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महर्षि दयानन्द व्याख्या : अबोधनिवारण के अवशिष्ट आक्षेपों का उत्तर
लेखक—युधिष्ठिर मीमांसक
पं॰ अम्बिकादत्त व्यास द्वारा “अबोध निवारण” में उपस्थापित सभी आपेक्षों का क्रमशः उत्तर दिया जाता है— १—(आक्षेप) पृष्ठ १५ पंक्ति २ *१ —
(शाकमानयनाय) प्रश्न तो यह है कि “स क्व गतः” और उत्तर शाकमानयनाय—भला यह भी क्या छापे वाले की ही अशुद्धि है? कदाचित् स्वामी जी ने शाकमानेतुम् लिखा हो और उसी को उसने बढ़ा के शाकमानयनाय बना लिया हो क्या इसका कोई भी विश्वास करेगा? यहां “कर्तृकर्मणोः कृति” २.३.६५ इस सूत्र से ‘शाकस्यानयनाय’ होना चाहिए॥
समाधान—इस विषय में प्रथम हम निरुक्तकार का ऐसा पाठ उद्धृत करते हैं, जिसमें शाकमानयनाय के समान ही प्रयोग किया है—
ततो वयः प्रपतान् पूरुषादः......ततो वयः प्रपतन्ति पुरुषान् अदनाय। निरुक्त २.६॥
यहां भी अदनाय ल्युडन्त कृदन्त के योग में षष्ठी का प्रयोग न करके द्वितीया का प्रयोग किया है। जो कि शाकमानयनाय के ठीक अनुरूप है। यदि महर्षि दयानन्द का प्रयोग अशुद्ध है तो निरुक्तकार यास्काचार्य का भी पुरुषान् अदनाय प्रयोग अशुद्ध मानना होगा।
स्वयं सूत्रकार पाणिनि ने भी तद् अर्हम् (५.१.११७) सूत्र में अर्हम् कृत् के योग में तद् द्वितीयान्त पद का ही निर्देश किया है। यदि सूत्रकार का प्रयोग भी अशुद्ध माना जाए तो घोटकारूढस्य घोटकविस्मृतिः न्याय सूत्रकार के विषय में चरितार्थ होगा। सूत्रकार दूसरों को तो साधु प्रयोग का ज्ञान कराने के लिये शास्त्र बनावे और स्वयं अशुद्ध प्रयोग करे, ऐसी कल्पना भला कौन सचेतस्क पुरुष कर सकता है।
*१. पृष्ठ और पङ्क्ति की संख्या का निर्देश प्रथम संस्करण के अनुसार है। इस संस्करण में पृष्ठ २५९ पर गमनागमनप्रकरण १ की संख्या ६ पर यह पाठ है।
अब हम व्याकरण शास्त्र के अनुसार शाकमानयनाय, पुरुषान् अदनाय प्रयोगों का साधुत्व दर्शाते हैं—
वैयाकरणों का मत है कि षष्ठी शेषे (अ॰ २.३.५०) सूत्रस्थ शेष की अनुवृत्ति आपादपरिसमाप्ति जाती है। इस अनुवृत्ति से जब कर्तृकर्मणोः कृति (अ॰ २.३.६५) सूत्र में कर्तृ-कर्म के शेषत्व की विवक्षा होगी तभी कर्तृ-कर्म में षष्ठी होगी। शेषत्व की विवक्षा न होने से कर्म में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होगा।
दुर्घटवृत्तिकार ने भी रक्षोगणक्षिप्नुमबिक्षतात्मा तथा धायैरामोदमुत्तमम् प्रयोगों में कृत् योग में कर्म में प्रयुक्त द्वितीया की उपपत्ति के लिये तदर्हम् (अ॰ ५.२.११७) के ज्ञापक के कर्तृकर्मणोः कृति (अ॰ २.३.६५) के नियम की अनित्यता ज्ञापित की है। द्रष्टव्य दुर्घटवृत्ति (अ॰ २.३.६५)॥
इस विवेचना से स्पष्ट है कि अम्बिकादत्त व्यास को न प्राचीन शिष्ट प्रयोगों का ज्ञान है और न आधुनिक काव्य ग्रन्थों का। व्याकरण ज्ञान में तो वह सर्वथा शून्य है यह ऋषि दयानन्द सरस्वती के द्वारा समाहित षण्मास शब्द के समाधान तथा हमारी इस विवेचना से अत्यन्त स्पष्ट है। ऐसा ही अपने अवैयाकरणत्व अथवा वैयाकरणखसूचीत्व का प्रदर्शन सर्वत्र किया है।
२—(आक्षेप) पृ॰ १८ पंक्ति २ *२ —(अस्मिन् समये तु मम सामर्थ्यं नास्ति षण्मासानन्तरं दास्यामि) इस वाक्य में “षण्मासानन्तरं” के स्थान में षण्मास्यनन्तरं होना चाहिए क्योंकि “द्विगोः” सूत्र से षण्मासी सिद्ध होगा न कि षण्मास। और पात्रादि गण में षण्मास शब्द का पाठ ही नहीं है जिसमें पञ्चपात्रम्, त्रिभुवनम् इत्यादि की तरह से सिद्ध हो॥
[*२. इस संस्करण में पृष्ठ २६२ पर साक्षिप्रकरण में संख्या १२ पर।]
समाधान—इस आक्षेप का यथोचित उत्तर ऋषि दयानन्द ने
षण्मासाण्ण्यच्च (अ॰ ५.३.८३) के पाणिनीय सूत्र का निर्देश करके दे दिया है। उससे स्पष्ट है कि पाणिनि के मत में षण्मासी प्रयोग जैसा कि पं॰ अम्बिकादत्त व्यास ने लिखा है, नहीं बनता।
अब हम षण्मास शब्द, जिसे पं॰ अम्बिकादत्त व्यास व्याकरण की दृष्टि से अशुद्ध प्रयोग मानते हैं, के साधुत्व प्रदर्शन के लिए प्राचीन आर्षग्रन्थों से कुछ प्रयोग उपस्थित करते हैं—
षण्मासा:—बौधायन धर्म सूत्र ३.१०.१६॥
षण्मासान्—बौधायन धर्म सूत्र २.४.८; ३.९.१७॥
षण्मासान्नित्ययुक्तस्य—महाभारत शान्ति पर्व २४०.३२॥
षण्मासे षण्मासे...। पञ्चतन्त्र, काकोलूकीय कथा ६, पं॰ गुरुप्रसाद
संम्पादित काशी संस्करण पृष्ठ ६५७।
यद्यहं षण्मासाभ्यन्तर एव तव पुत्रान् नीतिशास्त्रं प्रत्यनन्यसदृशान्
करोमि....। तन्त्राख्यायिका, पृष्ठ २।
इसी प्रकार महाभारत में अन्यत्र भी बहुत स्थानों पर पुंल्लिङ्ग षण्मास शब्द का प्रयोग मिलता है। हमें प्राचीन आर्ष वाङ्मय में कहीं षण्मासी शब्द का प्रयोग नहीं मिला। इसलिए पात्रादि गण में चाहे षण्मास शब्द का पाठ न हो पुनरपि सूत्रकार पाणिनि के एवं प्राचीन शिष्ट प्रयोगों से स्पष्ट है कि षण्मास प्रयोग ही साधु है। पं॰ अम्बिकादत्त व्यास का दर्शाया षण्मासी प्रयोग साधु नहीं है। वैयाकरण सम्प्रदाय में पात्रादि गण आकृतिगण माना जाता है। अतः साक्षात् पाठ न होने पर भी शिष्ट प्रयोगों के अनुसार षण्मास का प्रयोग उस में मानना चाहिए।
