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मिश्रितप्रकरणम् [३]

In Hindi:

महर्षि दयानन्द व्याख्या : ५०. मिश्रितप्रकरणम् [३]

१ भो कारुक! कटं वय। अरे चटाईवाले! चटाई बुन।

२ इमे व्याधा मृगादीन्पशून् हन्ति। ये बहेलिये हरिन आदि पशुओं को मारते हैं।

३ किराता वने निवसन्ति। किरात अर्थात् भील लोग वन में रहते हैं।

४ सकमलानि सरांसि कुत्र सन्ति? कमल के सहित वा कमलवाले तलाब कहां हैं?

५ इमे तडागा ग्रीष्मे शुष्यन्ति। ये सब तलाब गरमी में सूख जाते हैं।

६ कूपाज्जलमानय। तू कुएं से जल ला।

७ अद्य वाप्यां स्नातव्यम्। आज बावड़ी में नहाना चाहिये।

८ रञ्जकेन शतघ्नीभुशुण्ड्यादयश्चलन्ति। बारूद से बंदूक और तोपें आदि चलती हैं।

९ अयं कम्बलस्त्वया कस्माद् गृहीतः कस्मै प्रयोजनाय च? यह कम्बल तूने किससे लिया और किस प्रयोजन के लिये?

१० कश्मीराच्छीतनिवारणाय। कश्मीर से, जाड़ा छुड़ाने के लिये।

११ पश्य! माणवकाः क्रीडन्ति। देख! लड़के खेलते हैं।

१२ अस्मिन् गृहे स्रस्तराणि श्रेष्ठानि सन्ति। इस घर में बिछौने अच्छे हैं।

१३ इमे चोराः पलायन्ते। ये चोर लोग भागे जाते हैं।

१४ तत्र दस्युभिरागत्य सर्वं धनं हृतम्। वहां डाकूओं ने आकर सब धन हर लिया।

१५ द्वापरान्ते युधिष्ठिरादयो बभूवुः। द्वापर के अन्त में युधिष्ठिरादिक हुए थे।

१६ मम पादे कण्टकः प्रविष्ट एनमुद्धर। मेरे पैर में कांटा घुस गया, इसको निकाल।

१७ केशान् संवय। बालों को संभाल।

१८ भो नापित! नखाञ्छिन्धि मुण्डय शिरः श्मश्रूणि च। ओ नाऊ! नखों को काट, शिर मूण्ड और मूंछ भी काट डाल।

१९ अयं शिल्पी प्रासादमत्युत्तमं रचयति। यह राज अटारी बहुत अच्छी बनाता है

२० अयं कोटपालो न्यायकारी वर्त्तते। यह कोतवाल न्यायकारी वा इंसाफी है।

२१ स तु धर्मात्मा नैवास्त्यन्यायकारित्वात्। वह कोटवाल तो धर्मात्मा नहीं है, अन्यायकारी होने से।

२२ एते राजमन्त्रिणः कुत्र गच्छन्ति? ये राजा के मन्त्री लोग कहां जाते हैं?

२३ राजसभां न्यायकरणाय यान्ति।*१

[*१. यह वाक्य पाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।] राजसभा को न्याय करने के लिये।*१

[*१. यह वाक्य पाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।]

२४ भोस्ताम्बूलानि देहि। ओ! पान दे।

२५ ददामि।*२

[*२. यह वाक्य पाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।] देता हूँ।*२

[*२. यह वाक्य पाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।]

२६ भोस्तैलकार! तिलेभ्यस्तैलं निस्सार्य देहि। अरे तेली! तिलों से तैल निकाल कर दे।

२७ दास्यामि।*३

[*३. यह वाक्य पाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।] दूंगा।*३

[*३. यह वाक्य पाण्डुलिपि में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।]

२८ भो रजक! वस्त्राणि प्रक्षाल्य सद्यो देयानि। अरे धोबी! कपड़ों को धोकर अभी दे।

२९ कपाटान् बधान। किवाड़ें बन्द कर।

३० इदानीं प्रातःकालो जातः कपाटानुद्घाटय। इस समय सवेरा हुआ किवाड़ें खोलो।

३१ सर्वे युद्धाय सज्जा भवन्तु। सब सिपाही लोग लड़ाई के लिये तैयार हों।

३२ अर्थिप्रत्यर्थिनौ राजगृहे युध्येते। मुद्दई और मुद्दालेह कचहरी में लड़ते हैं।

३३ किमियं गोधूमान् पिनष्टि? क्या यह गेहुओं को पीसती है?

