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Vibhuti Paada / Attainments / 18
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Vibhuti Paada / Attainments / 18

संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्॥१८॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 18

In Hindi:

पदपाठ : संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्॥

हिंदी में अर्थ : (संस्कारसाक्षात्करणात्) संयम द्वारा संस्कारों का साक्षात्कार करने से (पूर्वजातिज्ञानम्) पूर्व जाति = पूर्व जन्म का ज्ञान होता है॥

व्यास भाष्य : द्वये खल्वमी संस्काराः स्मृतिक्लेशहेतवो वासनारूपा विपाकहेतवो धर्माधर्मरूपाः। ते पूर्वभवाभिसंस्कृताः परिणामचेष्टानिरोधशक्तिजीवनधर्मवदपरिदृष्टाश्चित्तधर्माः। तेषु संयमः संस्कारसाक्षात्क्रियायै समर्थः। न च देशकालनिमित्तानुभवैर्विना तेषामस्ति साक्षात्करणम्। तदित्थं संस्कारसाक्षात्करणात्पूर्वजातिज्ञानमुत्पद्यते योगिनः। परत्राप्येवमेव संस्कारसाक्षात्करणात्परजातिसंवेदनम्।

अत्रेदमाख्यानं श्रूयते—भगवतो जैगीषव्यस्य संस्कारसाक्षात्करणात् दशसु महासर्गेषु जन्मपरिणामक्रममनुपश्यतो विवेकजं ज्ञानं प्रादुरभूत्। अथ भगवानावट्यस्तनुधरस्तमुवाच—दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन त्वया नरकतिर्यग्गर्भसम्भवं दुःखं सम्पश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन सुखदुःखयोः किमधिकमुपलब्धमिति। भगवन्तमावट्यं जैगीषव्य उवाच — दशसु महासर्गेषु भव्यत्वादनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन मया नरकतिर्यग्भवं दुःखं सम्पश्यता देवमनुष्येषु पुनः पुनरुत्पद्यमानेन यत्किञ्चिदनुभूतं तत्सर्वं दुःखमेव प्रत्यवैमि। भगवानावट्य उवाच — यदिदमायुष्मतः प्रधानवशित्वमनुत्तमं च सन्तोषसुखं किमिदमपि दुःखपक्षे निक्षिप्तमिति। भगवाञ्जैगीषव्य उवाच — विषयसुखापेक्षयैवेदमनुत्तमं संतोषसुखमुक्तम्। कैवल्यसुखापेक्षया दुःखमेव। बुद्धिसत्त्वस्यायं धर्मस्त्रिगुणः। त्रिगुणश्च प्रत्ययो हेयपक्षे न्यस्त इति। दुःखरूपस्तृष्णातन्तुः। तृष्णादुःखसन्तापापगमात्तु प्रसन्नमबाधं सर्वानुकूलं सुखमिदमुक्तमिति॥

हिंदी में अर्थ : (खलु अमी संस्काराः) ये संस्कार निश्चय से (द्वये) दो प्रकार के होते हैं। प्रथम (स्मृतिक्लेशहेतवः) स्मृति और क्लेश के हेतु (वासनारूपाः) वासनारूप संस्कार; द्वितीय (विपाकहेतवः) कर्मफल = जाति, आयु और भोग के कारण (धर्माधर्मरूपाः) धर्म और अधर्म रूप संस्कार हैं। (ते) वे दोनों प्रकार के संस्कार (पूर्वभवाभिसंस्कृताः) पूर्व जन्मों में सञ्चित (परिणामचेष्टानिरोधशक्तिजीवनधर्मवत्) परिणाम, चेष्टा, निरोध, शक्ति, जीवन और धर्म के समान (अपरिदृष्टाः चित्तधर्माः) चित्त के अपरिदृष्ट = परोक्ष = अप्रत्यक्ष धर्म हैं। (तेषु) इन संस्कारों में (संयमः) किया गया संयम (संस्कारसाक्षात्क्रियायै) संस्कारों का साक्षात्कार करने में (समर्थः) समर्थ है। (च) और (तेषाम्) उन संस्कारों का (साक्षात्करणम्) साक्षात्कार, (देशकालनिमित्तानुभवैः) उनके देश, काल और निमित्त के अनुभव के (विना) बिना (न अस्ति) नहीं होता। (तत् इत्थम्) इस प्रकार से संयम द्वारा (संस्कारसाक्षात्करणात्) संस्कारों के साक्षात्कार से (योगिनः) योगी को (पूर्वजातिज्ञानम्) पूर्व जन्म का ज्ञान (उत्पद्यते) उत्पन्न होता है। (एवम्) इस प्रकार (परत्र अपि एव) से ही ज्ञात, पर = पूर्व जन्म के भी = पूर्व जन्म की अवस्था वाले (संस्कारसाक्षात्करणात्) संस्कारों को संयम द्वारा साक्षात् करने से (परजातिसंवेदनम्) उस जन्म से पर जन्म = पिछले जन्म का भी ज्ञान प्राप्त होता है।

