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Vibhuti Paada / Attainments / 53
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Vibhuti Paada / Attainments / 53

जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः॥५३॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 53

In Hindi:

पदपाठ : जातिलक्षणदेशैः अन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोः ततः प्रतिपत्तिः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तस्य विषयविशेष उपक्षिप्यते—

हिंदी में अर्थ : (तस्य) उस विवेकज्ञान का (विषयविशेष) विशिष्ट विषय (उपक्षिप्यते) प्रस्तुत किया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (तुल्ययोः) दो समान वस्तुओं = पदार्थों का (जातिलक्षणदेशैः) जाति, लक्षण और देश से (अन्यतानवच्छेदात्) भेद का निश्चय न होने से (ततः) उस विवेकजज्ञान से ही (प्रतिपत्तिः) भेद का निश्चय होता है॥

व्यास भाष्य : तुल्ययोर्देशलक्षणसारूप्ये जातिभेदोऽन्यताया हेतुर्गौरियं वडवेयमिति। तुल्यदेशजातीयत्वे लक्षणमन्यत्वकरं कालाक्षी गौः स्वस्तिमती गौरिति। द्वयोरामलकयोर्जातिलक्षणसारूप्याद्देशभेदोऽन्यत्वकर इदं पूर्वमिदमुत्तरमिति। यदा तु पूर्वमामलकमन्यव्यग्रस्य ज्ञातुरुत्तरदेश उपावर्त्यते तदा तुल्यदेशत्वे पूर्वमेतदुत्तरमेतदिति प्रविभागानुपपत्तिः। असन्दिग्धेन च तत्त्वज्ञानेन भवितव्यमित्यत इदमुक्तं ततः प्रतिपत्तिर्विवेकजज्ञानादिति।

कथम्? पूर्वामलकसहक्षणो देश उत्तरामलकसहक्षणाद्देशाद्भिन्नः। ते चामलके स्वदेशक्षणानुभवभिन्ने। अन्यदेशक्षणानुभवस्तु तयोरन्यत्वे हेतुरिति। एतेन दृष्टान्तेन परमाणोस्तुल्यजातिलक्षणदेशस्य पूर्वपरमाणुदेशसहक्षणसाक्षात्करणादुत्तरस्य परमाणोस्तद्देशानुपपत्तावुत्तरस्य तद्देशानुभवो भिन्नः सहक्षणभेदात्तयोरीश्वरस्य योगिनोऽन्यत्वप्रत्ययो भवतीति।

अपरे तु वर्णयन्ति—येऽन्त्या विशेषास्तेऽन्यताप्रत्ययं कुर्वन्तीति। तत्रापि देशलक्षणभेदो मूर्तिव्यवधिजातिभेदश्चान्यत्वे हेतुः। क्षणभेदस्तु योगिबुद्धिगम्य एवेति। अत उक्तं मूर्तिव्यवधिजातिभेदाभावान्नास्ति मूलपृथक्त्वमिति वार्षगण्यः॥

हिंदी में अर्थ : (तुल्ययोः) दो समान पदार्थों के (देशलक्षणसारूप्ये) देश और लक्षण समान होने पर (जातिभेदः) उनकी जाति का भेद (अन्यताया) उन दोनों की भिन्नता का (हेतुः) हेतु = कारण होता है, जैसे (इयम्) यह (गौः) गाय हैं, (इयम् वडवा इति) यह घोड़ी है। (तुल्यदेशजातीयत्वे) उन पदार्थों में समान देश और जाति होने पर (लक्षणम्) उन पदार्थों का लक्षण (अन्यत्वकरम्) उनकी भिन्नता का हेतु होता है, जैसे (कालाक्षी गौः) काली आँख वाली गाय, (स्वस्तिमती गौः) स्वस्ति चिह्न वाली गाय (इति) इत्यादि। (द्वयोः आमलकयोः) दो आँवलों के (जातिलक्षणसारूप्यात्) जाति और लक्षण समान होने पर (देशभेदः) उनके देश = स्थान का भेद ही (अन्यत्वकरः) उनकी भिन्नता का हेतु होता है, जैसे (इदम् पूर्वम्) यह पूर्वदेश में स्थित आँवला है, (इदम् उत्तरम् इति) यह उत्तर देश में स्थित आँवला है।

