In Hindi:
पदपाठ : शान्तोदिताव्यपदेश्य धर्मानुपाती धर्मी॥
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तत्र—
हिंदी में अर्थ : (तत्र) उनमें (धर्मी का स्वरूप यह है) —
हिंदी में अर्थ : (शान्तोदिताव्यपदेश्य) शान्त = अतीत, उदित = वर्त्तमान और अव्यपदेश्य = अनागत (धर्मानुपाती) धर्मों में अनुगत रहने वाला पदार्थ (धर्मी) धर्मी है॥
व्यास भाष्य : योग्यतावच्छिन्ना धर्मिणः शक्तिरेव धर्मः। स च फलप्रसवभेदानुमितसद्भाव एकस्यान्योन्यश्च परिदृष्टः। तत्र वर्त्तमानः स्वव्यापारमनुभवन्धर्मो धर्मान्तरेभ्यः शान्तेभ्यश्चाव्यपदेश्येभ्यश्च भिद्यते। यदा तु सामान्येन समन्वागतो भवति तदा धर्मिस्वरूपमात्रत्वात्कोऽसौ केन भिद्येत।
तत्र ये खलु धर्मिणो धर्माः शान्ता उदिता अव्यपदेश्याश्चेति, तत्र शान्ता ये कृत्वा व्यापारानुपरताः। सव्यापारा उदिताः। ते चानागतस्य लक्षणस्य समनन्तराः। वर्त्तमानस्यानन्तरा अतीताः। किमर्थमतीतस्यानन्तरा न भवन्ति वर्त्तमानाः। पूर्वपश्चिमताया अभावात्। यथानागतवर्त्तमानयोः पूर्वपश्चिमता नैवमतीतस्य। तस्मान्नातीतस्यास्ति समनन्तरः। तदनागत एव समनन्तरो भवति वर्त्तमानस्येति।
अथाव्यपदेश्याः के? सर्वं सर्वात्मकमिति। यत्रोक्तम्—जलभूम्योः पारिणामिकं रसादिवैश्वरूप्यं स्थावरेषु दृष्टम्। तथा स्थावराणां जङ्गमेषु जङ्गमानां स्थावरेष्वित्येवं जात्यनुच्छेदेन सर्वं सर्वात्मकमिति। देशकालाकारनिमित्तापबन्धान्न खलु समानकालमात्मनामभिव्यक्तिरिति। य एतेष्वभिव्यक्तानभिव्यक्तेषु धर्मेष्वनुपाती सामान्यविशेषात्मा सोऽन्वयी धर्मी। यस्य तु धर्ममात्रमेवेदं निरन्वयं तस्य भोगाभावः। कस्मात्? अन्येन विज्ञानेन कृतस्य कर्मणोऽन्यत्कथं भोक्तृत्वेनाधिक्रियेत। तत् स्मृत्यभावश्च नान्यदृष्टस्य स्मरणमन्यस्यास्तीति। वस्तुप्रत्यभिज्ञानाच्च स्थितोऽन्वयी धर्मी यो धर्मान्यथात्वमभ्युपगतः प्रत्यभिज्ञायते। तस्मान्नेदं धर्ममात्रं निरन्वयमिति॥
हिंदी में अर्थ : (धर्मिणः) धर्मी की (योग्यतावच्छिन्ना) योग्यता से अवच्छिन्न = युक्त, निर्धारित (शक्तिः एव) शक्ति ही (धर्मः) धर्म है। (च) और (सः) वह धर्म (फलप्रसवभेदानुमितसद्भावः) कार्यो की उत्पत्ति के भेद से, अनुमान किया जाता हुआ सत्ता वाले (एकस्य) एक धर्मी का (अन्यः अन्यः च) अन्य-अन्य = भिन्न-भिन्न (परिदृष्टः) देखा गया है। (तत्र) उन शक्तिरूप भिन्न-भिन्न धर्मो में (वर्त्तमानः धर्मः) वर्त्तमान = उदित धर्म (स्वव्यापारमनुभवन्) अपने व्यापार को अनुभव करता हुआ = अपनी क्रिया को करता हुआ (धर्मान्तरेभ्यः) अन्य धर्मों से = (शान्तेभ्यः च अव्यपदेश्येभ्यः च) शान्त = अतीत और अव्यपदेश्य = अनागत धर्मों से (भिद्यते) भिन्न होता है। (यदा तु) जिस काल में वर्त्तमान धर्म (सामान्येन समन्वागतः भवति) सामान्य = अभिव्यक्त रूप से धर्मी में अनुगत होता = रहता है (तदा) उस समय (धर्मिस्वरूपमात्रत्वात्) धर्मी के स्वरूप मात्र होने से (कः असौ) कौन यह धर्म है? और (केन भिद्येत) किससे यह भेद को प्राप्त होवे ? अर्थात् उस समय धर्म धर्मी में अत्यन्त भेद नहीं होता।