(अत्र) इस विषय में (इदम् आख्यानम्) यह आख्यान (श्रूयते) सुना जाता है — (भगवतः जैगीषव्यस्य) भगवान् महर्षि जैगीषव्य को (संस्कारसाक्षात्करणात्) संस्कारों का साक्षात्कार करने से (दशसु महासर्गेषु) दस महासर्गों = कल्पों में (जन्मपरिणामक्रमम्) जन्मपरिणाम के क्रम को (अनुपश्यतः) देखते हुए = साक्षात् करते हुए (विवेकजम् ज्ञानम्) विवेकज ज्ञान (प्रादुरभूत्) उत्पन्न हुआ। (अथ) इस पश्चात् किसी समय (तनुधरः भगवान् आवट्यः) शरीरधारी भगवान् आवट्य ने (तम् उवाच) उन महर्षि जैगीषव्य से कहा कि — (दशसु महासर्गेषु) दस महासर्गों में (भव्यत्वात्) भव्य होने से (अनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन) न दबाए जाने योग्य बुद्धि सत्त्व वाले, (नरकतिर्यग्गर्भसम्भवम्) नरक = दुःखमय योनियों, और तिर्यक् = पशु, पक्षी आदि योनियों की प्राप्ति में गर्भों में होने वाले (दुःखम् सम्पश्यता) दुःख को अनुभव करने वाले होने से और (देवमनुष्येषु) देव और मनुष्यों योनियों में (पुनः पुनः) बार-बार (उत्पद्यमानेन) उत्पन्न होने वाले, (त्वया) आप द्वारा (सुखदुःखयोः) सुख-दुःख में (किम् अधिकम्) क्या अधिक (उपलब्धम् इति) प्राप्त किया ?

(भगवन्तम् आवट्यम्) भगवान् आवट्य को (जैगीषव्यः उवाच) महर्षि जैगीषव्य ने उत्तर दिया कि (दशसु महासर्गेषु) दस महासर्गों में (भव्यत्वात्) भव्य होने के कारण (अनभिभूतबुद्धिसत्त्वेन) न दबाए जाने योग्य बुद्धि सत्त्व वाले, (नरकतिर्यग्भवम्) नरक = दुःखमय और तिर्यक = पशु-पक्षी आदि योनियों में होने वाले (दुःखम् सम्पश्यता) दुःख का अनुभव करते हुए, (देवमनुष्येषु) देव और मनुष्य योनियों में (पुनः पुनः) बारम्बार (उत्पद्यमानेन) उत्पन्न होते हुए (मया) मेरे द्वारा (यत् किञ्चित्) जो कुछ (अनुभूतम्) अनुभव किया गया, (तत् सर्वम्) उस सब को (दुःखम् एव) दुःख ही (प्रत्यवैमि) मानता हूँ = समझता हूँ।

