In Hindi:
पदपाठ : स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणम् पुनः अनिष्टप्रसंगात्॥
हिंदी में अर्थ : योगी पुरुष को (स्थान्युपनिमन्त्रणे) लौकिक सुख-साधन सम्पन्न पुरुषों एवं विद्वानों द्वारा आमन्त्रित किए जाने पर (सङ्गस्मयाकरणम्) सङ्ग = आसक्ति और स्मय = अभिमान नहीं करना चाहिए, अन्यथा (पुनः) फिर से (अनिष्टप्रसंगात्) अनिष्ट = योगमार्ग से भ्रष्ट होकर संसारचक्र के दृढ़ होने का प्रसङ्ग = अवसर उपस्थित हो जाता है॥
व्यास भाष्य : चत्वारः खल्वमी योगिनः प्राथमकल्पिको मधुभूमिकः प्रज्ञाज्योतिरतिक्रान्तभावनीयश्चेति। तत्राभ्यासी प्रवृत्तमात्रज्योतिः प्रथमः। ऋतम्भरप्रज्ञो द्वितीयः। भूतेन्द्रियजयी तृतीयः। सर्वेषु भावितेषु भावनीयेषु कृतरक्षान्बन्धः कर्त्तव्यसाधनादिमान्। चतुर्थो यस्त्वतिक्रान्तभावनीयः। तस्य चित्तप्रतिसर्ग एकोऽर्थः। सप्तविधाऽस्य प्रान्तभूमिप्रज्ञा।
तत्र मधुमतीं भूमिं साक्षात्कुर्वतो ब्राह्मणस्य स्थानिनो देवाः सत्त्वविशुद्धिमनुपश्यन्तः स्थानैरुपनिमन्त्रयन्ते ‘‘भो इहाऽऽस्यतामिह रम्यतां कमनीयोऽयं भोगः कमनीयेयं कन्या रसायनमिदं जरामृत्युं बाधते वैहायसमिदं यानममी कल्पद्रुमाः पुण्या मन्दाकिनी सिद्धा महर्षय उत्तमा अनुकूला अप्सरसो दिव्ये श्रोत्रचक्षुषी वज्रोपमः कायः। स्वगुणैः सर्वमिदमुपार्जितमायुष्मता प्रतिपद्यतामिदमक्षयमजरममरस्थानं देवानां प्रियम्’’ इति।
एवमभिधीयमानः सङ्गदोषान् भावयेद् घोरेषु संसाराङ्गारेषु पच्यमानेन मया जननमरणान्धकारे विपरिवर्त्तमानेन कथञ्चिदासादितः क्लेशतिमिरविनाशी योगप्रदीपः। तस्य चैते तृष्णायोनयो विषयवायवः प्रतिपक्षाः। स खल्वहं लब्धालोकः कथमनया विषयमृगतृष्णया वञ्चितस्तस्यैव पुनः प्रदीप्तस्य संसाराग्नेरात्मानमिन्धनीकुर्यामिति। स्वस्ति वः स्वप्नोपमेभ्यः कृपणजनप्रार्थनीयेभ्यो विषयेभ्य इत्येवं निश्चितमतिः समाधिं भावयेत्।
सङ्गमकृत्वा स्मयमपि न कुर्यादेवमहं देवानामपि प्रार्थनीय इति। स्मयादयं सुस्थितम् मन्यतया मृत्युना केशेषु गृहीतमिवात्मानं न भावयिष्यति। तथा चास्यछिद्रान्तरप्रेक्षी नित्यं यत्नोपचर्यः प्रमादो लब्धविवरः क्लेशानुत्तम्भयिष्यति। ततः पुनरनिष्टप्रसङ्गः। एवमस्य सङ्गस्मयावकुर्वतो भावितोऽर्थो दृढीभविष्यति। भावनीयश्चार्थोऽभिमुखीभविष्यतीति॥
हिंदी में अर्थ : (चत्वारः खलु अमी योगिनः) वे योगी चार प्रकार के होते हैं — (प्राथमकल्पिकः) प्राथमकल्पिक, (मधुभूमिकः) मधुभूमिक, (प्रज्ञाज्योतिः) प्रज्ञाज्योति (च) और (अतिक्रान्तभावनीयः इति) अतिक्रान्तभावनीय। (तत्र) उन चारों में से (प्रथमः) पहला = प्राथमकल्पिक योगी (अभ्यासी प्रवृत्तमात्रज्योतिः) अभ्यास करने वाला, जिसे संयम द्वारा पदार्थों का साक्षात् कराने वाली ज्योति प्राप्त होने लगी हो, होता है। (द्वितीयः) द्वितीय = मधुभूमिक योगी (ऋतम्भरप्रज्ञः) ऋतम्भराप्रज्ञा वाला होता है। (तृतीयः) तृतीय प्रज्ञाज्योति योगी (भूतेन्द्रियजयी) पञ्चमहाभूतों और इन्द्रियों पर जय प्राप्त किए हुए होता है। यह योगी (सर्वेषु) सभी (भावितेषु) सम्पादित = साक्षात्कृत विषयों में (कृतरक्षाबन्धः) स्थिरता हेतु आत्मरक्षार्थ दृढाभ्यास करता, और (भावनीयेषु) असम्पादित = साक्षात्करणीय विषयों में (कर्त्तव्यसाधनादिमान्) करणीय साधनानुष्ठानों को करने वाला होता है। (चतुर्थः) चतुर्थ योगी (यः तु) जो कि (अतिक्रान्तभावनीयः) अतिक्रान्तभावनीय होता है, (तस्य) उसका (चित्तप्रतिसर्गः) चित्त को अपने कारण में लीन करना ही (एकः अर्थः) एकमात्र प्रयोजन होता है। (अस्य) इस योगी की (सप्तविधा प्रान्तभूमिप्रज्ञा) सात प्रकार की प्रान्तभूमि प्रज्ञा होती है। (देखें, योगसूत्र २.२७)
(तत्र) इन योगियों में (मधुमतीम् भूमिम्) मधुमती भूमि का (साक्षात्कुर्वतः) साक्षात् करने वाले (ब्राह्मणस्य) ब्राह्मण की (सत्त्वविशुद्धिम्) सत्त्वशुद्धि को (अनुपश्यन्तः) देखते हुए (स्थानिनः देवाः) लौकिक सम्पत्ति के स्वामी एवं विद्वान् लोग (स्थानैः) विभिन्न भोगयुक्त स्थानों से (उपनिमन्त्रयन्ते) सत्कारपूर्वक निमन्त्रण देते हैं — “(भोः) हे भगवन्! (इह) इस स्थान में (आस्यताम्) स्थित हों (इह रम्यताम्) यहाँ रमण कीजिए, (अयम् कमनीयः भोगः) यह भोग कामना करने योग्य है, (इयम् कमनीया कन्या) यह कन्या कमनीय = सुन्दर है, (इदम् रसायनम्) यह रसायन (जरामृत्युम् बाधते) बुढ़ापे और मृत्यु को दूर करने वाला है, (इदम् यानम्) यह यान (वैहायसम्) आकाश में गमन करने वाला है, (अमी कल्पद्रुमाः) यह कल्प = संकल्प द्रुमः = कुबेर अर्थात् संकल्पों को पूरा करने वाला कुबेर है, (पुण्या मन्दाकिनी) यह सुख प्रदान करने वाली गंगा है, (सिद्धाः महर्षयः) सिद्ध महर्षि हैं, (उत्तमाः अनुकूलाः अप्सरसः) उत्तम अनुकूल अप्सराएँ = इन्द्रियाँ हैं, (दिव्ये श्रोत्रचक्षुषी) दिव्य श्रोत्र और चक्षु हैं, (वज्रोपमः कायः) वज्र के समान सुदृढ काया है। (स्वगुणैः) आपने अपने योगाभ्यास रूप गुण द्वारा (सर्वम् इदम् उपार्जितम्) यह सब उपार्जित किया है (आयुष्मता) इसे आप सेवन करें, (इदम् देवानाम्) यह देवों = विद्वानों को (प्रियम्) प्रिय (अक्षयम्) अक्षय (अजरम्) अजर (अमर स्थानम्) अमर स्थान को (प्रतिपाद्यताम् इति) स्वीकार कीजिए।”
(एवम्) इस प्रकार से (अभिधीयमानः) स्थानीय धनसम्पत्ति के स्वामियों एवं देवों द्वारा निमन्त्रित किया जाता हुआ योगी (सङ्गदोषान्) इन भोगों = विषयों की आसक्ति के दोषों को देखता हुआ (भावयेत्) विचार करे — “(घोरेषु) इस भीषण (संसाराङ्गारेषु) संसार रूपी अङ्गारों में (पच्यमानेन) जलाए जाते हुए (जननमरणान्धकारे) जन्म-मरण के अन्धकार में (विपरिवर्त्तमानेन) बार-बार भ्रमण करते हुए = भटकते हुए (मया) मैंने (कथञ्चित्) किसी प्रकार (क्लेशतिमिरविनाशी) अविद्या आदि क्लेशों के अन्धकार को नष्ट करने वाले (योगप्रदीपः) योग रूप दीपक को (आसादितः) प्राप्त किया है। (च) और (तस्य) उस योग रूप दीपक की, (एते) ये (तृष्णायोनयः विषयवायवः) तृष्णा को उत्पन्न करने वाली विषयों की वायु (प्रतिपक्षाः) विरोधी है।