बौधायन धर्म सूत्र में २.९.७ में प्रयुक्त षण्मुखम् प्रयोग भी यहां द्रष्टव्य है।
३. (आक्षेप) पृष्ठ २१ पं॰ ८*३
—(भवान् परेद्युः क्व गन्तासि)
यहां तो स्वामी जी ने बड़ा आनन्द दिखलाया क्या बात है इधर भवान् उधर गन्तासि यहां “भवान् परेद्युः क्व गन्ता” लिखना था।
[*३. यह पाठ इस संस्करण में पृष्ठ २६५ पर गमनागमनप्रकरण २ की संख्या ७ के स्थान पर अभी तक छपता आ रहा था। परन्तु मूल में वह पाठ है जो हमने इस संस्करण में छापा है।]
समाधान—यह साधारण अशुद्धि है इस जैसे अशुद्ध प्रयोगों के सम्बन्ध में हमें ऋषि दयानन्द का वह पत्र ध्यान से पढ़ना चाहिए, जिसमें उन्होंने आश्विन शुक्ला १३ बुधवार सं॰ १९३७ के दिन प्रेस के तात्कालिक मैनेजर बख्तावरसिंह को पत्र लिखा था—
जो संस्कृतवाक्यप्रबोध पर [काशी के पण्डितों ने] पुस्तक छपवाया है सो बहुत ठिकानों उनका लेख अशुद्ध है और कै एक ठिकानों में संस्कृतवाक्य-प्रबोध में अशुद्ध भी छपा है। इस अशुद्धि के कारण तीन हैं, एक—शीघ्र बनना, मेरा चित्त स्वस्थ न होना, दूसरा—भीमसेन के आधीन शोधन का होना और मेरा न देखना न प्रूफ को शोधना, तीसरा—छापेखाने में उस समय कोई भी कम्पोजीटर बुद्धिमान् न होना, लैम्पों की न्यूनता होनी। इसके उत्तर में जो-जो उनकी सच्ची बात है सो-सो शोधक और छापा का दोष रहेगा। पत्रव्यवहार पृ॰ २२३*४
[*४. यह पृष्ठ संख्या पत्र व्यवहार के प्रथम संस्करण की है।]
इस पत्र से ऋषि दयानन्द की सत्यप्रियता एवं भूल-स्वीकृति का विद्वज्जनोचित उत्कृष्ट उदाहरण मिलता है। इसके अनुसार यथोचित संशोधन अगले संस्करण में कर दिया गया है।
हम दुर्जनसन्तोष न्याय से महाभारत से इस प्रकार कुछ उदाहरण भी नीचे प्रस्तुत करते हैं, जिन में संस्कृतवाक्यप्रबोध के समान ही पुरुष भेद मिलता है। यथा—
यूयं.........अपराध्येयुः। महाभारत वनपर्व २३९.१०॥
वयं.........प्रतिपेदिरे। महाभारत शान्तिपर्व ३३६.३१॥
ददृशिरे वयम्। महाभारत शान्तिपर्व ३३६.३५॥
हमारा अपना तो यही मत है कि इस प्रकार के पुरुषभेद के प्रयोग भी संस्कृत भाषा एवं व्याकरण शास्त्र के अनुसार ठीक हैं, परन्तु ऋषि ने जब इन्हें अशुद्ध मान लिया या प्रारम्भिक जनों के शिक्षण के लिए इन्हें ठीक न माना, तो इस प्रकार के शब्दों का साधुत्व दर्शाना ऋषि के प्रति न्याय नहीं कहा जा सकता। अतः हमने व्याकरण शास्त्र की रीति से इस के साधुत्व दर्शाने की चेष्टा नहीं की।
४. (आक्षेप) पृष्ठ २२ पं॰ ९*५ —(इदानीं शीतं निवृत्योष्णसमय आगतः)—इस वाक्य में निवृत्य की जगह निवर्त्य होना चाहिये। यदि यह कहो कि हम णिजन्त न रख के निवृत्य ही बनावेंगे तो अर्थाशुद्धि होगी। पाणिनि महर्षि कहते हैं कि ‘समानकर्तृकयोः पूर्वकाले क्त्वा’ (३.४.२१) इसलिए पूर्वोक्त वाक्य में निवृत्ति का कर्त्ता तो भया शीत, और आगमन का उष्ण इसमें यहां क्रिया की एक कर्तृकता नहीं है इसी कारण दूषित है।
[*५. इस संस्करण में पृष्ठ २६६ पर मिश्रितप्रकरण (२) की संख्या १ पर।]
समाधान—यहां शीतं निवृत्तम् यह अभिप्राय इष्ट है, जैसा कि भाषानुवाद से स्पष्ट है। यह संशोधन भी अगले संस्करण में यथोचित कर दिया गया है। यदि पण्डित जी का कथन माना जाये तो निवृत्य प्रयोग भी निवर्त्य के स्थान में व्याकरणानुसार शुद्ध है। क्योंकि ग्रन्थकार का ऐसा भाव नहीं है। वैयाकरण सम्प्रदाय में अन्तर्भावित ण्यर्थ मान कर विना णिच् के भी ण्यर्थ-विशिष्ट अर्थ बहुत स्वीकार किया जाता है। वैयाकरण सम्प्रदाय में एक श्लोक प्रसिद्ध है—
वान्ति पर्णशुषो वाता वान्ति पर्णमुचोऽपरे।
ततः पर्णरुहो वान्ति ततो देवः प्रवर्षति॥
उज्ज्वलदत्तकृता उणादि टीका*६ पृष्ठ ६९
[*६. यह दशपादी उणादि वृत्ति पृष्ठ ३१२ पर भी उद्धृत है वहां द्वितीय चरण में ‘वान्ति’ के स्थान में ‘ततः’ पाठ है।]
यहां पर्णशुष्, पर्णमुच् पर्णरुह् शब्दों में अन्तर्भावित ण्यर्थ ही है अथवा यहां अविहित णि का लुक् है। इस विषय में महाभाष्य ७.४.६५ तथा उसकी टीकाएं भी द्रष्टव्य हैं। णि का अविहित लोप मानने की अपेक्षा अन्तर्णीत ण्यर्थ मानना अधिक सरल एवं युक्ततर है।
५. (आक्षेप) पृष्ठ २५ पं॰ ६*७ —(पश्य तव मम च कीदृशानि पुष्टान्यपत्यानि द्विवर्षानन्तरं जायन्ते) इस वाक्य में भी “द्विगोः” सूत्र से द्विवर्षी सिद्ध होगा।
[*७. इस संस्करण के पृष्ठ २६९ पर ननन्दृभ्रातृ॰ प्रकरण में संख्या १० पर।]
समाधान—इस पद का साधुत्व पूर्व प्रदर्शित षण्मास शब्द के समान जानना चाहिये।
६. (आक्षेप) पृष्ठ २८ पं॰ १३*८ —(त्वमद्य प्रसन्नमुखो दृश्यते किमत्र कारणम्) क्या प्रसन्नमुख हो के स्वामी जी ने लिखा है, भला हम उनसे पूछते हें कि त्वम् के संग में दृश्यते का प्रयोग कैसे हुआ? मेरे ज्ञान में तो प्रथम जो गन्तासि की अशुद्धि हो गई है उसी की यहां स्वामी जी ने दृश्यते से पूर्त्ति करी॥