(भगवान् आवट्यः) भगवान् आवट्य (उवाच) फिर बोले — (यत् इदम्) यह जो (आयुष्मतः) दीर्घ आयु वाले आपका (प्रधानवशित्वम्) प्रधान = प्रकृति वशित्व = स्वामित्व, (च) और (अनुत्तमम् सन्तोषसुखम्) अनुत्तम संतोष सुख है, (किम् इदम् अपि) क्या यह भी (दुःखपक्षे) दुःख की श्रेणी में (निक्षिप्तम् इति) डाल दिया? (भगवान् जैगीषव्यः उवाच) भगवान् जैगीषव्य ने उत्तर दिया कि (विषयसुखापेक्षया एव) विषयों से प्राप्त होने वाले सुखों की अपेक्षा से ही (इदम्) यह (संतोषसुखम्) संतोषसुख (अनुत्तमम्) अनुत्तम (उक्तम्) कहा गया है, परन्तु (कैवल्यसुखापेक्षया) मोक्षसुख की अपेक्षा से (दुःखम् एव) दुःखरूप ही है। क्योंकि (अयम्) यह संतोषसुख (बुद्धिसत्त्वस्य) बुद्धिसत्त्व का (धर्मः) धर्म है, और (त्रिगुणः) त्रिगुणात्मक है। (च) और (त्रिगुणः प्रत्ययः) त्रिगुणात्मक ज्ञान (हेयपक्षे न्यस्तः इति) हेय = त्याज्य पक्ष में रक्खा गया है। (तृष्णातन्तुः) तृष्णा तन्तु = तृष्णाओं का जाल (दुःखरूपः) दुःखरूप ही है। (तृष्णादुःखसन्तापापगमात्) संतोष होने पर तृष्णा रूपी दुःख-सन्ताप के दूर होने पर (इदम्) यह संतोष सुख (प्रसन्नम्) निर्मल, (अबाधम्) बाधा = पीड़ा रहित, (सर्वानुकूलम्) सभी के अनुकूल = सर्वप्रिय (सुखम्) सुख (उक्तम् इति) कहा गया है॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी द्वारा अपने संस्कारों में संयम करने से उसे अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। महर्षि व्यास कहते हैं कि संस्कार दो प्रकार के होते हैं — (१) स्मृति और अविद्यादि क्लेशों के कारण भूत वासनारूप संस्कार अर्थात् स्मृति और क्लेशों को उत्पन्न करने वाले संस्कार; और (२) कर्मफल = जाति, आयु और भोग रूप फलों को प्राप्त कराने वाले धर्म-अधर्म रूप संस्कार।

योगसूत्र ३.१५ की व्याख्या में महर्षि व्यास ने चित्त के अपरिदृष्ट धर्मों में संस्कारों को भी कहा है। इसी तथ्य को यहाँ भी स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ये दोनो प्रकार के संस्कार, पूर्व जन्मों में सञ्चित हुए, चित्त के अपरिदृष्ट धर्म हैं। “जो क्रियमाण = वर्त्तमान में किए जाने वाले कर्मों, का संस्कार ज्ञान में जमा होता है, उसे सञ्चित संस्कार कहते हैं।” (आर्योद्देश्यरत्नमाला, ४९, ५०)। और चित्त में यही सञ्चित संस्कार आत्मा के साथ जन्म-जन्मान्तर में रहते हैं।

इन संस्कारों में संयम करने पर योगी को इन संस्कारों का साक्षात्कार, उन संस्कारों के देश, काल और निमित्त के अनुभव के साथ होता है। अर्थात् ये संस्कार किस देश, किस काल और किस निमित्त = कारण से बने इसका भी ज्ञान योगी को हो जाता है। इस प्रकार से साक्षात् हुए संस्कारों से योगी अपने पूर्व जन्मों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। इन सञ्चित संस्कारों के साक्षात्कार से, पूर्व जन्मों का ज्ञान, संयम करने वाले योगी को ही होता है; अन्य साधारण मनुष्यों को नहीं।

इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास लिखते हैं — “परत्राप्येवमेव संस्कारसाक्षात्करणात् परजातिसंवेदनम्।” इस वाक्य का अनुवाद करते हुए सभी भाष्यकारों ने यह कहा है कि “दूसरे पुरुष के संस्कारों का साक्षात्कार करने से उसके पूर्वजन्म का ज्ञान भी योगी को हो जाता है।” अर्थात् किसी दूसरे पुरुष के चित्तस्थ संस्कारों में संयम करके, योगी उन संस्कारों का भी देश, काल और निमित्त के अनुभव के साथ साक्षात्कार करके, उस पुरुष के भी पूर्व जन्मों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यह विषय विचारणीय है। भाष्यकारों द्वारा किया गया ऐसा अर्थ / व्याख्यान निम्न कारणों से सम्भव नहीं हो सकता —