३४ कुतोऽद्य दुर्गे शतघ्न्यश्चलन्ति? क्यों आज किले में तोपें छूटती हैं?

३५ तेन भुशुण्ड्या सिंहो हतः। उसने बन्दूक से सह को मारा।

३६ तेनाऽसिना तस्य शिरश्छिन्नम्। उसने तलवार से उसका शिर काट डाला।

३७ अञ्जनं किमर्थमनक्षि? अञ्जन किसलिये लगाता है?

३८ दृष्टिवृद्धये।*१

[*१. मूल में इसका भाषार्थ नहीं है। —सम्पादक] [दृष्टि बढ़ाने के लिये।]*१

[*१. मूल में यह भाषार्थ नहीं है। —सम्पादक]

३९ उपानहौ धृत्वा क्व गच्छसि? जूते पहिन कर कहां जाता है?

४० जङ्गलम्। जङ्गल को।

४१ किं स्थाल्यामोदनं पचसि सूपं वा? क्या बटुवे में भात पकाता है, वा दाल?

४२ कटाहे शाकं पच। कड़ाही में तरकारी पका।

४३ विरुद्धं वदिष्यसि चेत्तर्हि ते दन्तांस्त्रोटयिष्यामि। विरुद्ध बोलेगा तो तेरे दाँत तोड़ डालूँगा।

४४ तव पितुस्तु सामर्थ्यं नाभूत् तव तु का कथा। तेरे बाप का तो सामर्थ्य न हुआ, अब तेरी तो क्या बात है।

४५ येन प्रजा पाल्यते स कथन्न स्वर्गं गच्छेत्। जिसने प्रजा का पालन किया, वह स्वर्ग को क्यों न जाय?

४६ यो राज्यं पीडयेत्स कुतो न नरके मज्जेत्? जो राज्य को दुःख देवे, वह नरक को क्यों न जाय?

४७ येनेश्वर उपास्यते तस्य विज्ञानं कुतो न वर्द्धेत। जो ईश्वर की उपासना करे, उसका विज्ञान क्यों न बढ़े।

४८ यः परोपकारी स सततं कथं न भवेत्। सुखी जो परोपकारी है वह सर्वदा सुखी क्यों न होवे?

४९ अस्यां मञ्जूषायां किमस्ति? इस संदूक में क्या है?

५० वस्त्रधने। कपड़ा और धन।

५१ इदानीमपि कुम्भ्यां धान्यं वर्त्तते न वा? अब कोठी में अन्न है वा नहीं?

५२ स्वल्पमस्ति। थोड़ा सा है।

५३ त्वमालसी तिष्ठसि कुतो नोद्योगं करोषि? तू आलसी रहता है, उद्योग क्यों नहीं करता?

५४ उभयत्र प्रकाशाय देहल्यां दीपं निधेहि। दोनों ओर उजियाला होने के लिये दरवाजे पर दिया धर।

५५ तेन चर्मासिभ्यां शतेन सह युद्धं कृतम्। उसने ढाल और तलवार से सौ पुरुषों के साथ युद्ध किया।

५६ अतिथीन् सेवयसि न वा? अतिथि=संन्यासियों की सेवा करता है वा नहीं?

५७ प्रेक्षासमाजं मा गच्छ। कभी मेले-तमाशे में मत जा।

५८ द्यूतसमाह्वयौ नैव सेवनीयौ। जो (अप्राणी=जड़ पदार्थों को दाव पर धर के खेलना वह) द्यूत, और (प्राणी=चेतन पदार्थों को दाव पर धरके खेलना) समाह्वय (कहाता है।) उनको कभी न करना चाहिये।

५९ यो मद्यपोऽस्ति तस्य बुद्धिः कुतो न ह्रसेत्? जो मद्य पीनेवाला है, उसकी बुद्धि क्यों न कमती होवे।

६० यो व्यभिचरेत् स रुग्णः कथं न जायेत। जो व्यभिचार करे वह रोगी क्यों न होवे।

६१ यो जितेन्द्रियस्स सर्वं कर्त्तुं कुतो न शक्नुयात्? जो जितेन्द्रिय है वह सब उत्तम काम क्यों न कर सके?