[*८. इस संस्करण के पृष्ठ २७२ पर शरीरावयवप्रकरण में संख्या ३०। मूलपाण्डुलिपि में पृष्ठ २६ पर ‘दृश्यसे’ ही पाठ है। अतः प्रथम संस्करण में मुद्रण की भूल है। —सम्पादक]
समाधान—यहां लेखक अथवा मुद्रक प्रमाद ही है। पूर्व संख्या ३ के सम्बन्ध में ऋषि का पत्र जो उद्धृत किया है उसके अनुसार यहां भी पाठ शोधन अगले संस्करण में कर दिया गया है। इसके साथ ही संख्या ३ के प्रकरण में निर्दिष्ट महाभारत के वचनों से भी तुलना करनी चाहिये।
७. (आक्षेप) पृष्ठ ३२ पं॰ २*९ —तत्र या धेनवस्ताभ्योऽर्धं दुग्धं त्वया दोहित्वा स्वामिभ्यो देयमर्धं च वत्सेभ्यः पाययितव्यम्)। वाह जी स्वामी जी बालकों की शिक्षा के लिए तो पुस्तक बनाया सो ऐसी शिक्षा दी कि दुग्ध्वा का दोहित्वा सिखाया। यदि णिजन्त रखिये तो भी दोहयित्वा होगा तथापि अर्थ संगत न होगा।
[*९. इस संस्करण के पृष्ठ २७६ पर ग्राम्यपशुप्रकरण में संख्या २।]
समाधान—साधारण जनों की दृष्टि से इस अशुद्धि का भी अगले संस्करण में संशोधन कर दिया गया है। वस्तुतः यह प्रयोग भी आगमशास्त्रमनित्यम् (परिभाषेन्दुशेखर ९४) अनित्यमागमशासनम् (सीरदेव परिभाषावृत्ति पृष्ठ १०१) नियम के अनुसार इट् सम्बन्धी विधि वा निषेध को अनित्य मानने से सिद्ध हो जाता है। ऐसे ही अनिट् धातुओं के सेट् प्रयोग अन्यत्र भी मिलते हैं। यथा—आकर्षितस्य (यजुर्वेद भाष्य २.१ के पदार्थ में) आकर्षितम् (यजुर्वेदभाष्य २.१६ के भावार्थ में), प्रक्षेपितुम् (यजुर्वेदभाष्य २.१ के पदार्थ में) भजितुम् (यजुर्वेदभाष्य २.२० के पदार्थ) आदि में मिलते हैं।
क्रियारत्नसमुच्चय (हैम धातु व्याख्या) में लिखा है—सर्वधातूनां बहुलं वेड् इत्यन्ये (पृ॰ ६६)। महाभारत शल्यपर्व ४.४९ का वचन है—
नातिक्रमिष्यते कृष्णो वचनं कौरवस्य तु।
यहां स्नुक्रमोरनात्मनेपदनिमित्ते (अष्टाध्यायी ७.२.३६) से इट् का निषेध प्राप्त है परन्तु सेट् का प्रयोग किया है।
पतॢ धातु में भरज्ञपिसनितनिपतिदरिद्राणाम् (वार्तिक ७.२.४९) से इट् के विकल्प का विधान होने से क्त में यस्य विभाषा (अ॰ ७.२.१५) सूत्र से नित्य इट् का निषेध प्राप्त होने पर भी पाणिनि ने द्वितीया श्रितातीतपतित॰ (अ॰ २.१.२४) में पतित में इडागम का प्रयोग किया है। इससे स्पष्ट है कि इट् के निषेध की विधि अनित्य है।
८. (आक्षेप) पृष्ठ ३२ पं॰ १४*१० —(श्रोतव्यं हरयः कीदृशं हर्षन्ति)
[*१०. इस संस्करण के पृष्ठ २७७ पर ग्राम्यपशुप्रकरण में संख्या ८।]
वाह क्या बात है स्वामी जी जैसा आपका पद ज्ञान है वैसा ही आपका अर्थ ज्ञान है। ह्रेष अव्यक्ते शब्दे धातु का घोड़े के हिनहिनाने के अर्थ में ह्रेषन्ते का प्रयोग होता है सो आपने हर्षन्ति लिखा।
समाधान—यहां मुद्रण दोष है। अगले संस्करण में ह्रेषन्ते ठीक कर दिया गया है।
९. (आक्षेप) पृष्ठ ३४ पं॰ १८*११ —(द्रष्टव्यं हस्तिसिंहयो रणम्) इस वाक्य में “येषाञ्च विरोधः शाश्वतिकः” २.४.९ इस सूत्र से नित्य एकवद्भाव होना चाहिए। अतएव हस्तिसिंहस्य हुआ। इसी पृष्ठ की २३ वीं पंक्ति में भी वही दशा है, सिंहवराहयोः लिखा है वहां भी सिंहवराहस्य होगा।
[*११. इस संस्करण में पृष्ठ २७८ पर वन्यपशुप्रकरण की संख्या ५।]
समाधान—येषां च विरोधः शाश्वतिकः (अ॰ २.४.९) में येषाम् बहुत्व का निर्देश होने से जहां परस्पर विरोधी बहुत प्राणियों का जातिगत विरोध द्योत्य होता है वहीं एकवद्भाव होता है, न कि व्यक्ति विशेष का विरोध द्योत्य होने पर। यद्यपि उपर्युक्त हस्तिसिंहयोः में निर्दिष्ट हस्ती और सिंह का स्वाभाविक वैर है, तथापि ऋषि दयानन्द के हस्तिसिंहयोः वचन में एक विशेष हस्ती और एक विशेष सिंह, जिनकी ओर संकेत कर के कहा जा रहा है, उन दो पशुओं के रण=युद्ध की ओर संकेत होने से यहां हस्तिसिंहयोः में एकवद्भाव प्राप्त ही नहीं है। अतः ग्रन्थकार का द्विवचन का निर्देश सर्वथा साधु है। पं॰ अम्बिकादत्त व्यास ने पाणिनि के उक्त सूत्र का रहस्य समझा ही नहीं। प्रतीत होता है पण्डित जी की गति केवल साहित्य में ही विशेष थी, उन्हें व्याकरण का विशेष ज्ञान नहीं था; अन्यथा वे ऐसा भ्रमपूर्ण आक्षेप न करते।
इसके लिये हम महाभाष्य का एक पाठ उद्धृत करते हैं। महाभाष्य १.२.३२ में लिखा है—क्षीरोदके सम्पृक्ते आमिश्रीभूतत्वान्न ज्ञायते कियत् क्षीरं कियदुदकम् इति। इस पर कैयट लिखता है—नियतव्यक्तिविवक्षायां जातिपरत्वाभावाद् एकवद्भावो न कृतः। यही समाधान सिंहवराहयोः हस्तिसिंहयोः में जानना चाहिये।
१०. (आक्षेप) पृष्ठ ३४ पं॰ २४*१२ —(शूकरा इक्षुक्षेत्राणि भक्षित्वा विनाशयन्ति) क्या भक्ष धातु को भी आधृषीय समझ लिया, कभी लिखते हो भक्षित्वा और कभी भक्षयित्वा वाह इसी का नाम तो पाण्डित्य है। इतना भी बोध नहीं है कि सदैव ही भक्षयित्वा होता है अहा हा!!!