(स खलु अहम्) वह मैं, (लब्धालोकः) योगदीपक के प्रकाश को प्राप्त करने वाला, (कथम्) किस प्रकार (अनया) इस (विषयमृगतृष्णया) विषय रूपी मृगतृष्णा से (वञ्चितः) छला जाता हुआ (तस्य एव) उस ही (प्रदीप्तस्य संसाराग्नेः) प्रज्वलित जन्म-मरण रूपी संसार की अग्नि में (पुनः) फिर से (आत्मानम्) अपने को (इन्धनीकुर्याम्) इन्धन बनाऊँ। (इति) इस प्रकार की भावना कर उन्हें कहे — “(स्वप्नोपमेभ्यः) स्वप्न तुल्य (कृपणजनप्रार्थनीयेभ्यः) कृपण = दीन मनुष्यों द्वारा प्रार्थना करने योग्य (विषयेभ्यः) विषयों का (स्वस्ति वः) और आप का कल्याण हो। ये आपको ही प्राप्त रहें। (इति एवम्) इस प्रकार (निश्चितमतिः) स्थिर बुद्धि वाला होकर योगी (समाधिम्) समाधि का (भावयेत्) अभ्यास करे।
(सङ्गम् अकृत्वा) विषयों के सङ्ग = आसक्ति से बचकर (स्मयम्) ऐसा अभिमान (अपि) भी (न कुर्यात्) न करे कि (एवम् अहम्) इस प्रकार मैं (देवानाम्) देवों = विद्वानों का (अपि) भी (प्रार्थनीयः इति) प्रार्थनीय हो गया हूँ। (स्मयात्) ऐसा अभिमान करने से (अयम्) यह योगी (सुस्थितम् मन्यतया) अपने को सुस्थिर मानते हुए (मृत्युना) मृत्यु के द्वारा, (केशेषु गृहीतम् इव) केशों से पकड़े जाने वाले के समान, (आत्मानम्) अपने को (न भावयिष्यति) नहीं जानेगा।
(तथा) वैसे ही (अस्य) इस योगी के (छिद्रान्तरप्रेक्षी) दूसरे छिद्रों = दोषों की प्रतीक्षा करने वाला (च) और (नित्यम् यत्नोपचर्यः) नित्य = महान् निरन्तर प्रयत्न से दूर करने योग्य, (प्रमादः) प्रमाद (लब्धविवरः) अवसर पाकर (क्लेशान्) अविद्यादि क्लेशों को (उत्तम्भयिष्यति) उभार देगा = उदार अवस्था में ला देगा। (ततः) इससे (पुनः) फिर से (अनिष्टप्रसङ्गः) अनिष्ट की प्राप्ति हो जायेगी। (अर्थात् संसार चक्र में फँसना हो जायेगा।)
(एवम्) इस प्रकार (सङ्गस्मयावकुर्वतः) आसक्ति और अभिमान न करते हुए (अस्य) इस योगी के द्वारा (भावितः अर्थः) भावित = सम्पादित किया गया अर्थ = योगाभ्यास (दृढीभविष्यति) दृढ़ होगा, (च) और (भावनीयः अर्थः) अगली भूमियों में साक्षात्कार होने वाला विषय (अभिमुखी भविष्यतीति) सामने उपस्थित होगा॥
वैदिक योग मीमांसा : महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि योगी पुरुष को, दूसरों पुरुषों द्वारा भोगों की प्राप्ति अथवा भोगों हेतु आमन्त्रण प्राप्त होने पर न तो उनमें राग = आसक्ति करनी चाहिए और न ही स्वयं की किसी योग्यता पर अभिमान करना चाहिए, अन्यथा योगी अपनी स्थिति से भ्रष्ट होकर पुनः अविद्यादि क्लेशों से ग्रस्त हो जायेगा। योगी पुरुष चार प्रकार के होते हैं —
१. प्राथमकल्पिक योगी — ऐसा साधक जो अष्टाङ्गयोग का पालन करते हुए वितर्कानुगत सम्प्रज्ञात समाधि के स्तर पर पहुँचा है, और उसे अभी सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि में स्थूल पदार्थों के आलम्बन के आश्रय से विषयों के ज्ञान की प्रवृत्तिमात्र आरम्भ हुई हो।
२. मधुभूमिक योगी — जब योगी सवितर्क सम्प्रज्ञात समाधि से आरम्भ कर निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधि का सम्पादन कर लेता है और उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति हो जाती है (योग० १.४८)। ऐसा योगी द्वितीय स्तर का मधुभूमिक संज्ञा वाला कहलाता है।
