In Hindi:
पदपाठ : एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामाः व्याख्याताः॥
हिंदी में अर्थ : (एतेन) इस चित्त के परिणामों (= निरोध, समाधि और एकाग्रता परिणामों से) (भूतेन्द्रियेषु) भूतों और इन्द्रियों में (धर्मलक्षणावस्थापरिणामाः) धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम (व्याख्याताः) व्याख्यात जानने चाहिए॥
व्यास भाष्य : एतेन पूर्वोक्तेन चित्तपरिणामेन धर्मलक्षणावस्थारूपेण भूतेन्द्रियेषु धर्मपरिणामो लक्षण- परिणामोऽवस्थापरिणामश्चोक्तो वेदितव्यः। तत्र व्युत्थाननिरोधयोर्धर्मयोरभिभवप्रादुर्भावौ धर्मिणि धर्मपरिणामः। लक्षणपरिणामश्च निरोधस्त्रिलक्षणस्त्रिभिरध्वभिर्युक्तः। स खल्वनागतलक्षणमध्वानं प्रथमं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तो वर्त्तमानलक्षणं प्रतिपन्नः। यत्रास्य स्वरूपेणाभिव्यक्तिः। एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा। न चातीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तः। तथा व्युत्थानं त्रिलक्षणं त्रिभिरध्वभिर्युक्तं वर्त्तमानलक्षणं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तमतीतलक्षणं प्रतिपन्नम्। एषोऽस्य तृतीयोऽध्वा। न चानागतवर्त्तमानाभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तम्। एवं पुनर्व्युत्थानमुपसम्पद्यमानमनागतलक्षणं हित्वा धर्मत्वमनतिक्रान्तं वर्त्तमानलक्षणं प्रतिपन्नम्। यत्रास्य स्वरूपाभिव्यक्तौ सत्यां व्यापारः। एषोऽस्य द्वितीयोऽध्वा। न चातीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यां वियुक्तमिति। एवं पुनर्निरोध एवं पुनर्व्युत्थानमिति।
तथावस्थापरिणामः। तत्र निरोधक्षणेषु निरोधसंस्कारा बलवन्तो भवन्ति दुर्बला व्युत्थानसंस्कारा इति। एष धर्माणामवस्थापरिणामः। तत्र धर्मिणो धर्मैः परिणामो धर्माणां त्र्यध्वनां लक्षणैः परिणामो लक्षणानामप्यवस्थाभिः परिणाम इति। एवं धर्मलक्षणावस्थापरिणामैः शून्यं न क्षणमपि गुणवृत्तमवतिष्ठते। चलं च गुणवृत्तम्। गुणस्वाभाव्यं तु प्रवृत्तिकारणमुक्तं गुणानामिति। एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मधर्मिभेदात् त्रिविधः परिणामो वेदितव्यः। परमार्थतस्त्वेक एव परिणामः। धर्मिस्वरूपमात्रो हि धर्मो धर्मिविक्रियैवैषा धर्मद्वारा प्रपञ्च्यत इति।
तत्र धर्मस्य धर्मिणि वर्त्तमानस्यैवाध्वस्वतीतानागतवर्त्तमानेषु भावान्यथात्वं भवति न तु द्रव्यान्यथात्वम्। यथा सुवर्णभाजनस्य भित्त्वान्यथा क्रियमाणस्य भावान्यथात्वं भवति न सुवर्णान्यथात्वमिति।
अपर आह — धर्मानभ्यधिको धर्मी पूर्वतत्त्वानतिक्रमात्। पूर्वापरावस्थाभेदमनुपतितः कौटस्थ्येनैव परिवर्त्तेत यद्यन्वयी स्यादिति। अयमदोषः। कस्मात्? एकान्ततानभ्युपगमात्। तदेतत् त्रैलोक्यं व्यक्तेरपैति। कस्मात् ? नित्यत्वप्रतिषेधात्। अपेतमप्यस्ति। विनाशप्रतिषेधात्। संसर्गाच्चास्य सौक्ष्म्यं सौक्ष्म्याच्चानुपलब्धिरिति।
लक्षणपरिणामो धर्मोऽध्वसु वर्त्तमानोऽतीतोऽतीतलक्षणयुक्तोऽनागतवर्त्तमानाभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्तः। तथाऽनागतोऽनागतलक्षणयुक्तो वर्त्तमानातीताभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्तः। तथा वर्त्तमानो वर्त्तमानलक्षणयुक्तोऽतीतानागताभ्यां लक्षणाभ्यामवियुक्त इति। यथा पुरुष एकस्यां स्त्रियां रक्तो न शेषासु विरक्तो भवतीति।
अत्र लक्षणपरिणामे सर्वस्य सर्वलक्षणयोगादध्वसंकरः प्राप्नोतीति परैर्दोषश्चोद्यत इति। तस्य परिहारः — धर्माणां धर्मत्वमप्रसाध्यम्। सति च धर्मत्वे लक्षणभेदोऽपि वाच्यो न वर्त्तमानसमय एवास्य धर्मत्वम्। एवं हि न चित्तं रागधर्मकं स्यात्क्रोधकाले रागस्यासमुदाचारादिति।
किञ्च, त्रयाणां लक्षणानां युगपदेकस्यां व्यक्तौ नास्ति सम्भवः। क्रमेण तु स्वव्यञ्जकाञ्जनस्य भावो भवेदिति। उक्तं च “रूपातिशया वृत्त्यतिशयाश्च परस्परेण विरुध्यन्ते सामान्यानि त्वतिशयैः सह प्रवर्त्तन्ते।” तस्मादसंकरः। यथा रागस्यैव क्वचित्समुदाचार इति न तदानीमन्यत्राभावः। किन्तु केवलं सामान्येन समन्वागत इत्यस्ति तदा तत्र तस्य भावः। तथा लक्षणस्येति।
