In Hindi:
पदपाठ : देशबन्धः चित्तस्य धारणा॥
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : उक्तानि पञ्च बहिरङ्गाणि साधनानि। धारणा वक्तव्या।
हिंदी में अर्थ : (पञ्च बहिरङ्गाणि साधनानि) योग के पाँच बहिरङ्ग — यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार (उक्तानि) कहे गए। अब (धारणा) योग का प्रथम अन्तरङ्ग धारणा (वक्तव्या) कही जानी चाहिए —
हिंदी में अर्थ : (चित्तस्य) चित्त का (देशबन्धः) देश विशेष में बाँधना = लगाना (धारणा) धारणा है॥
महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (देशबन्ध०) जब उपासनायोग के पूर्वोक्त पांचों अंग सिद्ध हो जाते हैं, तब उसका छठा अंग धारण भी यथावत् प्राप्त होती है (धारणा) उसको कहते हैं कि मन को चञ्चलता से छुड़ाके नाभि, हृदय, मस्तक, नासिका और जीभ आदि के अग्रभाग आदि देशों में स्थिर करके ओंकार का जप और उसका अर्थ जो परमेश्वर है उसका विचार करना॥” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)
“नाभि, हृदय, मूर्धाज्योति अर्थात् नेत्र, नासिकाग्र जिह्वाग्र इत्यादि देशों के बीच में चित्त को योगी धारण करे। तथा बाह्य विषय जैसा कि ओंकार वा गायत्री मन्त्र इनमें चित्त लगावे। क्योंकि “तज्जपस्तदर्थभावना” (योग० १.२८) यह सूत्र है योग का। इसका योगी जप अर्थात् चित्त में पुनः पुनः आवृति करे और इसका अर्थ जो ईश्वर उसको हृदय में विचारे। “तस्य वाचकः प्रणवः” (योग० १.२७) ओंकार का वाच्य ईश्वर है और उसका वाचक ओंकार है। बाह्य विषय से इनको ही लेना और कोई को नहीं। क्योंकि अन्य प्रमाण कहीं नहीं।” (ऋषि दयानन्द का पण्डित ताराचरण तर्करत्न से “प्रतिमापूजन विचार” पर शास्त्रार्थ से — द्र० ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन भाग १, पृष्ठ २९-३०, रामलाल कपूर ट्रस्ट संस्करण)
व्यास भाष्य : नाभिचक्रे हृदयपुण्डरीके मूधि्र्न ज्योतिषि नासिकाग्रे जिह्वाग्र इत्येवमादिषु देशेषु बाह्ये वा विषये चित्तस्य वृत्तिमात्रेण बन्ध इति धारणा॥
हिंदी में अर्थ : (चित्तस्य) चित्त का (नाभिचक्रे) नाभिचक्र में, (हृदयपुण्डरीके) हृदयकमल में, (मूधि्र्न ज्योतिषि) मूर्धा ज्योति = मस्तकगत प्रकाश में, (नासिकाग्रे) नासिका के अग्र भाग में, (जिह्वाग्रे) जिह्वा के अग्र भाग में, (इति एवम् आदिषु देशेषु) इस प्रकार अन्य शरीरान्तर्गत तालु आदि देशों में (वा) अथवा (बाह्ये विषये) बाह्य विषय अर्थात् ओंकारजप और गायत्री आदि मंत्रों में (वृत्तिमात्रेण) केवल वृत्ति द्वारा (बन्धः) बाँधना = लगाना (इति) यह (धारणा) धारणा कही जाती है॥
वैदिक योग मीमांसा : साधक, प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियों को बाह्य विषयों से निरुद्ध करने का अभ्यास करने के पश्चात्, योग के प्रथम अन्तरङ्ग धारणा का अभ्यास आरम्भ करता है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि चित्त को देश विशेष में बाँधना धारणा कहलाती है। महर्षि व्यास देश का अभिप्राय स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि चित्त को नाभिचक्र, हृदय कमल, मूर्धा ज्योति, नासिका के अग्रभाग, जिह्वा के अग्रभाग आदि देशों में वृत्ति मात्र से लगाना धारणा कहलाती है। अर्थात् प्रत्याहार द्वारा इन्द्रियनिग्रह