथा ३. ईश्वर। अब यदि “एकतत्त्व” से ईश्वर का ग्रहण न किया जाये, तो शेष दो तत्त्व, = प्रकृति और जीवात्मा, रहते हैं। उनको “एकतत्त्व” से ग्रहण करने पर निम्न दोष उपस्थित होंगे —

१. प्रथम पक्ष में “एकतत्त्व” से प्रकृति और उसके विकारों को ग्रहण करते हैं। महर्षि पतञ्जलि ने इन प्रकत्यादि तत्त्वों को योगसूत्र २.१८ में “दृश्य” कहा है। उक्त प्रकरण में दुःख का विवेचन करते हुए कहा है —

हेयं दुःखमनागतम्॥ (योग० २.१६)

अर्थात् अनागत = आने वाला भावी दुःख ही हेय है। यह अनागत दुःख ही दूर करने योग्य है। इस दुःख का कारण बताते हुए अगले सूत्र में कहा है —

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः॥ (योग० २.१७)

अर्थात् द्रष्टा = आत्मा और दृश्य = प्रकृति का अविद्याजन्य संयोग ही हेयहेतु = दुःख का कारण है। अगले सूत्रों में दृश्य का स्वरूप बताया है।

यहाँ यह विचारणीय है कि इन सूत्रों में आत्मा रूपी द्रष्टा के साथ, प्रकृति रूपी दृश्य के संयोग को, आने वाले भावी दुःखों का कारण कहा गया है। ऐसे में प्रकृति और उसके विकारों को एक “एकतत्त्व” से ग्रहण करके, उनके अभ्यास से व्याधि आदि विघ्नों तथा दुःखादि उपविघ्नों के नाश को सम्भव मानना, शास्त्रकार महर्षि पतञ्जलि तथा भाष्यकार महर्षि व्यास की मान्यताओं से सर्वथा विपरीत है।

इसी प्रकार महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र १.१५ में दृष्ट और आनुश्रविक विषयों से तृष्णारहित स्थिति को वैराग्य कहा है, और वैराग्य के सम्पादन के बिना समाधि की सिद्धि सम्भव नहीं है। ऐसे में दृष्ट विषयों में विरक्ति रूपी वैराग्य को आवश्यक मानते हुए शास्त्रकार इन दृष्ट विषयों के अभ्यास का निर्देश नहीं कर सकते। अतः प्रकृति और उसके विकार रूपी “एकतत्त्व” के अभ्यास से विक्षेपों का प्रतिषेध = निरोध = निवारण सम्भव नहीं है।

२. द्वितीय पक्ष में “एकतत्त्व” से आत्मा को ग्रहण करते हैं। इसे महर्षि पतञ्जलि ने द्रष्टा = चितिशक्ति कहा है। द्रष्टा के द्वारा अपने स्वयं के अभ्यास से भी विघ्नों = विक्षेपों के नाश का आधार नहीं बनता। यदि मात्र अपने अभ्यास से ही व्याधि आदि विघ्नों तथा दुःखादि उपविघ्नों का नाश सम्भव होता तो, द्रष्टा = आत्मा जिसे शुद्ध और ज्ञान का अनुभव करने वाला कहा है — “द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥” योगसूत्र २.२०॥, वह जानते हुए, समझते हुए दृश्य = प्रकृति के साथ संयोग करके अपने लिए दुःखों को प्राप्त नहीं करता। अतः अविद्यादि क्लेशों से ग्रस्त हुए द्रष्टा = आत्मा के द्वारा अपने स्वरूप के अभ्यास से भी विघ्नों का नाश सम्भव नहीं है।

इसी प्रकार किसी अन्य मुक्त आत्मा के स्वरूप के अभ्यास से भी विघ्नों का नाश सम्भव नहीं है। क्योंकि कोई भी जीवात्मा तीनों कालों में क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा पृथक् नहीं हो सकता। जबकि ईश्वर तीनों कालों में इन सब से सर्वथा असम्बद्ध है।

३. अतः तीसरा अनादि तत्त्व केवल “ईश्वर” ही है जिसके अभ्यास से इन सभी विघ्नों तथा उपविघ्नों का नाश सम्भव है। यह प्रकरण से भी स्पष्ट है कि ईश्वर की भावना से, ईश्वरप्रणिधान से इन विक्षेपों का नाश होता है। महर्षि पतञ्जलि योग सूत्र १.२९ में स्पष्ट रूप से इसी तथ्य को कह रहे हैं। अगले दो सूत्रों में विघ्नों और उपविघ्नों का वर्णन करने के पश्चात् इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ईश्वर के अभ्यास से उसके निवारण को कह रहे हैं।

इस मान्यता को पुनरुक्ति कहने वाले भाष्यकार यह भूल गए कि ईश्वरप्रणिधान का निर्देश तो महर्षि पतञ्जलि ने साधन पाद में भी दो बार किया है। प्रथम बार सूत्र २.१ में इसे क्रियायोग का अंग कहा है और फिर योगसूत्र २.३२ में इसे नियमों के अन्तर्गत गिना है। यह भी तो पुनरुक्ति हुई।

