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Samaadhi Paada / Trance / 4
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Samaadhi Paada / Trance / 4

वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥४॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 4

In Hindi:

पदपाठ : वृत्तिसारूप्यम् इतरत्र॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : व्युत्थानचित्ते तु सति तथाऽपि भवन्ती न तथा। कथं तर्हि? दर्शितविषयत्वात् —

हिंदी में अर्थ : (व्युत्थानचित्ते) चित्त की व्युत्थान दशा में = असम्प्रज्ञात समाधि से भिन्न अवस्था में = निरुद्धावस्था से भिन्न अवस्थाओं में (तु) तो (तथापि भवन्ती सति) जीवात्मा निजरूप में होता हुआ = अपरिवर्तनशील होता हुआ भी (न तथा) स्वयं को वैसा अनुभव नहीं करता। (कथं तर्हि) तो किस रूप का होता है?, (दर्शितविषयत्वात्) चित्त = बुद्धि के द्वारा दिखाए गये विषयों का प्रतिसंवेदी = अनुभवकर्त्ता होने के कारण—

हिंदी में अर्थ : (इतरत्र) निरुद्धावस्था से भिन्न काल में = व्युत्थान काल में जीवात्मा (वृत्तिसारूप्यम्) चित्तवृत्तियों के स्वरूप के समान रूप वाला प्रतीत होता है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “यदोपासको योग्युपासनां विहाय सांसारिकव्यवहारे प्रवर्त्तते तदा सांसारिकजनवत्तस्यापि प्रवृत्तिर्भवत्याहोस्विद् विलक्षणेत्यत्राह — इतरत्र सांसारिक व्यवहारे प्रवृत्तेऽप्युपासकस्य योगिनः शान्ता धर्मारूढा विद्याविज्ञानप्रकाशा सत्यतत्त्वनिष्ठाऽतीव तीव्रा साधारणमनुष्यविलक्षणाऽपूर्वैव वृत्तिर्भवतीति। नैवेदृश्यनुपासकानामयोगिनां कदाचिद् वृत्तिर्जायत इति।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

(वृत्तिसा॰) अर्थात् उपासक योगी और संसारी मनुष्य जब व्यवहार में प्रवृत्त होते हैं तब योगी की वृत्ति तो सदा हर्ष शोक रहित आनन्द में प्रकाशित होकर उत्साह और आनन्दयुक्त रहती है और संसार के मनुष्य की वृत्ति सदा हर्ष शोक रूप दुःख संसार में डूबी रहती है। उपासक योगी की तो ज्ञानरूप प्रकाश में सदा बढ़ती रहती है और संसारी मनुष्य की वृत्ति सदा अन्धकार में फंसती जाती है॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : व्युत्थाने याश्चित्तवृत्तयस्तदविशिष्टवृत्तिः पुरुषः। तथा च सूत्रम्—‘एकमेव दर्शनम्, ख्यातिरेव दर्शनम्’ इति। चित्तमयस्कान्तमणिकल्पं सन्निधिमात्रोपकारि दृश्यत्वेन स्वं भवति पुरुषस्य स्वामिनः। तस्माच्चित्तवृत्तिबोधे पुरुषस्यानादिः सम्बन्धो हेतुः॥

हिंदी में अर्थ : (व्युत्थाने) निरुद्धावस्था से भिन्न अवस्था में = असम्प्रज्ञात समाधि से भिन्न काल में (याः) जिस प्रकार की (चित्तवृत्तयः) चित्तवृत्तियाँ होती है (पुरुषः) पुरुष = जीवात्मा (तदविशिष्टवृत्तिः) उन्हीं वृत्तियों के समान धर्म वाला होता है। (तथा च सूत्रम्) इसी अर्थ को दिखाने वाला पंचशिखाचार्य का सूत्र है (एकमेव दर्शनम्) (व्युत्थान काल में) पुरुष और बुद्धि का दर्शन एक ही होता है; उसमें पुरुष का स्वरूप भिन्न और चित्त का स्वरूप या चित्त वृत्ति व्यापार भिन्न नहीं होता, (ख्यातिः) ख्याति अर्थात् बोध = एक बुद्धिवृत्ति बोध (एव) ही (दर्शनम्) दर्शन है। अर्थात् चित्त की जैसी वृत्तियाँ होती है वैसा ही पुरुष दीखता है। (चित्तम्) चित्त = बुद्धि (अयस्कान्तमणिकल्पम्) अस्यकान्त मणि = चुम्बक के समान (सन्निधिमात्रोपकारि) समीप होने मात्र से पुरुष का उपकार करने वाला होने से (दृश्यत्वेन) दृश्यत्व रूप से (पुरुषस्य स्वामिनः) पुरुष रूपी स्वामी का (स्वं भवति) स्व = धन हो जाता है।