[*१२. इस संस्करण में पृष्ठ २७९ पर वन्यपशुप्रकरण की संख्या १०।]
समाधान—श्री स्वामी दयानन्द ने तो भक्ष को आधृषीय नहीं समझा उन्होंने तो भ्वादिगण में पठित भक्ष का प्रयोग लिखा है। परन्तु पण्डित जी ही अपनी पढ़ी सिद्धान्त कौमुदी को भूल गये। यदि कौमुदी स्मरण होती तो उन्हें ज्ञात हो जाता कि वहां भ्लक्ष धातु के प्रसङ्ग में भक्ष इति मैत्रेयः भी लिखा है।
यदि कहो कि कौमुदीकार ने तो भक्ष को मैत्रेय के नाम से पाठान्तर रूप में उद्धृत किया है तो भी उन्हें जानना चाहिए कि पाठान्तर में पठित सभी धातुओं को कौमुदीकार प्रमाण मानता है। यदि प्रमाण न मानता तो उसका खण्डन करता।
इतना ही नहीं भक्ष धातु का भ्वादिगण में पाठ मैत्रेय के अतिरिक्त चान्द्र कातन्त्र, शाकटायन, हैम प्रभृति अनेक व्याकरणों में माना गया है। वैदिक वाङ्मय में भक्ष धातु के भ्वादिगणानुसारी बहुत से प्रयोग उपलब्ध होते हैं।
इस प्रकार अनेक वैयाकरणों एवं वैदिक वाङ्मय के प्रवक्ताओं के मत में भक्ष का भ्वादिगण में निर्बाध पाठ माना गया है। अतः ऋषि दयानन्द ने भक्ष को न आधृषीय माना है और न उससे णिच् विकल्प किया है। ऋषि दयानन्द के भक्षित्वा और भक्षयित्वा प्रयोग क्रमशः भ्वादिगण एवं चुरादिगण पठित धातुओं के हैं। दोनों ही शुद्ध हैं।
११. (आक्षेप) पृष्ठ ३५ पंक्ति २*१३ —(अयं रुरुर्वृषभवत् स्थूलोऽस्ति) यहां वृषभवत् का अन्वय स्थूल संग है और ऐसे अर्थ में पाणिनीय के अनुसार कदापि वति प्रत्यय न होगा क्योंकि ऐसा सूत्र है कि “तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः” ५.१.११५ जिससे क्रिया योग में वति प्रत्यय होता है जैसे ब्राह्मणवदधीते और गुण योग में नहीं होता जैसे यह कहना सर्वथा अशुद्ध है कि पितृवत् स्थूलः॥
[१३. इस संस्करण में पृष्ठ २७९ पर वन्यपशुप्रकरण की संख्या १२।]
समाधान—नीति शास्त्रकारों का वचन है प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रं मित्रवद् आचरेत्। यहां भी मित्र द्रव्य है न कि क्रिया। न्यासकार ने स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ (अ॰ १.१.५६) की व्याख्या में वही प्रयोग किया है जिसके विषय में पण्डित जी लिखते हैं—“जैसा यह कहना अशुद्ध है कि पितृवत् स्थूलः”। न्यासकार का पाठ है—यथा पितृवत् स्थूल इत्युक्ते अन्तरेणापि अत्र पुत्रग्रहणं सम्बन्धिशब्दत्वात् पुत्र इति गम्यते (पृ॰ १०३, राजशाही संस्करण)। न्यासकार के इस प्रयोग में जैसे वति प्रत्यय होता है वैसे ही ऋषि दयानन्द के रुरुर्वृषभवत् स्थूलः में समझना चाहिये।
दुर्घटवृत्तिकार ने पितृवत् स्थूलः पुत्रः की व्याख्या में लिखा है— स्थूलशब्दोऽयं धर्मप्राधान्यात् स्थौल्यवृत्तिः। एवं च ‘तत्र तस्येव’ (अ॰ ५.१.११६) इति वतिः।......पितरि यत्स्थौल्यं तत् पुत्र इत्यर्थः। यद्वा स्थूल इति विशेषणेन हेतुनिर्देशः। स्थौल्याद्धेतोर्गमनादिना पित्रा तुल्य इति। अ॰ ५.१.११५॥
अर्थात् पितृवत् स्थूलः पुत्रः में स्थूल शब्द धर्म (स्थूलता) प्रधान स्थौल्यार्थक है अतः यहां तत्र तस्येव (पा॰ ५.१.११६) से वति होता है। पिता में जो स्थौल्य है वही पुत्र में है यह वाक्यार्थ है। अथवा स्थूल यह विशेषण रूप से हेतु निर्देशक है। स्थौल्य के हेतु से जैसा पिता का गमनादि होता है वैसा ही पुत्र का है।
यही दोनों वाक्यार्थ ऋषि दयानन्द के वाक्य में भी अभिप्रेत हैं। एक अभिप्राय होगा—जैसे वृषभ में स्थूलता है वैसी ही रुरु में भी है। दूसरा अभिप्राय होगा—जैसे स्थूलताहेतुक वृषभ की गमनादि क्रिया होती है वैसी ही रुरु की भी है।
ऊपर के प्रमाण से स्पष्ट है कि ऋषि दयानन्द का अयं रुरुर्वृषभवत् स्थूलः सर्वथा शुद्ध है। वाक्यार्थ बोध न होने से अथवा संस्कृत वाक्य विन्यास की शिष्ट शैली का ज्ञान न होने से पण्डित जी को भ्रान्ति हुई है।
१२. (आक्षेप) पृष्ठ ३६ पं॰ १५* १४ —“पश्याहिनकुलयोः संग्रामो वर्तते” यह वैसी ही अशुद्धि है जैसी हम पहिले ३४ पृष्ठ की १८ पंक्ति में लिख चुके हैं।
[१४. इस संस्करण में पृष्ठ २८० पर तिर्यग्जन्तुप्रकरण की संख्या ४।]
समाधान—इसी प्रकार के प्रयोग का उत्तर हम आक्षेप ९ के उत्तर
में दे चुके हैं।
१३. (आक्षेप) पृष्ठ ३६ पं॰ १९*१५ —“मक्षिकां भक्षित्वा वमनं प्रजायते” पुनः वही अशुद्धि है जो ३४ पृष्ठ में है। इससे निश्चय होता हे कि यह छापे की भूल नहीं है परन्तु स्वामी जी का ज्ञान ही ऐसा है।
[*१५. इस संस्करण में पृष्ठ २८० पर तिर्यग्जन्तुप्रकरण संख्या ८।]
समाधान—यही आक्षेप संख्या १० में भी किया है अतः इसका समाधान भी उसी के समान है।
१४. (आक्षेप) पृष्ठ ३८ पं॰ १३*१६ —“भोस्तक्षन्.....रचित्वा दीयन्ताम्” भला रचित्वा कैसे हुआ? क्या आधृषीय में इसका पाठ है? न होगा तो चिन्ता क्या है, स्वामी जी कह देंगे कि तुम क्या जानों।
[*१६. इस संस्करण में पृष्ठ २८४ पर कारुप्रकरण संख्या १।]
समाधान—इसे अगले संस्करण में ठीक कर दिया गया है।
१५. (आक्षेप) पृष्ठ ४१ पं॰ २२*१७ —“विक्रीणामि” वाह वाह अलौकिक पाण्डित्य है। स्वामी जी ने क्री धातु को ञित् समझ के धड़ाके से विक्रीणामि लिख मारा। ये तो “विद्वान्” हैं इनको किस बात का डर है। “परिव्यवेभ्यः क्रियः” १.३.१८। पाणिनि जी के इस सूत्रानुसार विक्रीणे होना चाहिए और कदापि परस्मैपद न होगा।
[*१७. इस संस्करण में पृष्ठ २८५ पर अयस्कारप्रकरण संख्या ४।]
समाधान—स्वामी जी तो विद्वान् न सही, परन्तु पण्डित जी तो अपने आप को विद्वान् मानते हैं, फिर भी पण्डित जी अपने अज्ञान को नहीं देखते पाणिनि का सूत्र है—परिव्यवेभ्यः क्रियः (अ॰ १.३.१८) यहां परि-वि-अव उपसर्गों का द्वन्द्व समास है। अल्पाच्तरम् (अ॰ २.२.३८) के नियम से ‘वि’ का पूर्व प्रयोग होना चाहिए। क्या पाणिनि भी यहां उक्त नियम को भूल गया? परन्तु बात ऐसी नहीं है। पाणिनि ने पूर्वनिपात नियम का व्यभिचार करके ज्ञापन किया है कि प्रकृत प्रकरणस्थ आत्मनेपद विधान अनित्य है (वैयाकरण अन्य स्थानों पर पूर्वनिपात नियम के व्यभिचार को ज्ञापक मानते हैं) अतः विक्रीणामि प्रयोग भी साधु है। क्रयविक्रयप्रकरण में विक्रीणीते प्रयोग भी मिलता है।
१६. (आक्षेप) पृष्ठ ४४ पं॰ १५* १८ —(कपाटान् बध्नीहि) ठीक है ठीक है, बहुत शुद्ध बोलें, किस व्याकरण से बध्नीहि साधा?॥ इतनी भी बुद्धि नहीं और शंकराचार्य बनने चले, दूसरों को कहते हैं कि अज्ञ है और बोध नहीं है, आप ही को तो बड़ा बोध है॥ इसी विद्या और पाण्डित्य पर राजा शिवप्रसाद जी की निन्दा करते हो। आप को तो “हलः श्नः शानज्झौ” ३.१.८३ भी याद नहीं, बालकपन में क्या करते रहे? धातुरूपावली पढ़ी? यदि पढ़ते तो स्पष्ट ज्ञान होता कि बधान रूप होता है। कोई वैदिक प्रयोग तो नहीं याद पड़ा जो इस झोंक में ऐसा लिख गये?
