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Vibhuti Paada / Attainments / 22
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Vibhuti Paada / Attainments / 22

सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा॥२२॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 22

In Hindi:

पदपाठ : सोपक्रमम् निरुपक्रमम् च कर्म तत् संयमात् अपरान्तज्ञानम् अरिष्टेभ्यः वा॥

हिंदी में अर्थ : (सोपक्रमम्) उपक्रम सहित, शीघ्र फल प्रदान करने वाले (च) और (निरुपक्रमम्) उपक्रम रहित, देर से फल प्रदान करने वाले, दो प्रकार के (कर्म) कर्म होते हैं; (तत् संयमात्) उन कर्मों में संयम करने से योगी को (अपरान्तज्ञानम्) मृत्यु का ज्ञान होता है; (वा) अथवा = और (अरिष्टेभ्यः) आयुर्वेद में कथित अरिष्टों = मृत्यु की सूचना देने वाले चिह्नों से भी मृत्यु का ज्ञान होता है॥

व्यास भाष्य : आयुर्विपाकं कर्म द्विविधं सोपक्रमं निरुपक्रमं च। तत्र यथाऽऽर्द्रं वस्त्रं वितानितं लघीयसा कालेन शुष्येत्तथा सोपक्रमम्। यथा च तदेव सम्पिण्डितं चिरेण संशुष्येदेवं निरुपक्रमम्। यथा वाऽग्निः शुष्के कक्षे मुक्तो वातेन समन्ततो युक्तः क्षेपीयसा कालेन दहेत्तथा सोपक्रमम्। यथा वा स एवाग्निस्तृणराशौ क्रमशोऽवयवेषु न्यस्तश्चिरेण दहेत्तथा निरुपक्रमम्। तदैकभविकमायुष्करं कर्म द्विविधं सोपक्रमं निरुपक्रमं च। तत्संयमादपरान्तस्य प्रायणस्य ज्ञानम्।

अरिष्टेभ्यो वेति। त्रिविधमरिष्टमाध्यात्मिकमाधिभौतिकमाधिदैविकं च। तत्राध्यात्मिकं घोषं स्वदेहे पिहितकर्णो न शृणोति ज्योतिर्वा नेत्रेऽवष्टब्धे न पश्यति। तथाधिभौतिकं यमपुरुषान्पश्यति पितॄनतीतानकस्मात्पश्यति। आधिदैविकं स्वर्गमकस्मात्सिद्धान्वा पश्यति। विपरीतं वा सर्वमिति। अनेन वा जानात्यपरान्तमुपस्थितमिति॥

हिंदी में अर्थ : (आयुर्विपाकम् कर्म) आयु रूपी फल को देने वाले कर्म (द्विविधम्) दो प्रकार के होते हैं, (सोपक्रमम्) सोपक्रम = उपक्रम सहित, शीघ्र फल प्रदान करने वाले (च) और (निरुपक्रमम्) निरुपक्रम = उपक्रम रहित, देर से फल प्रदान करने वाले कर्म। (तत्र) उन दोनों में से (यथा) जिस प्रकार (आर्द्रम् वस्त्रम्) गीला वस्त्र (वितानितम्) फैलाया हुआ (लघीयसा कालेन) थोड़े ही काल में (शुष्येत्) सूखता है, (तथा) वैसे ही शीघ्र फल देने वाला (सोपक्रमम्) सोपक्रम कर्म होता है। (च) और (यथा) जिस प्रकार (तदेव) वही गीला वस्त्र (सम्पिण्डितम्) एकत्रित = सिकुड़ा हुआ (चिरेण) देर से (संशुष्येत्) सूखता है, (एवम्) इस प्रकार से देर से फल देने वाला (निरुपक्रमम्) निरुपक्रम कर्म होता है। (वा) अथवा (यथा) जैसे (अग्निः) अग्नि (शुष्के कक्षे) सूखे तिनकों के समूह में (मुक्तः) डाली गई और (समन्ततः) चारों ओर से (वातेन) वायु से (युक्तः) युक्त होकर (क्षेपीयसा कालेन) थोड़े समय में ही (दहेत्) तिनकों को जला देता है, (तथा) वैसे ही शीघ्र फल देने वाला (सोपक्रमम्) सोपक्रम कर्म होता है। (यथा वा) और जैसे (सः एव अग्निः) वही अग्नि (तृणराशौ) तिनकों के समूह में (अवयवेषु) थोड़े-थोड़े भाग पर (क्रमशः) क्रमपूर्वक (न्यस्तः) डाली हुई (चिरेण) देर से (दहेत्) जलाती है, (तथा) वैसे (निरुपक्रमम्) निरुपक्रम कर्म होता है। (तत्) वह (एकभविकम्) एक जन्म में (आयुष्करम् कर्म) आयुरूपी फल देने वाला कर्म (द्विविधम्) दो प्रकार का है (सोपक्रमम्) सोपक्रम (च) और (निरुपक्रमम्) निरुपक्रम। (तत्संयमात्) उस द्विविध कर्म में संयम करने से (अपरान्तस्य) अपरान्त अर्थात् (प्रायणस्य) इस वर्त्तमान शरीर से प्रायण = मृत्यु का (ज्ञानम्) ज्ञान होता है।