३. प्रज्ञाज्योति योगी — जिस योगी ने भूतजय (योग० ३.४४) तथा इन्द्रियजय (योग० ३.४७) की स्थिति को प्राप्त कर लिया हो, वह तृतीय स्तर का प्रज्ञाज्योति संज्ञा वाला योगी कहलाता है।
४. अतिक्रान्तभावनीय योगी — जो योगी असम्प्रज्ञात समाधि की उच्चावस्था में पहुँच गया हो तथा उसके लिए एकमात्र ही प्रयोजन शेष हो — चित्त को अपने कारण प्रकृति में लीन करना। उस योगी की सात प्रकार की प्रान्तभूमि प्रज्ञा होती है। (इनका वर्णन योगसूत्र २.२७ की व्याख्या में किया गया है।)
महर्षि व्यास कहते हैं कि दूसरे स्तर वाले योगी अर्थात् ऋतम्भरा प्रज्ञा वाले योगी के लिए, उसकी सत्त्व = बुद्धि की शुद्धता एवं प्रज्ञा को देखते एवं जानते हुए, स्थानीय धन-सम्पत्ति आदि के स्वामी एवं विद्वानों द्वारा सत्कार पूर्वक निमन्त्रण, द्वारा विभिन्न भोगों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें लौकिक धन-सम्पदा, दिव्य रसायन आदि जो शरीर को सुदृढ़ करते, पदार्थ विज्ञान के आधार पर बने यन्त्र जो कि शरीर की क्षमताओं की वृद्धि करते यथा विमान आदि तथा स्त्री आदि सम्मिलित होते हैं। योगी द्वारा अपनी सिद्धियों आदि के प्रदर्शन करने पर उसे इस प्रकार के निमन्त्रण स्वाभाविक रूप से मिलते हैं। इस स्थिति से बचने हेतु ही शास्त्रकारों ने योगी के लिए एकान्तवास को प्राथमिकता दी है।
इस प्रकार के सभी भोग एवं भोग्य पदार्थों की उपलब्धि, योगी के लिए एक प्रकार की परीक्षा है, जो इसमें फँस जाता है वह अपने मार्ग से पतति होकर, फिर से अनिष्ट को प्राप्त होकर संसार चक्र में लग जाता है; और जो नहीं फँसता, वह योग मार्ग पर आगे चल कर आत्म-साक्षात्कार और परमात्म-साक्षात्कार करने में समर्थ हो जाता है। यमाचार्य द्वारा नचिकेता को भी इसी प्रकार के प्रलोभन दिए गए, यथा “सौ वर्ष पर्यन्त जीने वाले पुत्र, पौत्रों, गाय आदि पशुओं, हाथी, घोड़ों एवं सुवर्ण को माँगो, पृथिवी के बड़े से बड़े राज्य को माँगो, अपने लिए दीर्घ कालीन जीवन माँगो। इस आत्मज्ञान के तुल्य कही जाने वाली जो वस्तु समझते हो, भोग के समस्त साधनों युक्त दीर्घ जीवन, भूमि पर विशाल साम्राज्य आदि भोग प्राप्त करो। जो-जो कामनाएँ दुर्लभ हैं, उन सब कामनाओं को स्वेच्छा से माँगो, ये जो रमण के साधन सम्पन्न रथों पर बैठी हुई, श्रुतिमधुर बाजों के सहित मनुष्यों को प्रसन्न करने वाली रूपवती स्त्रियाँ, जो सामान्य मनुष्यों को प्राप्त नहीं हो सकती, उन्हें प्राप्त करो, इनसे अपनी सेवा कराओं। हे नचिकेता मृत्यु के बाद आत्मा की स्थिति = सत्ता के विषय में मत पूछो।” (कठो॰ १.२३-२५) परन्तु नचिकेता इन भोगों के प्रलोभन में नहीं आया।
