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Vibhuti Paada / Attainments / 55
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Vibhuti Paada / Attainments / 55

सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति॥५५॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 55

In Hindi:

पदपाठ : सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यम् इति॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : प्राप्तविवेकजज्ञानस्याप्राप्तविवेकजज्ञानस्य वा —

हिंदी में अर्थ : (प्राप्तविवेकजज्ञानस्य) विवेकजज्ञान रूप सिद्धि को प्राप्त करने वाले (वा) अथवा (अप्राप्तविवेकज- ज्ञानस्य) इस विवेकजज्ञान की सिद्धि को प्राप्त न करने वाले, दोनों प्रकार के योगियों को —

हिंदी में अर्थ : (सत्त्वपुरुषयोः) सत्त्व प्रधान बुद्धि, और पुरुष = जीवात्मा, इन दोनों की (शुद्धिसाम्ये) शुद्धि की समानता होने पर (कैवल्यम्) कैवल्य = मोक्ष होता है। (इति) यह तृतीय पाद की समाप्ति का सूचक है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (सत्त्वपुरुष०) अर्थात् सत्त्व जो बुद्धि, पुरुष जो जीव, इन दोनों की शुद्धि से मुक्ति होती है, अन्यथा नहीं। (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)

व्यास भाष्य : यदा निर्धूतरजस्तमोमलं बुद्धिसत्त्वं पुरुषस्यान्यताप्रतीतिमात्राधिकारं दग्धक्लेशबीजं भवति तदा पुरुषस्य शुद्धिसारूप्यमिवापन्नं भवति, तदा पुरुषस्योपचरितभोगाभावः शुद्धिः। एतस्यामवस्थायां कैवल्यं भवतीश्वरस्यानीश्वरस्य वा विवेकजज्ञानभागिनः इतरस्य वा। न हि दग्धक्लेशबीजस्य ज्ञाने पुनरपेक्षा काचिदस्ति।

सत्त्वशुद्धिद्वारेणैतत्समाधिजमैश्वर्यं ज्ञानं चोपक्रान्तम्। परमार्थतस्तु ज्ञानाददर्शनं निवर्त्तते। तस्मिन्निवृत्ते न सन्त्युत्तरे क्लेशाः। क्लेशाभावात्कर्मविपाकाभावः। चरिताधिकाराश्चैतस्यामवस्थायां गुणा न पुरुषस्य दृश्यत्वेन पुनरुपतिष्ठन्ते। तत्पुरुषस्य कैवल्यम्। तदा पुरुषः स्वरूपमात्रज्योतिरमलः केवली भवति॥

इति पातञ्जलयोगसूत्रे व्यासभाष्ये विभूतिपादः तृतीयः॥

हिंदी में अर्थ : (यदा) जब (निर्धूतरजस्तमोमलम्) रजोगुण और तमोगुण के मलों से रहित (बुद्धिसत्त्वम्) सत्त्वगुण प्रधान बुद्धि, (पुरुषस्य) पुरुष के (अन्यताप्रतीतिमात्राधिकारम्) अन्यता = भेदज्ञान मात्र अधिकार वाली, और (दग्धक्लेशबीजम्) दग्धक्लेशबीजभाव वाली = जले हुए क्लेश रूप बीजों वाली (भवति) होती है, (तदा) तब बुद्धि, (पुरुषस्य) पुरुष की (शुद्धिसारूप्यम् इव) शुद्धि के समान अर्थात् उसकी शुद्धि के सदृश स्वरूप को (आपन्नम् भवति) प्राप्त कर लेती है। (तदा) उस समय (उपचरितभोगाभावः) पुरुष में उपस्थित भोगों का अभाव हो जाना, (पुरुषस्य) पुरुष की (शुद्धिः) शुद्धि है।