(वा) और (अरिष्टेभ्यः इति) अरिष्ट = विपरीत चिह्नों से भी मृत्यु का ज्ञान होता है। (त्रिविधम् अरिष्टम्) अरिष्ट तीन प्रकार के होते हैं — (आध्यात्मिकम्) आध्यात्मिक, (आधिभौतिकम्) आधिभौतिक (च) और (आधिदैविकम्) आधिदैविक। (तत्र) उनमें से (आध्यात्मिकम्) आध्यात्मिक (शरीर और बुद्धिगत) अरिष्ट ये हैं — (पिहितकर्णः) कान बन्द किए हुए (स्वदेहे) व्यक्ति अपने शरीर में (घोषम्) सुनाई देने वाले घोष = नाद = शब्द को (न शृणोति) नहीं सुनता; (वा) अथवा (नेत्रे अवष्टब्धे) नेत्रों को बन्द कर लेने पर (ज्योतिः) ज्योति = प्रकाश को (न पश्यति) नहीं देखता। (तथा) वैसे ही (आधिभौतिकम्) आधिभौतिक (दूसरे प्राणियों के आश्रय होने वाले) अरिष्ट ये हैं — (यमपुरुषान्) यम = वायु की अवरुद्धता अथवा प्राण हरण करने वाले पुरुष को (पश्यति) देखता है, अथवा (अतीतान्) मृत (पितॄन्) पितरों को (अकस्मात्) अचानक (पश्यति) देखता है। वैसे ही (आधिदैविकम्) आधिदैविक (प्रकृतिगत पदार्थों के आश्रय होने वाले) अरिष्ट ये हैं — (अकस्मात्) अचानक (स्वर्गम्) स्वर्ग = परलोक को (वा) अथवा (सिद्धान् पश्यति) पूर्वकाल के सिद्धों को देखता है। (वा) अथवा (सर्वम्) सभी पदार्थों को (विपरीतम् इति) उनके स्वरूप / गुणों से विपरीत = विरुद्ध देखता है। (अनेन) इन तीनों प्रकार के अरिष्टों से (वा) भी (उपस्थितम्) उपस्थित = निकट आने वाली (अपरान्तम्) मृत्यु को (जानाति इति) जानता है॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी जब अपने, आयु रूपी फल प्रदान करने वाले, सोपक्रम और निरुपक्रम कर्मों में संयम करता है, तो उसे अपरान्त = मृत्यु का ज्ञान प्राप्त होता है। अर्थात् वह इस संयम से यह जान लेता है कि उसकी मृत्यु निकट भविष्य में होगी अथवा देर से होगी।

सोपक्रम कर्म वे होते हैं जो शीघ्र फल प्रदान करने वाले होते हैं, जैसे कि कोई गीला वस्त्र निचोड़कर फैला कर सूखने हेतु डाला जाए तो वह शीघ्र सूख जाता है। इसके विपरीत निरुपक्रम कर्म देर से फल प्रदान करने वाले होते हैं, जैसे कि वही गीला वस्त्र एकत्रित रूप से बिना फैलाए ही सूखने हेतु रखा जाए तो वह देर से सूखता है।