को प्राप्त साधक का चित्त स्थिर होता हुआ, शरीर के विभिन्न आन्तरिक अङ्गों में रुकने का सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है, जिसे धारणा कहा गया है। सूत्र की व्याख्या करते हुए महर्षि व्यास ने चित्त को वृत्तिमात्र से ही विभिन्न देशों में बाँधने को धारणा कहा है। चित्त शरीर में एकदेशी है, तथा उसका स्थान हृदय कहा है। ऐसे में चित्त, नाभिचक्र, मूर्धा, नासिकाग्र अथवा जिह्वाग्र स्थानों में ज्ञान से सम्बन्ध को प्राप्त होता है, न कि उस देश विशेष में गमन से। अतः चित्त की वृत्ति को धारणा के देशविशेष तक प्रसार कर, वहाँ स्थिर करना होता है। शरीर के भिन्न देशों में चित्त को बाँधने = लगाने के साथ-साथ किसी एक विषय का आलम्बन भी किया जाता है, जिस पर चित्त का एकाग्र करना होता है। जब इसी विषय का ध्यान, और इसी विषय में समाधि भी सिद्ध होती है, तो यह उस विषय पर संयम कहलाता है।
व्यासभाष्य में धारणा हेतु, शरीर के अङ्गों के कथन के साथ “बाह्ये वा विषये” भी कहा है; जिसके आधार पर विभिन्न भाष्यकारों ने शरीर से बाहर के देशों में भी धारणा को कहा है। परन्तु योग का अन्तरङ्ग साधन होने से, धारणा का बाह्य देश के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। जिस प्रकार शरीर के विभिन्न अङ्गों को धारणा हेतु महर्षि व्यास ने स्पष्टया कहा है, उस प्रकार से किसी बाह्य देश का उल्लेख मात्र भी सूत्र या भाष्य में नहीं मिलता। व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी में भी इसका कोई प्रमाण नहीं है। योगसूत्र ३.७ में धारणा, ध्यान और समाधि को सम्प्रज्ञात समाधि हेतु अन्तरङ्ग साधन कहा है। प्रत्याहार, जो धारणा की अपेक्षा से बहिरङ्ग साधन है, में ही चित्त के निरोध द्वारा, इन्द्रियों को बाह्य विषयों अर्थात् शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध से, निरुद्ध करने का विधान है। अर्थात् इन्द्रियों द्वारा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के संयोग के माध्यम से कोई भी बाह्य विषय चित्त में किसी प्रकार से उपस्थित नहीं किया जाता। वस्तुतः ये शब्दादि स्थूल विषयों के गुण हैं, और इन्हीं शब्दादि के माध्यम से ही स्थूल भूत और उनके विकार, इन्द्रियों द्वारा चित्त में उपस्थित होते हैं। जब इन्द्रियों को इन विषयों से निरुद्ध कर दिया जाता है, तो चित्त में ये बाह्य विषय प्राप्त नहीं होते। ऐसी स्थिति में “धारणा” हेतु पुनः चित्त द्वारा बाह्य देशों के रूप में पृथिवी, जल और अग्नि आदि स्थूल भूतों और उनके विकारों से बने स्थानविशेष = देशविशेष में आलम्बन मानना, महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास दोनों की भावना के अनुकूल नहीं है। प्रत्याहार द्वारा अन्तःवृत्ति की ओर अग्रसर साधक के लिए बाह्य देश में धारणा को कहना और मानना, योग मार्ग पर आगे जाने की अपेक्षा पीछे की ओर लौटना हो जाएगा।
