In Hindi:
पदपाठ : तत् वैराग्यात् अपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्॥
हिंदी में अर्थ : (तत्) उस विवेकख्याति से (अपि) भी (वैराग्यात्) वैराग्य हो जाने पर (दोषबीजक्षये) सभी दोषों के बीज अविद्यादि क्लेशों का क्षय = नाश हो जाने पर (कैवल्यम्) कैवल्य = मोक्ष हो जाता है॥
महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “(तद्वैराग्या॰) अर्थात् शोकरहित आदि सिद्धि से भी विरक्त होके सब क्लेशों और दोषों का बीज जो अविद्या है, उसके नाश करने के लिए यथावत् प्रयत्न करे क्योंकि उसके नाश के बिना मोक्ष कभी नहीं हो सकता।” (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)
व्यास भाष्य : यदास्यैवं भवति क्लेशकर्मक्षये सत्त्वस्यायं विवेकप्रत्ययो धर्मः सत्त्वं च हेयपक्षे न्यस्तं पुरुषश्चापरिणामी शुद्धोऽन्यः सत्त्वादिति। एवमस्य ततो विरज्यमानस्य यानि क्लेशबीजानि दग्धशालिबीजकल्पान्यप्रसवसमर्थानि तानि सह मनसा प्रत्यस्तं गच्छन्ति। तेषु प्रलीनेषु पुरुषः पुनरिदं तापत्रयं न भुङ्क्ते। तदेतेषां गुणानां मनसि कर्मक्लेशविपाकस्वरूपेणाभिव्यक्तानां चरितार्थानां प्रतिप्रसवे पुरुषस्यात्यन्तिको गुणवियोगः कैवल्यम्, तदा स्वरूपप्रतिष्ठा चितिशिक्तरेव पुरुष इति॥
हिंदी में अर्थ : (यदा) जब (क्लेशकर्मक्षयम्) क्लेशों और कर्माशय के क्षीण हो जाने पर (अस्य) इस योगी को (एवम् भवति) ऐसा ज्ञान होता है कि (अयम्) यह (विवेकप्रत्ययः) विवेकख्याति = विवेकज्ञान (सत्त्वस्य) सत्त्वगुण का (धर्मः) धर्म है, (च) और (सत्त्वम्) यह सत्त्वगुण तो जड़, परिणामी, परार्थ होने से (हेयपक्षे) त्याज्य कोटि में (न्यस्तम्) डाला गया है; (च) और (पुरुषः) पुरुष (अपरिणामी) अपरिणामी = परिणाम रहित (शुद्धः) शुद्ध स्वरूप (सत्त्वात् अन्यः इति) सत्त्वगुण से सर्वथा भिन्न है। (ततः) तब (एवम्) इस प्रकार से (विरज्यमानस्य) उस विवेकख्याति से भी विरक्त होता हुआ (अस्य) इस योगी के (यानि क्लेशबीजानि) जो क्लेशों के बीज (दग्धशालिबीजकल्पानि) जले हुए धान के बीजों के समान (अप्रसवसमर्थानि) पुनः उगने में असमर्थ रहते हैं, (तानि) वे (मनसा सह) मन = चित्त के साथ (प्रत्यस्तम् गच्छन्ति) कारण में लीन हो जाते है। (तेषु) उनके (प्रलीनेषु) लीन हो जाने पर (पुरुषः) पुरुष (इदम् तापत्रयम्) इस त्रिविध = आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक तापों को (पुनः) फिर से (न भुङ्क्ते) नहीं भोगता।
(तत्) तब (मनसि) मन में (कर्मक्लेशविपाकस्वरूपेण) कर्म, क्लेश और कर्मफल के रूप से (अभिव्यक्तानाम्) अभिव्यक्त होने वाले, किन्तु (चरितार्थानाम्) चरितार्थ हुए = पुरुष के भोग और अपवर्ग प्रयोजनों को पूर्ण करने से (एतेषाम् गुणानाम्) इन सत्त्वादि गुणों के (प्रतिप्रसवे) प्रकृति में लीन होने पर (पुरुषस्य) पुरुष का (आत्यन्तिकः गुणवियोगः) सत्त्वादि गुणों से अत्यन्त वियोग रूप (कैवल्यम्) कैवल्य = मोक्ष होता है। (तदा) उस स्थिति में (पुरुषः) पुरुष (स्वरूपप्रतिष्ठा) अपने स्वरूप में स्थित (चितिशक्तिः एव) चैतन्य मात्र ही (इति) होता है॥
वैदिक योग मीमांसा : अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में चित्त के माध्यम से बुद्धि और पुरुष के भेद ज्ञान का साक्षात्कार करने से पुरुष को प्राप्त होने वाली सर्वभावाधिष्ठातृत्व और सर्वज्ञातृत्व सिद्धियों के आधार पर, पुरुष सत्त्वादि गुणों के सभी विकारों के वर्त्तमान धर्म के साथ-साथ भूत और भविष्यत् धर्मों को जानता हुआ उन पर अधिकार प्राप्त कर लेता है। परन्तु इस प्रकार से योगी प्रकृति के विकारों पर वशित्व प्राप्त करता हुआ भी स्वरूपप्रतिष्ठा को प्राप्त करने में असमर्थ रहता है। पुरुष साक्षात्कार का अभिलाषी योगी, इस स्थिति को भी अपने लक्ष्य में बाधक मानता है। रजोगुण और तमोगुण के मलों से सर्वथा रहित अवस्था