In Hindi:
पदपाठ : तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥
हिंदी में अर्थ : (तत्र) उस धारणा के देश में (प्रत्ययैकतानता) ज्ञान का समान प्रवाह (ध्यानम्) ध्यान कहलाता है॥
महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (तत्र) धारणा के पीछे उसी देश में ध्यान करने और आश्रय लेने के योग्य जो अन्तर्यामी परमेश्वर है, उसके आश्रय और आनन्द में अत्यन्त विचार और प्रेमभक्ति के साथ इस प्रकार प्रवेश करना कि जैसे समुद्र के बीच में नदी प्रवेश करती है। उस समय में ईश्वर को छोड़ किसी अन्य पदार्थ का स्मरण नहीं करना, किन्तु उसी अन्तर्यामी के स्वरूप और ज्ञान में मग्न हो जाना, इसी का नाम ध्यान है॥ (ऋ० भू॰ उपासना विषय)
तिन देशों में अर्थात् नाभि आदिकों में ध्येय जो आत्मा उस आलम्बन की और चित्त की एकतानता अर्थात् परस्पर दोनों की एकता, चित्त आत्मा से भिन्न न रहे और आत्मा चित्त से पृथक् न रहे उसका नाम है — सदृश प्रवाह। जब चित्त प्रत्ययैकतानता चेतन से ही युक्त रहे, अन्य प्रत्यय कोई पदार्थान्तर का स्मरण न रहे, तब जानना कि ध्यान ठीक हुआ। (ऋषि दयानन्द का पण्डित ताराचरण तर्करत्न से “प्रतिमापूजन विचार” पर शास्त्रार्थ से — द्र० ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन भाग १, पृष्ठ २९-३०)
व्यास भाष्य : तस्मिन्देशे ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्यैकतानता सदृशः प्रवाहः प्रत्ययान्तरेणापरामृष्टो ध्यानम्॥
हिंदी में अर्थ : (तस्मिन् देशे) उस धारणा के देश में (ध्येयालम्बनस्य प्रत्ययस्य) ध्येय रूप आलम्बन वाले ज्ञान की (एकतानता) एकरूपता = एकाग्रता अर्थात् ज्ञान का (सदृशः प्रवाहः) एक समान प्रवाह अर्थात् (प्रत्ययान्तरेण) अन्य किसी भी ज्ञान से (अपरामृष्टः) अमिश्रित = रहित ज्ञान का प्रवाह (ध्यानम्) ध्यान है॥
वैदिक योग मीमांसा : धारणा में आलम्बन किए हुए विषय की एकरूपता का बना रहना ध्यान कहलाता है। अर्थात् जिस विषय का आलम्बन किया गया हो, उस विषय के ज्ञान का सदृश प्रवाह का होना = पूर्व क्षण में जो ज्ञान था वही ज्ञान वर्त्तमान क्षण में भी होना, और इस ज्ञान से भिन्न किसी भी ज्ञान का चित्त में उपस्थित न होना अर्थात् किसी भी अन्य ज्ञान का, किसी प्रकार से, आलम्बित विषय के ज्ञान में मिश्रण न होना, और इस प्रकार समान ज्ञान के प्रवाह का बना रहना, ध्यान कहलाता है।
ध्यान की पराकाष्ठा तो सांसारिक विषयों तथा भोगों से रहित होकर ईश्वर का ध्यान है। परन्तु इस स्थिति से पूर्व आलम्बित किए गए विषय के ज्ञान का सदृश प्रवाह, उस विषय का ध्यान कहलाता है। महर्षि पतञ्जलि ने विभिन्न विषयों के संयम (धारणा, ध्यान और समाधि) से प्राप्त होने वाली सिद्धियों को विभूति पाद में कहा है। अतः चित्त का आलम्बन आरम्भ में प्रकृति के स्थूल और सूक्ष्म विकार ही होते हैं, और इन्हीं विषयों में संयम किया जाता है।
महर्षि दयानन्द ईश्वर के ध्यान को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “धारणा के देश में ध्यान करने और आश्रय लेने के योग्य परमेश्वर है .....” अर्थात् जीवात्मा का परम लक्ष्य परमात्मा ही है, और वही जीवात्मा रूपी पुरुष के लिए ध्यान के योग्य है और वही आश्रय के योग्य है। “...... उसी परमेश्वर के प्रकाश (अर्थात् ज्ञान) और आनन्द में, अत्यन्त विचार (= निरन्तर एवं सम्यक् चिन्तन द्वारा) और प्रेम भक्ति (= ईश्वर प्रणिधान) के साथ इस प्रकार प्रवेश करना कि जैसे समुद्र के बीच में नदी प्रवेश करती है ......” अर्थात् जैसे विशाल समुद्र में छोटी नदी प्रवेश कर उसी में लय हो जाती है वैसे ही पुरुष = चेतन जीवात्मा भी सर्वव्यापक चेतन, आनन्दस्वरूप परमेश्वर में ज्ञानपूर्वक प्रवेश कर उसी परमात्मा के ज्ञान और आनन्द में मग्न हो जाए। “..... उस समय में ईश्वर को छोड़ किसी अन्य पदार्थ का स्मरण नहीं करना, किन्तु उसी अन्तर्यामी के स्वरूप और ज्ञान में मग्न हो जाना, इसी का नाम ध्यान है।” अर्थात् परमपिता परमात्मा में प्रविष्ट जीवात्मा, प्रकृति और उसके विकारों को हेय जानता हुआ उनका किञ्चित् मात्र भी विचार = चिन्तन न करे, केवल और केवल मात्र परमात्मा के स्वरूप और ज्ञान में ही मग्न रहे। यह ही ध्यान की उत्कृष्ट स्थिति है।
परन्तु निराकार परमात्मा का ध्यान करना, साधक के लिये, आरम्भ में सम्भव नहीं होता। इस विषय में महर्षि दयानन्द के निम्न व्यक्तव्य महत्त्वपूर्ण हैं —
१. प्रश्न — मूर्त पदार्थों के बिना ध्यान कैसे करते बनेगा ?
