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Vibhuti Paada / Attainments / 17
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Vibhuti Paada / Attainments / 17

शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात्संकरस्तत्प्रविभागसंयमात्सर्वभूतरुतज्ञानम्॥१७॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 17

In Hindi:

पदपाठ : शब्दार्थप्रत्ययानाम् इतरेतराध्यासात् संकरः तत् प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्॥

हिंदी में अर्थ : (शब्दार्थप्रत्ययानाम्) शब्द, अर्थ और ज्ञान के (इतरेतराध्यासात्) परस्पर अध्यास = एक के धर्म दूसरे में देखने से (संकरः) उनका सम्मिश्रण होता है; (जबकि ये तीनों सर्वथा भिन्न हैं ) (तत् प्रविभागसंयमात्) शब्द, अर्थ और ज्ञान के प्रविभाग = भेद में संयम करने से (सर्वभूतरुतज्ञानम्) समस्त प्रजा = मनुष्यादि प्राणियों के शब्दों का ज्ञान हो जाता है॥

व्यास भाष्य : तत्र वाग्वर्णेष्वेवार्थवती। श्रोत्रं च ध्वनिपरिणाममात्रविषयम्। पदं पुनर्नादानुसंहारबुद्धिनिर्ग्राह्यमिति। वर्णाः एकसमयासम्भवित्वात्परस्परनिरनुग्रहात्मानः। ते पदमसंस्पृश्यानुपस्थाप्याविर्भूतास्तिरोभूताश्चेति प्रत्येकमपदस्वरूपा उच्यन्ते।

वर्णः पुनरेकैकः पदात्मा सर्वाभिधानशक्तिप्रचितः सहकारिवर्णान्तरप्रतियोगित्वाद्वैश्वरूप्यमिवापन्नः पूर्वश्चोत्तरेणोत्तरश्च पूर्वेण विशेषेऽवस्थापित इति। एवं बहवो वर्णाः क्रमानुरोधिनोऽर्थसंकेतेनावच्छिन्ना इयन्त एते सर्वाभिधानशक्तिपरिवृत्ता गकारौकारविसर्जनीयाः सास्नादिमन्तमर्थं द्योतयन्तीति।

तदेतेषामर्थसंकेतेनावच्छिन्नानामुपसंहृतध्वनिक्रमाणां य एको बुद्धिनिर्भासस्तत्पदं वाचकं वाच्यस्य संकेत्यते। तदेकं पदमेकबुद्धिविषयमेकप्रयत्नाक्षिप्तमभागमक्रममवर्णं बौद्धमन्त्यवर्णप्रत्ययव्यापारोपस्थापितं परत्र प्रतिपिपादयिषया वर्णैरेवाभिधीयमानैः श्रूयमाणैश्च श्रोतृभिरनादिवाग्व्यवहारवासनानुविद्धया लोकबुद्ध्या सिद्धवत्सम्प्रतिपत्त्या प्रतीयते। तस्य संकेतबुद्धितः प्रविभाग एतावतामेवंजातीयकोऽनुसंहार एकस्यार्थस्य वाचक इति।

संकेतस्तु पदपदार्थयोरितरेतराध्यासरूपः स्मृत्यात्मको योऽयं शब्दः सोऽयमर्थो योऽयमर्थः सोऽयं शब्द इति। एवमितरेतराध्यासरूपः संकेतो भवतीति। एवमेते शब्दार्थप्रत्यया इतरेतराध्यासात्संकीर्णा गौरिति शब्दो गौरित्यर्थो गौरिति ज्ञानम्। य एषां प्रविभागज्ञः स सर्ववित्।

सर्वपदेषु चास्ति वाक्यशक्तिः। वृक्ष इत्युक्तेऽस्तीति गम्यते। न सत्तां पदार्थो व्यभिचरतीति। तथा न ह्यसाधना क्रियास्तीति। तथा च पचतीत्युक्ते सर्वकारकाणामाक्षेपः। नियमार्थोऽनुवादः कर्त्तृकरणकर्मणां चैत्राग्नितण्डुलानामिति।