(तत्र) उनमें (ये खलु धर्मिणः धर्माः) धर्मी के जो धर्म हैं, वे (शान्ताः उदिताः अव्यपदेश्याः च इति) शान्त = अतीत, उदित = वर्त्तमान और अव्यपदेश्य = अनागत भेद वाले हैं। (तत्र) उन अतीतादि धर्मों में (ये) जो धर्म (व्यापारान् कृत्वा) अपने व्यापार को करके (उपरताः) उपरत = कार्यरहित हो गए हैं, वे (शान्ताः) शान्त = अतीत धर्म हैं। (सव्यापाराः) जो धर्म अपने व्यापार सहित हैं = कार्य कर रहे हैं, वे (उदिताः) उदित = वर्त्तमान धर्म हैं। (च) और (ते) वे वर्त्तमान धर्म (अनागतस्य लक्षणस्य) अनागत लक्षण वाले धर्म के (समनन्तराः) अतिशय समीपी हैं = एकदम पश्चात् आने वाले होते हैं। (= अर्थात् अनागत धर्म के पश्चात् वर्त्तमान धर्म होते हैं।) (वर्त्तमानस्य) वर्त्तमान धर्म के (अनन्तराः) अनन्तर = पश्चात् होने वाले (अतीताः) अतीत धर्म हैं। (अतीतस्य) अतीत धर्म के (अनन्तराः) अनन्तर = पश्चात् (वर्त्तमानाः) वर्त्तमान धर्म (किमर्थम्) किस कारण = क्यों (न भवन्ति) नहीं होते ? उत्तर देते हैं — क्योंकि (पूर्वपश्चिमतायाः) अतीत और वर्त्तमान धर्मों में पूर्वता (= पहले होना) और पश्चिमता (= पश्चात् होना) का (अभावात्) अभाव होने से; (यथा) जैसे (अनागतवर्त्तमानयोः) अनागत और वर्त्तमान धर्मों में (पूर्वपश्चिमता) पूर्वता और पश्चिमता प्रत्यक्ष होती है (एवम्) उस प्रकार की (अतीतस्य न) अतीत धर्म में अर्थात् अतीत और वर्त्तमान धर्मों में नहीं होती। (तस्मात्) इससे (अतीतस्य समनन्तरः) अतीत धर्म का समीपी = पश्चात् होने वाला कोई धर्म (न अस्ति) नहीं है। (तत्) वह (अनागत एव) अनागत धर्म ही (वर्त्तमानस्य) वर्त्तमान धर्म का (समनन्तरः भवति इति) समनन्तर = समीपी = अव्यवहित पूर्ववर्त्ती होता है।
(अथ) अब (अव्यपदेश्याः) अव्यपदेश्य = अनागत धर्म (के) कौन से हैं ? (सर्वम्) सभी पदार्थ = धर्मी (सर्वात्मकम् इति) अपनी सभी शक्तियों से युक्त होते हैं। (यत्र उक्तम्) जिस विषय में कहा है — (जलभूम्योः) जल और भूमि का (पारिणामिकम्) परिणाम (रसादिवैश्वरूप्यम्) रस-गन्धादि की विश्वरूपता = विविधरूपता (स्थावरेषु) स्थावर = अचर वृक्ष, लता, पुष्प, वनस्पति आदि में (दृष्टम्) देखी जाती है। (तथा) वैसे ही (स्थावराणाम्) स्थावरों = अचर पदार्थों का परिणाम (जङ्गमेषु) जङ्गम = चर पदार्थों = मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के शरीरों में और (जङ्गमानाम्) चर पदार्थों का परिणाम (स्थावरेषु इति) स्थावर = अचर पदार्थों में देखा जाता है। (एवम्) इस प्रकार (जात्यनुच्छेदेन) जाति का उच्छेद = नष्ट न होने से (सर्वम्) सभी धर्मी = पदार्थ (सर्वात्मकम् इति) अपनी सभी शक्तियों वाले होते हैं।