(एतस्याम्) इस (अवस्थायाम्) अवस्था में योगी चाहे (ईश्वरस्य) ईश्वर = योगजविभूति जन्य ऐश्वर्य सम्पन्न हो, (वा) अथवा (अनीश्वरस्य) अनीश्वर = योगजविभूति जन्य ऐश्वर्य सम्पन्न न हो; और (विवेकजज्ञानभागिनः) विवेकजज्ञान से युक्त हो (वा) अथवा (इतरस्य) विवेकजज्ञान युक्त न हो, उसे (कैवल्यम् भवति) कैवल्य = मोक्ष प्राप्त हो जाता है। (हि) क्योंकि (दग्धक्लेशबीजस्य) दग्धक्लेशबीज वाले योगी को (पुनः) फिर से (ज्ञाने) ज्ञान की (काचित् अपेक्षा) कोई अपेक्षा (न अस्ति) नहीं रहती।

(सत्त्वशुद्धिद्वारेण) बुद्धि की शुद्धि द्वारा (एतत्) इस (समाधिजम् ऐश्वर्यम्) समाधिजन्य ऐश्वर्य (च) और (ज्ञानम्) ज्ञान को (उपक्रान्तम्) कहा गया है। (परमार्थतः तु) वास्तव में तो (ज्ञानात्) ज्ञान से (अदर्शनम्) अज्ञान = अविद्या की (निवर्तते) निवृत्ति होती है। (तस्मिन्) उस अज्ञान = अविद्या के (निवृत्ते) निवृत्त होने पर (उत्तरे क्लेशाः) अस्मिता आदि अगले क्लेश (न सन्ति) नहीं होते। (क्लेशाभावात्) क्लेशों का अभाव होने से (कर्मविपाकाभावः) कर्मफलों का अभाव हो जाता है। (च) और (एतस्याम् अवस्थायाम्) इस अवस्था में = क्लेशरहित अवस्था में (गुणाः) सत्त्व आदि गुण (चरिताधिकाराः) अपने अधिकार समाप्त होने से कृतकृत्य हुए (पुरुषस्य) पुरुष = जीवात्मा के लिए (पुनः) फिर से (दृश्यत्वेन) दृश्य रूप में = भोग्य रूप में (न उपतिष्ठन्ते) उपस्थित नहीं होते। (तत्) वह (पुरुषस्य) पुरुष का (कैवल्यम्) कैवल्य = मोक्ष है। (तदा) उस समय (पुरुषः) पुरुष = जीवात्मा (स्वरूपमात्रज्योतिः) केवल अपने चैतन्य स्वरूप वाला, (अमलः) सत्त्वादि गुणों के मलों से रहित = निर्मल, (केवली) केवली = मुक्त (भवति) होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी हेतु परम पुरुषार्थ अपवर्ग = मोक्ष की प्राप्ति हेतु सम्पादनीय स्थिति का विधान करते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि बुद्धि और पुरुष इन दोनों की समान रूप से शुद्धि हो जाने पर पुरुष को कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है। इस स्थिति से पूर्व की किसी स्थिति में पुरुष को कैवल्य प्राप्ति सम्भव नहीं हो सकती।

बुद्धि की शुद्धि क्या है ? बुद्धि की शुद्धि को कहते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि रजोगुण और तमोगुण के मलों से रहित हुई और सत्त्वगुण प्रधान बुद्धि के माध्यम से योगी जब सम्प्रज्ञात समाधि की विभिन्न अवस्थाओं को प्राप्त करते हुए अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की उच्चतम अवस्था तक पहुँचता है, तब इस अवस्था में उसकी बुद्धि विवेकख्याति अर्थात् बुद्धि और पुरुष के भेदज्ञान से युक्त होती है, और इसके उपरान्त जब चित्त में क्लेशों की दग्धबीजभाव वाली स्थिति प्राप्त हो जाती है, तो इस अवस्था वाली बुद्धि शुद्ध कहलाती है। वस्तुतः बुद्धि की यह शुद्धि इसकी उच्चतम शुद्धि है, परन्तु यह शुद्धि भी चेतन पुरुष की शुद्धता की अपेक्षा से न्यून ही रहती है। इस अवस्था में क्लेशों के दग्धबीजभाव होने से बुद्धि, पुरुष के समान पवित्र होकर रहती है और इसका अपने कारण प्रकृति में विलय होना ही एक मात्र कार्य शेष रहता है।