दृष्टं च वाक्यार्थे पदरचनं श्रोत्रियश्छन्दोऽधीते जीवति प्राणान्धारयति। तत्र वाक्ये पदार्थाभिव्यक्तिस्ततः पदं प्रविभज्य व्याकरणीयं क्रियावाचकं वा कारकवाचकं वा। अन्यथा भवत्यश्वोऽजापय इत्येवमादिषु नामाख्यातसारूप्यादनिर्ज्ञातं कथं क्रियायां कारके वा व्याक्रियेतेति।

तेषां शब्दार्थप्रत्ययानां प्रविभागः। तद्यथा श्वेतते प्रासाद इति क्रियार्थः। श्वेतः प्रासाद इति कारकार्थः शब्दः। क्रियाकारकात्मा तदर्थः प्रत्ययश्च। कस्मात्? सोऽयमित्यभिसम्बन्धादेकाकार एव प्रत्ययः संकेत इति। यस्तु श्वेतोऽर्थः स शब्दप्रत्यययोरालम्बनीभूतः। स हि स्वाभिरवस्थाभिर्विक्रियमाणो न शब्दसहगतो न बुद्धिसहगतः।

एवं शब्द एवं प्रत्ययो नेतरेतरसहगत इत्यन्यथा शब्दोऽन्यथाऽर्थोऽन्यथा प्रत्यय इति विभागः। एवं तत्प्रविभागसंयमाद्योगिनः सर्वभूतरुतज्ञानं सम्पद्यत इति॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उनमें (वाक्) वाणी (वर्णेषु एव) वर्णों का उच्चारण करने में ही (अर्थवती) अर्थवान् = प्रयोजन वाली होती है। (च) और (श्रोत्रम्) श्रोत्रेन्द्रिय (ध्वनिपरिणाममात्रविषयम्) वाणी द्वारा उच्चारित ध्वनि के परिणाममात्र को विषय करने वाली है (= अर्थात् वह ध्वनि परिणाम अर्थबोधक नहीं होता।)। (पदम् पुनः) और जो पद है वह (नादानुसंहारबुद्धिनिर्ग्राह्यम् इति) नाद रूप वर्णात्मक ध्वनि का = वर्णों का एकत्व ग्रहण करने वाली बुद्धि के द्वारा ग्रहण करने योग्य होता है। (वर्णाः) अनेक वर्णों का (एकसमयासम्भवित्वात्) एक समय में उच्चारण सम्भव न होने से, वे (परस्परनिरनुग्रहात्मानः) परस्पर असम्बद्ध स्वभाव वाले हैं; इसलिए (ते) वे (पदम्) पद भाव को (असंस्पृश्य) स्पृश न करके (अनुपस्थाप्य) पद को उपस्थित न करके (आविर्भूतास्तिरोभूताश्च) आविर्भूत = उत्पन्न और तिरोहित = नष्ट हो जाता है। (इति) इसलिए (प्रत्येकम्) प्रत्येक वर्ण (अपदस्वरूपाः) अपदस्वरूप (उच्यन्ते) कहा जाता है।

परन्तु दूसरी दृष्टि से (वर्णः पुनः एकैकः) फिर एक-एक वर्ण (सहकारिवर्णान्तरप्रतियोगित्वात्) दूसरे सहयोगी वर्णों के साथ सम्बन्धित होने के कारण (पदात्मा) पदस्वरूप, (सर्वाभिधानशक्तिप्रचितः) सब अधिष्ठान = अर्थ बोध कराने की शक्ति से युक्त, (वैश्वरूप्यमिवापन्नः) विविधरूपता = नाना पदरूपता को प्राप्त होता हुआ, (च) और (पूर्वः) पूर्व वर्ण (उत्तरेण) उत्तर = परवर्ती वर्ण के साथ (च) और (उत्तरः) उत्तर = बाद का वर्ण (पूर्वेण) पूर्व के वर्ण के साथ (विशेषे अवस्थापितः इति) विशेष रूप से अवस्थित होता है। (एवम्) इस प्रकार (बहवः वर्णाः) बहुत वर्ण (क्रमानुरोधिनः) क्रम की अपेक्षा रखते हुए (अर्थसंकेतेनावच्छिन्नाः) अर्थ संकेत से युक्त (इयन्ते) जाने जाते हैं। (एते) ये वर्ण, (सर्वाभिधानशक्तिपरिवृत्ताः) समस्त अर्थ बोध कराने की शक्ति से युक्त, (गकारौकारविसर्जनीयाः) गकार, औकार और विसर्ग रूपी तीनों वर्ण मिलकर (सास्नादिमन्तम् अर्थम्) सास्नादि युक्त गौ नामक पशु रूप अर्थ को (द्योतयन्ति इति) प्रकाशित करते हैं।

