Donation Appeal Download Our App
Choose Sutra

तिर्यग्जन्तुप्रकरणम्

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ३८. तिर्यग्जन्तुप्रकरणम्

१ सर्पाः शीघ्रं सर्प्पन्ति। सर्प शीघ्र चलते हैं।

२ अयं कृष्णः फणी महाविषधारी। यह काला सांप बड़ा विषवाला है।

३ भवता कदाचिदजगरोऽपि दृष्टो न वा? आपने कभी अजगर भी देखा है वा नहीं?

४ पश्याहिनकुलयोः संग्रामो वर्त्तते। देख! सांप और नेउले का युद्ध होता है।

५ स वृश्चिकेन दष्टो रोदिति। वह बिच्छू ने काटा, रोता है।

६ इयं गोधा स्थूलास्ति। यह गोह मोटी है।

७ मूषका बिले शेरते। मूसे बिल में सोते हैं।

८ मक्षिकां भक्षित्वा वमनं प्रजायते। मक्खी खाकर वमन हो जाता है।

९ अत्र वासोऽभिधेयो यन्निर्मक्षिकं वर्त्तते। यहां वास करना चाहिये, जिससे मक्खी एक भी नहीं है।

१० मधुमक्षिकादंशेन शोथः प्रजायते। मधु मक्खियों के काटने से सूज जाता है।

११ भ्रमरा रुत्वाः पुष्पेभ्यो गन्धं गृह्णन्ति। भौंरे गूंजते हुए, फूलों से सुगन्धि ग्रहण करते हैं।