In Hindi:
पदपाठ : तारकम् सर्वविषयम् सर्वथाविषयम् अक्रमम् च इति विवेकजम् ज्ञानम्॥
हिंदी में अर्थ : (तारकम्) तारक = अपनी प्रतिभा से उत्पन्न होने वाला, (सर्वविषयम्) सभी पदार्थों को विषय बनाने वाला, (सर्वथाविषयम्) सभी पदार्थों के लक्षण परिणाम = अतीत, अनागत और वर्त्तमान रूपों को विषय बनाने वाला, (च) और (अक्रमम् इति) क्रम की अपेक्षा के बिना होने वाला (विवेकजम् ज्ञानम्) विवेकज ज्ञान होता है॥
व्यास भाष्य : तारकमिति स्वप्रतिभोत्थमनौपदेशिकमित्यर्थः। सर्वविषयं नास्य किञ्चिदविषयीभूतमित्यर्थः। सर्वथाविषयमतीतानागतप्रत्युत्पन्नं सर्वं पर्यायैः सर्वथा जानातीत्यर्थः। अक्रममित्येकक्षणोपारूढं सर्वं सर्वथा गृह्णातीत्यर्थः। एतद्विवेकजं ज्ञानं परिपूर्णम्। अस्यैवांशो योगप्रदीपो मधुमतीं भूमिमुपादाय यावदस्य परिसमाप्तिरिति॥
हिंदी में अर्थ : (तारकम् इति) “तारक” अर्थात् (अनौपदेशिकम्) योगी को बिना किसी उपदेश के (स्वप्रतिभोत्थम्) अपनी प्रतिभा से उत्पन्न होने वाला ज्ञान होता है, (इति अर्थः) यह अर्थ है। (सर्वविषयम्) “सर्वविषय” अर्थात् (अस्य) इस विवेकजज्ञान का (किञ्चित् अविषयीभूतम्) कोई भी पदार्थ अविषय (न) नहीं होता, (इति अर्थः) यह अर्थ है। (सर्वथाविषयम्) “सर्वथाविषय” अर्थात् योगी (अतीतानागतप्रत्युत्पन्नम्) भूत, भविष्यत और वर्त्तमान रूप (सर्वम्) सभी पदार्थों को (पर्यायैः) अनुक्रम से (सर्वथा) सब प्रकार से (जानाति) जानता है, (इति अर्थः) यह अर्थ है। (अक्रमम् इति) अक्रम अर्थात् (एकक्षणोपारूढम्) एक ही क्षण में उपस्थित (सर्वम्) सभी को (सर्वथा) सब प्रकार से (गृह्णाति) ग्रहण करता है, (इति अर्थः) यह अर्थ है। अतः (एतत्) यह (विवेकजम् ज्ञानम्) विवेकजज्ञान (परिपूर्णम्) परिपूर्ण होता है। (अस्य एव) इस विवेकजज्ञान का ही (अंशः योगप्रदीपः) एक अंश = भाग योगप्रदीप है, जो (मधुमतीम् भूमिम् उपादाय) मधुमती भूमि = ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्राप्ति से लेकर (यावत् अस्य परिसमाप्तिः इति) जब तक इस की परिसमाप्ति होती है अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि की पूर्व अवस्था तक यह विवेकज ज्ञान रहता है॥
वैदिक योग मीमांसा : क्षण और उसके क्रम में संयम करने से होने वाले विवेकजज्ञान, जो कि पदार्थों का सूक्ष्मतम भेद ज्ञान कराने में समर्थ होता है, की विशेषताओं को इस सूत्र में कहा गया है। इन विशेषताओं को निम्न प्रकार से जानना चाहिए —
१. तारक — विवेकजज्ञान को तारक कहा गया है। इसे स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि किसी उपदेश के बिना ही योगी की अपने प्रतिभा से होने वाला ज्ञान तारक कहा जाता है। अर्थात् इस ज्ञान में गुरुमुख से उपदेश की आवश्यकता नहीं होती, परन्तु योगी द्वारा जब किसी विषय विशेष को जानने हेतु उपर्युक्त संयम अर्थात् उस पदार्थ से क्षणों और उनके क्रम में संयम किया जाता है, तो इस संयम से योगी को उस ध्येय विषय में पूर्व पठित एवं उपदिष्ट ज्ञान से अतिरिक्त सम्बद्ध ज्ञान भी प्राप्त होता है, जो कि उस आलम्बित विषय का विशेषज्ञान कराता है। इस प्रकार योगी की अपनी योगज प्रतिभा से उत्पन्न हुए ज्ञान को तारक कहा जाता है।
कई भाष्यकारों ने भोज का अनुसरण करते हुए कहा है कि जिस ज्ञान से पुरुष इस अगाध संसार सागर से तर जाए, वह तारक कहाता है। इस प्रकार यह विवेकजज्ञान योगी को संसार-सागर से तैराने वाला होने से तारक कहा जाता है। परन्तु “तारक” की यह परिभाषा पुराणों के आधार पर की गई प्रतीत होती है। यह विवेकजज्ञान भी सत्त्वगुण का परिणाम होने से पुरुष = चित्तिशक्ति की अपेक्षा से हेय कोटि में ही आता है, और असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हेतु इससे भी वैराग्य होना आवश्यक होता है। अतः इस विवेकजज्ञान से, अविद्यादि क्लेशों और कर्माशय के दग्धबीजभाव न होने से, यह ज्ञान अपने आप में, संसार-सागर से तैराने वाला नहीं है। अतः महर्षि व्यास द्वारा किया गया अर्थ ही अधिक उचित है। हाँ, इस ज्ञान से योगी को पदार्थों का विशेषज्ञान होने से, उस योगी की वृत्ति प्रकृति की अपेक्षा पुरुषज्ञान की ओर हो जाने से, इस विवेकजज्ञान को असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हेतु एक महत्त्वपूर्ण साधन जानना चाहिए। परन्तु योगी के अन्तिम लक्ष्य कैवल्य प्राप्ति हेतु इस विवेकजज्ञान से भी वैराग्य का होना आवश्यक है।