न धर्मी त्र्यध्वा। धर्मास्तु त्र्यध्वानः। ते लक्षिता अलक्षिताः। तत्र लक्षिताः तां तामवस्थां प्राप्नुवन्तोऽन्यत्वेन प्रतिनिर्दिश्यन्तेवस्थान्तरतो न द्रव्यान्तरतः। यथैका रेखा शतस्थाने शतं दशस्थाने दशैका चैकस्थाने। यथा चैकत्वेऽपि स्त्री माता चोच्यते दुहिता च स्वसा चेति।
अवस्थापरिणामे कौटस्थ्यप्रसङ्गदोषः कैश्चिदुक्तः। कथम्? अध्वनो व्यापारेण व्यवहितत्वात्। यदा धर्मः स्वव्यापारं न करोति तदानागतो यदा करोति तदा वर्त्तमानो यदा कृत्वा निवृत्तस्तदातीत इत्येवं धर्मधर्मिणोर्लक्षणानामवस्थानां च कौटस्थ्यं प्राप्नोतीति परैर्दोष उच्यते।
नाऽसौ दोषः। कस्मात्? गुणिनित्यत्वेऽपि गुणानां विमर्दवैचित्र्यात्। यथा संस्थानमादिमद्धर्ममात्रं शब्दादीनां गुणानां विनाश्यविनाशिनामेवं लिङ्गमादिमद्धर्ममात्रं सत्त्वादीनां गुणानां विनाश्यविनाशिनाम्। तस्मिन् विकारसंज्ञेति।
तत्रेमुदाहरणं मृद्धर्मी पिण्डाकाराद्धर्माद्धर्मान्तरमुपसम्पद्यमानो धर्मतः परिणमते घटाकार इति। घटाकारोऽनागतं लक्षणं हित्वा वर्त्तमानलक्षणं प्रतिपद्यत इति लक्षणतः परिणमते। घटो नवपुराणतां प्रतिक्षणमनुभवन्नवस्थापरिणामं प्रतिपद्यत इति। धर्मिणोऽपि धर्मान्तरमवस्था धर्मस्यापि लक्षणान्तरमवस्थेत्येक एव द्रव्यपरिणामो भेदेनोपदर्शित इति। एवं पदार्थान्तरेष्वपि योज्यमिति।
त एते धर्मलक्षणावस्थापरिणामा धर्मिस्वरूपमनतिक्रान्ता इत्येक एव परिणामः सर्वानमून्विशेषानभिप्लवते। अथ कोऽयं परिणामः? अवस्थितस्य द्रव्यस्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिः परिणामः॥
हिंदी में अर्थ : (एतेन) इससे अर्थात् (पूर्वोक्तेन चित्तपरिणामेन) पूर्व कहे गए चित्त के परिणामों (निरोध, समाधि और एकाग्रता परिणामों) से, (धर्मलक्षणावस्थारूपेण) धर्म, लक्षण और अवस्था रूप से (भूतेन्द्रियेषु) भूतों और इन्द्रियों में भी (धर्मपरिणामः) धर्मपरिणाम, (लक्षणपरिणामः) लक्षणपरिणाम (च) और (अवस्थापरिणामः) अवस्थापरिणाम (उक्तः) कहा गया है, (वेदितव्यः) ऐसा जानना चाहिए।
(तत्र) उन परिणामों में (व्युत्थाननिरोधयोः धर्मयोः) व्युत्थान और निरोध धर्मों का जो क्रमशः (अभिभवप्रादुर्भावौ) अभिभव = दबना और प्रादुर्भाव = प्रकट होना (धर्मिणि) धर्मी चित्त में होने वाला (धर्मपरिणामः) धर्म परिणाम है। (च) और (लक्षणपरिणामः) लक्षणपरिणाम यह है कि (निरोधः) निरोध (त्रिलक्षणः) तीन = अनागत, वर्त्तमान और अतीत लक्षणों वाला अर्थात् (त्रिभिः अध्वभिः) तीन मार्गों = स्थितियों से (युक्तः) युक्त है। (सः खलु) वह त्रिलक्षण निरोध (प्रथमम्) पहले (अनागतलक्षणम् अध्वानम्) अनागत = भविष्यत् काल वाली स्थिति को (हित्वा) छोड़कर = त्यागकर, (धर्मत्वम्) अपने निरोधरूप धर्म को (अनतिक्रान्तः) न छोड़ता हुआ, (वर्त्तमानलक्षणम् प्रतिपन्नः) वर्त्तमान काल की स्थिति को प्राप्त होता है; (यत्र) जहाँ (अस्य) इसकी (स्वरूपेण) स्वरूप से (अभिव्यक्तिः) अभिव्यक्ति = प्रकटता होती है। (एषः) यह वर्त्तमानकालिक स्थिति (अस्य) इस निरोध धर्म की (द्वितीयः अध्वा) दूसरी स्थिति है। (च) और यह वर्त्तमान काल की स्थितिवाला निरोध धर्म (अतीतानागताभ्याम् लक्षणाभ्याम्) अतीत और अनागत लक्षणों से (वियुक्तः न) वियुक्त = रहित नहीं है।
(तथा) उसी प्रकार (व्युत्थानम्) व्युत्थान धर्म भी (त्रिलक्षणम्) तीन लक्षणों वाला अर्थात् (त्रिभिः अध्वभिः) तीन मार्गों = स्थितियों से (युक्तम्) युक्त है; वह (वर्त्तमानलक्षणम्) वर्त्तमान काल की स्थिति को (हित्वा) छोड़कर = त्यागकर (धर्मत्वम्) अपने व्युत्थान धर्म को (अनतिक्रान्तम्) न छोड़ता हुआ (अतीतलक्षणम् प्रतिपन्नम्) अतीतकालिक स्थिति को प्राप्त होता है। (एषः) यह (अस्य) इसकी (तृतीयः अध्वा) तृतीय स्थिति है। (च) और यह अतीत काल की स्थितिवाला व्युत्थान धर्म (अनागतवर्त्तमानाभ्याम् लक्षणाभ्याम्) अनागत = भविष्यत् और वर्त्तमान लक्षणों = स्थितियों से (वियुक्तम् न) वियुक्त = रहित नहीं है। (एवम्) इसी प्रकार (पुनः) फिर निरोध स्थिति के भंग होने पर (व्युत्थानम्) व्युत्थान धर्म (उपसम्पद्यमानम्) प्रादुर्भूत = प्रकट होता हुआ (अनागतलक्षणम्) अनागत = भविष्यत् कालिक स्थिति को (हित्वा) छोड़कर = त्यागकर (धर्मत्वम्) अपने व्युत्थान धर्म को (अनतिक्रान्तम्) न छोड़ता हुआ (वर्त्तमानलक्षणम् प्रतिपन्नम्) वर्त्तमान लक्षण को प्राप्त होता है। (यत्र) जिस काल में (अस्य) इस व्युत्थान धर्म की (स्वरूपाभिव्यक्तौ सत्याम्) स्वरूप की अभिव्यक्ति = प्रकटता होने पर ही (व्यापारः) व्यापार = क्रिया होती है। (एषः) यह (अस्य) इस वर्त्तमान कालिक व्युत्थान धर्म की (द्वितीयः अध्वा) दूसरी स्थिति है। (च) और यह वर्त्तमान काल की स्थिति वाला व्युत्थान धर्म (अतीतानागताभ्याम् लक्षणाभ्याम्) अतीत और अनागत लक्षणों से (न वियुक्तम् इति) वियुक्त = रहित नहीं है। (एवम्) इसी प्रकार (पुनः) फिर से (निरोधः) निरोध धर्म प्रकट होता और (एवम्) इसी प्रकार (पुनः) फिर से (व्युत्थानम् इति) व्युत्थान धर्म प्रकट होता है।
(तथा) उसी प्रकार (अवस्थापरिणामः) अवस्था परिणाम है। (तत्र) उसमें (निरोधक्षणेषु) निरोधक्षणों = निरोध समाधि काल में (निरोधसंस्काराः) निरोध संस्कार (बलवन्तः) बलवान् (भवन्ति) होते हैं, और (व्युत्थानसंस्काराः) व्युत्थान संस्कार (दुर्बलाः इति) दुर्बल = निर्बल होते हैं। (एषः) यह (धर्माणाम्) निरोध और व्युत्थान धर्मों का (अवस्थापरिणामः) अवस्था परिणाम है। (तत्र) उन तीन प्रकार के परिणामों में (धर्मिणः) चित्त रूप धर्मी का (धर्मैः) धर्मों के द्वारा = धर्मों के रूप में (परिणामः) परिणाम होता है; (धर्माणाम्) धर्मों का (त्रिः अध्वनाम्) तीन मार्ग = स्थितियों वाले (लक्षणैः) लक्षणों के द्वारा (परिणामः) परिणाम होता है; और (लक्षणानाम्) लक्षणों का (अपि) भी (अवस्थाभिः) अवस्थाओं के द्वारा (परिणामः इति) परिणाम होता है।
(एवम्) इस प्रकार (गुणवृत्तम्) सत्त्वादि गुणों का व्यापार (धर्मलक्षणावस्थापरिणामैः) धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों से (शून्यम्) रहित (क्षणम् अपि) एक क्षण भी (न अवतिष्ठते) नहीं रहता। (च) क्योंकि (गुणवृत्तम्) गुणों का व्यवहार = व्यापार (चलम्) चञ्चल है। (गुणस्वाभाव्यम् तु) गुणों का स्वभाव ही (गुणानाम्) गुणों की (प्रवृत्तिकारणम्) प्रवृत्ति = परिणाम का कारण (उक्तम् इति) कहा गया है। (एतेन) इस चित्त के त्रिविध परिणामों के द्वारा (भूतेन्द्रियेषु) पञ्च महाभूतों और इन्द्रियों आदि में (धर्मधर्मिभेदात्) धर्म और धर्मीं के भेद से (त्रिविधः) तीन प्रकार का (परिणामः) परिणाम (वेदितव्यः) जानना चाहिए।
(परमार्थतः तु) वास्तव में तो (एकः एव) एक ही (परिणामः) परिणाम होता है। (हि) क्योंकि (धर्मिस्वरूपमात्रः) धर्मी का स्वरूप मात्र ही (धर्मः) धर्म है, (एषा) यह (धर्मिविक्रिया एव) धर्मी का विकार = परिणाम ही (धर्मद्वारा) धर्मों के द्वारा (प्रपञ्च्यते इति) दिखाया जाता = विस्तार किया जाता है। (तत्र) उस धर्मी में परिणाम की दशा में (धर्मिणि वर्त्तमानस्य) धर्मी में वर्त्तमान = उपस्थित (धर्मस्य एव) धर्म के ही (अतीतानागतवर्त्तमानेषु अध्वसु) अतीत, अनागत और वर्त्तमान स्थितियों में (भावान्यथात्वम्) भाव = विकार की ही भिन्नता (भवति) होती है, (न तु द्रव्यान्यथात्वम्) द्रव्य = धर्मी रूप पदार्थ की भिन्नता नहीं होती। (यथा) जैसे (सुवर्णभाजनस्य) सुवर्ण पात्र को (भित्त्वा) तोड़कर = गलाकर (अन्यथा क्रियमाणस्य) अन्य प्रकार से बनाए जाने पर (भावान्यथात्वम्) भाव = विकार की ही भिन्नता (भवति) होती है, (सुवर्णान्यथात्वम्) सुवर्ण का परिवर्तन = सुवर्ण में परिवर्तन (न इति) नहीं होता।
(अपरः आह) इस विषय में अन्य पक्षी कहता है — (पूर्वतत्त्वानतिक्रमात्) पूर्व तत्त्व का अतिक्रमण = त्याग न होने से (धर्मी) धर्मी (धर्मानभ्यधिकः) अपने धर्मों से भिन्न अर्थात् अतिरिक्त नहीं है। (पूर्वापरावस्थाभेदम्) परिणाम से पूर्व और परिणाम के पश्चात् की अवस्थाओं में (अनुपतितः) अनुगत रहने वाला (यदि अन्वयी स्यात्) यदि कोई धर्मी होवे तो (कौटस्थ्येन एव परिवर्त्तेत इति) कूटस्थ = नित्य रूप से ही परिवर्तित हो जायेगा अर्थात् नित्य नहीं रहेगा। इस शंका का समाधान किया है — (अयम्) हमारे सिद्धान्त में यह (अदोषः) दोष नहीं है। (कस्मात्) क्यों यह दोष नहीं है? क्योंकि (एकान्ततानभ्युपगमात्) एकान्तिकता = भूत और इन्द्रिय रूपी धर्मी की, पुरुष के समान, एकान्तिक नित्यता = अपरिणामी नित्यता को स्वीकार नहीं किया गया है। (तत् एतत् त्रैलोक्यम्) यह सभी तीनों लोकों के पदार्थ रूपी धर्मी (व्यक्तेः अपैति) विनाश होने पर व्यक्तता = अभिव्यक्ति से रहित हो जाते हैं; अर्थात् परिणाम को प्राप्त होते हैं। (कस्मात्) क्यों? क्योंकि (नित्यत्वप्रतिषेधात्) इनकी नित्यता का प्रतिषेध किया गया है। (अपेतम् अपि अस्ति) और अभिव्यक्ति से रहित होने पर भी यह जगत् विद्यमान रहता है = नष्ट नहीं होता, क्योंकि (विनाशप्रतिषेधात्) विनाश का प्रतिषेध होने से। (संसर्गात् च) और संसर्ग = अपने कारण में लय होने से (अस्य) इस जगत् के पदार्थों की (सौक्ष्म्यम्) सूक्ष्मता होती है; (च) और (सौक्ष्म्यात्) सूक्ष्मता होने से (अनुपलब्धिः इति) इन पदार्थों की उपलब्धि नहीं होती।
(लक्षणपरिणामः धर्मः) लक्षण परिणाम वाला धर्म (अध्वसु) तीन काल की स्थितियों में (वर्त्तमानः) वर्त्तमान = विद्यमान होता हुआ, (अतीतः) जब अतीत होता है, तब (अतीतलक्षणयुक्तः) अतीत लक्षण युक्त होता हुआ, वह (अनागतवर्त्तमानाभ्याम् लक्षणाभ्याम्) अनागत और वर्त्तमान लक्षणों = स्थितियों से (अवियुक्तः) वियुक्त = रहित नहीं होता। (तथा) उसी प्रकार जब (अनागतः) अनागत रूप से विद्यमान होता हुआ (अनागतलक्षणयुक्तः) अनागत लक्षण = स्थिति से युक्त है, तो भी (वर्त्तमानातीताभ्याम् लक्षणाभ्याम्) वर्त्तमान और अतीत लक्षणों = स्थितियों से (अवियुक्तः) वियुक्त = रहित नहीं होता। (तथा) वैसे ही (वर्तमानः) वर्त्तमान स्थिति को प्राप्त हुआ (वर्त्तमानलक्षणयुक्तः) वर्त्तमान लक्षण = स्थिति से युक्त होता हुआ (अतीतानागताभ्याम् लक्षणाभ्याम्) अतीत और अनागत लक्षणों = स्थितियों से (अवियुक्तः इति) वियुक्त = रहित नहीं होता। (यथा) जैसे (पुरुषः) कोई पुरुष (एकस्याम् स्त्रियाम्) किसी एक स्त्री में (रक्तः) राग युक्त है, तो (शेषासु) अन्य स्त्रियों में (विरक्तः न भवति इति) विरक्त = राग रहित नहीं होता।
(अत्र लक्षणपरिणामे) इस लक्षण परिणाम में (सर्वस्य) अनागत आदि सभी लक्षणों का (सर्वलक्षणयोगात्) सभी अतीतादि लक्षणों से युक्त होने से (अध्वसंकरः) सभी स्थितियों = कालों का साङ्कर्य = मिश्रण दोष (प्राप्नोति) प्राप्त होता है, (इति) ऐसा (परैः) अन्य आचार्यों द्वारा (दोषः चोद्यते इति) दोष बतलाया जाता है। (तस्य) इस दोष का (परिहारः) निराकरण किया जाता है — (धर्माणाम्) धर्मों का (धर्मत्वम्) धर्मत्व (अप्रसाध्यम्) सिद्ध करने योग्य नहीं है (क्योंकि यह पहले से सिद्ध है।) (सति च धर्मत्वे) धर्म में धर्मत्व सिद्ध होने से, उस धर्म का (लक्षणभेदः अपि) लक्षण भेद भी (वाच्यः) कहना होगा। (अस्य) इस धर्म का (धर्मत्वम्) धर्मत्व (वर्त्तमानसमये एव) वर्त्तमान काल में ही (न) नहीं है। (हि) क्योंकि (एवम्) धर्मत्व की वर्त्तमानकालिक ही स्थिति मानने पर (क्रोधकाले) क्रोधकाल में (रागस्य) राग के (असमुदाचारात्) अभिव्यक्त न होने से (चित्तम्) मनुष्य का चित्त (रागधर्मकम्) भविष्य में कभी राग धर्म वाला (न स्यात्) नहीं होगा! (किम् च) और ऐसा क्यों होता है ? (त्रयाणाम् लक्षणानाम्) अतीत, वर्त्तमान और अनागत रूप तीन लक्षणों का (युगपत्) एक ही समय = काल में (एकस्याम्) एक ही व्यक्ति में (व्यक्तौ) अभिव्यक्ति होना (सम्भवः) सम्भव (न अस्ति) नहीं है। (क्रमेण) क्रम से मानने पर (तु) तो (स्वव्यञ्जकाञ्जनस्य) अपने व्यञ्जक कारण से अभिव्यक्त होने वाले लक्षण की (भावः) अभिव्यक्ति (भवेत् इति) होती है। (उक्तम् च) और कहा भी है — जैसे चित्त में (रूपातिशयाः) धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य अथवा अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य और अनैश्वर्य आदि रूपों का आधिक्य, (च) और (वृत्त्यतिशयाः) शान्त, घोर, मूढ रूप वृत्तियों का आधिक्य, इन का (परस्परेण) परस्पर (विरुध्यन्ते) विरोध होता है; (तु) किन्तु उपर्युक्त रूप और वृत्तियों की (सामान्यानि) सामान्य स्थिति (अतिशयैः सह) प्रबल स्थितियों के साथ (प्रवर्त्तन्ते) प्रवृत्त होती है। उसी प्रकार यहाँ भी