(यदा तु) जब तो (अन्वव्यग्रस्य ज्ञातुः) ज्ञाता पुरुष के अन्य विषय में आसक्त होने पर (पूर्वम् आमलकम्) पूर्व देश में स्थित आँवले को (उत्तरदेशे) उत्तर देश में (उपावर्त्यते) रख दिया जाए, (तदा) तब उस ज्ञाता पुरुष को (तुल्यदेशत्वे) दोनों आँवलों के एक देश = स्थानीय होने पर (एतत् पूर्वम् एतत् उत्तरम्) यह पूर्वदेश का आँवला है, यह उत्तर देश का आँवला है (इति) इस प्रकार का (प्रविभागानुपपत्तिः) विभाग = भेद करना सम्भव नहीं होता। (च) और (तत्त्वज्ञानेन असन्दिग्धेन) तत्त्वज्ञान असंदिग्ध = सन्देह रहित (भवितव्यम्) होना चाहिए (इति अतः) इसलिए (इदम् उक्तम्) यह कहा गया है कि (ततः) उस (विवेकजज्ञानात्) विवेकजज्ञान से (प्रतिपत्तिः इति) इस प्रकार का ज्ञान होता है।

(कथम्) कैसे विवेकजज्ञान से भेदज्ञान होता है? (पूर्वामलकसहक्षणः देशः) पूर्व देश में स्थित आँवले के साथ के क्षणों वाला देश (उत्तरामलकसहक्षणात् देशात्) उत्तर देश में स्थित आँवले के साथ के क्षणों वाले देश से (भिन्नः) भिन्न है; (च) और (ते) वे दोनों (आमलके) आँवले (स्वदेशक्षणानुभवभिन्ने) अपने-अपने देशों के क्षणों के अनुभव के कारण भिन्न हैं। (अन्यदेशक्षणानुभवः तु) अन्य देशों के क्षणों का अनुभव ही (तयोः) उन दोनों आँवलों की (अन्यत्वे) भिन्नता में (हेतुः इति) हेतु = कारण है।

(एतेन दृष्टान्तेन) इस दृष्टान्त से (तुल्यजातिलक्षणदेशस्य) समान जाति, समान लक्षण और समान देश वाले (परमाणोः) परमाणु का (पूर्वपरमाणुदेशसहक्षणसाक्षात्करणात्) पूर्व परमाणु के देश के साथ वाले क्षणों का साक्षात्कार हो जाने से (उत्तरस्य परमाणोः) उत्तर देश वाले परमाणु में (तद्देशानुपपत्तौ) वह देश न होने से (उत्तरस्य) उस उत्तर वाले परमाणु का (तद्देशानुभवः भिन्नः) उस (उत्तर) देश वाला अनुभव भिन्न होता है। (सहक्षणभेदात्) सम्बन्धित क्षणों का भेद होने से (तयोः) उन दोनों परमाणुओं की (अन्यत्वप्रत्ययः) भिन्नता का ज्ञान (ईश्वरस्य योगिनः) विवेकजज्ञान रूपी ऐश्वर्य सम्पन्न योगी को (भवति इति) होता है।

(अपरे तु वर्णयन्ति) अन्य आचार्य तो इस प्रकार कहते हैं — (ये) जो (अन्त्याः विशेषाः) अन्तिम विशेष अर्थात् परमाणु आदि अन्तिम पदार्थों में रहने वाले विशेष होते हैं, (ते) वे ही (अन्यताप्रत्ययम्) भिन्नता का ज्ञान (कुर्वन्ति इति) कराते हैं। परन्तु (तत्र अपि) उस सिद्धान्त में भी (देशलक्षणभेदः) देश तथा लक्षण भेद (च) और (मूर्तिव्यवधिजातिभेदः) मूर्त्ति = पिण्डरूप संस्थान, व्यवधान और जाति भेद ही (अन्यत्वे) भिन्नता का (हेतुः) हेतु = कारण है। दूसरी ओर सबसे सूक्ष्म (क्षणभेदः) क्षणभेद (तु) तो (योगिबुद्धिगम्य एव इति) योगी की बुद्धि से ही जाना जाता है। (अतः) इसलिए (वार्षगण्यः) आचार्य वार्षगण्य ने (उक्तम्) कहा है — (मूर्ति- व्यवधिजातिभेदाभावात्) मूर्त्ति, व्यवधान और जाति भेद के कारणों का अभाव होने से (मूलपृथक्त्वम्) जगत् के मूल कारण अर्थात् प्रकृति में पृथकता (न अस्ति इति) नही है॥