अतः इसी प्रकार महर्षि व्यास भी यहाँ योगी के लिए प्रतिपक्ष भावना का निर्देश करते हुए कहते हैं कि इस प्रकार के निमन्त्रण प्राप्त होने पर योगी यह विचार करे कि — “इस भीषण संसार की अग्नि में जलते हुए, जन्म-मरण की अन्धपरम्परा में लगातार भटकते हुए, मैंने इस जीवन में किसी प्रकार से योग रूपी दीपक को प्राप्त किया है। अब पुनः विषयों में फँस कर इस दीपक की अग्नि को नष्ट क्यों करूँ ? इन विषयों की मृगतृष्णा में फँसकर पुनः अपने आप को इस जन्म-मरण रूपी संसार का ईन्धन क्यों बनाऊँ। ” इस प्रकार से विचार कर इन विषय-भोगों को अस्वीकार करे, उनमें किसी प्रकार की आसक्ति = राग न करे। इस प्रकार स्थिर बुद्धि वाला होकर योगी, योग की आगे की भूमियों की प्राप्ति हेतु संलग्न हो जाये। योगी के लिए इस प्रकार की प्रतिपक्ष भावना का निर्देश महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.३३ की व्याख्या में भी किया है।
महर्षि व्यास आगे कहते हैं कि इस प्रकार से इन प्रलोभनों से बच कर, वह किसी प्रकार का अभिमान भी न करे कि मुझमें इस प्रकार की योग्यता आ गई है कि मैं स्थानीय देवों एवं विद्वानों का प्रार्थनीय हो गया हूँ, और न ही अपने वैराग्य पर ही अभिमान करे। ऐसा करने से उसमें प्रमाद उत्पन्न होगा जिससे अविद्यादि क्लेश फिर से उदार अवस्था में आ जायेंगे। ऐसा होने पर वह योगी फिर से अनिष्ट को प्राप्त होगा अर्थात् संसारचक्र रूप जन्म-मरण के अनवरत चक्र में पुनः लग जायेगा।
परन्तु यह आसक्ति और अभिमान रहित स्थिति का होना केवल द्वितीय स्तर वाले योगी के लिए ही अनिवार्य नहीं है किन्तु हर उस योगी के लिए अनिवार्य है जिसके अविद्या आदि क्लेश, और संस्कार दग्धबीज अवस्था तक नहीं पहुँचे हैं। दग्धबीज भाव की अवस्था से पूर्व योगी के क्लेश प्रसुप्त अथवा तनु अवस्था में होने से, कभी भी किसी भी प्रकार के तीव्र आलम्बन को पाकर पुनः उदार अवस्था में आ सकते हैं। अतः योगी को अत्यधिक सतर्क रहना होता है। इस प्रकार से सतर्क होता हुआ, योगी आसक्ति और अभिमान से सर्वथा रहित रहता हुआ अपर और पर वैराग्य का सम्पादन करता हुआ, योग के सतत् अभ्यास द्वारा न केवल अपने वर्त्तमान स्तर पर ही दृढ रहता है, बल्कि आगे की भूमियों की प्राप्ति में तत्पर रहता हुआ, अपने अन्तिम लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थरत रहता है।
हिंदी में टिप्पणी : गंगा नदी का जल अपने उद्गम स्थल से चलता हुआ जिस मार्ग से आता है, वह मार्ग ऐसे वनस्पति, औषधीय वृक्षों के सघन वन से घिरा होने से, इससे इस जल में बहुत प्रकार के औषधि, रसायन गुण होने से स्नान, पानादि द्वारा शरीर को सुख पहुँचाता है। महाभारत काल और उसके भी बहुत काल पश्चात् तक यह एक तथ्य सा था जिसके आधार पर महर्षि व्यास ने “पुण्या मन्दाकिनी” कहा है जिसका अभिप्राय है सुखकारी गंगा। वर्त्तमान काल में भी गंगोत्री के निकटवर्ती प्रदेशों में गंगा जल अपने औषधीय गुणों के कारण दीर्घ काल तक दूषित नहीं होता। परन्तु पौराणिक काल में “पुण्या मन्दाकिनी” से गंगा स्नान मात्र से पुण्य की प्राप्ति की कपोल कल्पना कर ली गई, जो कि अवैदिक है। इस सन्दर्भ में जो भी भोग गिने गए हैं वे सभी शरीरिक सुख प्रदान आदि में समर्थ हैं, अतः “पुण्या मन्दाकिनी” को भी इसी सन्दर्भ में समझना चाहिए।