[*१८. इस संस्करण में पृष्ठ २८८ पर मिश्रितप्रकरण (३) की संख्या २९।]
समाधान—अगले संस्करण में इसे शुद्ध कर दिया है। वैसे ‘बध्नीहि गां तात’ इत्यादि प्रयोगों में क्वचित् शानच् का अभाव देखा जाता है। व्यत्ययो बहुलम् (अ॰ ३.१.८५) का बहुलम् योगविभाग करके समस्त विकरण प्रत्ययों का व्यतिगमन होता है। इस कारण आर्ष प्रयोगों में बहुधा दृष्टविकरण प्रत्यय साधु माना जाता है।
रही राजा शिवप्रसाद ही की बात, उसके लिए राजा जी के निवेदन का समुचित उत्तर ऋषि दयानन्द ने भ्रमोच्छेदन ग्रन्थ में दिया है। अबोध निवारण के कर्त्ता ने राजा जी की प्रशंसा की है और राजा जी ने द्वितीय निवेदन के अन्त में (पृष्ठ १०) पर अबोध निवारण के प्रकाशक बाबू राम कृष्ण जी की।
उष्ट्राणां विवाहेषु गीतं गायन्ति गर्दभाः।
परस्परं प्रशंसन्ति अहो रूपमहो ध्वनिः।
यह उक्ति ही यहां चरितार्थ होती है।
१७. (आक्षेप) पृष्ठ ४४ पं॰ १९*१९ —अर्थिप्रत्यर्थिनो राजगृहे युध्यतः बड़ा आश्चर्य है कि आप इसके उलथे में लिखते हैं कि मुद्दई और मुद्दाले कचहरी में लड़ते हैं इस अभिप्राय से तो संस्कृत में युध्येते होना चाहिए (युध्यतः) तो भाव क्विबन्त युध शब्द से ‘सुप आत्मनः क्यच्’ ३.१.८ इस सूत्र से (आत्मनो युद्धमिच्छतीति) इच्छार्थे क्यच् करने से कथञ्चित् सिद्ध हो सकता है, परन्तु यह तो अनुवादानुसार आपका अभिप्राय ही नहीं झलकता और यदि आप अनुदात्तेत्लक्षण आत्मनेपद को अनित्य समझ कर इसे सिद्ध करेंगे तो आप एधति एधतः भी लिख सकते हैं॥
[*१९. इस संस्करण में पृष्ठ २८८ पर मिश्रितप्रकरण (३) की संख्या ३२।]
समाधान—यह पाठ भी अगले संस्करण में यथोचित बना दिया है। परन्तु ग्रन्थकार का युध्यतः पाठ अशुद्ध नहीं है। चक्षिङ् के ङित्करण से अनुदात्तेत् लक्षण आत्मनेपद का जो अनित्यत्व ज्ञापित किया है, उसके व्यापकत्व को न समझ कर ही लेखक ने आक्षेप किया है। युध धातु के परस्मैपद के प्रयोग आर्ष वाङ्मय में बहुधा उपलब्ध होते हैं यथा— युध्यति—महाभारत शान्तिपर्व ९७.१७ (निदर्शनार्थ एक स्थान का ही निर्देश किया है) आपने हंसी में जो लिखा है कि ‘अनुदात्तत्व लक्षण आत्मनेपद के अनित्यत्व से तो एधति एधतः भी लिख सकते हैं।’ यह भी लेखक का अज्ञान है। एध के परस्मैपद के प्रयोग महाभारत में मिलते हैं। यथा—एधन्ति—महाभारत वनपर्व २४६.२२॥
अतः युध्यतः को अपशब्द बताना अबोधनिवारण के कर्त्ता का अपना अबोध प्रकट करना है।
परस्मैपदी धातु में आत्मनेपद के और आत्मनेपदी के परस्मैपद में बहुधा शिष्ट प्रयोग मिलते हैं। इसके लिये हमारा “ऋषि दयानन्द की पद प्रयोग शैली” ग्रन्थ पृष्ठ २६-२८ देखना चाहिये।
१८. (आक्षेप) पृष्ठ ४५ पं॰ २६* २० —(तेन चर्मासिभ्यां शतेन सह युद्धं कृतम्) भला कहिए तो यहां कभी चर्मासिभ्यां हो सकता है? निस्सन्देह यह द्वन्द्वे घि इस सूत्र पर हरताल लगा दी जाए तो चर्मासिभ्यां शशकपिभ्याम् इत्यादि बहुत से नये शब्द सिद्ध हो जायं। ठीक ही है स्वामी जी ऐसे भारी प्रसिद्ध विद्वान् हैं। ये कोई भी प्रकरण ऐसा क्यों रहने देंगे जिसकी अशुद्धि का उदाहरण इनके ग्रन्थ में न मिले॥
[*२०. इस संस्करण में पृष्ठ २८९ पर मिश्रितप्रकरण (३) की संख्या ५५।]
समाधान—चर्मासिभ्याम् में द्वन्द्वे घि (अ॰ २.२.३२) के नियम का व्यत्यास दिखाया है। पर लेखक को पाणिनि का इको गुणवृद्धी (१.१.३) सूत्र ही स्मरण नहीं रहा। यदि स्मरण रहता तो वे चर्मासिभ्याम् को अशुद्ध न बताते या फिर पाणिनि से ही पूछते महाराज आपने हमें आदेश दिया कि द्वन्द्व समास में घि-संज्ञक का पूर्व प्रयोग किया जाये फिर अपने स्वयं उसका उल्लंघन क्यों किया। वस्तुतः सारा पूर्वनिपात प्रकरण प्रायिक है। पाणिनि ने स्वयं पचासों सूत्रों में इस प्रकरण के विपरीत प्रयोग किया है अतः गुणवृद्धी के समान चर्मासिभ्याम् प्रयोग साधु है।
१९. (आक्षेप) पृष्ठ ४६ पं॰ १* २१ —(अतिथीन् सेवयसि न वा) मेरी तो अब लिखते लिखते लेखनी थक गई। इतने ही में समझ जाइये कि यदि सेवा करता है इस अनुवादाऽनुसार आपका अभिप्राय है तो सेवसे लिखना चाहिए। हां यदि सेवा कराता है यह अभिप्राय हो तो शुद्ध हो सकता है परन्तु आपके हिन्दी लेख के अनुसार यह अभिप्राय ही नहीं झलकता।
[*२१. इस संस्करण में पृष्ठ २८९ पर मिश्रितप्रकरण (३) की संख्या ५६।]
समाधान—सेवयसि में स्वार्थ में णिच् प्रत्यय है न कि हेतुमान् में। यथा रामो राज्यमचीकरत् (रामायण) में। धातुपाठ के नौ गणों में पठित सभी धातुओं से स्वार्थ में भी णिच् होता है इसमें सभी वैयाकरण समानरूप से सहमत हैं।
२०. (आक्षेप) पृष्ठ ४४ पं॰ ५* २२ —(जलवायू शुद्धौ सेवनीयौ) यहां भी द्वन्द्वे घि इस सूत्र के अनुसार (वायुजले शुद्धे सेवनीये) लिखना चाहिए इसको कै बेर चितावें॥
