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गुरुशिष्यवार्त्तालापप्रकरणम्

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या :

१. गुरुशिष्यवार्तालापप्रकरणम्

१ भोः शिष्य! उत्तिष्ठ, प्रातःकालो जातः। हे शिष्य! उठ सवेरा हुआ।

२ उत्तिष्ठामि। उठता हूँ।

३ अन्ये सर्वे विद्यार्थिन उत्थिता न वा? और भी सब विद्यार्थी उठे वा नहीं?

४ अधुना तु नोत्थिताः खलु। अभी तो वे नहीं उठे हैं।

५ तानपि सर्वानुत्थापय। उन सबको भी उठा दे।

६ सर्व उत्थापिताः। सब उठा दिये।

७ सम्प्रत्यस्माभिः किं कर्त्तव्यम्? इस समय हमको क्या करना चाहिए?

८ शौचादिकं कृत्वा सन्ध्यामुपासीध्वम्। शरीरशुद्धि करके ईश्वर ज्ञान के लिये सन्ध्योपासन करो।

९ आवश्यकं कृत्वा सन्ध्योपासिताऽतः परं किं करणीयम्? आवश्यक कर्म करके सन्ध्योपासन कर लिया, इसके आगे हम क्या करें?

१० अग्निहोत्रं विधाय पठत। अग्निहोत्र करके पढ़ो।

११ पूर्वं किं पठनीयम्? पहिले क्या पढ़ना चाहिये?

१२ वर्णोच्चारणशिक्षामधीध्वम्। वर्णोच्चारणरीति को सीखो।

१३ अग्रे किमध्येतव्यम्। आगे क्या पढ़ना चाहिये?

१४ किञ्चित्संस्कृतोक्तिबोधः क्रियताम्। कुछ संस्कृत बोलने का ज्ञान करो।

१५ पुनः किमभ्यसनीयम्? फिर किसका अभ्यास करें?

१६ यथायोग्यव्यवहारानुष्ठानाय प्रयतध्वम्। यथोचित व्यवहार करने के लिये प्रयत्न करो।

१७ कुतोऽनुचितव्यवहारकर्तुर्विद्यैव न जायते। क्योंकि उलटे व्यवहार करनेहारे को विद्या ही नहीं होती।

१८ को विद्वान् भवितुमर्हति? कौन मनुष्य विद्वान् होने के योग्य होता है?

१९ यः सदाचारी प्राज्ञः पुरुषार्थी भवेत्। जो सत्याचरणशील, बुद्धिमान्, पुरुषार्थी होता है।

२० कीदृशादाचार्यादधीत्य पण्डितो भवितुं शक्यते? कैसे आचार्य से पढ़ के पण्डित हो सकता है?

२१ अनूचानतः। पूर्णविद्या वाले से।

२२ अथ किमध्यापयिष्यते भवता? आप इसके अनन्तर हमको क्या पढ़ावेंगे?

२३ अष्टाध्यायीमहाभाष्यम्। अष्टाध्यायी और महाभाष्य को।

२४ किमनेन पठितेन भविष्यति? इसके पढ़ने से क्या होगा?

२५ शब्दार्थसम्बन्धविज्ञानम्। शब्द, अर्थ और [उनके ]सम्बन्धों का यथार्थ बोध।

२६ पुनः क्रमेण किं किमध्येतव्यम्? फिर क्रम से क्या क्या पढ़ना चाहिये?

२७ शिक्षाकल्पनिघण्टुनिरुक्तछन्दो-ज्योतिषाणि वेदानामङ्गानि। शिक्षा, कल्प, निघण्टु-निरुक्त, छन्द और ज्योतिष वेदों के अङ्ग।

२८ मीमांसावैशेषिकन्याययोगसांख्य-वेदान्तान्युपाङ्गान्यायुर्धनुर्गान्धर्वार्थोपवेदानैतरेयशतपथसामगोपथ-ब्राह्मणान्यधीत्य ऋग्यजुस्सामाऽथर्ववेदान् पठन्तु। मीमांसा, वैशेषिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त उपाङ्ग, आयुर्वेद, धुनर्वेद गान्धर्ववेद और अर्थवेद उपवेद, ऐतेरय-शतपथ, साम और गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थों को पढ़ के ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को पढ़ो।

२९ एतत्सर्वं विदित्वा किं कार्य्यम्? ये सब जान के फिर क्या करना चाहिये?

३० धर्मजिज्ञासाऽनुष्ठाने एतेषामेवाऽध्यापनं च। धर्म जानने की इच्छा, इसी का आचरण और इन्हीं को सर्वदा पढ़ाया करो।