२. सर्वविषय — विवेकजज्ञान सभी पदार्थों को विषय करने वाला होता है अर्थात् योगी सभी पदार्थों से सम्बन्धित क्षणों और उसके क्रम में संयम करके उस पदार्थ का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है। यहाँ सभी पदार्थों से प्रकृति के सभी विकारों को ही जानना चाहिए। भोज ने इसे स्पष्ट रूप से कहा है कि सभी महदादि पदार्थ = महत्तत्त्व आदि पदार्थ इस विवेकजज्ञान का विषय होते हैं। इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं है कि बिना संयम के ही योगी को सभी विषयों का विवेकजज्ञान हो जाता है।
३. सर्वथाविषय — सर्वथाविषय का अभिप्राय है कि योगी वर्त्तमान में उपलब्ध होने वाले सभी पदार्थों के भूत और भविष्यत् रूप ज्ञान को भी, उपर्युक्त प्रकार के संयम से, अनुक्रम से और सब प्रकार से जानता है। अर्थात् इस प्रकार के संयम से हुए विवेकजज्ञान से योगी को किसी भी कार्य पदार्थ के भूतलक्षणपरिणाम और भविष्यत् लक्षणपरिणाम का ज्ञान तथा अवस्था परिणाम का ज्ञान भी, विशेषतापूर्वक हो जाता है।
भोज ने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा है कि योगी को सभी विद्यमान पदार्थों के सम्बन्ध में, स्थूल और सूक्ष्म भेद से सभी अतीत, अनागत, वर्त्तमान अवस्थाओं द्वारा, उन-उन परिणामों के साथ ज्ञान होता है अर्थात् वर्त्तमान में उपलब्ध अमुक पदार्थ, भूत काल में किस अवस्था में था और भविष्यत् काल में किस अवस्था में होगा। अतः किसी भी धर्म परिणाम के, काल की अपेक्षा से कहे जाने वाले, लक्षण और अवस्था परिणामों को योगी विशेषता से जानता है।
४. अक्रम — अक्रम को स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि योगी एक ही क्षण में आरूढ = विद्यमान सभी को सब प्रकार से ग्रहण करता है। इसके आधार पर भाष्यकारों ने कहा है कि योगी एक ही क्षण में उपस्थित हुए बहुत से पदार्थों को एक साथ जान लेता है। परन्तु यहाँ सर्वम् का तात्पर्य — “एक से अधिक विद्यमान पदार्थ” न होकर “एक ही पदार्थ के सभी लक्षण और अवस्था परिणामों” से है। अतः इस अक्रमम् ज्ञान का अभिप्राय इस प्रकार से जानना चाहिए — वर्त्तमान क्षण में उपलब्ध होने वाला कोई भी पदार्थ भूतकाल में बहुत सी अवस्थाओं = परिणामों को प्राप्त करके उपलब्ध होता है, योगी उन सभी परिणामों को, इस विवेकजज्ञान से, एक साथ जान लेता है। जैसे वर्त्तमान में उपलब्ध होने वाला घड़ा, सर्वप्रथम मृत् परिणाम से पिण्ड परिणाम को और पिण्ड परिणाम से घट परिणाम को प्राप्त कर उपलब्ध होता है; और यही घड़ा भविष्यत् में कपाल परिणाम को और पुनः फिर से मृत् परिणाम को प्राप्त हो जायेगा। इसी प्रकार अवस्था परिणाम में क्षणों = काल के प्रभाव से घट में नूतनता से पुराणता आती जाती है। योगी इस विवेकजज्ञान के आधार पर इस घड़े के सभी भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान परिणामों को तथा उसकी सभी अवस्थाओं को बिना किसी क्रम के एक ही क्षण में एक साथ जान लेता है।
दूसरी ओर यदि योगी संयम हेतु एक ही काल में बहुत से पदार्थों का आलम्बन कर सके तो उन सभी का एक साथ युगपत् ज्ञान सम्भव माना जा सकेगा, परन्तु व्यवहार काल में तो एक समय में मन का सम्बन्ध एक ही इन्द्रिय से होने से, एक क्षण में एक ही विषय उपलब्ध होगा तो ऐसे में एक से अधिक पदार्थों के युगपत् ज्ञान का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता; जबकि यह तो सम्भव है कि योगी को एक ही पदार्थ की सभी अवस्थाओं का युगपत् ज्ञान हो जाए।
उपरोक्त चार प्रकार की विशेषताओं के कारण से, क्षण और उसके क्रम में संयम से होने वाला विवेकजज्ञान, अपने आप में परिपूर्ण होता है। इससे योगी को किसी भी पदार्थ का तारक = विशिष्ट ज्ञान, सब प्रकार का और क्रम की अपेक्षा से रहित ज्ञान प्राप्त हो जाता है। योगी को यह ज्ञान ऋतम्भरा प्रज्ञा से आरम्भ होकर असम्प्रज्ञात समाधि की पूर्व अवस्था तक बना रहता है। इस अवस्था में योगी सत्त्वगुण विशिष्ट इस ज्ञान को भी, चेतन पुरुष की अपेक्षा से हेय जानकर, इससे भी विरक्त होकर, पुरुष साक्षात्कार रूपी लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु संलग्न हो जाता है।