१. योगी के संयम का विषय बाह्य देश या बाह्य विषय नहीं होता। दूसरे किसी पुरुष के चित्तस्थ संस्कार योगी के लिए अन्य बाह्य विषयों के समान ही बाह्य विषय ही हैं। इस प्रकार दूसरे पुरुष के चित्तस्थ संस्कार बाह्य विषय होने से इनमें धारणा, ध्यान और समाधि का होना सम्भव नहीं होता।

२. योगसूत्र ३.२० में महर्षि पतञ्जलि कहते हैं — “न च तत्सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्।” अर्थात् दूसरे के चित्त का ज्ञान आलम्बन सहित नहीं होता, क्योंकि परचित्त का जो आलम्बन है, वह योगी के संयम का विषय नहीं बनता। जब योगी किसी दूसरे पुरुष के चित्तस्थ आलम्बनों, जो कि वर्त्तमान काल में ही होते हैं, को संयम का विषय नहीं बना सकता, तो ऐसे में वह योगी किसी अन्य पुरुष के, पूर्व जन्म के आलम्बनों से बने हुए सञ्चित संस्कारों को संयम का विषय कैसे बना लेगा ? महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कह रहे है कि जब संस्कारों का साक्षात् देश, काल और निमित्त के अनुभव के साथ होता है, तभी पूर्व जन्मों का ज्ञान सम्भव होता है। अतः योगसूत्र ३.२० के सिद्धान्तानुसार किसी भी दूसरे पुरुष के चित्तस्थ संस्कारों का उनके आलम्बनों में, वह भी देश, काल और निमित्त के साथ, संयम का होना सम्भव न होने से, योगी किसी दूसरे पुरुष के संस्कारों का न तो साक्षात्कार कर सकता, और न ही उनके पूर्व जन्मों का जान सकता।

३. योगसूत्र ३.१९ में जो परचित्तज्ञान रूपी सिद्धि है वह भी प्रत्यय अर्थात् दूसरे पुरुष की चित्तवृत्ति में संयम करने से होती है, और वृत्तियाँ चित्त के परिदृष्ट धर्म हैं। दूसरी ओर संस्कार चित्त के अपरिदृष्ट धर्म हैं, और दूसरे चित्त के अपरिदृष्ट धर्मों में संयम का विधान योगशास्त्र में कहीं सिद्ध नहीं होता। अतः भाष्यकारों द्वारा इस प्रकार का अर्थ सिद्धान्त विरुद्ध है।

इस वाक्य का वास्तविक अभिप्राय हमने व्यासभाष्य के अनुवाद में कहा है। अर्थात् योगी उस पर = पूर्व जन्म का ज्ञान होने पर, उस जन्म के भी संस्कारों को संयम से साक्षात्कार करता हुआ, उससे भी पूर्व जन्म को जान लेता है। और यह क्रम पीछे लम्बे काल तक चला जाता है, जैसे कि महर्षि जैगीषव्य ने दस महासर्गों में हुए जन्मों का वृतान्त जान लिया। योगी द्वारा समस्त संस्कारों को एक साथ साक्षात् करने से सभी पूर्व जन्मों का युगपत् = एक साथ ज्ञान सम्भव नहीं हो सकता अतः क्रम से पूर्व-पूर्व जन्मों का ज्ञान होना ही युक्तियुक्त है, और इस बात का भोजवृत्ति में इस प्रकार से कहा है — “क्रमेण साक्षात्कृतेषूद्बुद्धेषु संस्कारेषु पूर्वजन्मान्तरानुभूतानपि जात्यादीन् प्रत्यक्षेण पश्यति॥”

शंका — महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा सत्यार्थप्रकाश के नवम समुल्लास में दिए गए प्रश्नोत्तर के अनुसार जीव के अल्पज्ञ होने से उसको पूर्वजन्म का ज्ञान नहीं होता। अतः ऐसे में पूर्वजन्म आदि का ज्ञान किस प्रकार से सम्भव माना जाए ?