सभी पदार्थों में अपने सभी धर्मों की विद्यमानता होते हुए भी उन सभी की वर्त्तमान काल में अभिव्यक्ति नहीं होती। क्योंकि (देशकालाकारनिमित्तापबन्धात्) देश, काल, आकार और निमित्त रूप कारणों के सम्बन्ध के अभाव से (समानकालम्) एक ही काल में (आत्मनाम्) सभी पदार्थों की (अभिव्यक्तिः न खलु इति) अभिव्यक्ति नहीं होती। (यः) जो (एतेषु) इन (अभिव्यक्तानभिव्यक्तेषु) अभिव्यक्त = वर्त्तमान और अनभिव्यक्त = अतीत और अनागत (धर्मेषु) धर्मो में (अनुपाती) अनुगत तथा (सामान्यविशेषात्मा) सामान्य और विशेष रूप वाला है (सः) वह (अन्वयी) अनेक धर्मों के आश्रय रूप से स्थित पदार्थ (धर्मी) धर्मी कहा जाता है।
(यस्य तु) जिसके मत में (इदम्) यह धर्मी (धर्ममात्रम्) केवल धर्म मात्र = रूप तथा (निरन्वयम्) सम्बन्ध रहित है, (तस्य) उसके मत में (भोगाभावः) भोग का अभाव होता है। (कस्मात्) कैसे ? क्योंकि (अन्येन विज्ञानेन) अन्य चित्त के द्वारा (कृतस्य कर्मणः) किए गए कर्म का (अन्यत्) अन्य चित्त (भोक्तृत्वेन्) भोक्ता के रूप में (कथम् अधिक्रियेत) कैसे अधिकृत होगा ? (च) और (अन्यदृष्टस्य) अन्य के देखे = अनुभव किए पदार्थ का (अन्यस्य) अन्य को (स्मरणम्) स्मरण (न अस्ति) नहीं होता, अतः (तत् स्मृत्यभावः) उस चित्त को पूर्व अनुभूत पदार्थों की स्मृति का अभाव होगा। (च) और (वस्तुप्रत्यभिज्ञानात्) धर्मी = वस्तु की प्रत्यभिज्ञा होने से सिद्ध होता है कि (स्थितः अन्वयी धर्मी) सभी धर्मों में अनुगत रहने वाला वाला धर्मी स्थित = सत्तावाला है (यः) जो कि (धर्मान्यथात्वम् अभ्युपगतः) भिन्न = अन्य धर्म को प्राप्त होकर भी (प्रत्यभिज्ञायते) प्रत्यक्ष होता = पहचाना जाता है। (तस्मात्) इसलिए (इदम्) यह धर्मी (निरन्वयम्) सभी धर्मों से सम्बन्ध रहित और (धर्ममात्रम्) धर्ममात्र (न इति) नहीं है॥
वैदिक योग मीमांसा : किसी भी पदार्थ के धर्म = गुण उस पदार्थ के ही आश्रय होते हैं, और वे धर्मी के स्वरूप का अतिक्रमण न करते हुए उसी में रहते हैं। स्थूल रूप से नेत्रादि इन्द्रियों से उपलब्ध होने वाले धर्मी का साक्षात् तो जन सामान्य को भी होता है, परन्तु सूक्ष्म द्रव्यों = धर्मियों का ज्ञान उनके गुणों = धर्मों के अनुभव द्वारा ही होता है। इन धर्मों के अनुभव से हुए, धर्मी का ज्ञान भी, धर्मी की स्थूल (= नेत्रादि इन्द्रियों द्वारा दृष्यमान) सत्ता के न होने से, उसकी सत्ता की अनुभूति को नहीं करा पाता। जैसे कि आत्मा के गुणों के ज्ञान से, आत्मा का ज्ञान होने पर भी, केवल मात्र चेतनस्वरूप आत्मा की