महर्षि व्यास ने इस सूत्र के भाष्य में “नाभिचक्रे ......... इत्येवमादिषु देशेषु” रूपी शरीर के आन्तरिक देशों के समान “बाह्ये वा देशे” न कहकर “बाह्ये वा विषये” कहा है। अतः महर्षि व्यास को धारणा हेतु शरीर के आभ्यन्तर अङ्ग नाभिचक्र आदि देशों के समान बाह्य देश अपेक्षित नहीं हैं। यहाँ बाह्य विषय से क्या अपेक्षित है? इसका उत्तर महर्षि दयानन्द ने दिया है — “बाह्यविषय जैसा कि ओंकार और गायत्री मन्त्र इनमें चित्त लगावे।” बाह्यविषयों में इनको ग्रहण करने हेतु योगदर्शन के दो सूत्रों का प्रमाण दिया है “(१) “तज्जपस्तदर्थभावना”॥ योग० १.२८॥ इसका योगी जप अर्थात् चित्त में पुनः पुनः आवृति करे और इसका अर्थ जो ईश्वर उसको हृदय में विचारे। (२) “तस्य वाचकः प्रणवः” (योग० १.२७) ओंकार का वाच्य ईश्वर है और उसका वाचक ओंकार है।” और स्पष्ट रूप से कहा है कि — “बाह्य विषय से इनको ही लेना और कोई को नहीं। क्योंकि अन्य प्रमाण कहीं नहीं।” उक्त शास्त्रार्थ में आगे चलकर महर्षि दयानन्द निम्न सूत्रों को उद्घृत करते हैं —
“(१) भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्॥३.२६॥;
(२) चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्॥३.२७॥; तथा
(३) ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्॥३.२८॥”,
और कहते हैं — “इत्यादिक सूत्रों से यह प्रसिद्ध जाना जाता है कि धारणादिक तीन अङ्ग आभ्यन्तर के हैं, सो हृदय में ही योगी परमाणुपर्यन्त (जितने) पदार्थ हैं, उनको योग ज्ञान से जानता है। बाहर के पदार्थों से किंचिन्मात्र भी ध्यान में योगी सम्बन्ध नहीं रखता। किन्तु आत्मा से ही ध्यान का सम्बन्ध है, और से नहीं। इस विषय में जो कोई अन्यथा कहे, सो उसका कहना सब सज्जन लोग मिथ्या ही जानें॥”
महर्षि दयानन्द ने ईश्वर प्राप्ति रूपी मुख्य प्रयोजन हेतु योगाङ्गों की व्याख्या उसी रूप में की है। परन्तु साधक को जिस विषय का साक्षात्कार करना हो बाह्यविषय से उसी विषय को ग्रहण कर वैसी धारणा करनी चाहिए। सम्पूर्ण विभूतिपाद में संयम हेतु बाह्यदेश विशेष को कहीं भी ग्रहण नहीं किया गया। जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि सूर्य, चन्द्र और ध्रुव को भी महर्षि दयानन्द ने बाह्यदेश के रूप में स्वीकार नहीं किया; और इन तीनों के अतिरिक्त, संयम हेतु अन्य कोई ‘‘बाह्यदेश’’ विभूति पाद में है ही नहीं। महर्षि पतञ्जलि ने संयम हेतु विभिन्न विषयों को योगसूत्र ३.१६ से ३.५२ तक कहा है, जो कि लौकिक देशविशेष न होकर शरीर के अन्तः नाभि, हृदय आदि देश अथवा चित्तगत विषय ही हैं। इन्हीं आन्तरिक देशों और विषयों में धारणा, ध्यान और समाधि होती है।
धारणा की सिद्धि हेतु महर्षि दयानन्द का बाबू जनकधारीलाल को निम्न उपदेश पठनीय है — “बाबू जनकधारीलाल ने स्वामी दयानन्द से पूछा कि “मन स्थिर नहीं होता।” महाराज ने कहा कि “उसे एक जगह ठहरा लो।” बाबू जनकधारीलाल ने कहा कि “नहीं ठहरता, क्या इसके लिए किसी वस्तु का ध्यान करने की आवश्यकता है ?” महाराज ने कहा कि “नहीं, और यदि यह तुमसे नहीं हो सकता तो अपने भीतर किसी तिल या सूई की नोक के बराबर किसी वस्तु की कल्पना कर लो और उसपर ध्यान जमाओ, फिर उसके टुकड़े करके एक टुकड़े पर ध्यान जमाओ। ऐसे ही टुकड़े करते चले जाओ यहाँ तक कि अन्त में अत्यन्त सूक्ष्म टुकड़ा रह जाए फिर उसे भी उड़ा दो, तब तुम्हारी धारणा हो जायेगी।” (महर्षि दयानन्द सरस्वती जीवनचरित — श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, पृष्ट ५६९) इस वर्णन से भी स्पष्ट है कि धारणा हेतु बाह्यपदार्थ अथवा बाह्यदेश आदि का आलम्बन ऋषियों द्वारा प्रतिपादित शास्त्रीय परम्परा में नहीं है।