(तत्) वह (अर्थसंकेतेनावच्छिन्नानाम्) अर्थ संकेत से युक्त और (उपसंहृतध्वनिक्रमाणाम्) ध्वनिक्रम से रहित (एतेषाम्) इन वर्णों का (यः) जो (एकः बुद्धिनिर्भासः) बुद्धि में एक अभिव्यक्ति होती है (तत्) वह (वाच्यस्य) वाच्य रूप अर्थ का (वाचकम्) वाचक (पदम्) पद नाम से (संकेत्यते) संकेतित किया जाता है।

(तत् पदम्) वह पद (एकम्) एक होता है, क्योंकि (एकबुद्धिविषयम्) एक बुद्धि का विषय होता है, (एकप्रयत्नाक्षिप्तम्) एक ध्वनिरूप प्रयत्न से सम्पादित होता है, (अभागम्) भाग = अंश से रहित अर्थात् अखण्ड और (अक्रमम्) क्रमरहित = एक ही समय में उत्पद्यमान होता है, (अवर्णम्) वर्णों से भिन्न (बौद्धम्) बुद्धि निष्ठ होता है, (अन्त्यवर्णप्रत्ययव्यापारोपस्थापितम्) अन्तिम वर्ण के ज्ञानरूप व्यापार से अभिव्यक्त होता है, (परत्र प्रतिपिपादयिषया) दूसरों को बताने की इच्छा से (अभिधीयमानैः) वक्ता द्वारा उच्चारित किया जाने वाले (च) और (श्रोतृभिः श्रूयमाणैः) श्रोताओं द्वारा सुने जाने वाले (वर्णैः) वर्णों के द्वारा (अनादिवाग्व्यवहारवासनानुविद्धया) अनादि कालीन वाणी के व्यवहार की वासना से अनुविद्ध = युक्त (लोकबुद्ध्या) लोकबुद्धि के द्वारा (सिद्धवत्) नित्य के समान, (सम्प्रतिपत्त्या) सदृश व्यवहार की परम्परा के कारण (प्रतीयते) प्रतीत = अनुभूत होता है।

(तस्य) उस पद का (संकेतबुद्धितः) संकेत बुद्धि = संकेत ज्ञान के द्वारा (प्रविभागः) प्रविभाग = अर्थ के विभाजन का नियमन होता है; जैसे (एतावताम्) इतने वर्णों का (एवम् जातीयकः अनुसंहारः) इस प्रकार का मिलन = एकीभावन (एकस्य अर्थस्य) एक अर्थ का (वाचकः इति) वाचक है। (संकेतः तु) संकेत तो (पदपदार्थयोः) पद और उस पद के अर्थ का (इतरेतराध्यासरूपः) परस्पर अध्यास अर्थात् आरोपित अभेद रूप तथा (स्मृत्यात्मकः) स्मृति रूप होता है, जैसे (यः अयम् शब्दः) जो यह शब्द है, (सः अयम् अर्थः) वही यह अर्थ है; और (यः अयम् अर्थः) जो यह अर्थ है, (सः अयम् शब्दः इति) वही यह शब्द है। (एवम्) इस प्रकार (इतरेतराध्यासरूपः) पारस्परिक अध्यारोप वाले शब्द और अर्थ का (संकेतः) संकेत (भवति इति) होता है। (एवम्) इस प्रकार से (एते शब्दार्थप्रत्ययाः) ये शब्द, अर्थ और ज्ञान (इतरेतराध्यासात्) परस्पर के अध्यास = आरोप के कारण (संकीर्णाः) मिश्रण को प्राप्त होते हैं, जैसे (गौः इति शब्दः) “गौ” यह शब्द है, (गौः इति अर्थः) “गौ” यह अर्थ है, (गौः इति ज्ञानम्) “गौ” यही ज्ञान है, (यहाँ शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों का आकार एक है परन्तु तीनों पदार्थ अत्यन्त भिन्न हैं।) (यः) जो पुरुष (एषाम्) इन शब्द, अर्थ और ज्ञान के (प्रविभागज्ञः) प्रविभाग = भिन्नता रूप व्यवस्था को जानने वाला होता है, (सः) वह (सर्ववित्) सर्ववित् = समस्त भूतों = प्रजा के शब्दों को जानने वाला हो जाता है।

