In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३५. ग्रामस्थपक्षिप्रकरणम्
१ एताभ्यां चटकाभ्यां प्रासादे नीडं रचितम्। इन चिड़ियों ने अटारी पर घोसला बनाया है।
२ अत्राण्डानि धृतानि। यहां अण्डे धरे हैं।
३ इदानीं तु चाटकैरा अपि जाताः। अब तो इनके बच्चे भी हो गये हैं।
४ पश्य विष्णुमित्र! कुक्कुटयोर्युद्धम्। देख विष्णुमित्र! मुरगों की लड़ाई।
५ कुक्कुटी स्वानण्डान् सेवते। मुरगी अपने अण्डों को सेवती है।
६ पश्य! शुकानां समूहश्शब्दयन्नुड्डीयते। देख! सुग्गों के झुण्ड शब्द करते उड़े जाते हैं।
७ रात्रौ काका न वाश्यन्ते। रात में कौवे नहीं बोलते हैं।
८ भो भृत्य! ताडय ध्वांक्षमनेन मे पेयजल-पात्रे चञ्चुर्निक्षिप्य [जलं] विनाशितम्। अरे नौकर! कौवे को उड़ादे, इसने मेरे पीने के जल के बरतन में चोंच डाल कर [जल] दूषित कर दिया।
९ वायसेन बालकहस्ताद्रोटिका हृता। कौवे ने लड़के के हाथ से रोटी छीन ली।
१० पश्य! कीदृशं काकोलूकं युद्धं प्रवर्त्तते। देख! किस प्रकार की कौवे और उल्लुओं की लड़ाई हो रही है।
११ अनेन शुकहंसतित्तिरिकपोताः पालिताः। इसने सुग्गा, हंस, तीतर और कबूतर पाले हैं।