In Hindi:
पदपाठ : कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुष्प्रकाशासम्प्रयोगे अन्तर्धानम्॥
हिंदी में अर्थ : (कायरूपसंयमात्) अपने शरीर के रूप में संयम करने से (तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे) उस शरीर के रूप की ग्राह्यशक्ति = देखे जा सकने की योग्यता = शक्ति के स्तम्भित होने = रुक जाने पर (चक्षुष्प्रकाशासम्प्रयोगे) दूसरे पुरुष के चक्षु इन्द्रिय के प्रकाश का इस योगी के शरीर से सम्प्रयोग = सम्बन्ध न होने से (अन्तर्धानम्) योगी का शरीर अन्तर्धान हो जाता है॥
व्यास भाष्य : कायस्य रूपे संयमाद्रूपस्य या ग्राह्या शक्तिस्तां प्रतिष्टभ्नाति। ग्राह्यशक्तिस्तम्भे सति चक्षुष्प्रकाशा- सम्प्रयोगेऽन्तर्धानमुत्पद्यते योगिनः। एतेन शब्दाद्यन्तर्धानमुक्तं वेदितव्यम्॥
हिंदी में अर्थ : (कायस्य रूपे) अपने शरीर के रूप में (संयमात्) संयम करने से (रूपस्य या ग्राह्याशक्तिः) रूप की ग्राह्य शक्ति = दूसरे पुरुष के नेत्र द्वारा देखे जाने की जो योग्यता = शक्ति है, (ताम्) उस शक्ति को (प्रतिष्टभ्नाति) वह योगी संयम से रोक देता है। (ग्राह्यशक्तिस्तम्भे सति) इस रूप की ग्राह्यशक्ति के रुक जाने पर (चक्षुष्प्रकाशासम्प्रयोगे) दूसरे पुरुष के नेत्रों के प्रकाश का इस योगी के शरीर के साथ संयोग = सम्बन्ध न होने से (योगिनः) योगी को (अन्तर्धानम्) अन्तर्धान नामक सिद्धि (उत्पद्यते) प्राप्त होती है। अर्थात् वह योगी दूसरे पुरुष को दिखाई नहीं देता। (एतेन) इस रूपान्तर्धान के समान (शब्दादि अन्तर्धानम्) शब्दादि के अन्तर्धान भी (उक्तम्) कहा गया (वेदितव्यम्) जानना चाहिए॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि योगी के लिए अन्तर्धान = दूसरों को दिखाई न देने रूप विभूति का वर्णन कर रहे हैं। किसी भी शरीर में रूप होता है, वह दूसरे पुरुषों के नेत्रों द्वारा देखा जाता है, यह रूप की ग्राह्य शक्ति है। योगी पुरुष जब अपने शरीर के रूप में संयम करता है, तो उस रूप में संयम करने से उसे ऐसा सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है कि वह, शरीर के रूप की ग्राह्यशाक्ति को सम्तम्भित कर देता है = रोक देता है। इस ग्राह्यशक्ति के रुक जाने पर, दूसरे पुरुष के नेत्रों के प्रकाश का संयोग = सम्बन्ध इस योगी के शरीर के साथ नहीं होता, जिसके परिणामस्वरूप योगी का शरीर उस दूसरे पुरुष को दिखाई नहीं देता। इस प्रकार योगी का शरीर दूसरे पुरुषों द्वारा न देखा जाना ही अन्तर्धान नामक सिद्धि है।
इस प्रकार से रूप की ग्राह्यशक्ति के स्तम्भन से = रुक जाने से योगी का शरीर अदृश्य हो जाता है; परन्तु वह शरीर वहाँ बना रहता है। ऐसे में योगी का अदृश्य शरीर स्पर्श द्वारा अनुभूत होगा, कि यहाँ = इस स्थान पर कोई शरीर है, परन्तु वह आँखों से नहीं दीख रहा। अर्थात् वह अदृश्य शरीर दूसरे किसी अवरोधक यथा अन्य शरीर, पत्थर, लाठी आदि से टकराकर अपनी अनुभूति को कराएगा, परन्तु दूसरे पुरुष के नेत्रों द्वारा दिखाई नहीं देगा।