(च) और (सर्वपदेषु) सभी पदों में (वाक्यशक्तिः) वाक्य-अर्थ का बोध कराने की शक्ति (अस्ति) रहती है। (वृक्षः इति उक्तेः) ‘वृक्ष’ ऐसा कहने पर (अस्ति इति गम्यते) ‘है’ का ज्ञान हो जाता है अर्थात् अस्ति पद का अध्याहार किया जाता है। क्योंकि (पदार्थः) पदार्थ (सत्ताम् न व्यभिचरति इति) अपनी सत्ता का उल्लघंन नहीं करता। (तथा) वैसे ही (क्रिया) क्रिया भी (असाधना हि न अस्ति इति) साधन = कारक बिना नहीं होती। (तथा च) और इसी प्रकार (पचति इति उक्ते) पचति = ‘पकाता है’ ऐसा कहने पर (सर्वकारकाणाम्) सभी कारकों का (आक्षेपः) आक्षेप = अध्याहार होता है। (कर्त्तृकरणकर्मणाम् चैत्राग्नितण्डुलानाम्) चैत्र नामक कर्ता, अग्नि रूप करण और तुण्डल = चावल रूप कर्म का कथन तो (नियमार्थः) अर्थ का नियम करने के लिए (अनुवादः इति) अनुवाद मात्र है। (च) और (वाक्यार्थे) वाक्य के अर्थ में (पदरचनम्) एक पद की रचना भी (दृष्टम्) देखी जाती है। जैसे — (श्रोत्रियः छन्दोऽधीते) “छन्द = वेद का अध्ययन करता है” इस वाक्य के लिए “श्रोत्रिय” पद की; और (प्राणान्धारयति) “प्राणों को धारण करता है” इस वाक्य के (जीवति) “जीवति” पद की रचना देखी जाती है।

(तत्र) वहाँ, पद और वाक्य के विषय में, (वाक्ये) वाक्य में ही (पदार्थाभिव्यक्तिः) पद के अर्थ की अभिव्यक्ति होती है, (अकेले पद में उस अर्थ का बोध नहीं हो पाता); (ततः) इस कारण से (पदम्) वाक्यगत पद का (प्रविभज्य) विभाग करके (व्याकरणीयम्) व्याख्यान करना चाहिए कि (क्रियावाचकम् वा कारकवाचकम् वा) यह पद क्रिया वाचक है अथवा कारक वाचक है। (अन्यथा) नहीं तो (भवत्यश्वोऽजापयः इति एवम् आदिषु) ‘भवति’, ‘अश्वः’, ‘अजापयः’ इत्यादि पदों में (नामाख्यातसारूप्यात्) नाम = संज्ञा और आख्यात = क्रिया का समान रूप होने के कारण (अनिर्ज्ञातम्) ज्ञात नहीं होता कि (क्रियायाम् कारके वा) इन पदों को क्रिया में अथवा कारक में (कथम् व्याक्रियेत इति) किस प्रकार व्याख्यान किया जाए।

