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महर्षि दयानन्द व्याख्या : आर्यदर्पण पत्र मई सन् १८८० ई॰ के पृष्ठ ११३-११९ तक अबोधनिवारण के सम्बन्ध में लिखा गया लेख
अबोधनिवारण* ५१
[*५१. यह लेख श्री पं॰ भवानीलाल जी भारतीय अजमेर के सौजन्य से प्राप्त हुआ है। युधिष्ठिर मीमांसक]
घटं भित्त्वा पटं छित्त्वा कृत्वा रासभरोहणम्।
येन केन प्रकारेण प्रसिद्धः पुरुषो भवेत्॥
यह पुस्तक “ब्रह्मामृतवर्षिणी सभा” के पण्डितों की ओर से स्वामी जी के ‘संस्कृतवाक्यप्रबोध” की अशुद्धियां प्रकाश करने हेतु बनाया गया है।
प्रथम हम इस सभा के कर्त्तव्य के विषय में “भारतमित्र” पत्र से निम्न लेख संग्रह करते हैं। इस सभा के एक हितकारी लिखते हैं कि—
“इस सभा के कई बड़े दोष देख पड़े हैं कि जो उसके गुणों को नष्ट कर देते हैं। पहिले मुझे आशा थी कि ये दोष सुधर जायेंगे पर अब देखता हूँ कि स्वाभाविक हो गये हैं।
१. इस सभा के मैनेजर इस प्रकार हैं कि ९ वा १० महीने हुए समाचार पत्रों में विज्ञात कर चुके हैं कि “पीयूष शीकर प्रकाश होगा” पर न जाने यह पत्र कब निकलेगा?
२. सभा का नियम है कि “जब कोई बोल रहा हो तो दूसरा न बोले” पर इस पर कोई भी दृष्टि नहीं देता प्रायः हुल्लड़ मच जाता है।
३. अब हाल में मेरे पास “वाक्यपञ्चाशिका” और “खगोल दर्पण” दो पुस्तक आये हैं।
महाशय! मैं इन पुस्तकों की समालोचना क्या करूं ग्रह को नक्षत्र और नक्षत्र को ग्रह लिखा है, बस इतने ही में समझ जाइए।
४. गत शनिवार की सभा में पण्डित युगलकिशोर जी ने ऐसी असभ्य और अनुचित बातें कहीं कि मैं उसे यहां नहीं लिख सकता, इस सब पर जब बाबू नारायणसिंह आदि ने उनको रोका तो लड़ने को तैयार हुए। इस पर बड़ा हुल्लड़ हुआ और मारपीट की नौबत भी आ गई थी, ईश्वर ने कृपा की।
ऊपर जिस बात को असभ्य लिखा है वह इस प्रकार है कि जब
स्वामी जी चले गये तो पण्डित युगलकिशोर ने विचारा होगा कि अब कोई विचित्र मिथ्या बात लोगों के मन प्रसन्न करने और अपनी बड़ाई के लिए अवश्य उड़ानी चाहिए। प्रायः उन्होंने यह विज्ञापन भाषा और अंगरेजी में छपवाकर प्रकाशित किया—
“अभाग्य वश से मूर्ख जन की प्रसिद्धि के अनुसार हम लोगों ने