उत्तर — शब्द का आकार नहीं तो भी शब्द ध्यान में आता है वा नहीं ? आकाश का आकार नहीं तो भी आकाश का ज्ञान करने में आता है वा नहीं ? जीव का आकार नहीं तो भी जीव का ध्यान होता है वा नहीं? ज्ञान, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, ये नष्ट होते ही जीव निकल गया है, यह किसान भी समझता है। योग आदि शास्त्र में ध्यान का लक्षण किया है —
रागोपहतिर्ध्यानम्॥ सांख्य ३.३०॥
ध्यानं निर्विषयं मनः॥ सांख्य ६.२५॥
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥ योग० ३.२॥
साकार का ध्यान कैसे करोगे? साकार के गुणों का ज्ञानाकार होने तक ध्यान नहीं बनता अर्थात् सम्भव नहीं होता कि ज्ञान के पहले ध्यान हो जाये। देखो एक सूक्ष्म परमाणु के भी अधम, उत्तम और मध्यम ऐसे अनेक विभाग ज्ञान-बल से कल्पना में आते हैं। अब कोई ऐसा कहे कि मुट्ठी में क्या पदार्थ है ? तो विदित होने तक ढकी हुई मुट्ठी की ओर देखने ही से केवल उस पदार्थ का ध्यान कैसे करें ? तो मेरा यही कहना है कि प्रत्यक्ष के सिवाय उस पदार्थ को जानने के लिए और भी दृढतर सबल उपाय है। देखो अनुमान ......। अनुमान ज्ञान के सम्मुख प्रत्यक्ष की क्या प्रतिष्ठा है।” (उपदेशमञ्जरी, चतुर्थ उपदेश)
पूना प्रवचन के इस उद्धरण में स्वामी जी स्पष्ट करते हैं कि ध्यान से पहले आलम्बन किए जाने वाले विषय के शब्दज्ञान का होना आवश्यक है। अतः जिस विषय का आलम्बन करना हो, जिसका ध्यान करना हो उस विषय का शाब्दिक ज्ञान वेदादि सत्यशास्त्रों और आचार्यों से पहले प्राप्त कर लेना चाहिए अन्यथा उस विषय का आलम्बन और ध्यान सम्भव नहीं होगा। श्रवण चतुष्ठय के मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार श्रवण के बाद ही होते हैं। शब्दज्ञान के बाद ही धारणा और ध्यान सम्भव होता है। अतः साधक के लिए उचित है कि वेदादि सत्यशास्त्रों में प्रतिपादित परमात्म-विषयक शाब्दिक ज्ञान को सम्यक् रूप से प्राप्त करके, उसके गुण कर्म और स्वरूप को यथार्थ रूप से जानकर ही, परमात्मा का ध्यान करे।
२. उदयपुर के महाराणा ने स्वामी दयानन्द से प्रश्न किया कि — “जब किसी मूर्त्तिमान् वस्तु को चाहे वह कैसी ही हो, आप नहीं मानते तो ध्यान किसका करें ? स्वामी जी ने उत्तर दिया कि — कोई चीज मानकर ध्यान नहीं करना चाहिए। ईश्वर सर्वशक्तिमान्, सर्वसृष्टिकर्त्ता, सृष्टि को एक क्रम में चलाने वाला, नियन्ता, पालनकर्त्ता और ऐसे ही अनेक ब्रह्माण्डों का स्वामी और नियन्ता है, ऐसी-ऐसी उसकी महिमा का स्मरण करके अपने चित्त में उसकी महानता (= महत्ता) का ध्यान करना चाहिए। अर्थात् इसी प्रकार समस्त विशेषणों से युक्त परमेश्वर को स्मरण करके उसका ध्यान करना और उसकी महिमा का वर्णन करना..... यह ध्यान है॥ (ऋषि दयानन्द की जीवनी पं॰ लेखरामकृत — द्र० पृ॰ ५५६)
ध्यान के विषय में महर्षि कपिल की भी यही मान्यता है कि मन को निर्विषय = आलम्बित विषय से अतिरिक्त अन्य विषय के ज्ञान से रहित करना। महर्षि कपिल सांख्यदर्शन में कहते हैं —
रागोपहतिर्ध्यानम्॥ सांख्य ३.३०॥
अर्थात् सांसारिक विषयों के प्रति आसक्ति = राग अथवा भोगों की प्रवृत्ति = राग की निवृत्ति हो जाना ही मन की स्थिरता = ध्यान है। और
ध्यानं निर्विषयं मनः॥ सांख्य ६.२५॥
विषय रहित = वृत्तिरहित = निरुद्ध वृत्ति वाला, सत्त्वादि गुणों के अधिकार से रहित मन = चित्त का होना ध्यान है।
अतः ईश्वर के ध्यानकाल में किसी भी अन्य विषय के ज्ञान से रहित स्थिति का सम्पादन करना ही साधक का लक्ष्य है। इसी प्रकार अन्य विषयों के ध्यानकाल में भी जानना चाहिए।