(तस्मात् चित्तवृत्तिबोधे) उन चित्तवृत्तियों के बोध = अनुभव में (पुरुषस्य) पुरुष का बुद्धि के साथ (अनादिः) प्रवाह से अनादि (सम्बन्धो हेतुः) सम्बन्ध ही कारण है॥

वैदिक योग मीमांसा : निरुद्धावस्था में उपासक = योगी, स्वरूपस्थिति को प्राप्त करता हुआ, द्रष्टा परमात्मा के स्वरूप में अवस्थित होता है। परन्तु योगी सदा तो इस निरुद्धावस्था में नहीं रहता; अतः योगी की व्युत्थान काल में, तथा अन्य जो सामान्य संसारी जन है जिनकी इस ओर गति ही नहीं है, उनकी स्थिति कैसी होती है ? उस अवस्था में पुरुष = जीवात्मा का चैतन्य स्वरूप होता हुआ भी, वैसा भासित नहीं होता; तो कैसा होता है? इस प्रश्न का उत्तर इस सूत्र के द्वारा दिया गया है।

निरुद्धावस्था से भिन्न अवस्था में पुरुष वृत्तियों के समान रूप वाला प्रतीत होता है; अर्थात् चित्त की जैसी वृत्तियाँ होती है, वैसी ही दशा वाला जीवात्मा व्यवहार काल में प्रतीत होता है। व्यवहार काल में जैसी शान्त, घोर, मूढ रूप अथवा सुख, दुःख, मोह रूप वाली चित्त की वृत्तियाँ होती है, उन्हीं वृत्तियों के अनुरूप ही जीवात्मा = पुरुष अपने आप को अनुभव करता है; और यह मानता है कि मैं शान्त, घोर, मूढ अवस्था वाला हूँ अथवा सुख, दुःख, मोह से स्वयं को वैसा ही सुखी, दुःखी, मोहित अनुभव करता है; और उसी प्रकार का व्यवहार भी करने लगता है। जीवात्मा = पुरुष व्यवहार काल में अपने चैतन्यस्वरूप को न त्यागता हुआ भी क्रोध आने पर “मैं क्रोधित हूँ”; मोह होने पर “मैं मोहित हूँ”; सुख अनुभव होने पर “मैं सुखी हूँ”; दुःख प्राप्त होने पर “मैं दुःखी हूँ”; अज्ञान होने पर “मैं अज्ञानी हूँ”; मूढता होने पर “मैं मूढ हूँ”; शान्त होने पर “मैं शान्त हूँ”; मल, दोष होने पर “मैं मलिन हूँ”; इत्यादि, इस प्रकार चित्त वृत्तियों के बदलने के साथ-साथ, पुरुष अपने आप को वैसा-वैसा अनुभव करता है।