दयानन्द सरस्वती के पास आके वेदार्थ जानने की इच्छा की थी परन्तु जब स्वामीजी के मुख से नाना प्रकार की वेद विरुद्ध शिष्टाचार के बाहर बात सुन पड़ी तब तो हमने काशीस्थ ब्रह्मामृत-वर्षिणी सभा के सभ्य विद्वानों से अपने सन्देह दूर करने की इच्छा की और जब हम लोग अपनी बुद्ध्यनुसार समस्त शंका से रहित भये तब उक्त सभा के मेम्बर पंडित युगलकिशोर पाठक जी (जो कि हमारे वैदिक गुरु हैं) के उपदेश से निजचित्तग्लानिवृत्तिपूर्वक कुसंगजनित पापनिवृत्त्यर्थ मणिकर्णिका तीर्थ पर यथाविधि प्रायश्चित्त और श्री विश्वेश्वरादि देवों का दर्शन करके अपने सन्मति के अनुसार वेदाभ्यास की इच्छा प्रकट करते हैं। और यह प्रतिज्ञा करते हैं के हम लोग निज गुरु निर्दिष्ट मार्ग से दूर न होंगे।
प्रायश्चित्त करने वालों का नाम—
सीताराम, बबुवानन्द पाण्डे, कृष्णारात शुक्ल, रामप्रसाद दुबे, इस पत्र के प्रकाशकर्त्ता वेदशास्त्र सम्पन्न
पण्डित युगलकिशोर पाठक॥”
जब यह विज्ञापन सभा में पढ़ा गया तब बहुत से लोगों की इच्छा हुई कि जिन चार पुरुषों के इसमें नाम हैं उनके दर्शन भी करने चाहिएं। इस पर बाबू नारायणसिंह (सभासद् आर्यसमाज) ने पंडित युगलकिशोर से पूछा कि वे ४ पुरुष कहां हैं? पंडित जी ने (क्रोध में लाल होकर) उत्तर दिया कि उन को हम अपनी अगली सभा में लेते आवेंगे।
पण्डित जी ने तो इस विज्ञापन में झूठमूठ इन ४ पुरुषों के नाम मनमाने लिखकर एक उपहास का काम किया था, इन चारों को लावें कहां से!
अब तो पण्डित जी घबड़ाए और लगे इधर उधर लड़कों को सिखलाने कि तुम हमारे साथ चलकर ऐसा ऐसा कह देना, परन्तु ऐसे बुरे काम में कौन पण्डित जी की सुनता है! प्रायश्चित्त का नाम ही सुनकर श्वासा बन्द होते हैं, क्योंकि इससे अत्यन्त निन्दा और बुराई विदित होती है।
परन्तु यूं तू करके पण्डित जी एक लड़के को ले ही गये, जब उसका नाम पूछा तो उसने रामकृष्ण दुबे बता दिया (पण्डित जी ने सिखाया होगा कि रामप्रसाद दुबे कहना, परन्तु बनावटी नाम कब तक याद रह सकता है वह भूल गया) फिर पूछा गया कि तुम स्वामी जी के पास गए थे? उसने कहा कि कभी नहीं। (!!!)
जब यह बात हुई तब तो पण्डित जी का यह गुप्त व्यवहार प्रकाशित हो गया, फिर लोगों ने कहा कि आपने यह मिथ्या विज्ञापन क्यों मुद्रित कराया? इस पर पण्डित जी क्रोध में लाल होकर लगे गड़बड़ हांकने, तब उनके मुखारविन्द से यह बात निकली कि “जिसने दयानन्द का मुख देखा वह हिन्दू के बीज का नहीं” इस बात को कहने पर बाबू नारायणसिंह ने कहा कि सं॰ १९२६ के शास्त्रार्थ में श्रीयुत महाराजा काशी नरेश और स्वामी विशुद्धानन्द और बालशास्त्री आदि हजारों हिन्दू थे, तो आपने इन सबको दुर्वचन कहा! इस पर पण्डित जी को सभा से निकाल दिया, तब तो उन्होंने बड़ा हुल्लड़ मचाया, मारपीट की नौबत आ गई थी, ईश्वर ने कृपा कर दी। अब पाठक विचारें कि यह कैसी लपोड़संखी सभा है! धन्य है इस सभा की!! और धन्य है इसके पण्डितों की!!!