समाधान — सत्यार्थ प्रकाश के नवम समुल्लास में महर्षि दयानन्द ने एक प्रश्न के उत्तर में यह कहा है कि जब इसी जन्म की ही सभी बातों का स्मरण नहीं रहता, तो पूर्व जन्म की बातों का स्मरण नहीं हो सकता। इस प्रकरण में यह स्पष्ट कहा है कि कोई पूर्व या पीछे जन्म के वर्त्तमान को जानना चाहे, तो भी नहीं जान सकता। देखो सत्यार्थप्रकाश के इस प्रकरण में विषय यह है कि “अनेक जन्मों के होने पर भी पूर्व जन्मों की बातों का स्मरण क्यों नहीं रहता और ऐसा स्मरण न रहने से वर्त्तमान में ईश्वर की व्यवस्था में मिलने वाले फल का सम्बन्ध पूर्वजन्मों में कृत कर्मों से कैसे हो और उस पुरुष का कैसे सुधार हो ?” इन प्रश्नों का उत्तर इस प्रकरण में महर्षि दयानन्द ने दिया है। यह पूरा प्रकरण जन सामान्य को लक्ष्य करके कहा है। यहाँ योग या योग की सिद्धियों का प्रकरण नहीं है। अतः इस सामान्य-विषयक व्याख्यान / सिद्धान्त के आधार पर, अन्य ऋषियों द्वारा प्रतिपादित विशिष्ट-सिद्धान्त (योगी की सिद्धि) से विपरीत मान्यता को कहना उचित नहीं जानना चाहिए।

महर्षि दयानन्द ने पूर्व जन्मों के ज्ञान का निषेध व्यक्ति की स्मरण शक्ति के आधार पर किया है। चित्त के संस्कारों = अपरिदृष्ट धर्मों का स्मरण न रहना = न होना सिद्धान्तानुकूल है, और इसीलिये जन-साधारण को पूर्व-जन्मों की स्मृति नहीं होती। दूसरी ओर संयम द्वारा चित्त के अपरिदृष्ट धर्मों के ज्ञान को प्राप्त करना योगी के लिये सम्भव होता है और उसी का प्रतिपादन महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र में कर रहे हैं। महर्षि व्यास ने इस विभूति की प्रामाणिकता को सिद्ध करने हेतु, महर्षि जैगीषव्य और महर्षि आवट्य की वार्त्ता को भी भाष्य में दिया है। इस विषय में महर्षि कणाद ने भी स्मृति ज्ञान में संस्कारों को भी कारण कहा है —

आत्ममनसोः संयोगविशेषात्संस्काराच्च स्मृतिः॥ वैशेषिक० ९.२.६॥

अर्थात् आत्मा और मन के संयोग विशेष और संस्कारों से स्मृतिज्ञान होता है। अतः व्यक्ति को संस्कारों के उद्बुद्ध होने से पूर्व अनुभूत पदार्थ = विषय का स्मरण हो जाता है, यह लोक में सामान्यतः देखा भी जाता है। इस प्रकार की स्मृति में संस्कार ही निमित्त कारण रहते हैं।

अतः विभिन्न प्रकरणों में कही जाने वाली बातों के घालमेल से कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। महर्षि दयानन्द जो व्यासभाष्य को पूर्णतया प्रमाणिक मानते हैं, उनके द्वारा किसी अन्य प्रकरण में दिए गए सन्दर्भ को, पूर्व के पतञ्जलि और व्यास जैसे आप्त ऋषियों द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों के ही विरुद्ध, तर्क रूप में प्रस्तुत करके उनकी मान्यताओं का खण्डन उचित नहीं कहा जा सकता।

अतः महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास द्वारा प्रतिपादित उपरोक्त विभूति सर्वथा शास्त्रानुकूल और संस्कारों में संयम से योगियों को प्राप्त होने वाली है।