आयु रूपी फल प्रदान करने में, पूर्व जन्मों में कृत कर्म तथा वर्त्तमान जन्मों में कृत कर्म, दोनों ही कारण होते हैं। वर्त्तमान जन्म में सात्त्विक पौष्टिक भोजन, व्यायाम, ब्रह्मचर्य आदि का पालन करने से शरीर की पुष्टि होकर जीवन काल बढ़ता है = अर्थात् आयु बढ़ती है। इसके विपरीत तामसिक तथा शरीरिक स्वास्थ्य का नाश करने वाला भोजन, ब्रह्मचर्य नाश आदि करने से शरीरिक स्वास्थ्य का क्षय होने से जीवन काल कम होता है = अर्थात् आयु कम हो जाती है। इस प्रकार के, शारीरिक स्वास्थ्य से प्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध कर्मों के अतिरिक्त भी शास्त्रकारों ने निम्न कर्मों से भी आयु का सम्बन्ध कहा है, जो कि आयु को प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से प्रभावित करते हैं —

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।

चत्वारि तस्य वर्धन्त आयुर्विद्यायशोबलम्॥ मनु॰२.१२१॥

जो सदा नम्र सुशील विद्वान् और वृद्धों की सेवा करता है, उसका आयु, विद्या, कीर्त्ति और बल ये चारों सदा बढ़ते हैं और जो ऐसा नहीं करता उनके आयु आदि चार नहीं बढ़ते॥ (सत्यार्थप्रकाश तृ॰ समु॰)

ऋषयो दीर्घसन्ध्यत्वाद्दीर्घमायुरवाप्नुयुः।

प्रज्ञां यशश्च कीर्त्ति च ब्रह्मवर्चसमेव च॥ मनु॰ ४.९४॥

मन्त्रार्थद्रष्टा ऋषियों ने देर तक सन्ध्योपासन करने के कारण दीर्घ आयु, बुद्धि, यश, ब्रह्मतेज को प्राप्त किया है॥

आचाराल्लभते ह्यायुराचारादीप्सिताः प्रजाः॥ मनु॰ ४.१५६॥

धर्माचरण से ही दीर्घायु को ........ प्राप्त होता है॥

दुराचारी हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः।

दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरेव च॥ मनु॰४.१५७॥

जो दुष्टाचारी पुरुष होता है, वह सर्वत्र निन्दित, दुःखभागी और व्याधि से अल्पायु सदा हो जाता है॥

सर्वलक्षणहीनोऽपि यः सदाचारवान्नरः।

श्रद्दधानोऽनसूयश्च शतं वर्षाणि जीवति॥ मनु॰ ४.१५८॥

जो सब लक्षणों से हीन होकर भी होकर सदाचारयुक्त सत्य में श्रद्धा और निन्दा आदि दोष रहित होता है, वह सुख से सौ वर्ष पर्यन्त जीता है॥

आयुर्विप्रापवादेन ॥ मनु॰ ४.२३७॥

अर्थात् ब्राह्मणों = ब्रह्मज्ञान वाले पुरुषों की बुराई करने से आयु नष्ट होती है॥

रजसाऽभिप्लुतां नारीं नरस्य ह्युपगच्छतः। प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रहीयते॥

तां विवर्जयतस्तस्य रजसा समभिप्लुताम्। प्रज्ञा तेजो बलं चक्षुरायुश्चैव प्रवर्धते॥ मनु॰ ४.४१-४२॥

रजस्वला स्त्री के पास जाने वाले मनुष्य के बुद्धि, तेज, बल, नेत्रज्योति और आयु, ये सब घटते हैं॥ रजस्वला स्त्री से संभोग न करने वाले मनुष्य के बुद्धि, तेज, बल, नेत्रज्योति और आयु ये सब बढ़ते हैं॥

इस प्रकार शास्त्रकारों ने आयु को प्रभावित करने वाले विभिन्न कर्मों को कहा है। जिस कर्म का सम्बन्ध सीधा शरीर के स्वास्थ्य से हो, वह कर्म सोपक्रम कर्म की श्रेणी में जानना चाहिए; अन्य कर्मों को निरुप्रकम कर्म की श्रेणी में जाना जा सकता है। इनमें से भोजन, व्यायाम, ब्रह्मचर्यपालन आदि से सम्बन्धित कर्म, शरीर को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करने से, शीघ्र फल प्रदान करने वाले सोपक्रम कर्म कहे जाते हैं। इसके विपरीत निरुपक्रम कर्म शीघ्र फल प्रदान करने में समर्थ न होने से, ऐसे कर्म या तो वर्त्तमान जन्म में ही अपने किसी अभिव्यञ्जक कारण = निमित्त को पाकर फल प्रदान करनें में सहायक हो जाते हैं, अथवा अदृष्टजन्मवेदनीय = भावी जन्म में जाति के साथ-साथ आयु और भोग रूपी फलों को देने वाले होते हैं।