अब इस पुस्तक के विषय में देखिए—इसके टाइटिल पेज पर लिखा है कि “काशी के पण्डित अम्बिकादत्त व्यास और बाबूराम वर्मा ने श्रीयुत* ५२ की आज्ञा अनुसार प्रकाशित किया॥”
[*५२. यहां शून्य (खाली) जगह एक नाम लिखने के लिए छोड़ दी गई है।]
यहां पहिले हम यह ही पूछते हैं कि पुस्तक के बनाने वाले का नाम सत्य सत्य क्यों नहीं लिखा गया? (कि जो पं॰ राममिश्र शास्त्री हैं) दूसरे श्रीयुत पं॰ के आगे शून्य जगह क्यों छोड़ी गई? क्या लोगों को धोखा देने के लिए! देखिए हमने जो दो पुस्तक मोल लिये तो उन पर “चतुर्भुज जी” लिखा पाया और जो हमने और लोगों के पास इन्हीं को देखा तो और ही नाम लिखा पाया, *५३ क्या प्रकाश करने वालों का मुख्य तात्पर्य
५३. हमारे पास जो पुस्तक अबोधनिवारण की है उस पर हाथ से “सूर्यनारायण” लिखा है। युधिष्ठिर मीमांसक
लोगों को धोखा देकर टट्टी की आड़ में शिकार करने का है? फिर देखिये इसकी भूमिका में रामकृष्ण ने लिखा है कि यह पुस्तक हमारे मित्र पं॰ अम्बिकादत्त व्यास ने बनाई और आगे चलके पुस्तक के पहिले पेज पर लिखा है कि “रामकृष्णवर्माविरचितम्” अब पाठकगण विचारें कि इन मिथ्या बातों और पूर्वापर विरोध से क्या विदित होता है!
अब यहां एक और विचित्र बात सुनिये कि जब यह पुस्तक बनाया गया तब बहुत से पण्डितों के पास हस्ताक्षर के हेतु ले गये, परन्तु किसी बड़े पण्डित ने अपने हस्ताक्षर न किये, तब पण्डित चतुर्भुज जी से भी कहा गया (यहां तो मानों मुख खोले ही बैठे थे) उन्होंने कह दिया हां हमारे नाम से छपवा दो, फिर न जाने किस कारण उनका नाम न छापा गया, तब तो पण्डित जी बड़े क्रोधित हुए।
अब हमने सुना है आजकल यहां के पण्डित लोग एक पुस्तक इस “अबोधनिवारण” के खण्डन में बना रहे हैं जिसमें स्वामीजी कृत “संस्कृतवाक्यप्रबोध” का मण्डन और “अबोधनिवारण” का खण्डन होगा।
फिर इसी भूमिका में स्वामीजी को लिखा है कि “यदि कुछ विद्या रखते हैं तो इसका प्रत्युत्तर देकर लेख को शुद्ध ठहराइए, अब आपको अधिक क्या समझावें।”
हम नहीं जानते कि ये लोग सोच समझकर क्यों नहीं लिखते! महाशय!! आपको लिखने का तो बोध है ही नहीं, पहिले लिखना तो सीखिये, तब ही मुख फैलाइये।
क्या आपने स्वामीजी का विज्ञापन नहीं देखा है? क्या आपने भ्रमोच्छेदन को विचारकर नहीं देखा है? जो ऐसा लिखते हो। स्वामीजी ने अपने विज्ञापन तथा भ्रमोच्छेदन में स्पष्ट लिख दिया है कि काशी में आजकल स्वामी विशुद्धानन्द और पण्डित बालशास्त्री ये दो ही प्रसिद्ध हैं, जो ये चाहें तो भले ही शास्त्रार्थ मन खोलकर पत्र द्वारा अथवा सन्मुख समझ कर के करें, नहीं तो काशी में और किसी तीसरे के लेख का उत्तर हम कदाचित् न देंगे। *५४
[*५४. जब यहां के असभ्य लोग अण्ड बण्ड विज्ञापन स्वामी जी के विषय में लगाने लगे तब अन्त में स्वामी जी को इन लोगों के मुख बन्द करने की यह प्रतिज्ञा अवश्य करनी पड़ी।
इसलिए जो आप स्वामीजी से अपने पुस्तक का उत्तर ही लेना चाहते थे, तो क्या इन दोनों में से किसी एक के हस्ताक्षर न करवा लिये होते?