अनुभूति, शब्द प्रमाण द्वारा ज्ञात होने पर भी, अच्छे स्तर के योग साधकों को भी नहीं हो पाती, जनसामान्य की तो कथा ही क्या ? इसी प्रकार प्रकृति के सूक्ष्म विकारों महत्तत्त्व से लेकर आकाश पर्यन्त के विषय में भी जानना चाहिए। अतः महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि अपने विभिन्न धर्मों में अनुगत रहने वाला धर्मी है, और वह सत्तावान् है।
धर्मी और उसके धर्मों के विषय को स्पष्ट करते हुए कहा है कि धर्मी की योग्यता से युक्त शक्ति = सामर्थ्य ही उसका धर्म कहा जाता है। धर्मी अपने वर्त्तमान धर्मों = उदित धर्मों की क्रियाओं द्वारा ही जाना जाता है। यहाँ = इस काल में, धर्म और धर्मी में अत्यन्त भेद नहीं होता। धर्मी का यह उदित धर्म, अन्य धर्मों = शान्त और अव्यपेदश्य धर्मों से भिन्न होता है।
शान्त = अतीत धर्म वे हैं जो अपना कार्य करके कार्य रहित हो गए हैं। जो अपने कार्य कर रहे हैं = वर्त्तमान में उपलब्ध हैं, वे उदित धर्म हैं। अनागत धर्म उदित धर्म के अत्यन्त समीपी हैं = उसके एकदम पश्चात् होने वाले हैं। इसी प्रकार उदित धर्मों के एकदम पश्चात् अतीत धर्म होता है। परन्तु अतीत धर्म के पश्चात् वर्त्तमान धर्म नहीं होता क्योंकि इनमें पूर्वता = पहले होना और पश्चिमता = पश्चात् होना सिद्ध नहीं होता। जैसे मिट्टी के पिण्ड से तो घड़ा बनता है, परन्तु घड़े के ठीकरों से पुनः घड़ा नहीं बनता किन्तु उसका तो चूर्ण ही बनता है। ठीकरे होने पर घड़ा अतीत धर्म हो गया, अब उसका कोई अन्य धर्म नहीं है। यहाँ अब ठीकरा ही उदित धर्म है। अतः अतीत धर्म का अत्यन्त समीपी = इसके पश्चात् कोई धर्म नहीं होता। इसलिए अनागत धर्म ही वर्त्तमान धर्म का अत्यन्त समीपी अर्थात् उसका पूर्ववर्त्ती धर्म होता है न कि अतीत धर्म।
अनागत धर्म कौन से हैं ? किसी भी पदार्थ की सभी शक्तियाँ उसके अनागत धर्म हैं, और उनमें से जो धर्म अभिव्यक्त हो जाते हैं वे उदित धर्म कहलाते हैं। अतः उदित और शान्त धर्मों के समान अनागत धर्मों को निश्चितरूपेण नहीं कहा गया। इसमें उदाहरण देकर कहा है — “भूमि और जल के विविध परिणाम स्थावर = वृक्ष, वनस्पति आदि तथा उनमें विभिन्न प्रकार के रसों के रूप में होती है। इन वृक्ष आदि से अन्न, औषधि, वनस्पति आदि के द्वारा वीर्य की उत्पत्ति होकर विभिन्न प्राणियों के शरीरों का निर्माण होता है; और इन्हीं जङ्गमों = मनुष्य, पशु, पक्षी आदि के शरीरों से उत्पन्न होने वाले मल रूपी खाद से वृक्षादि की उत्पत्ति तथा मृत्यु उपरान्त इन शरीरों के विविध परिणामों से स्थावरों की पुष्टि आदि होते हैं। इसी को महर्षि व्यास ने “स्थावराणां जङ्गमेषु जङ्गमानां स्थावरेष्वित्येवं जात्यनुच्छेदेन सर्वं सर्वात्मकम् इति।” कहा है। यहाँ पर यह समझना चाहिए कि स्थावरों में किसी वृक्ष आदि के, तथा जङ्गमों में किसी भी शरीर के नाश होने पर उस जाति विशेष का नाश नहीं होता। किसी एक वृक्ष और शरीर के नष्ट होने पर भी वह वृक्ष और शरीर आदि अन्यत्र उपलब्ध होते हैं।