इसमें इतना विशेष जानना चाहिए कि जो उपासक = योगी होता है उसकी वृत्ति तो व्यवहार काल में भी शान्त, धर्म पर रूढ, विद्या विज्ञान का प्रकाश करने वाली, हर्ष शोक से रहित, आनन्द से प्रकाशित, उत्साह और आनन्द युक्त तथा तत्त्व के यथार्थ रूप को जानने वाली होती है; और अन्य संसारी मनुष्यों की हर्ष शोक रूप दुःख सागर में डूबी रहती है। क्योंकि जब उपासक = योगी ने आत्म साक्षात्कार कर लिया है, परमात्म-ज्ञान को प्राप्त कर लिया, प्रकृति-पुरुष का विवेक हो जाने से वह अपने आपको प्रकृति से भिन्न जानता है; अतः प्रकृति के गुणों के कारण सुख, दुःख, मोह रूप वृत्तियों से प्रभावित न होता हुआ हर्ष-शोक से रहित ही रहता है। अतः व्युत्थान काल में वह अपने स्वरूप में स्थित न होते हुए भी शान्त, धर्मनिष्ठ, उत्साह और आनन्द से युक्त ही रहता है। दूसरी ओर जिस पुरुष को प्रकृति और पुरुष के भेद का ज्ञान नहीं हुआ वह अविद्या के कारण, रजोगुण अथवा तमोगुण की प्रधानता से अथवा दोनों के ही प्रभाव के कारण शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि को ही अपना स्वरूप मानता तथा परिवार = पत्नी / पति, पुत्र, माता, पिता को भी अपना स्वरूप मान, उनके सुख में सुख का अनुभव करता और दुःख में दुःख का अनुभव करता। ऐसी अवस्था में पुरुष प्राकृतिक पदार्थों, परिवार, धन आदि की हानि को अपनी हानि समझता और इनके लाभ को अपना लाभ मानते हुए वैसा ही व्यवहार भी करता है।

इस सूत्र पर महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा किया गया अर्थ व्यासभाष्य का पूरक होने से महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि साधारण दृष्टि से देखा जाए तो दोनों में भेद लगता है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं है। महर्षि व्यास के अनुसार सांसारिक अवस्था में, योगी तथा संसारी मनुष्यों, दोनों का आत्मा चित्तवृत्ति के समान ही प्रतीत होता है; अर्थात् उस समय तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) के प्रभाव के कारण जिस प्रकार की चित्तवृत्तियाँ होती हैं, पुरुष भी अपने को उसी अवस्था वाला अनुभव करता है। यहाँ पर महर्षि दयानन्द इतना विशेष कहते हैं कि योगी और संसारी मनुष्य की अवस्था में भेद रहता है, जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है। आत्मा की स्वरूपस्थिति से इतर अवस्था में तो वृत्तिसारूप्यम् ही होता है, परन्तु योगी और संसारी मनुष्यों की वृत्तियों में तो धरती और आकाश का अन्तर रहता है। “कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्” (योग० ४.७) के अनुसार योगी के कर्म अशुक्ल अकृष्ण होते हैं और अन्य अर्थात् संसारी मनुष्यों के तीन प्रकार के अर्थात् शुक्ल, कृष्ण, शुक्लकृष्ण। अतः वृत्ति की दृष्टि से व्युत्थान दशा में तो योगी और अयोगी (संसारी मनुष्य) दोनों समान हैं परन्तु वृत्ति के स्तर = वृत्तिभेद के कारण उनमें समानता नहीं होती। सात्त्विक, राजसिक और तामसिक वृत्ति युक्त मनुष्यों को, प्रधान अथवा गौण वृत्ति स्तर के आधार पर ही क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त तथा एकाग्र अवस्था भेद में महर्षि व्यास ने भी बाँटा है। ऐसे में सभी योगी तथा संसारी मनुष्य, व्युत्थान दशा में एक समान नहीं माने जा सकते। इस प्रकार महर्षि दयानन्द, महर्षिव्यास के अर्थ को ही अधिक स्पष्ट कर रहे हैं।

कुछ विद्वानों ने एकाग्र और निरुद्ध अवस्था से भिन्न अवस्था अर्थात् क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त अवस्थाओं को ही व्युत्थान अवस्था मानते हुए केवल इन्हीं तीन में ही “वृत्तिसारूप्यम्” माना है; और निरुद्धावस्था के साथ-साथ एकाग्रावस्था में भी स्वरूपस्थिति को माना है। जबकि “तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्” (योग० १.३) के अनुसार केवल निरुद्धावस्था में ही स्वरूप स्थिति होती है। एकाग्र अवस्था में तो सम्प्रज्ञात समाधि ही होती है जो कि चार प्रकार की बताई गई है। इनमें से चतुर्थ प्रकार की सम्प्रज्ञात समाधि (अस्मितानुगत) में ही पुरुष का = आत्मा का ज्ञान होता है; शेष तीनों में तो प्रकृति और उसके विकार तथा सुख विशेष की अनुभूति ही आलम्बन के विषय रहते हैं। सम्प्रज्ञात समाधि में सर्ववृत्ति निरोध नहीं होता, और वृत्तियों की स्थिति रहती है, चाहे वे मात्र सात्त्विक ही होती हैं। दूसरी ओर “सर्ववृत्तिनिरोधेत्वसंप्रज्ञातः समाधिः”॥(योग० १.१ - व्यास भाष्य) सभी वृत्तियों के निरोध को असम्प्रज्ञात समाधि कहा है। अतः केवल असम्प्रज्ञात समाधि में ही स्वरूपस्थिति मानी गयी है।