हमने सुना है कि इस बात की चर्चा भी सभा में हुई थी तिस पर पण्डित राममिश्र जी ने कहा कि क्या ये दोनों हम से भी बढ़ गये, हमने बालशास्त्री की सैकड़ों अशुद्धियाँ निकाली हैं।
अब कहां है स्वामी विशुद्धानन्द जी को जगद्गुरु लिखने वाले? यहां तो वे जगत् क्या केवल एक काशी के भी गुरु न निकले।
और आपने जो लिखा कि स्वामीजी को कहां तक समझावें—सो ठीक है, स्वामी जी जैसे विद्वान् आप की मिथ्या स्वार्थिक और अनुचित बातों को कैसे समझ सकते हैं।
क्योंकि विद्वान् विद्वान् ही की बातों को विचार कर समझा करते हैं। फिर आपने लिखा कि “पं॰ अम्बिकादत्त को धन्यवाद दें कि उन्होंने स्वामीजी के पुस्तक का यह शुद्धि पत्र बनाया था।”
वाह! वाह!! यह एक ही रही, भला जो आप डूब रहा है वह दूसरे को क्या बचा सकता है!!! फिर अन्त में लिखा कि “स्वामीजी पं॰ राममिश्र जी के साथ शास्त्रार्थ करें।”
हम कहते हैं कि स्वामी जी तो रहे अलग, पहिले आपके पण्डित जी स्वामी जी के विद्यार्थियों से ही शास्त्रार्थ कर लेवें।
सबसे पहले हमारे ही इस प्रश्न का उत्तर दें कि यदि पाषाणादि मूर्तिपूजन को आप लोग सत्य मानते हैं तो इसका प्रमाण वेद संहिताओं में कहीं से दीजिए?
बताइये कि वेद के कौन कौन से मन्त्रों में ये नीचे लिखी तीन वार्त्ता, जो आप लोग करते हैं लिखी हैं?
१. पूजा और उपासना के लिए काठ, पत्थर, पीतल आदि की मूर्तियां बनाई जावें।
२. उन मूर्तियों में ईश्वर की स्थापना की जावे।
३. उन मूर्तियों पर चन्दन, पानी, दूध, बताशा, भंग, धतूरा, बकरी, बकरा, पूरी, कचौरी आदि चढ़ाये जावें। मन्दिरों में जाकर घण्टा, झांझ, गाल कर्ताल बजाये जावें और पुजारियों को माल दिये जावें।
इनमें केवल वेद संहिताओं ही के प्रमाण माने जायेंगे।
अब क्या तो आप या आपके पण्डित जी हमारा उत्तर दें, नहीं तो लिखें कि यह मिथ्या पाखण्ड ही है? स्वामी जी से जैसा शास्त्रार्थ करेंगे विदित है। शोक है कि आपको शास्त्रार्थ का नाम लेते भी लज्जा नहीं आती। स्वामी जी यहाँ ५॥ साढ़े पांच मास रहे—शास्त्रार्थ का विज्ञापन दिये, उस समय कोई भी उद्यत न हुआ। क्या उस समय आप और आप के पण्डित जी गहरी नींद में सन्नाटे भर रहे थे? किसी ने शास्त्रार्थ का नाम भी न लिया। अब आपके व्यर्थ गाल बजाने से क्या होता है।
हमारे इस लेख से आप यह न समझें कि आप के पुस्तक का खण्डन न किया जावेगा। नहीं, आपके पुस्तक का खण्डन लिखा जा रहा है।*५५
[*यह खण्डन क्यों नहीं छपा, इसका कारण हमें ज्ञात नहीं। सम्भव है ऋषि दयानन्द ने व्यर्थ समझ कर मना कर दिया हो, पुनरपि खण्डन अवश्य प्रकाशित होना चाहिए था। अन्यथा जनता में भ्रम फैलता है जैसा कि मुन्नालाल मिश्र के २१.१०.१८८२ के पत्र से ज्ञात होता है।]
हम स्वीकार करते हैं कि इस पुस्तक में नवीन यन्त्रालय न होने, और स्वामी जी के उसी समय पधारने, और पूर्ण विद्वान् शोधक के न होने से बहुधा अशुद्धियां हो गई हैं, परन्तु आपने जो व्यर्थ एक बात का बतकड़ा बनाकर पक्षपात की सामग्री से एक झूठा मानार बनाया है, इसको देखिये हम कैसे सत्य के झोंके से उड़ाकर तितर बितर कर डालते हैं। यहाँ भी दो तान बातें आप को खण्डन कर के दिखलाते हैं*६—
[ये खण्डनात्मक बातें इसी ग्रन्थ के प्रथम परिशिष्ट में प्रकाशित की जा चुकी है।]