पुरुष की शुद्धि क्या है ? चेतन पुरुष = चितिशक्ति को तो स्वरूपतः ही शुद्ध कहा गया है। ऐसे में पुरुष की शुद्धता सम्पादन का क्या तात्पर्य है? असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था से भिन्न अवस्था में = व्युत्थान अवस्था में पुरुष, बुद्धि द्वारा उपलब्ध कराए गए, भोगों को प्राप्त करने वाला होता है, अर्थात् वह वृत्तियों के स्वरूप वाला होता है। पुरुष द्वारा बुद्धि के माध्यम से प्राप्त होने वाले भोगों को प्राप्त करना, वृत्तियों के स्वरूप वाला भासित होना ही इसकी अशुद्धि है। उपर्युक्त प्रकार से बुद्धि की शुद्धि हो जाने पर, पुरुष में बुद्धि द्वारा उपस्थित होने वाले भोगों का अभाव हो जाना, इसकी शुद्धि है।

इस अवस्था में अर्थात् बुद्धि और पुरुष दोनों की शुद्धि हो जाने पर, योगी ने चाहे इस पाद में कही गई विभूतियों = सिद्धियों को प्राप्त किया हो या न किया हो, और इसी प्रकार से विवेकजज्ञान अर्थात् क्षण और उनके क्रम में संयम से होने वाले, प्रकृति के विकार रूप सर्वविषय ज्ञान को प्राप्त किया हो या न किया हो, उसको कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है। इसमें कारण यह है कि योगी द्वारा क्लेशों को दग्धबीज रूप कर देने के पश्चात् उसे, इस प्रकार के किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती। अतः योगी ने विभूतियाँ प्राप्त की हों या न की हों, प्रकृति के विकारों का पूर्णरूपेण ज्ञान हो या न हो, उसके लिए कैवल्य प्राप्ति में कोई बाधा नहीं होती। यहाँ पर यह ध्यान रखना चाहिए कि योगी के लिए प्रकृति-पुरुष भेद ज्ञान रूपी विवेकख्याति का निषेध नहीं है, किन्तु इस ज्ञान की प्राप्ति होना अनिवार्य रूप से अपेक्षित है; यहाँ केवल मात्र प्रकृति के विकारों के सब प्रकार के क्रमरहित ज्ञान की अपेक्षा नहीं है।

उपर्युक्त प्रकार से बुद्धि की शुद्धि हो जाने से अर्थात् बुद्धि सत्त्व के पुरुष के समान शुद्ध = पवित्र होकर रहने से अर्थात् बुद्धि और पुरुष भेद ज्ञान हो जाने से योगी को समाधिजन्य ऐश्वर्य और ज्ञान की प्राप्ति स्वतः होती है। महर्षि व्यास कहते हैं कि वास्तव में तो ज्ञान से अज्ञान = अविद्या का नाश होता है। अविद्या का नाश होने से अविद्या रूपी माता की सन्तानें अस्मितादि क्लेशों की उत्पत्ति नहीं होती। इस प्रकार से अविद्यादि क्लेशों के निवृत्त हो जाने से पुरुष को कर्मफलों की प्राप्ति नहीं होती। और इस प्रकार से बुद्धि में अनुगत सत्त्वादि गुण कृतकृत्य हुए = समाप्त अधिकार वाले होने से अर्थात् पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग का सम्पादन कर चुकने से, फिर से पुरुष को भोग प्राप्त नहीं कराते। इस अवस्था में पुरुष के लिए एक ही प्रयोजन शेष रहता है चित्त = बुद्धि को अपने कारण प्रकृति में लीन करना।

यह अवस्था के उपरान्त ही पुरुष का कैवल्य होता है। इस अवस्था को प्राप्त हुआ पुरुष अपने स्वरूप में स्थित हुआ अर्थात् चैतन्य मात्र स्वरूप वाला, सत्त्वादि गुणों के मलों से रहित = निर्मल और केवली होता है।

इति सतीशार्यविरचितायां पातञ्जलयोगसूत्रव्यासभाष्यराजमार्तण्डवृत्तिव्याख्यायां

वैदिकयोगमीमांसायां विभूतिपादः तृतीयः॥