(तेषाम्) उन (शब्दार्थप्रत्ययानाम्) शब्द, अर्थ और प्रत्यय = ज्ञान का (प्रविभागः) प्रविभाग होता है। (तत् यथा) वह जैसे (श्वेतते प्रासादः) ‘मकान सफेद हो रहा है’ (इति) यहाँ ‘श्वेत’ शब्द (क्रियार्थः) क्रिया का वाचक है; और (श्वेतः प्रासादः) ‘सफेद मकान’ (इति) यहाँ ‘श्वेत’ (कारकार्थः शब्दः) कारक का वाचक शब्द है। (तदर्थः) इन दोनों ‘श्वेतते’ और ‘श्वेतः’ पदों का क्रमशः (क्रियाकारकात्मा) क्रिया रूप और कारक रूप अर्थ है। (प्रत्ययः) इन दोनों अर्थों का ज्ञान भी (च) क्रिया रूप और कारक रूप होता है। (कस्मात्) इन शब्द, अर्थ और ज्ञान में भेद कैसे है ? (सः अयम्) वह यही है (इति) इस प्रकार का (अभिसम्बन्धात्) अभेद सम्बन्ध होने से (एकाकार एव) एकाकार ही (प्रत्ययः संकेतः इति) संकेतकृत ज्ञान = ज्ञानात्मक संकेत होता है।

(यः तु) जो यह (श्वेतः अर्थः) ‘श्वेत’ अर्थ है (सः) वह (शब्दप्रत्यययोः) ‘श्वेत’ शब्द और ‘श्वेत’ ज्ञान का (आलम्बनीभूतः) आलम्बन बना है। (हि) क्योंकि (सः) वह अर्थ ही (स्वाभिः अवस्थाभिः) अपनी अवस्थाओं द्वारा, (विक्रियमाणः) परिणाम = विकार को प्राप्त होता हुआ, (न शब्दसहगतः) न शब्द के साथ संकीर्ण होता है, (न बुद्धिसहगतः) न ज्ञान के साथ संकीर्ण होता है। (एवम्) इस प्रकार (शब्दः) शब्द, और (एवम्) इस प्रकार (प्रत्ययः) प्रत्यय = ज्ञान (न इतरेतरसहगतः) एक दूसरे के साथ संकीर्ण नहीं होते।

(इति) इसलिए (अन्यथा शब्दः) शब्द अन्य प्रकार का है, (अन्यथा अर्थः) अर्थ अन्य प्रकार का है, और (अन्यथा प्रत्ययः) ज्ञान अन्य प्रकार का है, (इति विभागः) इस प्रकार का विभाग है। (एवम्) इस प्रकार (तत्प्रविभागसंयमात्) शब्द, अर्थ और ज्ञान तीनों के विभाग में संयम करने से (योगिनः) योगी को (सर्वभूतरुतज्ञानम्) सभी भूतों = समस्त मनुष्यादि रूप प्रजा के शब्दों का ज्ञान (सम्पद्यते इति) प्राप्त होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी जब शब्द, अर्थ और ज्ञान के विभाग में संयम करता है, तो वह समस्त भूतों = प्रजा = मनुष्यादि प्राणियों की वाणी = शब्दों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है।

किसी भी पदार्थ का वाचक शब्द, उस शब्द का लक्षित अर्थ और ज्ञान तीनों भिन्न-भिन्न होते हैं। जैसे कि —

“गौ” शब्द से तात्पर्य — किसी व्यक्ति द्वारा कण्ठ, तालु आदि के संयोग से उदात्तादि स्वर युक्त उच्चारण किया जाने वाला और श्रोत्रन्द्रिय से ग्रहण होने वाला ध्वनिरूप है;

“गौ” अर्थ — सास्नादि लक्षण युक्त शरीर = पिण्ड वाला पशु विशेष उस “गौ” शब्द का अर्थ है;

“गौ” ज्ञान — बुद्धि में गौ पदार्थाकारकारित वृत्ति ज्ञान कहाती है।

ये तीनों ही भिन्न-भिन्न हैं, और इन तीनों के धर्म भी भिन्न है। परन्तु व्यवहार में तीनों को परस्पर एक दूसरे में आरोपण से इन तीनों का मिश्रित रूप ही ज्ञात होता है। जब इन तीनों के वास्तविक विभाग को जानकर योगी इन तीनों के विभाग में संयम करता है, तो वह समस्त मनुष्यादि प्राणियों की वाणी = शब्द को जान लेता है।