वाला योगी चित्तगत अविद्या आदि क्लेशों और उन क्लेशों के कारण होने वाले कर्मों को क्षीण करता है, अर्थात् वह क्लेशों को तनु करता हुआ प्रसुप्तावस्था में ला देता है। ऐसी अवस्था की प्राप्ति होने पर, यह जो सत्त्वपुरुषान्यता रूप विवेकख्याति है, जो कि शुद्ध सत्त्वगुण का ही परिणाम है, योगी उससे भी विरक्त होता है। क्योंकि इस स्थिति में योगी यह जानता है कि सत्त्वगुण भी जड़, परिणामी, परार्थ है, और यह पुरुष साक्षात्कार कराने में सर्वथा असक्ष्म है। दूसरी ओर जो चित्तिशक्ति = चेतन पुरुष है वह अपरिणामी, शुद्धस्वरूप तथा सत्त्वगुण से सर्वथा भिन्न है।
इस प्रकार योगी पुरुष = आत्मा की श्रेष्ठता को जानता हुआ, सत्त्वगुण से भी विरक्त होता है। इस परवैराग्य का सम्यक् रूप से सम्पादन करने से योगी के चित्त में उपस्थित अविद्या आदि क्लेश दग्धबीजभाव को प्राप्त होते हैं, अर्थात् वे जले हुए धान के उन बीजों के समान हो जाते हैं, जो पुनः उगने में असमर्थ होते हैं। इस अवस्था वाले क्लेशों के साथ मन = चित्त अपने कारण मूल प्रकृति में लीन हो जाता है। इस स्थिति को महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.५ के भाष्य में भी इस प्रकार से कहा है “तदेवंभूतं चित्तमवसिताधिकारमात्मकल्पेन व्यवतिष्ठते प्रलयं वा गच्छतीति।” इस प्रकार चित्त का अधिकार समाप्त हो जाने पर, क्लेशों के दग्धबीजभाव को प्राप्त हो जाने पर, चित्त के अपने कारण प्रकृति में लीन हो जाने पर अथवा उस चित्त के आत्मस्वरूप में स्थित होने पर योगी त्रिविध तापों को पुनः नहीं भोगता।
कैवल्य प्राप्ति हेतु अविद्यादि क्लेशों की निवृत्ति और सिद्धियों से विरक्ति को, महर्षि दयानन्द ने यजु॰ १९.७४ के भावार्थ में निम्न प्रकार से कहा है —
ये युक्ताहारविहारा वेदानधीत्य योगमभ्यस्याऽविद्यादि क्लेशान्निवर्त्य योगसिद्धीः प्राप्यः तदभिमानमपि विहाय कैवल्यमाप्नुवन्ति ते ब्रह्मानन्दम्भुञ्जते॥
अर्थात् जो उचित आहार-विहार वाले होकर, वेदों को पढ़कर, योगाभ्यास कर, अविद्यादि क्लेशों को छुड़ा, योग की सिद्धियों को प्राप्त हो और उनके अभिमान को भी छोड़कर = अर्थात् उनसे भी विरक्त होकर मोक्ष को प्राप्त होते हैं, वे ब्रह्मानन्द भोगते हैं॥ यहाँ भी कैवल्य प्राप्ति हेतु सिद्धियों से वैराग्य को स्पष्ट रूप से कहा है।
ऐसी अवस्था को प्राप्त योगी का चित्त, जोकि सत्त्वादि गुणों का ही परिणाम है, और जो क्लेश, कर्म और कर्मफल की अभिव्यक्ति का आधार होता था, वह चरितार्थ होता हुआ अर्थात् पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को पूर्ण करने के उपरान्त, इस वर्त्तमान शरीर से आत्मा का वियोग होने पर, इन सत्त्वादि गुणों के साथ अपने कारण, प्रकृति में लीन होने से अर्थात् दग्धबीज भाव को प्राप्त हुए क्लेशों सहित इस चित्त के प्रकृति में लीन हो जाने से पुरुष = आत्मा की सत्त्वादि गुणों से अत्यन्त निवृत्ति हो जाती है। इस प्रकार चित्त की निवृत्ति हो जाने से उस योगी को कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है। ऐसी अवस्था में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित चैतन्य मात्र ही होता है।
शंका — आत्मा की सत्त्वादि गुणों से निवृत्ति हो जाने से क्या वह कैवल्य में ज्ञान, क्रिया हीन हुआ निश्चेष्ट ही एक स्थान में रहता है ?
समाधान — उस स्थिति में आत्मा अपनी स्वाभाविक शक्तियों के आश्रय से कैवल्य में रहता है, और अपनी इन स्वाभाविक शक्तियों के आश्रय से अव्याहत गति से परमात्मा में विचरण करता हुआ आनन्द को भोगता है। इस सम्बन्ध में शास्त्रकार ऋषियों ने कहा है कि “उसके साथ सङ्कल्पादि स्वाभाविक गुण सामर्थ्य सब रहते हैं, भौतिक संग नहीं रहता।” पुरुष की इस दुःखरहित अवस्था और कैवल्यानन्द प्राप्ति रूप स्थिति का चित्रण योगसूत्र ४.३४ की व्याख्या में किया है।