[*२२. इस संस्करण में पृष्ठ २९० पर मिश्रितप्रकरण (३) की संख्या ७१।]
समाधान—इसका समाधान भी चर्मासिभ्याम् (आक्षेप १८) के समाधान में जो लिखा है उससे ही समझ लेना चाहिए।
२१. (आक्षेप) पृष्ठ ४७ पं॰ ९* २३ —(ते का चिकीर्षाऽस्ति) वाह! वाह!! वाह!!! इस वाक्य से तो दयानन्द जी की सभी कलई खुल गई। क्योंकि इनको यह भी नहीं मालूम कि सूत्रानुसार युष्मदस्मद् को कैसे स्थल में ते मे आदि-आदि आदेश होते हैं। देखिए अष्टाध्यायी में अ॰ ८ पा॰ १ सूत्र में “पदात्” एतदधिकारीय अ॰ ८ पा॰ १। २२ “तेमयावेकवचनस्य” सूत्र से किसी पद से परे जो तव या मम उसी को ते और मे हो सकते हैं, स्वामी जी ने तो वाक्य के आरम्भ में ही झोंक दिया। अब यही समाधान बाकी रह गये हैं कि ये वैदिक शब्द हैं या उपसर्ग विभक्ति-स्वर-प्रतिरूपक निपात हैं इत्यादि। उचित ही है स्वामी जी इन दिनों के वैदिक हैं, जो चाहें सो कहें।
[*२३. इस संस्करण में पृष्ठ २९० पर मिश्रितप्रकरण (३) की संख्या ७४।]
समाधान—ते का चिकीर्षाऽस्ति वाक्य में वाक्यादि में प्रयुक्त ते पद विभक्तिप्रतिरूपक निपात है। जब आक्षेप्ता को स्वयं ज्ञात है कि चादिगण (१.४.५७) में उपसर्गविभक्तिस्वरप्रतिरूपकाश्च निपाताः गणसूत्र पठित है तब हंसी उड़ाने का उन्हें क्या अधिकार है। यदि वे कहें कि इस सूत्र के द्वारा उन्हीं विभक्तिप्रतिरूप (विभक्त्यन्तसदृश) शब्दों की निपात संज्ञा होती है जो व्यवहार में आते हैं तो इस विषय में हमारा कहना है कि ते मे विभक्तिप्रतिरूपक निपात वैयाकरणों द्वारा साक्षात् स्वीकृत हैं।
इसके दो साक्षात् प्रमाण उपस्थित करते हैं—
हैम व्याकरण का सूत्र है—विभक्तिथमन्ततसाद्याभाः (१.१.३३)
इसकी बृहद्वृत्ति में लिखा है—ते मे चिराय अह्नाय....एते प्रथमादिविभक्त्यन्तप्रतिरूपकाः। इसके बृहन्न्यास में हेमचन्द्राचार्य ने स्पष्ट लिखा है ते प्रभृतयश्चत्वारश्चतुर्थ्यन्तप्रतिरूपकाः। (बृहद्वृत्ति-बृहन्न्यासलघुन्यास संवलिता, भाग १ पृष्ठ ५६)
धाराधीश भोजकृत सरस्वतीकण्ठाभरण नामक व्याकरण का सूत्र है—अहं शुभं कृतं पर्याप्तं येन तेन चिरेणान्तरेण ते मे चिराय अह्नाय... सुप्प्रतिरूपाः। १.१.१२४॥
इस सूत्र की दण्डनाथकृत हृदयहारिणी टीका में लिखा है—ते इति त्वयार्थे....श्रुतं ते राज शार्दूल। मे मयार्थे—श्रुतं मे भरतर्षभ! भाग १ पृष्ठ ३८॥
व्याकरण के उपर्युक्त दो प्रत्यक्ष प्रमाणों से सिद्ध है कि ते मे विभक्तिप्रतिरूपक निपात हैं। हेमचन्द्र ने चतुर्थ्यर्थ में कहा है और दण्डनारायण ने तृतीयार्थ के उदाहरण दिये हैं। ठीक इसी प्रकार यहां ते निपात तव इस षष्ठ्यर्थ में प्रयुक्त है अतः यहां आक्षेप्ता ने जो दोष दिया है वह उपस्थित ही नहीं होता पुनरपि सुकुमारमति बालकों की दृष्टि से दूसरे संस्करण में ते के स्थान में तव सुगम पाठ बना दिया है।
२२. (आक्षेप) पृष्ठ १९ पं॰ १७* २४ —(अयं मम लेखोऽस्ति पश्यताम्) हां हां देखते हैं आप का ही लेख है तभी तो इतना शुद्ध है— आगे भी देखते आये हैं और यहां भी देखते हैं। आप तो पश्यतु अथवा दृश्यताम् के धोखे में लिख गए। पर भला कुछ लोट पोट कर रफू बना निकल जाइएगा, पर वह अभिप्राय आप के अनुवाद से खुलता ही नहीं। कह दीजिये कि प्रथम पुरुष के द्विवचन का रूप है।
[*२४. इस संस्करण में पृष्ठ २६४ पर साक्षिप्रकरण की संख्या ३६। मीमांसक जी के समाधान की अपेक्षा वर्तमान प्रकाशित पाठ उचित प्रतीत होता है। श्रोता लेखक ने पश्यैतम् को पश्यताम् सुन लिया होगा। क्योंकि यह ग्रन्थ बोलकर लिखवाया हुआ है। सम्पादक]
समाधान—इस आक्षेप में पश्य तम् इन दो पदों के स्थान पर मुद्रण वा लेखन प्रमाद से पश्यतम् एक शब्द बन कर पश्यताम् बन गया है। ऐसी भूलें लेखन वा मुद्रण में प्रायः हो जाती हैं यह सम्पादनकलाप्रवीण भले प्रकार जानते हैं। यहां मुद्रणकर्त्ता द्वारा पश्य तम् में दो पदों का मिलाना और त के आगे आ की मात्रा ‘ा’ का जोड़ा जाना साधारण सा दोष है। पर आक्षेप्ता का तो घटं भित्त्वा पटं छित्त्वा प्रसिद्धः पुरुषो भवेत् उक्ति के अनुसार सुगम प्रसिद्धि प्राप्त करनी थी, तब भला वह इसमें क्यों चूके।
२३. (आक्षेप) पृष्ठ ६ पं॰ २०* २५ —(येन शरीराच्छ्रमो न क्रियते स नैव शरीरसुखमाप्नोति) यहां शरीरेण श्रमो न क्रियते ऐसा होना चाहिए क्योंकि “विभाषा गुणेऽस्त्रियाम्” २.३.२५ इस अनुशासन से गुणवाचक शब्द ही से पञ्चमी होती है। यदि कोई यह कहे कि विभाषा के योग विभाग से जैसा धूमादग्निमान् होता है वैसे ही हम भी कहेंगे तो यह बात तो वैसी ही भई जैसे कि किसी ने पूछा दयानन्द जी वेद नाम किसका तो आप बोले कि संहिता मात्र का। तब उसने कहा कि कात्यायन महर्षि तो “मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्” ऐसा बोलते हैं। तब आप बोले यह तो कृत्रिम है। तब उसने कहा कि समस्त भारतवर्ष के प्रतिज्ञा-सूत्र के पुस्तक में यह पाठ मिलता है। तब तो आप बोले वे सब पुस्तक अशुद्ध हैं, बस तो उन्हीं का कहना प्रमाण हो तो शरीराच्छ्रमो सिद्ध हो जायेगा।