अगर दुर्जनतोषन्याय से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में, आत्मा के आलम्बन को छोड़कर अन्य सभी वृत्तियों का निषेध मानकर, स्वरूपस्थिति को माना भी जाये, तो भी शेष तीनों सम्प्रज्ञात समाधियों की अवस्थाओं में, आत्मा = पुरुष का आलम्बन न होने से तथा वृत्तियों का भी अस्तित्त्व रहने से, उन्हें व्युत्थान अवस्था ही मानना होगा। यहाँ पर यह भी विचारणीय है कि अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा = पुरुष का बोध तो होता है परन्तु पुरुष का यह आलम्बन भी चित्त के माध्यम से ही होता है, और उस अवस्था में परमात्मा का आलम्बन एवं साक्षात्कार नहीं होता। ऐसे में यदि एकाग्रावस्था = सम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति में वृत्तिसारूप्यम् न माना जाये तो पुरुष की स्वरूपस्थिति माननी होगी जो कि प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम प्रमाण से विरुद्ध है।

अतः स्वरूपस्थिति केवल असम्प्रज्ञात समाधि = निरुद्धावस्था में होने से, और एकाग्रावस्था में वृत्तिसारूप्यम् होने से “एकाग्रावस्था”, “निरुद्धावस्था” की अपेक्षा से तो व्युत्थान अवस्था ही है। हाँ, एकाग्रावस्था में होने वाली सम्प्रज्ञात समाधि को योगपक्ष में माने जाने से यह अवस्था शेष तीन अवस्थाओं (क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त) से तो श्रेष्ठ है, परन्तु यहाँ भी स्वरूपस्थिति नहीं मानी जा सकती क्योंकि महर्षि व्यास द्वारा इसे “निरोधमभिमुखं करोति” (व्यासभाष्य सूत्र १.१) मानते हुए स्वरूपस्थिति होने के लिए निरुद्धावस्था की ओर अग्रसर करने वाला कहा है। इसी प्रकार “तदेव रजोलेशमलापेतं स्वरूपप्रतिष्ठं सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रं धर्ममेघध्यानोपगं भवति।” (व्यासभाष्य सूत्र १.२) यहाँ पर एकाग्रावस्था में चित्त का स्वरूपप्रतिष्ठित अर्थात् शुद्ध, पवित्र अवस्था वाला होना कहा है न कि जीवात्मा की स्वरूपस्थिति को माना है।

यहाँ पर स्वरूपस्थिति का तात्पर्य समझना भी आवश्यक है। योगसूत्र ४.३४ में महर्षि पतञ्जलि जी कहते हैं — “पुरुषार्थ शून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति”। यहाँ कैवल्य और स्वरूपप्रतिष्ठा = स्वरूपस्थिति को एक समान माना है; और ऐसा ही आशय महर्षि व्यास, महर्षि दयानन्द सरस्वती का भी है। सम्प्रज्ञात समाधि चित्त के आलम्बन से होती है जिसमें विभिन्न स्थूल, सूक्ष्म विषय चित्त का आलम्बन होते हैं, और अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में भी जीवात्मा बुद्धि द्वारा ही अपना अनुभव करता है। अतः सम्प्रज्ञात समाधि को सालम्बन कहा गया है। महर्षि पतञ्जलि ने इसके वितर्कानुगत तथा विचारानुगत भेदों को सबीज समाधि कहा है, जिसे स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास ने “बहिर्वस्तुबीजाः” अर्थात् बाह्यवस्तुओं के आलम्बन से होने से सबीज कहा है (योग० १.४६)। जबकि कैवल्य के लिए निर्बीज समाधि = असम्प्रज्ञात समाधि अपेक्षित होने से (व्यासभाष्य १.५१) तथा मात्र सम्प्रज्ञात समाधि से कैवल्य सम्भव न होने से इस अवस्था में पुरुष की स्वरूपस्थिति = स्वरूप प्रतिष्ठा नहीं मानी जा सकती।

