In Hindi:
महर्षि दयानन्द व्याख्या : ४४. कारुप्रकरणम्
१ भोस्तक्षन्! त्वया नौविमानरथ-शकटहलादीनि निर्माय तत्र प्रशस्तानि कलायन्त्रकौशलानि रचनीयानि। हे बढ़ई! तू नावें, विमान, रथ, गाड़ी और हल आदि रचके उनमें अत्युत्तम कला और यन्त्र आदि बना।
२ इदं काष्ठं छित्त्वा पर्य्यङ्कं रचय। इस लकड़ी को काट के पलंग बना।
३ अस्मात्कपाटाः सम्पादनीयाः। इससे किवाड़ों को बना।
४ इमं वृक्षं किमर्थं छिनत्सि? इस वृक्ष को किसलिये काटता है?
५ मुसलोलूखलनिर्माणाय। मूसल और ओखली बनाने के लिये।