[*२५. इस संस्करण में पृष्ठ २५२ पर भोजनप्रकरण की संख्या १५।]
समाधान—संस्कृतवाक्यप्रबोध के उक्त वाक्य पर किये आक्षेप का उत्तर परिशिष्ट १ में प्रकाशित लेख में भली भांति दे दिया गया है। प्रकृत प्रकरण के अनन्तर वेदसंज्ञा जो लेख है वह राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के पत्र एवं उनके छापे निवेदन तथा ऋषि दयानन्द द्वारा दिये गये पत्रोत्तर एवं निवेदन के उत्तर में लिखे गये भ्रान्तिनिवारण ग्रन्थ से सम्बन्ध रखता है। इस विषय में पाठक ऋषि दयानन्द द्वारा लिखित पत्र एवं भ्रान्तिनिवारण ग्रन्थ देखें। यथार्थता विदित हो जायेगी। अब रहा कात्यायन के मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम् सूत्र की बात। उसके विषय में ऋषि दयानन्द कृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का वेदसंज्ञा प्रकरण का आरम्भिक भाग देखना चाहिये।
२४. (आक्षेप) पृष्ठ ९ पं॰ २२* २६ —“ईश्वरः कोऽस्तीति ब्रूहि” इस वाक्य का अर्थ स्वामीजी लिखते हैं कि “ईश्वर किसको कहते हैं आप कहिए”। ‘न वेति विभाषा’ १.१.४४ पाणिनि जी के इस सूत्र की व्याख्या जानने वाले लोगों की दृष्टि से यह बात सिद्ध हे कि “इति शब्दोऽर्थविपर्यासकृत्” तब तो ईश्वरः कोऽस्तीति वाक्य से कदापि यह अर्थ न होगा कि ईश्वर किसको कहते हैं आप कहिए, किन्तु यह अर्थ होगा कि तुम “ईश्वरः कोऽस्ति” इस वाक्य को कहो।
[*२६. इस संस्करण में पृष्ठ २५५ पर सभाप्रकरण की संख्या ४।]
समाधान—‘इति’ शब्द का वाक्यार्थ-बोधन में भी प्रयोग होता है यह आक्षेप्ता को ज्ञात ही नहीं। आप्टेकृत संस्कृत इंगलिश कोश (हिन्दीसंस्करण) में लिखा है—
इति....(वाक्यार्थ द्योतक)-ज्ञास्यसि कियद्भुजो मे रक्षति मौर्वीकिणांक इति शि॰ १.२३॥ (यहां ग्रन्थ का पता अशुद्ध छपा है)।
२५. (आक्षेप) पृष्ठ १० पं॰ ९* २७ —“चक्रवर्त्तिशब्दस्य कः पदार्थः” भला आर्थिक लोगों को तनिक दृष्टि देनी चाहिए कि “चक्रवर्त्तिशब्द का क्या अर्थ है इसकी संस्कृत यही होगी? माना कि कदाचित् स्वामी जी यह कहें कि हमारा यह तात्पर्य है कि चक्रवर्त्ती इस पद का पदार्थ क्या है, तो ऐसे समास में एकदेशान्वय कभी होता ही नहीं फिर यह कैसे शुद्ध ठहरा*।
*ऐसी अशुद्धि का स्वामी जी को अभ्यास है क्योंकि पृष्ठ ३० के १७ पंक्ति में लिखा है कि (सभाशब्दस्य कः पदार्थ)**। (अबोध निवारण में छपा नोट)
[*२७. इस संस्करण में पृष्ठ २५५ पर आर्यावर्त्तचक्रवर्तिराजप्रकरण की संख्या ३।]
[** मूलपाण्डुलिपि में ‘सभाशब्दस्य कोऽर्थः’ यह पाठ है। सम्पादक]
समाधान—इस का समाधान पूर्व परिशिष्ट संख्या १ में बहुत सुन्दर रूप दे दिया गया है।
२६. (आक्षेप) पृष्ठ १३ पं॰ २२*२८ —“मुद्रैकया सपादप्रस्थं विक्रीणते”। मुद्रैकया प्रयोग तो स्वामी जी ने न मालूम किस व्याकरण से सिद्ध किया। पाणिनीय से तो कदापि सम्भव ही नहीं है। क्योंकि उसमें यह लिखा है कि “विशेषणं विशेष्येण बहुलम्” २.१.५७ इस सूत्र के अनुसार एकमुद्रया ऐसा होना चाहिए और व्यास में एकया मुद्रया, मुद्रया एकया चाहे जैसा कर लो।
[*२८. इस संस्करण में पृष्ठ २५८ पर क्रयविक्रयप्रकरण की संख्या ५।]
समाधान—मुद्रैकया में एक शब्द का साक्षात् परनिपातबोधक सूत्र नहीं है, परन्तु राजदन्तादिषु परम् (अ॰ २.१.३१) के आकृतिगण होने से अथवा विशेषणं विशेष्येण बहुलम् (अ॰ २.१.५७) इस समास विधायक सूत्र में पठित ‘बहुल’ पद से परनिपात होगा। एक का ऐसे स्थानों में पर प्रयोग देखा जाता है। अथवा एक शब्द पूर्णता का वाचक है। लोक में इस अर्थ में जनसाधारण में आज भी बोला जाता है। किसी वस्तु का मूल्य पूछने पर बेचने वाला ‘एक रुपया’ के स्थान पर बोलता है ‘पूरा रुपया’ से न कम न अधिक। इस अर्थ में मुद्राया एकम् मुद्रैकम् षष्ठी समास होगा मुद्रैकया का अर्थ होगा पूरे एक रुपये से।
२७. (आक्षेप) पृष्ठ १५ पं॰ १३* २९ —‘एतस्मिन् किमुप्यते’ इसका उत्तर जो स्वामी जी ने दिया भी तो क्या उत्तम दिया “यवान्” अर्थात् यवों को। ह! ह!! ह!!! भला स्वामी जी तो बड़े भारी वैयाकरण हैं उनके संसर्ग से ऐसा ज्ञात होता है कि छापेखाने वाले भी विद्वान् हो गए, कि स्वामी जी ने यवाः लिखा और उन्होंने यवान् बना लिया। उप्यते यह “डुवप बीजसन्ताने” धातु से कर्मणि प्रत्यय है और इसी कारण उत्तर में यवाः होना चाहिए।
[*२९. इस संस्करण में पृष्ठ २६० पर क्षेत्रवपनप्रकरण की संख्या ११।]