वस्तुतः भाष्यकार महर्षि व्यास सूत्र की अवतरणिका में स्पष्ट कर रहे हैं — “तत्राभ्यासस्य विषयमुपसंहरन्निदमाह” अर्थात् उस अभ्यास के विषय का उपसंहार रूप इस सूत्र का व्याख्यान किया गया है। उपसंहार के लिए आरम्भ को देखना चाहिए कि किस विषय का आरम्भ कर उसका उपसंहार किया जा रहा है। यहाँ आरम्भ “ईश्वरप्रणिधान” का है अतः उपसंहार भी ईश्वरप्रणिधान के अभ्यास का ही मानना चाहिए, अन्यथा प्रकरण विरोध होगा।

इस प्रकार “एकतत्त्वाभ्यास्” से “ईश्वर” का अभ्यास मानना ही उचित है। अस्तु।

इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास ने क्षणिकचित्त मानने वालों की मान्यता का भी निराकरण किया है। इसे मूलरूप से बौद्धमत के खण्डन के रूप में नहीं जानना चाहिए। क्योंकि बौद्धमत तो महर्षि व्यास के काल के बहुत बाद में प्रचलित हुआ है। चित्त के क्षणिक मानने की मान्यता तो पहले से ही प्रचलित थी जिसे बौद्धों ने महर्षि व्यास के काल के बहुत बाद में अपनाया और वर्त्तमान काल में यह क्षणिकवाद की मान्यता बौद्धमत के रूप में प्रसिद्ध है। सांख्यसूत्रकार महर्षि कपिल ने भी सांख्यदर्शन में क्षणिकवाद की मान्यता को उठाकर उसका निराकरण किया है।

क्षणिकवाद के अनुसार कोई भी पदार्थ स्थिर नहीं है। सभी पदार्थ क्षणिक हैं, हर क्षण में पदार्थ नया बनता = उत्पन्न होता है, और पिछले क्षण वाला पदार्थ नष्ट हो जाता है। इस प्रकार चित्त भी क्षणिक है। अन्य पदार्थों के समान चित्त भी प्रत्येक क्षण में नया उत्पन्न होता है अर्थात् पिछले क्षण में बने हुए चित्त के स्थान पर वर्त्तमान क्षण में नया चित्त बन जाता है। यह मान्यता चित्त की एकाग्रता और समाधि हेतु अव्यवहारार्य और निकृष्ट है। इस मान्यता में महर्षि व्यास ने निम्न दोष दिखाए हैं —

१. चित्त प्रत्येक क्षण में नया उत्पन्न होने से, जिस वस्तु अथवा विषय को, उत्पन्न होकर वर्त्तमान क्षण में ग्रहण करता है, उस वस्तु अथवा विषय को ग्रहण करके नष्ट हो जाता है। इस प्रकार अगली वस्तु और अगले विषय के लिए नवीन चित्त होगा। जब कोई भी चित्त दो वस्तुओं अथवा दो विषयों को ग्रहण ही नहीं करता तो वह चित्त सर्वथा एकाग्र ही है, और एकाग्र चित्त के लिए योगाभ्यास का उपदेश व्यर्थ है।

२. यदि क्षणिकवादी इस विषय में यह कहें कि प्रत्येक पदार्थ और विषय के लिए पृथक्-पृथक् चित्त नियत हैं और सब विषयों से, योगाभ्यास द्वारा, एक पदार्थ में समाहित करना होता है; तो यह मानना भी क्षणिकवाद की मान्यता से विपरीत है। क्योंकि ऐसा चित्त क्षणिक नहीं और फिर पृथक्-पृथक् नियत चित्तों का एक पदार्थ अथवा विषय में नियत करना कदापि सम्भव नहीं हो सकता।

३. यदि एकाग्रता से क्षणिकवादी यह मानते हों कि क्षण-क्षण में बदलते चित्त में क्षण-क्षण में विलक्षण विषय को लेते रहने से चित्त विक्षिप्त है, और ज्ञानमात्र निरन्तर सदृश प्रवाह वाले चित्त का प्रवाह चालू होना एकाग्रता है और इस प्रकार की स्थिति को बनाए रखने हेतु योगाभ्यास होना चाहिए। तो इस पर भी महर्षि व्यास प्रश्न करते हैं कि यह जो सदृश प्रवाह होने से चित्त की एकाग्रता मानी है, वह प्रवाह चित्त का धर्म है अथवा प्रवाह अंश = प्रत्यय = ज्ञान का ? प्रथम पक्ष में तो चित्त और चित्त का प्रवाह क्षणिक होने से एक प्रवाहचित्त ही सम्भव नहीं है। जो चित्त प्रतिक्षण बदलता रहता है, उसकी सदृश प्रवाह रूप वृत्ति का आधार क्या है ? जब पूर्व क्षण का चित्त ही नहीं रहा, ऐसे में उसकी वृत्ति का तो उपस्थित रहना; परन्तु दूसरी ओर जिसमें वह वृत्ति उत्पन्न हुई, वह चित्त ही नहीं है, यह परस्पर विरोधी मान्यता है। दूसरे पक्ष में भी चित्त की विक्षिप्तता सिद्ध नहीं होगी, क्योंकि जो ज्ञान हो रहा है, चाहे वह सदृश प्रवाह वाला है या असदृश प्रवाह वाला है, वह भी क्षणिक ही है, और फिर प्रत्येक विषय के लिए अलग-अलग नियत चित्त होने से चित्त एकाग्र ही है।