जानना चाहिए कि विशेष = अभिव्यक्त वर्त्तमान लक्षण के साथ सामान्य = अनभिव्यक्त अतीत और अनागत लक्षणों की स्थिति होती है। अतः कहा है — (तस्मात्) इस कारण से (असंकरः) यहाँ तीनों लक्षणों का काल साङ्कर्य दोष नहीं होता। (यथा) जिस प्रकार (रागस्य एव) राग की ही (क्वचित्) किसी पदार्थ / स्त्री / प्राणी आदि में (समुदाचारः) अभिव्यक्ति होती है (इति) इससे (तदानीम्) उस समय राग का (अन्यत्र) अन्य पदार्थ / स्त्री / प्राणी आदि में (अभावः न) अभाव नहीं होता; (किन्तु) किन्तु वह राग (केवलम्) केवल (सामान्येन) सामान्य रूप से (समन्वागतः) अनुगत = स्थित है, (इति) इसलिए (तदा) उस समय (तत्र) वहाँ = अन्य विषयों / पदार्थों में (तस्य) उस राग का (भावः अस्ति) भाव होता है। (तथा) उसी प्रकार (लक्षणस्य इति) लक्षण परिणाम के विषय में समझना चाहिए।
(धर्मी) भूत और इन्द्रिय आदि धर्मी (त्र्यध्वा न) तीन लक्षणों = मार्गों = स्थितियों वाला नहीं है। (तु) किन्तु (धर्माः) उस धर्मी के धर्म (त्र्यध्वानः) तीन लक्षण वाले हैं। (ते) वे धर्म (लक्षिताः) अभिव्यक्त = वर्त्तमान स्थिति वाले और (अलक्षिताः) अनाभिव्यक्त = अतीत अथवा अनागत स्थिति वाले होते हैं। (तत्र) उनमें (लक्षिताः) लक्षित = अभिव्यक्त धर्म (ताम् ताम् अवस्थाम्) उस-उस अवस्था को (प्राप्नुवन्तः) प्राप्त होते हुए (अवस्थान्तरतः) अवस्था के भेद से (अन्यत्वेन) अन्य-अन्य रूप से (प्रतिनिर्दिश्यन्ते) व्यवहृत होते हैं, (द्रव्यान्तरतः) द्रव्य भेद से (न) नहीं; अर्थात् धर्मी द्रव्य में भेद नहीं होता। (यथा) जैसे (एका रेखा) एक का अङ्क (शतस्थाने) सौ के स्थान में (शतम्) सौ को बताता, (दशस्थाने) दस के स्थान में (दशम्) दस को बताता, (च) और (एकस्थाने) एक = इकाई के स्थान में (एकम्) एक को बताता है। अन्य उदाहरण दिया है — (च) और (यथा) जैसे (एकत्वे अपि स्त्री) एक स्त्री होने पर भी, वह (माता च उच्यते) किसी की माता कही जाती है, (दुहिता च स्वसा च इति) किसी की पुत्री और किसी की बहन कही जाती है।
(कैश्चित्) किसी ने (उक्तः) कहा है कि (अवस्थापरिणामे) अवस्था परिणाम में (कौटस्थ्यप्रसङ्गदोषः) कूटस्थ = नित्यत्व दोष को प्रसङ्ग होता है। (कथम्) किस प्रकार से ? (अध्वनः) अतीत, अनागत, वर्त्तमान काल का (व्यापारेण) केवल व्यापार से (व्यवहितत्वात्) व्यवधान होता है। (यदा) जब (धर्मः) धर्म (स्वव्यापारम्) अपने व्यापार = कार्य को (न करोति) नहीं करता, (तदा) तब (अनागतः) उसकी अनागत स्थिति = लक्षण होता है; (यदा) जब (करोति) करता है, (तदा) तब (वर्त्तमानः) वर्त्तमान लक्षण; और (यदा) जब (कृत्वा) करके (निवृत्तः) निवृत्त होता है, (तदा) तब (अतीतः) अतीत लक्षण कहा जाता है। (इति एवम्) इस प्रकार से (धर्मधर्मिणोः) धर्म, धर्मी के (लक्षणानाम्) लक्षणों की (च) और (अवस्थानाम्) अवस्थाओं की (कौटस्थ्यम्) कूटस्थता = नित्यता रूप दोष (प्राप्नोति) प्राप्त होता है। (इति) यह (परैः) दूसरों द्वारा (दोषः) दोष (उच्यते) कहा गया है।
(असौ दोषः) यह दोष (न) वास्तव में नहीं है। (कस्मात्) क्यों ? क्योंकि (गुणिनित्यत्वे अपि) गुणी = धर्मीं के नित्य होने पर भी (गुणानाम्) गुणों का (विमर्दवैचित्र्यात्) विचित्र = विलक्षण रूप से अभिभव होने से कूटस्थ = नित्यता दोष का प्रसङ्ग नहीं होता। (यथा) जैसे कि (अविनाशिनाम् शब्दादीनाम् गुणानाम्) अविनाशी शब्दादि गुणों = तन्मात्रों रूप धर्मियों के (विनाशि) विनाशशील (आदिमत् धर्ममात्रम् संस्थानम्) कार्यरूपी पृथिवी आदि स्थूल धर्म हैं; (एवम्) इसी प्रकार (अविनाशिनाम् सत्त्वादीनाम् गुणानाम्) अविनाशी सत्त्वादि गुणों का (विनाशि) विनाशशील (आदिमत् धर्ममात्रम् लिङ्गम्) कार्यरूप लिङ्ग = महत्तत्त्व नामक प्रथम धर्म है। (तस्मिन्) इस रूपान्तर की ही (विकारसंज्ञा इति) विकार संज्ञा है। (तत्र) उसमें (इदम्) यह (उदाहरणम्) उदाहरण है — (मृत् धर्मी) मिट्टी रूपी धर्मी (पिण्डाकारात् धर्मात्) पिण्डाकार रूप धर्म से (धर्मान्तरम्) अन्य धर्म को (उपसम्पद्यमानः) प्राप्त होती हुई (धर्मतः) धर्म के द्वारा ही (घटाकारः) घट रूप में (परिणमते इति) परिणत होती है। (घटाकारः) वह घट (अनागतम् लक्षणम्) अनागत लक्षण को (हित्वा) छोड़कर (वर्त्तमानलक्षणम्) वर्त्तमान लक्षण को (प्रतिपद्यते) प्राप्त होता है, (इति) इस प्रकार (लक्षणतः) लक्षण के द्वारा (परिणमते) परिणत होता है। (घटः) वह घट (प्रतिक्षणम्) प्रत्येक क्षण में (नवपुराणताम्) नए पन से पुराने पन को (अनुभवन्) अनुभव करता हुआ = प्राप्त होता हुआ (अवस्थापरिणामम्) अवस्था परिणाम को (प्रतिपद्यते इति) प्राप्त होता है। (धर्मिणः अपि) धर्मी का भी (धर्मान्तरम् अवस्था) धर्मान्तर = अन्य धर्म होना एक अवस्था है, (धर्मस्य अपि) धर्म का भी (लक्षणान्तरम् अवस्था) भिन्न-भिन्न लक्षण होना, उस धर्म की अवस्था है। (इति अतः) इस प्रकार = धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम से (एकः एव) एक ही (द्रव्यपरिणामः) द्रव्य = धर्मी का परिणाम (भेदेन उपदर्शितः इति) भिन्न प्रकार से दिखाया जा रहा है।
(एवम्) इस प्रकार परिणाम त्रय को (पदार्थान्तरेषु अपि) अन्य पदार्थों = भूत और इन्द्रियों में भी (योज्यम् इति) घटित कर लेना चाहिए। (ते एते) वे ये (धर्मलक्षणावस्थापरिणामाः) धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम (धर्मिस्वरूपम्) धर्मी के स्वरूप का (अनतिक्रान्ताः) अतिक्रमण न करते हुए, उसी में रहते हैं। (इति) इसलिए (एकः एव परिणामः) वस्तुतः एक ही परिणाम (अमून् सर्वान्) इन सभी (विशेषान्) विशेषों = परिणामों को (अभिप्लवते) प्राप्त होता है। (अथ) अब (कः अयम् परिणामः) यह परिणाम क्या है ? इसका उत्तर देते हैं — (अवस्थितस्य) पूर्व विद्यमान (द्रव्यस्य) द्रव्य के (पूर्वधर्मनिवृत्तौ) पूर्व धर्म के निवृत्त होने पर (धर्मान्तरः) अन्य धर्म की (उत्पत्तिः) उत्पत्ति ही (परिणामः) परिणाम है॥
वैदिक योग मीमांसा : चित्त में समाधि, एकाग्रता और निरोध परिणाम होते हैं। इसी प्रकार भूत और इन्द्रियों, जोकि सृष्टि निर्माण प्रक्रिया में अन्तिम कार्य पदार्थ हैं, में धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम होते हैं। इनसे पूर्व के विकारों — तन्मात्राओं, अंहकार और महत्तत्त्व के तत्त्वान्तर परिणाम होते हैं। परन्तु इन १६ सोलह पदार्थों = पञ्च महाभूत और ११ ग्यारह इन्द्रियों के आगे तत्त्वान्तर परिणाम नहीं होते। इनमें धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम ही होते हैं। समाधि, एकाग्रता और निरोध परिणाम चित्त (= मन) में ही व्यवहृत होते हैं, अन्य किसी भूत या इन्द्रिय में नहीं। परन्तु धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम इन सभी विशेषों = १६ सोलह पदार्थों में व्यवहृत होते हैं। इससे यह भी जानना चाहिए कि चित्त के समाधि, एकाग्रता और निरोध रूप तीनों ही परिणामों में धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम भी घटते हैं।
परिणाम क्या है ? महर्षि व्यास कहते हैं किसी भी पूर्व विद्यमान द्रव्य = धर्मी के पूर्व धर्म की निवृत्ति होकर अन्य धर्म की उत्पत्ति होना परिणाम कहलाता है। जैसे मिट्टी में चूर्ण-धर्म से पिण्ड-धर्म की प्राप्ति; पिण्ड-धर्म से घट-धर्म की प्राप्ति; घट-धर्म से कपाल-धर्म = ठीकरा-धर्म की प्राप्ति; और कपाल-धर्म से पुनः चूर्ण-धर्म की प्राप्ति होना, मिट्टी रूपी धर्मी के ही धर्म परिणाम हैं। इन सभी परिणामों में मिट्टी रूपी धर्मी उपस्थित रहता है। ये सभी परिणाम मिट्टी के विभिन्न धर्मों = रूपों को ही दिखाते हैं। वस्तुतः परिणाम एक ही होता है जिसको धर्म परिणाम रूप में जाना जाता है। इसी परिणाम को जब काल के दृष्टिकोण से कहा जाता है, तो यह लक्षण परिणाम कहालाता है जो कि अनागतलक्षण परिणाम, वर्त्तमानलक्षण परिणाम और अतीतलक्षण परिणाम के रूप में जाना जाता है। और यही परिणाम जब पूर्व-पर धर्म के प्रबल-दुर्बल अथवा नवीन-पुरातन आदि रूप से कहा जाता है, तो यह अवस्था परिणाम कहलाता है। अतः जब मिट्टी का पिण्ड-धर्म था तो घट का अनागतलक्षण परिणाम था; जब घट बन गया तो घट का वर्त्तमानलक्षण परिणाम हुआ; और जब घट टूट कर कपालधर्म में बदल गया, तो अब घट का अतीतलक्षण परिणाम हो गया। यही घट जब बन जाता है तो प्रत्येक क्षण के साथ नवीन से पुरातन