समाधान—यद्यपि यह सामान्य दृष्टि से दीखने वाली भूल ठीक कर दी गई है तथापि यह कोई राजशासन अथवा वैयाकरणों का शासन नहीं है कि कर्म में प्रयुक्त वाक्य का उत्तर कर्म में ही हो। किं पचसि; का उत्तर प्रायः ओदनं पच्यते इस प्रकार दिया जाता है कोई भी उसे अशुद्ध नहीं कहता। इसी प्रकार किं पच्यते का उत्तर भी तण्डुलान् पचे में दिया जाता है। इसी लौकिक वाग्व्यवहार के अनुसार किमुप्यते का उत्तर यवान् वपामि सर्वथा ठीक है। पदों में पदैकदेश का और वाक्यों में वाक्यैकदेश का प्रयोग होता है। यथा फलं गृहाण के स्थान पर गृहाण=लीजिये इतना ही बोलते हैं। इसी प्रकार यहां भी यवान् वपामि के स्थान पर यदि यवान् मात्र बोला जाता है, तो सर्वथा ठीक है। भाषा का व्यवहार लोकव्यवहार से जाना जाता है व्याकरण से नहीं, यह शास्त्र सिद्धान्त है।
२८. (आक्षेप) पृष्ठ १६ पं॰ १४* ३० —(एतद्रूप्यैकेन कियन्मिलति) अहा हा! एकदम से स्वामी जी ने तो “एक” शब्द को विशेष्यवाचक समझ लिया है। भला यदि मनोरमा पढ़े होते और उसका प्रमाण मानते तो यही कह देते कि “पाचकपाठकादिषु विशेष्यविशेषणभावे कामचारः” परन्तु इन्होंने तो इसका प्रमाण मानना ही नहीं है। अब महाभाष्य के पन्ने उलटने ही रह गये हैं। भला यदि कहीं महाभाष्य में इसका प्रमाण मिल जाएगा तो हम देख लेंगे।
समाधान—इसका समाधान पूर्व २६वें आक्षेप के समाधान से ही समझ लें।
[*३०. इस संस्करण में पृष्ठ २६१ क्रयविक्रयार्घप्रकरण की संख्या १।]
२९. (आक्षेप) पृष्ठ १७ पं॰ ७*३१ —(यद्येतावति समये न दास्यसि चेत्तर्हि राजनियमन्निग्राह्य गृहीष्यामि) क्यों न हो “ग्रहिज्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां ङिति च” ६.१.१६॥ बस यह सूत्र स्वामी जी को कहीं याद आ गया और सम्प्रसारण कर मारा। भला यदि यह कहो कि यहां हस्तदोष है, तो अगले वाक्य में कैसे हस्तदोष हुआ जहां लिखा है (यद्येवं कुर्यान्तर्हि तथैव गृहीतव्यम्) इन स्थानों पर क्रम से ग्रहीष्यामि और ग्रहीतव्यम् होना चाहिये।
[*३१. इस संस्करण में पृष्ठ २६१ पर उत्तमर्णाधमर्णप्रकरण संख्या ५। मूलपाण्डुलिपि में ग्रहीष्यामि ऐसा पाठ है। प्रथम संस्करण में गृहीष्यामि छपा है। सम्पादक]
समाधान—यहां निस्सन्देह लेखन वा मुद्रण प्रमाद से ग्रहीष्यामि के स्थान पर गृहीष्यामि, ग्रहीतव्यम् के स्थान पर गृहीतव्यम् छपा है। अतएव इसे अगले संस्करण में ठीक कर दिया गया है। व्याकरणशास्त्र की गम्भीरतम उपपादन शैली के अनुसार प्रकृति में (धातु प्रतिपादिक) में लोप-आगम-वर्णविकार=संप्रसारण आदि करके जो रूप निष्पन्न किया जाता है वह स्वतन्त्र लुप्त प्रकृति का संकेत है। इस विषय में हमने ‘ऋषि दयानन्द की पदप्रयोगशैली’ एवं ‘आदिभाषायां प्रयुज्यमानानाम् अपाणिनीयप्रयोगाणां साधुत्वविवेचनम्’ लेख में विस्तार से विवेचन किया है। तदनुसार ग्रह समानार्थक गृह और गृभ स्वतन्त्र धातुएं हैं। इन में भी इट् आगम को दीर्घ होता है। तदनुसार प्रथम संस्करण का पाठ भी युक्त है।
३०. (आक्षेप) पृष्ठ १७ पं॰ १७* ३२ —(भोस्साक्षिन् त्वमत्र किञ्चिज्जानासि न वा) इस वाक्य में साक्षिंस्त्वमत्र ऐसा उचित था, यदि कहो कि “संहितैकपदे नित्या नित्या धातूपसर्गयोः। नित्या समासे वाक्ये तु सा विवक्षामपेक्षते” तब तो यह वाक्य शुद्ध हो सकता है। इसी कारण से ऐसी छोटी-छोटी बातों पर इस पुस्तक में हमने दृष्टि दिया ही नहीं है क्योंकि दयानन्द जी तो साधु ठहरे। यह सन्धि विग्रह के मर्म को क्या जानें।
[*३२. इस संस्करण में पृष्ठ २६२ पर साक्षिप्रकरण संख्या १।]
समाधान—आक्षेप्ता के लेख से स्वयं स्पष्ट है कि भोस्साक्षिन् त्वमत्र में संहिताभाव पक्ष में सत्वाभाव ठीक है, फिर भी कुछ-न-कुछ लिखना था, सो लिख डाला। अतः इस पर कुछ भी लिखना व्यर्थ है।
३१. (आक्षेप) पृष्ठ २६ पं॰ २६* ३३ —(सत्यमेवमेतदीश्वरकृपया सुखेन रात्रिर्गच्छेत् प्रभात आगच्छेत्) यहां प्रभातः के स्थान में प्रभातम् चाहिए। और क्या कहें बस इतना ही कहते हैं कि “दयानन्दस्तु लिङ्गमपि न जानाति कोषं पश्यतु”।
[*३३. इस संस्करण में पृष्ठ २७१ पर सायंकालकृत्यप्रकरण संख्या १६।]
समाधान—यहां पर सुगमता के लिए वाक्यरचना का संशोधन अगले संस्करण में कर दिया है। पुनरपि प्रभात आगच्छेत् वाक्य अशुद्ध नहीं है। पण्डित जी को शास्त्ररहस्य विदित ही नहीं है। लिङ्ग लोकाश्रय होते हैं—लिङ्गमशिष्यं लोकाश्रयत्वाल्लिङ्गस्य (महाभाष्य)। शिष्ट प्रयोगों में इसी कारण लिङ्गानुशासन के सामान्य नियमों का बाध देखा जाता है। प्रभात शब्द के विषय में क्या कहें, यदि पण्डित जी ने कालिदास का ‘शाकुन्तल’ नाटक भी पढ़ा होता तो उन्हें ज्ञात हो जाता कि प्रभात शब्द नित्य नपुंसक नहीं है। शाकुन्तल ४ में लिखा है ननु प्रभाता रजनी। यदि कहो कि रजनी के कारण प्रभाता स्त्रीलिङ्ग में हो गया तो यहां भी रात्रिर्गच