स्वरूपस्थिति योग का अन्तिम लक्ष्य होने से (योग० १.३), अगर अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में ही ऐसा होना सम्भव होता, तो इससे आगे असम्प्रज्ञात समाधि का निर्देश आवश्यक ही नहीं था। परन्तु महर्षि पतञ्जलि योग की अन्तिम अवस्था असम्प्रज्ञात समाधि को मानते हुए ऐसा ही निर्देश करते हैं; अतः सम्प्रज्ञात समाधि के बाद असम्प्रज्ञात समाधि का व्याख्यान ही बताता है कि योग का अन्तिम लक्ष्य = स्वरूपस्थिति इससे पूर्व की अवस्थाओं में सम्भव नहीं है।

इसी प्रकार योगसूत्र ३.३५ में “स्वार्थसंयम” से पुरुष-ज्ञान रूपी सिद्धि को कहा है, जिसके उपरान्त योगी को प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, वार्ता रूपी विभूतियों की प्राप्ति होती है (योग० ३.३६); जो कि व्युत्थान अवस्था में तो सिद्धियाँ हैं, परन्तु समाधि में व्यवधान रूप कही गयी हैं (योग० ३.३७)। इसी प्रकार योगसूत्र ३.४९ में भी सत्त्वपुरुषान्यताख्याति से होने वाली सर्वभावाधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व नामक सिद्धियों को कहा गया है; और अगले ही सूत्र में इन सिद्धियों से वैराग्य की प्राप्ति को कैवल्य के लिए आवश्यक कहा है। अतः इस प्रकार से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था में हुए पुरुष-ज्ञान के आधार पर होने वाली सिद्धियों / उपलब्धियों को समाधि के व्यवधान कहने से (योग० ३.३७) तथा कैवल्य प्राप्ति हेतु इनसे वैरागय को आवश्यक कहने से (योग० ३.५०) भी, इस अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में हुए पुरुषज्ञान को स्वरूपस्थिति नहीं माना जा सकता।

शंका :— योगसूत्र १.३ पर महर्षि दयानन्द का निम्न अर्थ आप ने दिया है — “जब चित्त एकाग्र और निरुद्ध होता है तब सबके “द्रष्टा” ईश्वर के स्वरूप में जीवात्मा की स्थिति होती है।” अतः एकाग्र अवस्था में पुरुष की स्वरूपस्थिति होती है ऐसा मानना ही उचित है।

समाधान :— व्यासभाष्य के सन्दर्भ में यहाँ “एकाग्र’’ शब्द से योग की चतुर्थ अवस्था लक्षित न होकर चित्त की एकाग्रता मात्र मानना ही उचित है, अन्यथा उपर्युक्त दोष प्राप्त होगें। महर्षि दयानन्द ने द्रष्टा ईश्वर के स्वरूप में ही पुरुष की स्थिति मानी है जो कि असम्प्रज्ञात समाधि में तो ज्ञानपूर्वक होती है; परन्तु सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ज्ञानपूर्वक कदापि सम्भव नहीं है। इस सन्दर्भ में महर्षि दयानन्द ने सूत्र १.२ का अर्थ करते हुए कहा है “मनुष्य रजोगुण तमोगुणयुक्त कर्मों से मन को रोक शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त कर्मों से भी मन को रोक, शुद्ध सत्त्वगुणयुक्त हो, पश्चात् उसका निरोध कर एकाग्र अर्थात् एक परमात्मा और धर्मयुक्त कर्म इनके अग्रभाग में चित्त का ठहरा रखना निरुद्ध अर्थात् सब ओर से मन की वृत्ति को रोकना॥ ” यहाँ पर भी “एकाग्र” शब्द से चित्त की चतुर्थ एकाग्रावस्था लक्षित नहीं है। महर्षि दयानन्द के शब्द ध्यान देने योग्य हैं — “.... शुद्धसत्त्वगुण युक्त हो, पश्चात् उसका निरोध कर एकाग्र ........ चित्त को ठहरा रखना निरुद्ध अर्थात् सब ओर से मन की वृत्ति को रोकना।” यहाँ सत्त्वगुण वाली अवस्था सम्प्रज्ञात समाधि ही है और सत्त्वगुण का निरोध भी लक्षित है जो गुणों के प्रति तृष्णारहित स्थिति अर्थात् परवैराग्य के द्वारा होता है। यह अवस्था “निरुद्धावस्था” की है। इसी अवस्था में असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति मानी गई है। इसी निरुद्धावस्था अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि में ही पुरुष = जीवात्मा की परमात्मा में अवस्थिति सम्भव होती है।