परन्तु इन सोपक्रम और निरुपक्रम कर्मों में संयम करने से योगी यह नहीं जान सकता कि उसकी मृत्यु किस काल में = किस दिन, कितने समय पर तथा किस स्थान में होगी। महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने इस प्रकार का कोई भी संकेत न तो सूत्र और भाष्य में किया है, और न ही ऐसी मान्यता को प्रमाणित करने का कोई शब्द प्रमाण ही मिलता है।

आधुनिक भाष्यकार अपरान्त ज्ञान को काल और देश के सन्दर्भ में मानते हैं। यह अनार्ष मान्यता सर्वप्रथम भोज द्वारा प्रतिपादित की गई है। भोजवृत्ति में ही यह लिखा है कि योगी मृत्यु के विषय में यह जानता है कि अमुक काल और अमुक देश में मृत्यु होगी। परन्तु यह मान्यता वेदादि सत्यशास्त्रों में प्रतिपादित सिद्धान्तों से सर्वथा विरुद्ध होने से मान्य नहीं है। मृत्यु का काल और देश पूर्व निश्चित कदापि नहीं है।

शंका — आर्यसमाज के संस्थापक महर्षि दयानन्द जी की जीवनी में यह प्रतिपादित किया गया है कि स्वामी जी अपनी मृत्यु के काल के विषय में जानते थे। उन्होंने किसी से तीन-चार वर्ष पूर्व ही कहा था कि संवत् १९४१ को वे नहीं देखेंगे। उनकी मृत्यु संवत् १९४० में ही हो गयी थी। अतः मृत्यु के काल का उन्हें पूर्व से ज्ञान था।

समाधान — ऐसा स्वामी दयानन्द ने किसे कहा था, यह निश्चयपूर्वक ज्ञात नहीं होता। न ही उनके किसी पत्रादि में ऐसा कोई उल्लेख ही मिलता है। दूसरी ओर स्वामी जी ने अपनी मृत्यु से लगभग सवा दो मास पूर्व भाद्रबदी ५ संवत् १९४० (तदानुसार २१ अगस्त १८८३) को मुंशी समर्थदान को पत्र में निम्न प्रकार लिखा था —

“ऋग्वेद को चौथा अष्टक भी पूरा हो गया, पाँचवे अष्टक का एक अध्याय कल पूरा होगा और छठा मण्डल आज पूरा हो गया। परमेश्वर की कृपा से १ वर्ष में ऋग्वेद भाष्य पूरा हो जायेगा। और एक वा ढेड वर्ष साम और अथर्व में लगेगा।” (द्रष्टव्य पत्र और विज्ञापन, भाग २ पृष्ट ७६७ (रामलाल कपूर ट्रस्ट से प्रकाशित))

और ३० अक्टूबर, १८८३ का स्वामी जी का देहान्त हो गया था। २ माह और १० दिन पूर्व स्वामी जी को मृत्यु का पूर्वाभास ही नहीं था; अतः ऐसी शंका निर्मूल है। स्वामी जी की महिमा को बढ़ाने के लिए ऐसी कल्पना करना और प्रचारित करना अविद्या है। ऐसी बातें फैलाने वाले लोग नहीं जानते, कि वे किस प्रकार से सिद्धान्तों की हानि कर रहे हैं। अस्तु।

दूसरी ओर अरिष्टों के ज्ञान से भी मृत्यु का ज्ञान होता है, जो कि साधारण मनुष्यों को भी सामान्यतः हो जाता है। कुछ प्रकार के अरिष्टों के ज्ञान से होने वाला मृत्यु का ज्ञान, मृत्यु के अतिनिकट होने पर ही होता है। आयुर्वेद के अनुसार निम्न प्रकार के अरिष्ट हैं —