वैदिक योग मीमांसा : पिछले सूत्र में क्षण और उसके क्रम में संयम करने से, विवेकजज्ञान की प्राप्ति को कहा है। इस विवेकजज्ञान की विशेष योग्यता का वर्णन, महर्षि पतञ्जलि इस सूत्र में, करते हुए कहते हैं कि जिन दो समान प्रतीत होने वाले पदार्थों के भेद ज्ञान का निर्णय जाति, लक्षण और देश से नहीं हो सकता, उन पदार्थों के भी भेद ज्ञान का निश्चय इस विवेकजज्ञान से योगी को हो जाता है। पदार्थों / वस्तुओं के भेद ज्ञान को लोक में जनसामान्य उन पदार्थों की जाति, उनके लक्षण अथवा उनकी देशविशेष में स्थिति से करते हैं। जिसको इस प्रकार से समझना चाहिए —

१. जाति — किन्ही दो पदार्थों में भेद ज्ञान हेतु उन पदार्थों की जाति प्रमुख साधन है। किन्हीं दो पदार्थों के लक्षण समान होने पर तथा उनके एक ही देश में स्थित होने पर उन दोनों की जाति ही उनके भेद का निश्चय कराती है। यदि श्वेत रंग के दो पशु यदि एक स्थान में खड़े हों तो उनकी जाति से उनके भेद का निश्चय किया जाता है जैसे कि यह गाय है और यह घोड़ी है। इस प्रकार से यह भेद निर्णय उन दोनों की जाति के आधार पर होता है।

२. लक्षण — यदि किन्हीं दो पदार्थों की जाति तथा देश समान हो तो उनके लक्षण से उनके भेद का निश्यच किया जाता है। यदि किसी एक स्थान पर दो गायें खड़ी हो तो उनके विभिन्न लक्षण उनके भेद का निर्णय कराते हैं जैसे कि यह काली आँख वाली गाय है, यह स्वस्ति चिह्न वाली गाय है, आदि।

३. देश — यदि कोई दो पदार्थ समान जाति और लक्षण वाले हों तो उन दोनों की देश विशेष में स्थिति से उनके भेद का निश्चय किया जाता है। जैसे दो समान आकार के आँवले रखे हों तो उनके स्थान की भिन्नता से उनके भेद को जाना जाता है, कि यह पूर्व देश में स्थित आँवला है, यह उत्तर देश में स्थित आँवला है।

उपर्युक्त उदाहरणों में जाति और लक्षण से भेद ज्ञान का निर्णय तो स्पष्ट रूप से जाना जाता है परन्तु देश विशेष के भेद से उन पदार्थों की समान जाति और समान लक्षण में किसी अन्तर को उत्पन्न नहीं करता। अर्थात् यदि पूर्व देश में स्थित आँवले को उत्तर देश वाले आँवले से बदल दिया जाये तो अथवा उन दोनों को एक साथ रख दिया जाए तो साधारण मनुष्य उन दोनों आँवलों में कोई भेद नहीं कर सकता कि कौन सा आँवला पहले पूर्व अथवा उत्तर देश में स्थित था ?

परन्तु महर्षि व्यास कहते हैं कि तत्त्वज्ञान तो किसी भी प्रकार के सन्देह से रहित होता है। अतः विवेकजज्ञान से उन दोनों के भेद का निर्णय किया जाता है। इस भेदज्ञान को विवेकजज्ञान अर्थात् क्षणों और उनके क्रम में साक्षात्कार से प्राप्त किया जाता है। जो आँवला पूर्व देश में स्थित था उस आँवले के साथ के क्षणों वाला देश, दूसरे आँवले के साथ के क्षणों वाले देश से भिन्न था; और वे दोनों ही आँवले अपने-अपने देश के साथ के क्षणों के अनुभव के कारण भिन्न होते हैं। अर्थात् पहला आँवला जिन क्षणों में पूर्व देश में स्थित था, उन क्षणों में दूसरा आँवला उस देश में न होकर दूसरे देश में था। अतः उन दोनों आँवलों के साथ के क्षणों से विभिन्न देशों का सम्बन्ध होने से, यह विभिन्न देशस्थ क्षणों का अनुभव, उन दोनों आँवलों के भेद का निश्चय कराने में समर्थ होता है।

इस प्रकार से भेदज्ञान का निर्णय क्षणों और उनके क्रम में संयम की योग्यता से योगी को ही हो पाता है। इसी उदाहरण से महर्षि व्यास कहते हैं कि समान जाति, समान लक्षण और समान देश वाले सूक्ष्म परमाणुओं के भेद ज्ञान का निश्चय भी, उन परमाणुओं के देशविशेष के क्षणों के साक्षात्कार द्वारा, विवेकजज्ञान सम्पन्न योगी ही कर सकता है।