स्थिति को प्राप्त होना, घट में अवस्था परिणाम है। यहाँ पिण्ड-धर्म से घट-धर्म की प्राप्ति में अन्य कोई परिणाम नहीं हुआ, परन्तु कालभेद से लक्षण-परिणाम और अवस्था भेद से अवस्था-परिणाम कहे गए है। अतः एक ही धर्म-परिणाम को भिन्न रूपों में कहा गया है। महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि धर्मी = द्रव्य का एक धर्म से अन्य धर्म को प्राप्त होना एक परिणाम है, और धर्म के अनागत आदि भिन्न-भिन्न लक्षण होना, उस धर्म की अवस्था है। अतः धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम से एक ही द्रव्य = धर्मी का परिणाम भिन्न प्रकार से दिखाया जाता है।
चित्त के समाधि आदि परिणामों में धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम को विस्तार से कहा गया है। इनको इस प्रकार से समझना चाहिए —
१. निरुद्ध चित्त में व्युत्थान धर्म का दबना और निरोध धर्म का प्रकट होना धर्म परिणाम है। इसी प्रकार चित्त में सर्वार्थता धर्म का क्षय होना और एकाग्रता धर्म का उदय होना भी, समाधि परिणाम को प्राप्त “चित्त” का धर्म परिणाम है।
२. चित्त में लक्षण परिणाम को निम्न प्रकार से जानना चाहिए — जब तक चित्त में निरोध संस्कार उत्पन्न नहीं होते और व्युत्थान संस्कार कार्यरत रहते हैं, उस काल में निरोध संस्कारों की अनागत लक्षण = स्थिति है, और व्युत्थान संस्कारों की वर्त्तमान लक्षण = स्थिति है। और जब निरोध संस्कार प्रकट होते हैं, तो यह निरोध संस्कारों का अनागत लक्षण को त्याग कर वर्त्तमान लक्षण = स्थिति को प्राप्त होना है; और व्युत्थान संस्कारों के दब जाने से व्युत्थान संस्कारों का वर्त्तमान लक्षण को त्याग कर अतीत लक्षण परिणाम को प्राप्त होना है। निरोध संस्कार अनागत लक्षण से वर्त्तमान लक्षण को प्राप्त होते हुए भी, न तो अपने निरोध धर्म का त्याग करते और न ही अनागत और अतीत लक्षणों से रहित होते। इसी प्रकार व्युत्थान संस्कारों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए।
अब जब चित्त में निरोध समाधि भंग होती है, तो निरोध संस्कार दब जाते और व्युत्थान संस्कार प्रकट हो जाते हैं। निरोध संस्कारों का दब जाना, यह निरोध संस्कारों का वर्त्तमान लक्षण को त्याग कर अतीत लक्षण परिणाम को प्राप्त होना है; और व्युत्थान संस्कारों का उदय होना यह व्युत्थान संस्कारों का अनागत लक्षण को त्याग कर वर्त्तमान लक्षण परिणाम की प्राप्ति है। इस प्रकार ये निरोध और व्युत्थान धर्म अपने स्वरूप का त्याग न करते हुए, किसी भी लक्षण = स्थिति में रहते हुए, शेष दोनों लक्षणों से भी युक्त रहते हैं। इस प्रकार से निरोध धर्म का उदय और व्युत्थान धर्म का दबना; और फिर से व्युत्थान धर्म का उदय होना और निरोध धर्म का दबना, यह क्रम चलता रहता है।
३. निरोध समाधि काल में चित्त में निरोधसंस्कार प्रबल होते, और व्युत्थानसंस्कार निर्बल होते हैं; यह निरोध और व्युत्थान धर्मों का अवस्था परिणाम है। इसी प्रकार अन्य अवस्थाओं में भी एक प्रकार के धर्म की प्रबलता और अन्य धर्म की दुर्बलता को भी अवस्था परिणाम जानना चाहिए।
महर्षि व्यास कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम गुणों की वृत्तियाँ चञ्चल होने से, उनका व्यापार, धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों के बिना कभी नहीं रहता। अतः स्थूल भूतों और इन्द्रियों में ये परिणाम निरन्तर होते रहते हैं। परन्तु इन परिणामों से धर्मी के स्वरूप में कोई परिवर्तन नहीं होता, जैसे किसी सुवर्ण पात्र को गला कर अन्य प्रकार का गहना आदि बनाने से, सुवर्ण में परिवर्तन नहीं होता, वैसे ही इन परिणामों से भूत और इन्द्रियों में मूलतः परिवर्तन नहीं होता।
इस विषय में यह जानना चाहिए कि धर्मों से भिन्न धर्मी सदा विद्यमान रहता है, और सभी धर्म = गुण, धर्मी = द्रव्य के ही आश्रय रहते हैं। सूक्ष्म धर्मी के नेत्रादि इन्द्रियों से उपलब्ध न होने से मनुष्य को धर्मी की सत्ता में सन्देह होता है। जैसे कि कोई कहे कि नेत्रेन्द्रिय रूपी धर्मी कोई पृथक् सत्तावान् पदार्थ नहीं है, किन्तु दर्शन रूपी धर्म ही नेत्रेन्द्रिय है, जब तक दर्शन होता रहता है तब तक नेत्रेन्द्रिय की सत्ता स्वतः सिद्ध होती है, और जब दर्शन रूपी धर्म नहीं है, तो नेत्रेन्द्रिय नहीं है। इस प्रकार का ज्ञान अविद्या है। इसी प्रकार आत्मा आदि के विषय में भी अविद्या रहती है।