४. यदि क्षणिकवादी यह मानें कि एक ही चित्त से असम्बद्ध तथा स्वभाव से भिन्न-भिन्न प्रतीति रूप ज्ञान हो जाते है; इसलिए एकाग्रता हेतु योग का उपदेश सम्भव है। इस मान्यता में दोष यह है कि प्रतिक्षण बदलने वाले चित्तों में, किसी अन्य चित्त द्वारा देखे हुए ज्ञान का अन्य चित्त स्मरण कैसे करेगा ? और फिर अन्य चित्त द्वारा अर्जित किया गया कर्माशय होने से, उसके फल का भोग करने वाला अन्य चित्त होगा ! यह मान्यता गोमापायसीय न्याय से भी निकृष्ट है। जैसे गोमय = गोबर और पायस = गो दुग्ध से बना पाक, दोनों ही गाय से उत्पन्न होने से दोनों ही भक्ष्य है, ऐसा मानना सर्वथा अनुचित है। इसी प्रकार उपरोक्त मान्यता है।

५. क्षणिकवाद की मान्यता का सबसे प्रबल दोष यह है कि यह मान्यता प्रत्यक्ष प्रमाण के भी विरुद्ध है। लोक में यह सभी प्रत्यक्ष रूप से जानते और मानते हैं कि जिस पदार्थ को मैंने देखा था, उसी का स्पर्श कर रहा हूँ; और जिसे स्पर्श किया था, उसी को देख रहा हूँ। यहाँ देखने और स्पर्श करने वाली इन्द्रियाँ भिन्न होते हुए भी उनसे ज्ञान प्राप्त करने वाला चित्त एक ही है। यह प्रतीति क्षणिक चित्त से सम्भव नहीं है। पूर्व क्षण के जिस चित्त की स्थिति काल में नेत्र द्वारा देखा गया, वह चित्त अब नहीं है, और वर्त्तमान क्षण के जिस चित्त के होते हुए स्पर्शेन्द्रिय द्वारा स्पर्श किया गया, वह पूर्व क्षण में नहीं था और अगले क्षण में भी नहीं रहेगा। इस प्रकार से भिन्न चित्तों द्वारा एक वृत्ति रूप ज्ञान का होना सम्भव नहीं होता। यह प्रत्यक्ष अनुभव रूप ज्ञान अन्य सभी प्रमाणों की अपेक्षा से अधिक प्रबल है, क्योंकि अन्य अनुमान और तर्कादि प्रत्यक्ष के ही बल से प्रतिष्ठित रहते हैं।

इस प्रकार अनेक ज्ञानों का आश्रय एक अक्षणिक = नियत, स्थायी चित्त ही सिद्ध होता है। अतः एक, नियत और मोक्ष तक रहने वाला अक्षणिक चित्त होने से योग का उपदेश संगत है। इसी एक चित्त द्वारा एक ईश्वर के अभ्यास से ही चित्त के सभी विक्षेपों का निरोध सम्भव है।

मूल सूत्र में क्षणिकवाद का निर्देश भी न होने पर भी, महर्षि व्यास ने इस मान्यता को इस सूत्र की व्याख्या में उठा कर इसका खण्डन किया है। यह मान्यता प्रचलित होने के कारण, इसके योग की सिद्धि में बाधक होने से ही महर्षि व्यास ने इसे यथावसर उठाया है। योग = समाधि के विघ्नों के प्रतिषेध हेतु ईश्वर का अभ्यास तो तभी सम्भव होगा जब चित्त को क्षिप्त, मूढ अथवा विक्षिप्त माना जाए। क्षणिकवाद की मान्यता में तो चित्त सर्वथा एकाग्र ही है और विक्षिप्त चित्त के अभाव में योगविषयक सम्पूर्ण उपदेश ही व्यर्थ रहता है। अतः विक्षेपों के प्रतिषेध हेतु उपदेश के अवसर पर, चित्त को एक, स्थायी और अक्षणिक सिद्ध करना और इसकी एकाग्रता हेतु प्रयत्न करने का उपदेश व्यवहारार्य है।

महर्षि पतञ्जलि ने भी निम्न सूत्रों में क्षणिकवाद की मान्यता का खण्डन किया है —

एकसमये चोभयानवधारणम् ॥ ४.२०॥

चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च॥ ४.२१॥

इन का व्याख्यान यथास्थान किया जायेगा।