महर्षि व्यास ने इस सूत्र की व्याख्या में स्पष्ट किया है कि मनुष्य द्वारा उच्चारित प्रत्येक वर्ण, व्यक्तिगत रूप से, पद स्वरूप को प्राप्त नहीं होता ओर न ही किसी अर्थ का बोध कराता। परन्तु यही वर्ण दूसरे पूर्व और उत्तर के वर्णों के साथ मिलकर पद बनते हैं, और अर्थ बोध कराने की सामर्थ्य से युक्त होते हैं। जैसे ग, औ और : (विसर्ग) तीनों वर्ण पृथक्-पृथक् किसी अर्थ को न जनाते हुए भी मिलकर “गौः” रूप से गाय रूप पशु का ज्ञान कराते हैं। यह पद बुद्धि = चित्त में एक विषय का ज्ञान कराता है। उस पद की विशेषताओं को निम्न प्रकार से कहा गया है —

१. यह एक बुद्धि का विषय होता = एक ज्ञान का बोध कराता;

२. एक ध्वनिरूप प्रयत्न से सम्पादित होता;

३. अखण्ड और क्रमरहित = एक समय में उपलब्ध होता;

४. पद वर्णों से भिन्न बुद्धिनिष्ठ = बुद्धिग्राह्य होता;

५. अपने अन्तिम वर्ण के ज्ञान रूप व्यापार से अभिव्यक्त होता;

६. वक्ता द्वारा, दूसरों को बताने की इच्छा से, उच्चारित किया जाता और श्रोताओं द्वारा सुना जाने वाला वर्णों से, अनादि काल से व्यवहार रूपी संस्कारों से युक्त, लोगों को नित्य के समान प्रतीत होता है।

सभी पदों में वाक्य अर्थ का बोध कराने की शक्ति है जैसे कि ‘वृक्ष’ कहने पर “है” का ज्ञान होता है, क्योंकि कोई भी पदार्थ अपनी सत्ता से रहित नहीं होता। इसी प्रकार कोई भी क्रिया अपने कारक से रहित नहीं होती, जैसे “पकाता है” कहने पर “चैत्र” नामक कर्ता, जिसके द्वारा पकाया जाता; “अग्नि” रूपी करण, जिस पर पकाया जाता है; और “चावल” रूप कर्म, जिसको पकाया जाता है; का अध्याहार भी होता है। इसी प्रकार वाक्य के अर्थ में एक पद की रचना भी होती है, जिसके उदाहरण “श्रोत्रिय” और “जीवति” पद से दिए गए हैं।

किसी वाक्य में ही पद के अर्थ की अभिव्यक्ति होती है, इसलिए वाक्यगत पद का विभाग करके, अर्थात् “यह कारक है” अथवा “क्रिया है ?”, करना चाहिए, अन्यथा वाक्य का असम्बद्ध अर्थ हो जाता है। इसमें “भवति, अश्वः और अजापयः” जो कारक और क्रिया दोनों रूपों में प्रयुक्त होते हैं, का उदाहरण दिया गया है। जैसे कि (१) “घटो भवति” में भवति शब्द क्रियावाचक है, और “भवति! भिक्षां देहि” में भवति शब्द सम्बोधन रूप में संज्ञावाचक है; (२) “त्वम् अश्वः” = तूने श्वास लिया, यहाँ अश्वः शब्द क्रियावाचक है, और “अश्वः धावति” = घोड़ा दौड़ता है, यहाँ अश्वः शब्द संज्ञावाचक है; और (३) “त्वम् अजापयः शत्रुन्” = तूने शत्रुओं को हरवाया, यहाँ अजापयः शब्द क्रियावाचक है, और “त्वम् अजापयः पिब” = तू बकरी का दूध पी, यहाँ अजापयः शब्द कारक संज्ञावाचक है। अतः यदि कारक और क्रिया का समुचित विभाग न किया जाए, तो वाक्य से यथार्थ बोध = ज्ञान नहीं होगा।