बाह्यविषय से बाह्यदेश आदि में धारणा की अवधारणा पौराणिक काल की देन है। वाचस्पति मिश्र की तत्त्ववैशारदी में ऐसा व्याख्यान मिलता है। वेदादि सत्यशास्त्रों का अध्ययन न रहने से, तथा महर्षि व्यास के नाम से कल्पित पुराणों के आधार पर यह मान्यता पनपी। वाचस्पति मिश्र ने किसी पुराण का प्रमाण देकर प्रमाणित किया कि मूर्त्तरूप सर्वोपाश्रय तथा निःस्पृह शंख, चक्र, गदा, पद्म तथा शरीरिक छटा से युक्त भगवान् की धारणा तब तक करनी चाहिए जब तक उसमें दृढ़ता न आये। इस प्रकार का व्याख्यान ईश्वर के सशरीर होने की कपोल कल्पना पर आधारित है। जबकि वेद में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिलता। इस विषय में यजुर्वेद का निम्न प्रमाण द्रष्टव्य है —
सीरा॑ युञ्जन्ति क॒वयो यु॒गा वित॑न्वते॒ पृथ॑क्। धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒या॥ यजु॰ १२.६७॥
अर्थात् जो विद्वान् योगी लोग और ध्यान करने वाले हैं वे यथायोग्य विभाग से नाडि़यों में अपने आत्मा से परमेश्वर की धारणा करते हैं, जो योगयुक्त कर्मों में तत्पर रहते हैं, अपने ज्ञान और आनन्द को सदा विस्तृत करते हैं, वे विद्वानों के बीच में प्रशंसित होके परमानन्द को प्राप्त होते हैं। (ऋ० भू॰ उपासना॰)।
इस प्रकार के वेदों में कई मन्त्र मिलते हैं। जिसमें शरीर के भिन्न-भिन्न अङ्गों तथा नाडि़यों में धारणा का उपदेश साधक के लिए उपलब्ध होता है।
दूसरी ओर पौराणिक मान्यताओं को ही मानने वाले योगवार्त्तिककार विज्ञानभिक्षु भी बाह्यदेश से सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि में ईश्वर वा देवता की धारणा-ध्यान को उचित नहीं मानते। इसमें निम्न कारण को कहा है कि सभी वृत्तियों के रुकने पर ही धारणा होगी। यदि ऐसा न हुआ तो समाधि में ध्येयमात्र शेष की स्थिति, कल्पना का विषय बन जायेगी। अतः इस प्रकार धारणा से उत्पन्न वृत्ति ही ध्यान और समाधि में बाधक होगी। इसमें उन्होंने “ईश्वरगीता” का प्रमाण देते हुए कहा है कि “बिना आलम्बन के जो एकाकार समाधि की स्थिति हो जाती है, जिसमें अर्थमात्र की प्रतीति होती है, वही योग का उत्तम साधन है।” इसी प्रकार गरुडपुराण का श्लोक उद्धृत किया है —
प्राणायामैर्द्वादशभिर्यावत्कालः कृतो भवेत्।
स तावत्कालपर्यन्तं मनो ब्रह्मणि धारयेत्॥ गरुडपुराण १.२२७.२४॥
एतदेव तु धारणासामान्यलक्षणम्।
इसका अर्थ स्पष्ट है कि योगी प्राणायाम के कालपर्यन्त मन में ब्रह्म को धारण करे। अतः विज्ञानभिक्षु भी धारणा हेतु बाह्यदेशों को नहीं मानते।
धारणा से जो विद्वान् किसी बाह्य वा आन्तरिक देश विशेष में चित्त को बाँधना मात्र कहते और मानते हैं, वे निम्न विभूतियों में संयम का सम्पादन सिद्ध नहीं कर पायेंगे, क्योंकि संयम का अभिप्राय धारणा-ध्यान- समाधि का एक विषय में होना है —
सूत्र संयम का विषय
३.१६ धर्म, लक्षण, अवस्था रूप परिणाम
३.१७ शब्द, अर्थ, ज्ञान का प्रविभाग
३.१८ संस्कार
३.१९ ज्ञान
३.२१ कायरूप
३.२२ सोपक्रम, निरुपक्रम कर्म
३.२३ मैत्रादि
३.२४ हस्ति आदि बल
३.२५ प्रवृत्ति-आलोक
३.३२ मूर्ध-ज्योतिषि
३.३५ स्वार्थ संयम
३.३९ उदान प्राण