६२ योगाभ्यासः कृतो येन ज्ञानदीप्तिर्भवेन्नरः। जिसने योग का अभ्यास किया है वह ज्ञानप्रकाश से युक्त होता है।

६३ वस्त्रपूतं जलं पेयं मनः पूतं समाचरेत्। [स भ्रान्तौ कदापि न पतेत्? ]*१

[*१. यह वाक्य मूल और प्रथम संस्करण में नहीं है बाद के संस्करणों में बढ़ाया है।] जो कपड़े से छान कर जल पीता और मन जिसमें प्रसन्न रहे उसी कर्म को करता है, वह भ्रमजाल में कभी नहीं गिरता।*२

[*२. यह वाक्य प्रथम संस्करण में है।]

६४ अयं वाचालोऽस्त्यतो बरबरायते। यह बोलने में वाचाल है इसी कारण बड़बड़ाता है।

६५ भूमितले किमस्ति? भूमि के नीचे क्या है?

६६ मनुष्यादयः। मनुष्यादि।

६७ यः पद्भ्यां भ्रमति तस्यारोग्यं जायते। जो पग से चलता है उसको आरोग्य रहता है।

६८ व्यजनेन वायुं कुरु। पंखा से हवा कर।

६९ किं घर्मादागतो यत् स्वेदो जातोऽस्ति।*१

[*१. यह वाक्य मूल और प्रथम संस्करण में नहीं है बाद के संस्करणों में बढ़ाया है।] क्या घाम से आया है जो पसीना हो रहा है?*१

[*१. यह वाक्य मूल और प्रथम संस्करण में नहीं है बाद के संस्करणों में बढ़ाया है।]

७० स्वस्थे शरीरे नित्यं स्नात्वा मितं भोक्तव्यम्। अच्छे शरीर में रोज नहा के थोड़ा-सा खाना चाहिये कि जितना पच जाये।

७१ जलवायू शुद्धौ सेवनीयौ। पवित्र जल और वायु का सेवन करना चाहिये।

७२ सर्वर्तुके शुद्धे गृहे निवसनीयम्। जो सब ऋतुओं में सुख देनेहारा घर हो उसी में रहना चाहिये।

७३ नैव केनचिन्मलिनानि वस्त्राणि धार्याणि। किसी को भी मैला कपड़ा पहिनना न चाहिये।

७४ तव का चिकीर्षास्ति? तेरी क्या करने की इच्छा है?

७५ गृहं गत्वा भोक्तुम्। घर पर जाके खाने की।

७६ त्वं सक्तून् भुङ्क्षे न वा? तू सत्तू खाता है वा नहीं?

७७ घृतदुग्धमिष्टैः सहाऽद्मि।*१

[*१. यह वाक्य मूल में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।] घी, दूध और मीठा के साथ खाता हूँ।*१

[*१. यह वाक्य मूल में नहीं है, प्रथम संस्करण में है।]

७८ त्वयाम्रफलानि चूषितानि न वा? तूने आम के फलों को चूसा वा नहीं?

७९ उर्वारुकफलान्यत्र मधुराणि जायन्ते। खरबूजे के फल यहां मीठे होते हैं।

८० इक्षुभ्यो गुडादिकं निष्पद्यते। ऊख से गुड़ इत्यादि बनता है।

८१ इदानीमाकण्ठं दुग्धं पीतं मया। इस समय गले तक मैंने दूध पिया।

८२ तक्रं देहि। मट्ठा दे।

८३ दुग्धं पिब।*१

[*१. यह वाक्य मूल में नहीं है।] दूध पी।*१

[*१. यह वाक्य मूल में नहीं है।]

८४ अत्र श्वेता शर्करा वर्तते। यहां सफेद चीनी है।

८५ अयं रुच्या दध्नौदनं भुङ्क्ते। यह प्रीति से दही के साथ भात खाता है।

८६ अद्य मोदका भुक्ता न वा? आज लड्डू खाये वा नहीं?

८७ त्वया कदाचित्कृशराऽपि भुक्ता न वा? तूने कभी खिचड़ी भी खाई है वा नहीं?

८८ मयाऽपूपा भक्षिताः। मैंने मालपूये खाये हैं।

८९ सशर्करं दुग्धं पेयम्। र्शं॑र के सहित दूध पीना चाहिये।

९० येन धर्मः सेव्यते स एव सुखी जायते। जो धर्म्म का सेवन करता है वही सुखी रहता है।