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Vibhuti Paada / Attainments / 11
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Vibhuti Paada / Attainments / 11

सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः॥११॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 11

In Hindi:

पदपाठ : सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः॥

हिंदी में अर्थ : (सर्वार्थतैकाग्रतयोः) सर्वार्थता = चित्त का सब विषयों की ओर प्रवृत्त होना, और एकाग्रता = चित्त का एक विषय की ओर प्रवृत्त होना रूप दोनों धर्मों का क्रमशः (क्षयोदयौ) क्षय = दबना और उदय = प्रकट होना (चित्तस्य) चित्त का (समाधिपरिणामः) समाधि परिणाम है॥

व्यास भाष्य : सर्वार्थता चित्तधर्मः। एकाग्रताऽपि चित्तधर्मः। सर्वार्थतायाः क्षयस्तिरोभाव इत्यर्थः। एकाग्रताया उदय आविर्भाव इत्यर्थः। तयोर्धर्मित्वेनानुगतं चित्तम्। तदिदं चित्तमपायोपजनयोः स्वात्मभूतयोर्धर्मयोरनुगतं समाधीयते स चित्तस्य समाधिपरिणामः॥

हिंदी में अर्थ : (सर्वार्थता) सर्वार्थता = सब विषयों की ओर प्रवृत्त होना (चित्तधर्मः) चित्त का धर्म है; और (एकाग्रता) एकाग्रता = किसी एक विषय की ओर प्रवृत्त होना (अपि) भी (चित्तधर्मः) चित्त का धर्म है। (सर्वार्थतायाः) सर्वार्थता का (क्षयः) क्षय अर्थात् (तिरोभावः) तिरोहित हो जाना = दब जाना (इति अर्थः) यह अर्थ है। (एकाग्रताया) एकाग्रता का (उदयः) उदय अर्थात् (आविर्भावः) प्रकट हो जाना (इति अर्थः) यह अर्थ है। (तयोः) उन दोनों धर्मों के साथ (धर्मित्वेन) धर्मी रूप से (चित्तम्) चित्त (अनुगतम्) अनुगत रहता है। (तत् इदम् चितम्) वह यह चित्त, (अपायोपजनयोः) सर्वार्थता के क्षय और एकाग्रता के उदय रूप (स्वात्मभूतयोर्धर्मयोः) अपने स्वरूप में होने वाले धर्मों के साथ (अनुगतम्) अनुगत रहता हुआ (समाधीयते) समाहित होता है, (सः) वह (चित्तस्य) चित्त का (समाधिपरिणामः) समाधि परिणाम है॥

वैदिक योग मीमांसा : चित्त की प्रशान्त स्थिति की प्राप्ति के लिए, निरोध परिणाम की स्थिति हेतु योगी को पुरुषार्थ करना होता है। निरोध परिणाम चित्त का अन्तिम परिणाम है, इसके उपरान्त अन्य कोई परिणाम नहीं होता। परन्तु इस स्थिति में आने हेतु साधक को समाधि परिणाम से ही आरम्भ करना होता है।

समाधि चित्त का सार्वभौम धर्म है। समाधि चित्त की सभी भूमियों = क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध भूमियों में होने वाला धर्म है। चित्त का यह समाधि परिणाम क्या है ? इसके विषय में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि चित्त में सर्वार्थता का क्षय होना और एकाग्रता का प्रकट होना चित्त का समाधि परिणाम है।

चित्त त्रिगुणात्मक है। गुणों के अनुरूप ही चित्त का स्वभाव चञ्चल होने से, यह अनेक विषयों को ग्रहण करने में समर्थ होता है, और इस प्रकार एक के बाद एक विभिन्न विषयों को ग्रहण करता रहता है। यही चित्त का सर्वार्थता रूपी धर्म है। चित्त का एक अन्य धर्म एकाग्रता है, जिसमें चित्त अनेक = विविध विषयों का ग्रहण न करता हुआ, एक ही विषय को पुनः पुनः ग्रहण करता है; और इस प्रकार से सदृश = समान विषय को ग्रहण करने से चित्त में एकाग्रता प्रकट होती है, यह चित्त का एकाग्रता परिणाम है। जब साधक चित्त के सर्वार्थता रूपी धर्म को अभिभूत कर = दबा कर, एकाग्रता रूपी धर्म को प्रकट करता है तो उसका चित्त समाधि परिणाम को प्राप्त होता है।

यहाँ यह जानना चाहिए कि चित्त का यह समाधि परिणाम चित्त की सभी भूमियों में सम्भव है; परन्तु इस प्रकार से हुए सभी समाधि परिणाम योग की स्थितियाँ नहीं हैं। केवल मात्र चित्त की एकाग्रावस्था और निरुद्धावस्था में होने वाला समाधि परिणाम ही योग की श्रेणी में आता है। अतः जब चित्त में रजोगुण प्रधान रहता (क्षिप्तावस्था), अथवा तमोगुण प्रधान रहता (मूढावस्था), अथवा सत्त्वगुण के साथ रजोगुण भी रहता हुआ विक्षेप का उत्पन्न करता रहता (विक्षिप्तावस्था), तब इन अवस्थाओं में सर्वार्थता का क्षय होने पर भी, साधक का योग में प्रवेश नहीं होता। जब सत्त्वगुण प्रधान चित्त (एकाग्रावस्था) में सर्वार्थता का क्षय होकर एकाग्रता का उदय होता है, तब इस अवस्था में होने वाला समाधि परिणाम ही, साधक के लिए अपेक्षित है।

निरोध परिणाम का सम्बन्ध संस्कारों से है, जहाँ योगी व्युत्थान संस्कारों का अभिभव कर, निरोध संस्कारों को उत्पन्न करता है; जबकि दूसरी ओर सर्वार्थता और एकाग्रता का सम्बन्ध चित्त की वृत्तियों से है। यहाँ साधक रजोगुण, तमोगुण, इन दोनों गुणों के मिश्रण से युक्त / प्रभावित अथवा सत्त्वगुण के साथ रजोगुण से भी युक्त चित्त की वृत्तियों का निरोध करने के पश्चात् ही सत्त्वगुण प्रधान अवस्था में विभिन्न विषयों सम्बन्धी वृत्तियों का क्षय कर एक विषय सम्बन्धी वृत्तियों को उत्पन्न कर समाधि परिणाम को प्राप्त करने में समर्थ होता है।