In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३७. वनस्थपक्षिप्रकरणम्
१ अयं देवदत्तो हंसगत्या गच्छति। यह देवदत्त हंस के समान चलता है।
२ कदाचित् सारसावपि उड्डीयमानौ क्रीडते क्रीडन्तौ महाशब्दं कुरुतः। कभी सारस पक्षी भी उड़ते और हुए बड़े शब्द करते हैं।
३ श्येनेनातिवेगेन वर्तिका हता। बाज ने बड़े वेग से बटेर को मारा।
४ शृणु! तित्तिरयः कीदृशं मधुरं वदन्ति। सुन! तीतर किस प्रकार मधुर बोलते हैं।
५ वसन्ते पिकाः प्रियं शब्दयन्ति। वसन्त ऋतु में कोयल प्रियशब्द करती है।
६ काककोकिलवद् दुर्वचाः सुवाक् च मनुष्यो भवति। कौवे और कोयल के सदृश, दुष्ट और अच्छा बोलनेवाला मनुष्य होता है।
७ पश्येमे मयूरा नृत्यन्ति। देखिये! ये मोर नाचते हैं।
८ उलूका रात्रौ प्रचरन्ति। उल्लू रात को विचरते हैं।
९ पश्य! बकः सरस्सु पाखण्डिजन-वन्मत्स्यघाताय कथं ध्यायति। देख! बगुला तलाबों में पाखण्डी मनुष्य के तुल्य मछली मारने के लिये किस प्रकार ध्यान करता है?
१० बलाका अप्येवमेव जलजन्तून् घ्नन्ति। बलाका भी इसी प्रकार जलजन्तुओं को मारती हैं।
११ पश्य! कथञ्चकोरा धावन्ति? देख! किस प्रकार चकोर दौड़ते हैं।
१२ येऽत्यूर्ध्वमाकाशे गत्वा मांसाय निपतन्ति ते गृध्रास्त्वया दृष्टा न वा? जो बहुत ऊपर आकाश में जाकर मांस के लिये गिरते हैं उन गीधों को तूने देखा वा नहीं?
१३ मेनका मनुष्यवद्वदन्ति। मैना मनुष्य के समान बोलती हैं।
१४ चिल्लिकार्माणवकहस्ताद्रोटिकां छित्त्वोड्डीयते। चील्ह लड़के के हाथ से रोटी छीन कर उड़ जाती है।