इसी प्रकार महर्षि व्यास आगे “श्वेतते प्रासादः” में ‘श्वेतः’ पद से क्रिया का ज्ञान और “श्वेतः प्रासादः” में ‘श्वेतः’ पद से कारक का ज्ञान होने का उदाहरण देकर कहते हैं कि इन दोनों अर्थों का ज्ञान भी क्रिया रूप और कारक रूप में होता है। जो यह ‘अर्थ’ है, वह न तो ‘शब्द’ के साथ संकीर्ण = मिश्रित होता है, और न ही ‘ज्ञान’ के संकीर्ण = मिश्रित होता है। इसी प्रकार ‘शब्द’ और ‘ज्ञान’ भी अन्य दोनों के साथ संकीर्ण = मिश्रित नहीं होते; क्योंकि ‘शब्द’ अन्य प्रकार का है, इसके रूप और धर्म भिन्न हैं; ‘अर्थ’ भी अन्य प्रकार का है, इसके भी रूप और धर्म भिन्न हैं; तथा ‘ज्ञान’ भी अन्य प्रकार का है, इसके भी रूप और धर्म भिन्न-भिन्न हैं। इस प्रकार इनके विभाग को जानकर इन तीनों के विभाग में संयम करने से योगी को समस्त प्रजा = मनुष्यादि प्राणियों के शब्दों को ज्ञान होता है।

इस सूत्र के आधार पर आधुनिक भाष्यकारों ने योगी को सर्वभूत से सभी प्राणियों = मनुष्य, पशु, पक्षी आदि की वाणी = शब्दों का ज्ञान होना कहा है। परन्तु व्यासभाष्य में इस प्रकार का कोई संकेत भी नहीं है। जिस प्रकार से महर्षि व्यास ने वर्णों से पद और पद के अर्थ का प्रकार कहा है, वैसा मनुष्यों की भाषा में ही घटता है, पशु-पक्षी आदि प्राणियों द्वारा उच्चारित ध्वनियों में नहीं। जैसे महर्षि पतञ्जलि ने सूत्र में “सर्वभूतरुतज्ञानम्” कहा है वैसे ही महर्षि व्यास ने व्याख्या में सर्वभूतरुतज्ञानम् कहा है। महर्षि व्यास के बाद भोजवृत्ति में “मृगपशुपक्षिसरीसृपादि” का स्पष्ट उल्लेख है, जो इस प्रकार की सम्भावना को बल देता है। अतः व्यास भाष्य में ऐसा कोई वर्णन न होने से वेद के प्रमाणानुसार सर्वभूत से मनुष्यादि प्राणियों को ग्रहण करना चाहिए, और उन्हीं के शब्दों का ज्ञान योगी को होता है। भोज के बाद के भाष्यकारों ने भोजवृत्ति के आधार पर ही अपने भाष्यों में पशुु-पक्षी आदि के शब्दों का ज्ञान इस सिद्धि में जोड़ दिया है।

शंका — वेद के आधार पर “भूत” शब्द से केवल मनुष्यादि का ग्रहण करने में क्या प्रमाण है ?

समाधान — देखो, यजुर्वेद ५.१२ में जहाँ वाणी का वर्णन है, उस मन्त्र में “भूतेभ्यः” का अर्थ शतपथ ब्राह्मण में “प्रजा वै भूतानि” (शत० ३.५.२.१३) किया है। इस प्रकार महर्षि दयानन्द भी इस मन्त्र में भूतेभ्यः का अर्थ “मनुष्यादि प्राणिभ्यः” = मनुष्यादि प्राणियों के लिए, करते हैं। इस मन्त्र का अर्थ इस प्रकार से है —

“मैं जो मासों का सेवन और क्रूरता आदि दोषों को नाश करने वाली, ज्योति शास्त्र से संस्कारयुक्त वाणी है, जो परमात्मा वेद और वेद के जानने वाले मनुष्यों के सेवन और बल के जाड्यपन को दूर करने वाली, पढ़ने-पढ़ाने के व्यवहार युक्त वाणी है, जो राज्य धनुर्विद्या और शूरवीरों का सेवन और चोर, डाकू, अन्याय को नाश करने वाली राज्यव्यवहार में कुशल वाणी है, जो विद्याधन की पुष्टि का सेवन और अविद्या को दूर करने वाली वाणी है, और जो विद्वानों के पूजन करने वाले यजमान के लिए दिव्य विद्या सम्पन्न विद्वान् दिव्य गुणों वा भोगों को प्राप्त कराती है, उसको सब मनुष्यादि प्राणियों के लिए यज्ञ = (अध्ययन-अध्यापन) से सम्पादन करता हूँ।”