३.४० समान प्राण
३.४१ श्रोत्र-आकाश संबन्ध
३.४२ काया-आकाश संबन्ध
३.४४ भूतों के स्थूल-स्वरूप आदि
३.४७ इन्द्रियों का ग्रहण-स्वरूप आदि
३.५२ क्षण और उसका क्रम
इन सभी संयम के विषयों में धारणा हेतु किसी देश-विशेष का निर्देश नहीं है। अतः बाह्यदेश में धारणा मानने पर योगसूत्र ३.४ के अनुसार संयम की मूल आवश्यकता = जिस देश में धारणा, उसी में ध्यान, उसी में समाधि, की अवधारणा उपर्युक्त सूत्रों में नहीं घट पायेगी। यहाँ धारणा-ध्यान-समाधि की एक विषयता तभी संभव है, जब धारणा में चित्त को वृत्ति द्वारा ही किसी भी देशविशेष में बाँधना माना जाये। वहाँ भी वृत्ति की प्रमुखता और देश की गौणता ही रहेगी। देखो अगले ही सूत्र में महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कह रहे हैं — “तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम्॥” अर्थात् उस धारणा के देश में ध्येय रूप आलम्बन वाले ज्ञान की एकरूपता = ज्ञान का समान प्रवाह ध्यान है। इसी प्रकार भोज भी योग० ३.२ की व्याख्या में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करते हैं कि “वहाँ उस धारणा के देश में जिसमें चित्त को लगाया गया हो उसमें प्रत्यय की अर्थात् ज्ञान की जो एकरूपता = एकाग्रता है अर्थात् विपरीत, भिन्न परिणाम के परित्याग द्वारा जिस विषय को धारणा में आलम्बन किया गया था उस विषय की आलम्बनता से ही निरन्तर = ध्यानकाल में ज्ञान की उत्पत्ति होती है, वह ध्यान कहा जाता है॥” इसी प्रकार योग ३.४ की व्याख्या में महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कहते हैं — “एकविषयाणि त्रीणि साधनानि संयम इत्युच्यते।” अर्थात् एक विषय में किए गए धारणा, ध्यान और समाधि रूप तीनों साधन संयम कहे जाते हैं। और इसी मान्यता को भोज ने भी उक्त सूत्र के भाष्य में कहा है। अतः धारणा वाले देश में आलम्बित विषय = ज्ञान का होना ही, प्रधान रूप से प्रतिपादित जानना चाहिए।
वेदादि सत्यशास्त्रों में योगमार्ग के पथिक के लिए बाह्यदेश में धारणा हेतु कोई प्रमाण नहीं मिलता। बाह्य देश आदि में आलम्बन से वृत्तिनिरोध सम्भव ही नहीं हो सकता; इसी लिए साधक को वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की आरम्भिक अवस्था में इन बाह्य और स्थूल विषयों का साक्षात्कार कर इन से भी निरुद्ध होकर आन्तरिक और सूक्ष्म विषयों आलम्बनों द्वारा उनका साक्षात्कार करते हुए मूल प्रकृति का यथार्थ ज्ञान = साक्षात्कार करना होता है; तत्पश्चात् आत्मा और परमात्मा का आलम्बन करने तथा इनको साक्षात् करने से ही वृत्तिनिरोध की पूर्णता को प्राप्त करता है। यहाँ यह भी जानना चाहिए कि वितर्कानुगत के जो स्थूल आलम्बन कहे हैं, उनमें भी मात्र पृथिवी, जल और अग्नि रूप महाभूत और इनके विकार ही स्थूलतम और बाह्य देशों से सम्बद्ध होते हैं, शेष तो इनकी अपेक्षा सूक्ष्म तथा नेत्रेन्द्रिय से ग्रहण ही नहीं होते। अतः यह स्पष्ट है कि ऋषियों द्वारा प्रतिपादित वेदानुकूल और शास्त्रीय परम्परा में सूर्य, चन्द्र, ध्रुव आदि बाह्यपदार्थों = देशों को धारणा हेतु बाह्यदेश नहीं माना गया और न ही इन्हें संयम का विषय नहीं माना गया। इन आलम्बनों का वास्तविक अभिप्राय उन सूत्रों की व्याख्या में दर्शाया जायेगा।