१. आध्यात्मिक अरिष्ट :— ये अरिष्ट मुख्यतः शरीर और बुद्धिगत होते हैं। जैसे मनुष्य द्वारा अपने कानों को बन्द करने पर उदर गत वायु के घोष = शब्द को न सुनना; अथवा नेत्रों को बन्द करने पर प्रकाश, चमक का दिखाई न देना।

२. आधिभौतिक अरिष्ट :— ये अरिष्ट मुख्यतः दूसरे प्राणियों के आश्रय होते हैं। इसमें महर्षि व्यास ने यमपुरुष और अतीत में हुए मृत पितरों के अचानक दर्शन को कहा है। यमपुरुषों से आधुनिक भाष्यकारों ने गरुड़ पुराण में कल्पित यमदूतों को देखना कहा है। परन्तु यमपुरुष का यह अर्थ कदापि नहीं है। भोज ने विकृतपुरुष = विकृत आकृति वाले अथवा विकृत मनोवृत्ति वाले घातक पुरुष के दर्शन को कहा है। इससे यह प्रतीत होता है कि भोज के काल तक गरुड़ पुराण का अस्तित्व ही नहीं था, अन्यथा अन्य अरिष्टों के समान भोज भी यहाँ यमपुरुष का कथन आधुनिक भाष्यकारों के समान करते। यमपुरुष का वास्तिवक अभिप्राय इस प्रकार से समझना चाहिए —

अ. वाजिनं यमम्॥ (ऋ० ८.२४.२२); यमः सूयमानो विष्णुः सम्भ्रियमाणो वायुः पूयमानः॥ (यजु॰ ८.५७); अयं वै यमो योऽयं (वायुः) पवते॥ (यजु॰ ३८.९ पर शत० १४.२.२.११); इन प्रमाणों के अनुसार वायु का नाम यम है। इसके आधार पर जब पुरुष को शरीर में वायु = प्राण की अवरुद्धता हो तो इसे यमपुरुष जानना चाहिए। अर्थात् प्राणों के अवरुद्ध होने रूप विपरीत चिह्न से मृत्यु का ज्ञान हो रहा है।

आ. “ये दुष्टान् यच्छन्ति निगृह्णन्ति ते यमा न्यायाधीशः” जो दुष्टों को दण्ड और श्रेष्ठों का पालन करने हारे न्यायकारी हों, वे यम कहाते हैं (सत्यार्थप्रकाश चतुर्थ समु॰) अतः न्यायाधीश राजा का प्राण दण्ड देने वाला कर्मचारी = जल्लाद का किसी मृत्युदण्ड पाए अपराधी द्वारा देखा भी यमपुरुष का देखना जानना चाहिए।

इ. अथवा विकृत आकृति तथा विकृत मनोवृत्ति वाले घातक मनुष्य यथा डाकू, हत्यारे आदि का भी मनुष्यों द्वारा देखा जाना, यमपुरुष का देखना जानना चाहिए; क्योंकि ऐसे लोग अकारण ही दूसरों के प्राण हरण करने वाले होते हैं।

इसी प्रकार “पितृलोको यमः” (कौषितकि ब्राह्मण १६.८) तथा “यमो वैवस्वतो राजेत्याह तस्य पितरो विशः” (शत० १३.४.३.६) के आधार पर अतीत में हुए पितरों के दर्शन को भी अरिष्ट रूप में कहा गया जानना चाहिए।

३. आधिदैविक अरिष्ट :— ये अरिष्ट दूसरे पदार्थों = स्थानों के आश्रय से होते हैं। व्यक्ति जब सभी पदार्थों को विपरीत = उलटे रूप में ही देखता है, अथवा अचानक स्वर्ग = परलोक, जोकि सामान्यतः देखे जाने में असम्भव हैं, को देखना; पूर्वकाल में हुए सिद्धों को देखना आदि कहा गया है।

वस्तुतः मृत्यु के समीप होने से शारीरिक और इन्द्रियों की शक्ति क्षीण होने से, ऐसा असम्बद्ध रूप से ज्ञान ही, मृत्यु की समीपता का बोध कराता है। अरिष्टपूर्वक यह ज्ञान सामान्य मनुष्यों को भी होता है। परन्तु योगी पुरुष को सोपक्रम-निरुपक्रम कर्मों में संयम और अरिष्टों से, मृत्यु का ज्ञान अधिक निश्चयपूर्वक होता है।