किन्हीं पदार्थों में भेदज्ञान हेतु जाति भेद और लक्षण भेद तो पदार्थों के स्वरूप में ही निहित होता है, परन्तु देश भेद पदार्थ के स्वरूप में निहित न होकर, उस पदार्थ के देश विशेष से सम्बन्ध में निहित होता है। महर्षि व्यास ने देश भेद हेतु जिस प्रक्रिया को कहा है, लगभग उसी के आधार पर आधुनिक वैज्ञानिकों ने Relativity Theory of Time and Space अर्थात् “समय और काल के सम्बन्ध के सिद्धान्त” को प्रतिपादित किया है। वस्तुतः कोई भी पदार्थ किसी भी समय किसी न किसी देश और काल से अर्थात् दोनों से ही सम्बन्धित होता है। शास्त्रकारों ने काल और देश (आकाश) को नित्य कहा है। अतः नित्य रूप से उपलब्ध होने वाले व्यापक देश और काल से, कोई भी पदार्थ सदा ही सम्बन्धित रहता है, अर्थात् वह पदार्थ किसी न किसी देश के साथ और इसी प्रकार से सदा ही काल से सम्बन्धित रहता है।

काल अर्थात् क्षणों और उनके क्रम में संयम की योग्यता से योगी, अमुक पदार्थ उस काल विशेष में किस देश से सम्बन्धित था, इसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है; और इसी को विवेकजज्ञान कहा गया है। योगसूत्र ३.५४ में महर्षि पतञ्जलि ने विवेकजज्ञान को “सर्वथाविषयम्” कहा है जिसका अर्थ करते हुए मर्हिर्ष व्यास लिखते हैं — “सर्वथाविषयमतीतानागतप्रत्युत्पन्नं सर्वं पर्यायैः सर्वथा जानातीत्यर्थः।” अर्थात् योगी अतीत, अनागत, वर्तमान रूप सभी पदार्थों को सभी प्रकार से जानता है। अतः योगी द्वारा उपरोक्त प्रकार से क्षण और उसके क्रम में संयम करने और उस काल में उस पदार्थ से सम्बन्धित देश का साक्षात् करने से पदार्थ के भेदज्ञान करने में समर्थ रहता है।

किन्हीं दूसरे आचार्यों के मत में परमाणुओं में भेदज्ञान का निर्णय कराने में अन्तिम विशेष धर्म ही कारण होते हैं। परन्तु इस मान्यता में भी पदार्थों के मूर्त्ति, व्यवधान, जाति भेद, देश भेद और लक्षण भेद को भेद का कारण कहा और माना जाता है; और यह मान्यता सर्वसाधारण मनुष्यों द्वारा समान रूप से स्वीकृत होती है। दूसरी ओर उनके भेदज्ञान का सबसे सूक्ष्म कारण, क्षणभेद तो केवल और केवल मात्र योगी की बुद्धि से ही जाना जाता है। अतः विवेकजज्ञान सम्पन्न योगी स्थूल पदार्थों के साथ-साथ सूक्ष्म पदार्थों = परमाणुओं के भेद का निश्चय करने में समर्थ होता है, क्योंकि मूल प्रकृति के परमाणुओं का भेद ज्ञान उनकी जाति, लक्षण और देश के आधार पर नहीं हो सकता।

हिंदी में टिप्पणी : — (अ) न्याय ४.१.२८ की व्याख्या में महर्षि वात्स्यायन ने काल और आकाश को नित्य कहा है;

— (आ) महर्षि दयानन्द सत्यार्थ प्रकाश के १२ वें समुल्लास में जैनियों का खण्डन करते हुए कहते हैं — “क्योंकि आकाश काल जीव और परमाणु, ये नए वा पुराने कभी नहीं हो सकते। क्योंकि ये अनादि और कारण रूप से अविनाशी हैं”;

— (इ) शास्त्रों में सृष्टि काल और प्रलय काल की गणना उपलब्ध होने से, काल की नित्यता प्रमाणित होती है। इसी प्रकार यजु॰ ३१.४ में ब्रह्माण्ड के, परमात्मा के एक देश में ही प्रतिपादन होने से और शेष देश में न होने से देश की नित्यता प्रमाणित होती है;

— (ई) वैशेषिक दर्शन में महर्षि कणाद ने भी काल और देश की नित्यता को प्रतिपादित किया है। आकाश के सम्बन्ध में सूत्र २.१.२७-२९ तथा काल के सम्बन्ध में सूत्र २.२.६-९ देखें॥