Donation Appeal Download Our App
Vibhuti Paada / Attainments / 10
Choose Sutra
Vibhuti Paada / Attainments / 10

तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्॥१०॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 10

In Hindi:

पदपाठ : तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्॥

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस निरोध अवस्था वाले चित्त की, (संस्कारात्) निरोध संस्कारों के कारण, (प्रशान्तवाहिता) प्रशान्त = प्रकृष्ट, उत्कृष्ट रूप से शान्त स्थिति प्रवाह रूप से बनी रहती है॥

व्यास भाष्य : निरोधसंस्काराभ्यासपाटवापेक्षा प्रशान्तवाहिता चित्तस्य भवति। तत्संस्कारमान्द्ये व्युत्थानधर्मिणा संस्कारेण निरोधधर्म संस्कारोऽभिभूयत इति॥

हिंदी में अर्थ : (निरोधसंस्काराभ्यासपाटवापेक्षा) निरोधसंस्कारों के अभ्यास से उत्पन्न पटुता = कुशलता की अपेक्षा रखने वाले (चित्तस्य) चित्त की (प्रशान्तवाहिता) प्रशान्त = उत्कृष्ट रूप से शान्त स्थिति = निस्तरङ्ग रूप से निरोध समाधि की स्थिति (भवति) होती है। (तत्संस्कारमान्द्ये) निरोध संस्कारों की मन्दता = निर्बलता होने पर (व्युत्थानधर्मिणा संस्कारेण) व्युत्थान धर्म के संस्कारों से (निरोधधर्मः संस्कारः) निरोध धर्म वाले दुर्बल संस्कार (अभिभूयते इति) दब जाते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : जब योगी निरुद्धावस्था के सम्यक् अभ्यास से निरोध संस्कारों को बढ़ाता हुआ, उन्हें सुदृढ़ करता है तो ऐसे में व्युत्थान संस्कारों के निर्बल हो जाने = दब जाने पर, चित्त की प्रशान्त = उत्कृष्ट = प्रकृष्ट रूप से शान्त स्थिति बनी रहती है। ऐसे चित्त के विषय में महर्षि व्यास कहते हैं — “आत्मकप्लेन व्यवतिष्ठते” (योग १.५) अर्थात् ऐसा चित्त आत्मा के समान पवित्र होकर रहता है। इस स्थिति को बनाए रखने हेतु योगी को सतत् अभ्यास करने के साथ-साथ परवैराग्य की स्थिति को बनाए रखना होता है। अर्थात् योगी सत्त्वादि गुणों के प्रति तृष्णा से सर्वथा रहित रहता हुआ, व्युत्थान संस्कारों को सर्वथा निरुद्ध करता रहे, अन्यथा ये व्युत्थान संस्कार पुनः प्रबल होकर निरोध संस्कारों को दबा लेगें और साधक उस स्थिति से च्युत होकर = भ्रष्ट होकर पुनः योग के निचले स्तर पर आ जायेगा। योगी को यह जानना चाहिए कि जन्म-जन्मान्तर की अनवरत यात्रा में व्युत्थान संस्कार ही प्रबल रहते हैं। वह = जीवात्मा, प्रकृति और उसके आलम्बनों के प्रति रक्त = आकृष्ट रहने के कारण ही, जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में लगा हुआ है। अतः योगी वर्त्तमान जीवन में, सतत रूप से अभ्यास द्वारा निरोध संस्कारों को प्रबल करता हुआ, परवैराग्य और ईश्वरप्रणिधान रूपी साधनों के सम्यक् सम्पादन द्वारा, व्युत्थान संस्कारों को दबा कर ही चित्त की इस प्रशान्त स्थिति को बनाता है। योगी को इसके लिए सतत् पुरुषार्थ करना चाहिए।