इस सूत्र के अनुसार योगी रूप की ग्राह्यशक्ति को ही रोकता है न कि रूप को स्तम्भित करता है। अतः यहाँ मात्र ग्राह्यशक्ति का ही स्तम्भन जानना चाहिए न कि रूप का स्तम्भन होना। इसमें कारण यह है कि जब तक किसी पदार्थ में अग्नि का संयोग रहेगा, तब तक रूप की विद्यमानता रहेगी। अतः पार्थिव, जल और अग्नि के परमाणुओं से बने शरीर रूप गुण से युक्त ही रहते हैं, और उस रूप का स्तम्भन नहीं हो सकता।
महर्षि व्यास ने रूप के अन्तर्धान के समान शब्दादि के अन्तर्धान को भी कहा है। अर्थात् योगी द्वारा शब्द में संयम करके, उसकी ग्राह्यशक्ति को रोक देने पर, दूसरे पुरुष की श्रोत्रेन्द्रिय का उससे शब्द से सम्बन्ध न होने से शब्द अन्तर्धान हो जाता है अर्थात् दूसरे पुरुष को सुनाई नहीं देता। इसी प्रकार योगी जब स्पर्श में संयम करता हुआ, उसकी ग्राह्यशक्ति को स्तम्भित कर देता है, तो दूसरे पुरुष की त्वचा द्वारा सम्बन्ध न होने से, उस योगी के शरीर को स्पर्श द्वारा भी नहीं जाना जा सकता। इसी प्रकार रस और गन्ध के विषय में भी जानना चाहिए।
देखो, इस विषय में आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक प्रयोग का वर्णन, उपरोक्त सिद्धि की प्रामाणिकता को प्रतिपादित करता है। १४ दिसम्बर २००७ के नवभारतटाइम्स में छपे एक समाचार के अनुसार वैज्ञानिकों ने एक ऐसा लेप / घोल तैयार करने में सफलता प्राप्त की है, जिसे किसी स्थूल द्रव्य = पदार्थ पर लगाने से वह द्रव्य / पदार्थ दूसरे व्यक्ति को दिखाई नहीं देता। यह घोल / लेप अपने ऊपर पड़ने वाले प्रकाश को सोख लेता है, जिससे प्रकाश वापिस व्यक्ति के नेत्रों तक नहीं पहुँच पाता तथा वह पदार्थ अदृश्य हो जाता है। रक्षा विशेषज्ञों ने इस प्रकार के विमानों का निर्माण कर लिया है, जो शत्रु को दिखाई नहीं देते और न अन्य किसी रेडार आदि से पकड़े जाते हैं। इसी प्रकार १७.०८.२००८ पर दूरदर्शन पर दिखाए गए समाचार के अनुसार वैज्ञानिकों ने एक ऐसा लबादा = वस्त्र तैयार कर लिया है जिसको पहन कर व्यक्ति दिखाई नहीं देता।
इन प्रयोगों की तुलना महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित स्तर से नहीं की जा सकती, और न ही ये वैज्ञानिक उस स्थिति के आसपास ही पहुँचे हैं। परन्तु इस प्रकार का प्रयोग महर्षि पतञ्जलि द्वारा कथित विभूति को प्रतिपादित ही करता है कि जब पदार्थ विज्ञान द्वारा यह कार्य सम्भव है, तो उपरोक्त सिद्धि भी सम्भव है।
महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास इस स्थित से कहीं आगे जाकर कहते हैं कि जब शरीर के रूप में संयम करके उसकी ग्राह्यशक्ति को रोक दिया जाए, तो दूसरे पुरुष के नेत्रों के प्रकाश का सम्बन्ध इस शरीर से ही नहीं हो पाता, जिसके परिणामस्वरूप वह शरीर ही दिखाई नहीं देता।
हिंदी में टिप्पणी : आधुनिक काल में वैज्ञानिकों द्वारा ऐसे आवाज को रोकने वाले साउण्डप्रूफ कमरों का निर्माण कर लिया है, जिसमें होने वाली शब्दादि की ध्वनियों को बाहर स्थित मनुष्य नहीं सुन सकता।