महर्षि दयानन्द योगसूत्र १.३ की भूमिका हेतु ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के संस्कृत भाग में लिखते हैं “निरुद्धासती स क्वावतिष्ठत इत्यत्रोच्यते — अर्थात् चित्त की वृत्तियाँ निरुद्ध होने पर कहाँ स्थित होती है?, यह कहते हैं।” यहाँ महर्षि द्वारा प्रयुक्त “निरुद्धा” शब्द ही स्पष्ट कर रहा है कि यहाँ महर्षि दयानन्द को निरुद्धावस्था ही अभिप्रेत है, न कि एकाग्रावस्था।

महर्षि दयानन्द ने योगदर्शन पर व्यासभाष्य को एकमात्र प्रामाणिक भाष्य माना है, ऐसी स्थिति में उनका लेख महर्षि व्यास या महर्षि पतञ्जलि के आशय से विपरीत है, ऐसा मानना दुराग्रह मात्र ही होगा। इस सन्दर्भ में भोजवृत्तिकार ने “तदेवं यस्मिन् एकाग्रतया परिणते चितिशक्तेः स्वस्मिन् रूपे प्रतिष्ठानं भवति” कहा है। जिसका अर्थ करते हुए “एकाग्रतया” का अर्थ पूर्ण एकाग्रता = निरुद्धावस्था ही किया गया है। वस्तुतः यहाँ “एकाग्र” या “एकाग्रतया” से चित्त की एकाग्रावस्था (चतुर्थ अवस्था) लक्षित नहीं है। अतः केवल निरुद्धावस्था में ही स्वरूपस्थिति सम्भव होती है। अस्तु।

वस्तुतः यह सब वृत्तियाँ बुद्धि की है न कि पुरुष की। चित्त को अस्यकान्तमणि = चुम्बक के समान कहा है। जैसे चुम्बक पत्थर अपने समीप के लोहे को खीच लेता है, वैसे ही चित्त = बुद्धि भी अपने समीप होने से पुरुष रूप स्वामी का धन बन जाता है। आत्मा मन आदि इन्द्रियों के साथ मिल विषयों की ओर झुकता; इन्द्रियाँ उन शब्दादि विषयों को ग्रहण करती हुई, मन के माध्यम से विषयों को चित्त = बुद्धि तक पहुँचाती; और चित्त के विषयाकार रूप परिणाम के कारण सन्निधिमात्र से बुद्धिबोधात्मा पुरुष उसी रूप का अर्थात् उन्हीं चित्तवृत्तियों के रूप का ही प्रतीत होता है। यह सत्य है कि चित्त प्रकृति का विकार होने से = जड़ होने से स्वतः विषयों को प्राप्त नहीं कर सकता; यह सभी वृत्ति = व्यापार पुरुष की प्रेरणा से ही होते, परन्तु इन विकारों से चित्त ही विभिन्न छिप्तादि अवस्था वाला होता, और पुरुष इस चित्त का स्वामी होने से तथा चित्त पुरुष का धन होने से; इन सब वृत्तियों का भोक्ता और अनुभवकर्त्ता पुरुष ही होता है।

चित्त की इन वृत्तियों के बोध में पुरुष का बुद्धि के साथ अनादि सम्बन्ध ही कारण है। परन्तु यह अनादि सम्बन्ध प्रवाह से अनादि है, पुरुष के समान अनादि नहीं; क्योंकि यह सम्बन्ध मोक्ष काल में तथा प्रलय की अवस्था में नहीं रहता; सर्गकाल में भी यह सम्बन्ध अविद्या के रहते ही होता है, विवेकख्याति होने पर छूट जाता है॥