उपर्युक्त प्रकार से प्रतिपादित वाणी को मानवेतर पशु-पक्षी आदि योनियों के प्राणियों में कदापि सिद्ध नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण में जो “प्रजा वै भूतानि” कहा है, वहाँ प्रजा में पशुओं की गणना नहीं होती। इसी प्रकार से अथर्ववेद १९.७१.१ के प्रमाणानुसार प्रजा और पशु को पृथक् गिना है, अर्थात् प्रजा में पशुओं की गणना नहीं होती। इसी प्रकार मैत्रायाणी संहिता में “देवाः ३ह्येव भूता” (मै॰ ३.८.५) कहा है। यहाँ भूतों से देवों का ग्रहण करने पर पशु-पक्षी आदि को देवों में ग्रहण कैसे किया जा सकता है?

अतः यहाँ सब मनुष्यादि प्राणियों की वाणी = शब्दों का ज्ञान ही योगी को होता है, ऐसा जानना चाहिए।

शंका — अगर समस्त मनुष्यों की वाणी = शब्दों का ज्ञान मानना हो तो उपर्युक्त प्रमाणानुसार मनुष्यादि प्राणियों से क्या अभिप्राय है ? क्या “आदि” पद से पशु-पक्षी का ग्रहण नहीं होता ?

समाधान — यहाँ मनुष्यादि प्राणियों से अभिप्राय देववाणी संस्कृत भाषाभाषी मनुष्यों से इतर मलेच्छ, असुर, गन्धर्व, किन्नर, किम्पुरुष, यक्ष, राक्षस आदि का ग्रहण व्यासभाष्य ३.२६ के प्रमाणानुसार करना चाहिए। योगी को उपर्युक्त संयम से इनके शब्दों का भी ज्ञान होता है।

शंका — छान्दोग्योपनिषद् ४.१.२-५ में राजा जानश्रुति द्वारा हंसों की वार्त्ता सुनने का स्पष्ट वर्णन है। अतः उपनिषद् के प्रमाणानुसार पशु-पक्षी आदि प्राणियों के शब्दों का ज्ञान भी इस सिद्धि में मानना चाहिए।

समाधान — उपरोक्त प्रकरण में राजा जानश्रुति द्वारा वह हंसों की वार्त्ता रात्रि में स्वप्नावस्था में सुनने का वर्णन है न कि जागृत अवस्था में। निरुक्त १४.११ के अनुसार हंस का अर्थ आत्मा भी होता है। परलोक की कामना वाले राजा जानश्रुति द्वारा रात्रि में आत्मविचार रूपी हंसों की वार्त्ता सुनी, न कि वास्तविक हंसों की। इस सन्दर्भ का विस्तारपूर्वक वर्णन पण्डित शिवशंकर शर्मा काव्यतीर्थ ने छान्दोग्योपनिषद् के भाष्य में किया है, कृपया पाठक वहीं देखें। अतः पशु-पक्षियों की वाणी को जानने का कोई वर्णन वेदानुकूल सत्यशास्त्रों में नहीं पाया जाता।

हाँ! इतना तो सत्य है कि पशु पालने वाले मनुष्य, उन पशुओं के साथ रहते हुए, उनकी ध्वनियों में अन्तर को जानने लगते हैं कि यह ध्वनि सामान्य स्थिति की है, अथवा यह ध्वनि भययुक्त स्थिति की है, अथवा यह ध्वनि दुःखयुक्त स्थिति की है; आदि-आदि। इससे अधिक का ज्ञान मनुष्यों को होना सम्भव नहीं होता। यह सम्भव नहीं होता कि गाय के पास रहने वाला, उसको पालने वाला मनुष्य, या उसकी वाणी = ध्वनि आदि में संयम करके योगी, उसकी ध्वनि के अभिप्राय को मनुष्यों के शब्दों के समान जान ले; जैसे कि गाय यह कह रही है “कोई मुझे मारने आ रहा है, मुझे बचाओ; अमुक कीड़ा अथवा जोंक मेरा खून पी रही है, मेरे शरीर पर से उसे हटाओ; मेरे पैर में काँटा चुभ गया है उसे निकालो; मेरा दूध देने का समय हो गया है, अतः निकाल लो” आदि-आदि।