कुछ आचार्य धर्मों से अतिरिक्त धर्मी को नहीं मानते क्योंकि ऐसा मानने पर धर्म परिणाम होने से, धर्मी की नित्यता समाप्त हो जायेगी अर्थात् धर्मी स्वरूपतः परिवर्तित हो जाएगा। इस शंका का समाधान करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि शास्त्र में इन भूत और इन्द्रियों को पुरुष और मूलप्रकृति के समान नित्य नहीं माना गया। इन का विनाश होने से ये अभिव्यक्ति से रहित हो जाते हैं; और अपने-अपने कारण में लय होने से उनकी सूक्ष्मता होती और इस प्रकार सूक्ष्म धर्मी = सूक्ष्म पदार्थ उपलब्ध नहीं होता। वस्तुतः इन भूत और इन्द्रियों का स्वरूपतः कभी विनाश नहीं होता; अपने-अपने कारण में रहते हुए, ये अभिव्यक्त नहीं होते और कार्य रूप में आने पर उपलब्ध होते हैं। अतः यह जानना चाहिए कि गुणों = धर्मों का समुदाय मात्र धर्मी नहीं है; किन्तु सत्तावान धर्मी ही धर्मों = गुणों से जाना जाता है।
अब लक्षणपरिणाम वाला धर्म तीनों स्थितियों से युक्त रहता है, परन्तु वर्त्तमान काल में ही प्रकट रूप में उपलब्ध होता है। यदि ऐसा न हो तो, किसी पुरुष का किसी एक स्त्री के प्रति वर्त्तमान काल में राग प्रकट रूप में होने से और उस काल में अन्य स्त्रियों के प्रति राग प्रकट रूप में न रहने से, उस पुरुष का राग अन्य किसी स्त्री के प्रति भविष्यत काल में भी नहीं होगा या अतीत काल में नहीं था, ऐसा नहीं कहा जाता सकता। यहाँ अन्य स्त्रियों के प्रति राग अतीत लक्षण वाला अथवा अनागत लक्षण वाला है ऐसा मानना चाहिए। अतः चित्त में उपस्थित राग धर्म तीनों लक्षणों से युक्त है, किसी के प्रति वर्त्तमान लक्षण वाला, किसी के प्रति अतीत लक्षण वाला और किसी के प्रति अनागत लक्षण वाला है। “धर्म के तीनों लक्षणों से युक्त होने पर काल मिश्रण दोष होगा” ऐसी शंका होने पर महर्षि व्यास कहते हैं कि धर्म का धर्मत्व वर्तमान काल में ही नहीं है। यदि धर्म की केवल वर्तमान कालिक स्थिति मानी जाए, तो क्रोध काल में राग धर्म के अभिव्यक्त न होने से, पुरुष के चित्त में कभी राग होना ही नहीं चाहिए, और ऐसे पुरुष का चित्त सदा क्रोध धर्म से ही युक्त रहना चाहिए; परन्तु ऐसा सम्भव नहीं है। किसी भी धर्म के तीनों लक्षण एक साथ नहीं होते किन्तु क्रम से अभिव्यक्त होते हैं। और फिर कहा भी है कि रूपों के अतिशय और वृत्तियों के अतिशय में परस्पर विरोध है अर्थात् दो विरुद्ध प्रकृति की वृत्तियाँ एक साथ प्रबल रूप से चित्त में नहीं रहती, परन्तु एक की प्रबलता में दूसरी सामान्य / निर्बल रूप से रहती है। अतः इन तीनों लक्षणों में काल साङ्कर्य = मिश्रण दोष नहीं होता। इसी प्रकार धर्मों के विभिन्न रूप में प्रकट होने पर भी धर्मी में भेद नहीं होता। इसमें उदाहरण दिया है कि एक स्त्री अपने पुत्र के लिए माता, पिता के लिए पुत्री, भाई के लिए बहन और पति के लिए पत्नी होती है, इससे उस स्त्री में कोई भेद नहीं होता।
इस प्रकार अवस्था परिणाम में नित्यत्व दोष प्रसङ्ग के समाधान में भी यह जानना चाहिए कि वस्तुतः अवस्था परिणाम कोई पृथक् अथवा स्वतन्त्र परिणाम नहीं है, जिसमें धर्मों की विभिन्न अवस्थाएँ होती हों। जैसे मिट्टी रूपी धर्मी पहले पिण्डाकार रूप में होती, फिर उससे घट को बनाया जाता है; यह धर्म परिणाम हुआ। यह घट अनागत लक्षण को त्याग कर वर्त्तमान लक्षण को प्राप्त होता है; यह लक्षण परिणाम हुआ। यही घट प्रत्येक क्षण में नए से पुराना होता हुआ अवस्था परिणाम को प्राप्त होता है। इस प्रकार एक ही परिणाम को धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम रूप से दिखाया जाता है।
इन धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों को पञ्च महाभूतों तथा इन्द्रियों में समान रूप से होता हुआ जानना चाहिए और उनमें भी घटा लेना चाहिए। ये परिणाम द्रव्य के स्वरूप को नष्ट न करते हुए, उसी में रहते हैं।