व्यास भाष्य में “सर्वं सर्वात्मकम्” कहा है जिसका अर्थ कई भाष्यकारों ने यह किया है कि सभी धर्मी सर्वशक्तिमान् = सभी धर्मों से युक्त होते हैं, अर्थात् वे सभी शक्तियाँ सर्वविकारोत्पादन में समर्थ होती हैं। वस्तुतः ऐसा सम्भव नहीं है कि सभी पदार्थों से सब कुछ बन जाए। इस विषय में महर्षि कणाद वैशेषिक दर्शन में कहते हैं —
द्रव्यगुणयोः सजातीयारम्भकत्वं साधर्म्यम्॥ वै॰ १.१.९॥
द्रव्याणि द्रव्यान्तरमारभन्ते गुणाश्च गुणान्तरम्॥ वै॰ १.१.१०॥
अर्थात् द्रव्य और गुणों का अपने समान जाति वाले को बनाना समान धर्म है; यथा पृथिवी द्रव्य अपने समान जाति वाले पृथिवी आदि द्रव्यों का आरम्भ करते हैं, अपने से विपरीत जाति वालों का नहीं॥ पृथिवी आदि द्रव्य अन्य द्रव्य का और रूपादि गुण अन्य गुणों को आरम्भ करते हैं। मिट्टी से मिट्टी के ही अन्य पदार्थ, जल से अन्य जल का, तेज से अन्य तेज का आरम्भ = उत्पत्ति होती है, जो कि स्वसमान जाति ही होती है। ऐसा सम्भव नहीं है कि पृथिवी से जल, तेज, वायु आदि की उत्पत्ति होवे, इसी प्रकार अन्य द्रव्यों के विषय में भी जानना चाहिए।
इसी प्रकार सांख्यदर्शनकार महर्षि कपिल कहते हैं —
नासदुत्पादो नृशृङ्गवत्॥१॥
उपादाननियमात्॥२॥
सर्वत्र सर्वदा सर्वासम्भवात्॥३॥
शक्तस्य शक्यकारणम्॥४॥ सांख्य १.११४-११७॥
अर्थात् असत् का उत्पाद नहीं होता, नृशृङ्ग की भांति। सत् ही अभिव्यक्त = उत्पन्न होता है, असत् नहीं॥१॥ उपादान का नियम होने से असत् का उत्पाद् नहीं होता। जो-जो उत्पन्न होता है, वह-वह उपादान के नियम से अर्थात् जैसा उपादान-कारण होता है वैसा वह उत्पन्न होता, यथा मिट्टी से घड़ा, तन्तुओं से वस्त्र इत्यादि॥२॥ क्योंकि सब स्थान में, सब काल में, सब के उत्पन्न न होने से। यदि उपादान का नियम न हो तो सब स्थानों में, सब काल में, सब वस्तुओं की उत्पत्ति हुआ करे, परन्तु ऐसा नहीं होता॥३॥ क्योंकि शक्त शक्य को करता है, वह शक्य उस शक्त के अन्दर पूर्व से विद्यमान होता और वह पूर्व से विद्यमान शक्य ही व्यक्त = अभिव्यक्त होता है, अतः असदुत्पाद नहीं होता॥४॥
अतः उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि कोई भी पदार्थ की ‘‘अपनी’’ सभी शक्तियों = धर्मों से ही युक्त होता हैं, न कि सभी प्रकार की शक्तियों = धर्मों से। अर्थात् उसकी अपनी सभी शक्तियाँ ही उसके धर्म और यही “सर्वं सर्वात्मकम्” का उचित अर्थ है।
किसी भी धर्मी के सभी अनभिव्यक्त अनागत धर्म एक साथ अभिव्यक्त नहीं होते। किसी भी धर्म की अभिव्यक्ति में निम्न कारणों का कहा गया है —
