In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : २६. रोगप्रकरणम्
१ अस्य कीदृशो रोगो वर्त्तते? इसको किस प्रकार का रोग है?
२ जीर्णज्वरोऽस्ति। जीर्णज्वर (पुराना बुखार) वा ताप है।
३ औषधं देहि। दवा दीजिये।
४ ददामि। देता हूँ।
५ परन्तु पथ्यं सदा कर्त्तव्यम्, कुतः? नहि पथ्येन विना रोगो निवर्त्तते।
६ अयं कुपथ्यकारित्वात् सदा रुग्णो वर्त्तते। सदा यह कुपथ्य (बदपरहेज) करने से रोगी रहता है।
७ अस्य पित्तकोपो वर्त्तते। इसको पित्त का कोप है।
८ मम कफो वर्द्धत औषधं देहि। मुझ को कफ़ बढ़ता जाता है, दवा दीजिये।
९ निदानं कृत्वा दास्यामि। रोग की परीक्षा करके दूंगा।
१० अस्य महान् कासश्वासोऽस्ति। इसको बड़ा कासश्वास अर्थात् दमा है।
११ मम शरीरे तु वातव्याधिर्वर्त्तते। मेरे शरीर में तो वात की व्याधि है।
१२ सङ्ग्रहणी निवृत्ता न वा? संग्रहणी छूटी वा नहीं?
१३ अद्यपर्यन्तं तु न निवृत्ता खलु। आज तक तो नहीं छूटी।
१४ औषधं संसेव्य पथ्यं करोषि न वा? दवा का सेवन करके पथ्य करते हो वा नहीं?
१५ क्रियते, परन्तु सुवैद्यो न मिलति कश्चिद्, यः सम्यक् परीक्ष्यौषधं दद्यात्। करता तो हूँ, परन्तु अच्छा वैद्य नहीं मिलता कि जो अच्छे प्रकार परीक्षा करके दवा देवे।
१६ तृषाऽस्ति चेज्जलं पिब। प्यास हो तो जल पी।