१. देश :— कई धर्म धर्मी में अनभिव्यक्त रूप में रहते हुए भी, अनुकूल देश में ही अभिव्यक्त होते हैं। जैसे केसर की उत्पत्ति शीत प्रधान देश कश्मीर में होती है, अन्यत्र ग्रीष्म प्रदेशों में नहीं; जबकि केसर के बीज में केसर की उत्पत्ति रूपी शक्ति सर्वदा विद्यमान रहती है।
२. काल :— कुछ धर्मों की उत्पत्ति = अभिव्यक्ति काल विशेष में ही होती है; जैसे तरबूज ग्रीष्म काल में ही होता है, शीतकाल में नहीं।
३. आकार :— स्थूलमहाभूतों से बनने वाले विभिन्न शरीर, उस जाति विशेष की आकार की सीमा के अनुसार ही उत्पन्न होते हैं, उससे इतर नहीं। यथा चींटी, मृग, हाथी, मनुष्य आदि के शरीर। इसी प्रकार मनुष्यों द्वारा बनाए गए पदार्थों का आकार भी, मनुष्यों द्वारा अपनी आवश्यकताओं के अनुसार ही, मनुष्यों द्वारा निश्चित किया जाता है। अतः किसी भी धर्मी के किसी भी अनागत धर्म की अभिव्यक्ति में आकार का प्रतिबन्ध रहता है, जो कि उसके चेतन निमित्त कारण द्वारा नियत किया जाता है। ऐसा प्रतिबन्ध होते हुए भी धर्मी के स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता।
४. निमित्त :— इन कारणों के अतिरिक्त निमित्त भी एक कारण है; जिसमें साधारण निमित्त कारण भी किसी धर्म की अभिव्यक्ति में कारण होते हैं। यथा मिट्टी के पिण्डाकार होने के पश्चात् भी चाक, डण्डा, अग्नि आदि साधारण निमित्त कारण भी घट की अभिव्यक्ति में कारण होते हैं। इनमें से किसी एक या अधिक के न होने पर या सम्यक् रूप से न होने पर भी उस धर्म की अभिव्यक्ति नहीं हो पाती।
अतः विभिन्न कारणों से अभिव्यक्त न होते हुए भी, धर्मी = पदार्थ के सभी अनभिव्यक्त धर्म, उसके अनागत धर्म होते हैं; और इन सब में धर्मी अनुगत रहता है।
सूत्र भाष्य के अन्त में महर्षि व्यास ने धर्मों से अतिरिक्त एक अवस्थित धर्मी को न मानने वाले क्षणिक वादियों के मत का खण्डन निम्न युक्तियाँ देकर किया है —
१. यदि पुरुष तथा चित्त रूपी धर्मी अवस्थित न हो तो इस पक्ष में कर्मफल भोग का अभाव होगा। क्योंकि अन्य चित्त (पुरुषयुक्त) द्वारा किए हुए कर्म के फल का भोग अन्य चित्त (पुरुषयुक्त) को कैसे प्राप्त हो सकता है। (व्यास भाष्य में विज्ञान शब्द आया है, बृहदारण्यकोपनिषद् ३.७.२२ में प्रयुक्त “विज्ञान” शब्द का अर्थ “आत्मा” किया गया है।)
२. जैसे अन्य पुरुष द्वारा देखें का स्मरण अन्य पुरुष नहीं कर सकता, ऐसे में नित्य आत्मा और अवस्थित चित्त को न मानने से स्मृति का भी अभाव होगा। परन्तु धर्मी की प्रत्यभिज्ञा = पूर्वानुभूत विषयक स्मृति से सिद्ध होता है कि अनुभव करने के काल वाला चित्त और स्मृतिकाल वाला चित्त एक ही है। अतः धर्मों से भिन्न धर्मी सत्तावान् और अवस्थित है।