In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अग्निहोत्र और संध्या के प्रमाण
महर्षि दयानन्द व्याख्या : अथाग्निहोत्रसन्ध्योपासनयोः प्रमाणानि
सा॒यंसा॑यं गृ॒ह॑पतिर्नो अ॒ग्निः प्रा॒तःप्रा॑तः सौमन॒सस्य॑ दा॒ता।
वसो॑र्वसोर्वसु॒दान॑ एधि व॒यं त्वेन्धा॑नास्त॒न्वं᳡ पुषेम॥ १॥
प्रा॒तःप्रा॑तर्गृ॒हप॑तिर्नो अ॒ग्निः सा॒यंसा॑यं सौमन॒सस्य॑ दा॒ता।
वसो॑र्वसोवसुदान॑ ए॒धीन्धा॑नास्त्वा श॒तहि॑मा ऋधेम॥ २॥
अथर्व॰ कां॰ १९। सू॰ ५५। मं॰ ३, ४॥
तस्माद् ब्राह्मणोऽहोरात्रस्य संयोगे सन्ध्यामुपास्ते। स ज्योतिष्याऽज्योतिषो दर्शनात् सोऽस्याः कालः सा सन्ध्या। तत् सन्ध्यायाः सन्ध्यात्वम्॥ ३॥ षड्वश ब्रा॰ प्रपा॰ ४। खं॰ ५॥
उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन् कुर्वन् ब्राह्मणो विद्वान् सकलं भद्रमश्नुते॥ ४॥
तैत्तिरीय आ॰ २। प्रपा॰ २। अनु॰ २॥
[पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् सावित्रीमार्कदर्शनात्।
पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात्॥ ५॥]
न तिष्ठति तु यः पूर्वां नोपास्ते यश्च पश्चिमाम्।
स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मणः॥ ६॥ मनु॰ अ॰ २। श्लो॰ [१०१,] १०३॥
भाष्यम्—अयं (नः)अस्माकं (गृहपतिः०)गृहात्मपालकोऽग्निः भौतिकः परमेश्वरश्च (प्रातः-प्रातः)तथा (सायं-सायं)च परिचरित-स्सूपासितः सन् (सौमनसस्य दाता)आरोग्यस्यानन्दस्य च दाता भवति। तथा (वसोर्व॰)उत्तमोत्तमपदार्थस्य च। अत एव परमेश्वरः (वसुदानः)वसुप्रदातास्ति। हे परमेश्वर! एवंभूतस्त्वमस्माकं राज्यादिव्यवहारे हृदये च (एधि)प्राप्तो भव। तथा भौतिकोऽप्यग्निरत्र ग्राह्यः। (वयं)हे परमेश्वर! एवं (त्वाम्)त्वा (इन्धानाः)प्रकाशयितारस्सन्तो वयं (तन्वम्)शरीरं (पुषेम)पुष्टं कुर्य्याम। तथाग्निहोत्रादिकर्मणा भौतिकमग्निमिन्धानाः प्रदीपयितारः सन्तः सर्वे वयं पुष्येम॥ १॥
(प्रातःप्रातर्गृहपतिर्नो॰)अस्यार्थः पूर्ववद्विज्ञेयः। परन्त्वयं विशेषः—वयमग्निहोत्रमीश्वरोपासनं च कुर्वन्तः सन्तः (शतहिमाः)शतं हिमा हेमन्तर्तवो गच्छन्ति येषु संवत्सरेषु ते शतहिमा यावत्स्युस्तावत् (ऋधेम)वर्द्धेमहि। एवं कृतेन कर्म्मणा नोऽस्माकं नैव कदाचिद्धानिर्भवेदितीच्छामः॥ २॥
भाषार्थ—(सायंसायं॰)यह हमारा गृहपति अर्थात् घर और आत्मा का रक्षक भौतिक अग्नि और परमेश्वर प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकाल श्रेष्ठ उपासना को प्राप्त होके (सौमनसस्य दाता)जैसे आरोग्य और आनन्द का देने वाला है उसी प्रकार उत्तम से उत्तम वस्तु का देने वाला है। इसी से परमेश्वर (वसुदानः)वसु अर्थात् धन का देने वाला प्रसिद्ध है। हे परमेश्वर! इस प्रकार आप मेरे राज्य आदि व्यवहार और चित्त में प्रकाशित रहिये। तथा इस मन्त्र में अग्निहोत्र आदि करने के लिये भौतिक अग्नि भी ग्रहण करने योग्य है। (वयं त्वे॰)हे परमेश्वर! पूर्वोक्त प्रकार से हम आपको प्रकाश करते हुए अपने शरीर को (पुषेम)पुष्ट करें। इसी प्रकार भौतिक अग्नि को प्रज्ज्वलित करते हुए सब संसार की पुष्टि करके पुष्ट हों॥ १॥
(प्रातःप्रातर्गृहपतिर्नो॰)इस मन्त्र का अर्थ पूर्व मन्त्र के तुल्य जानो। परन्तु यह विशेष है कि—अग्निहोत्र और ईश्वर की उपासना करते हुए हम लोग (शतहिमाः)सौ हेमन्त ऋतु बीत जायं जिन वर्षों में, अर्थात् सौ वर्ष पर्यन्त (ऋधेम)धनादि पदार्थों से वृद्धि को प्राप्त होते रहें। और पूर्वोक्त प्रकार से अग्निहोत्रादि कर्म करके हमारी हानि कभी न हो, ऐसी इच्छा करते हैं॥ २॥
(तस्माद् ब्राह्मणो॰)ब्रह्म का उपासक मनुष्य रात्रि और दिवस के सन्धि समय में नित्य उपासना करे। जो प्रकाश और अप्रकाश का संयोग है, वही सन्ध्या का काल जानना। और उस समय में जो सन्ध्योपासन की ध्यानक्रिया करनी होती है, वही सन्ध्या है। और जो एक ईश्वर को छोड़ के दूसरे की उपासना न करनी तथा सन्ध्योपासन कभी न छोड़ देना, इसी को सन्ध्योपासना कहते हैं॥ ३॥
(उद्यन्तमस्तं यान्तं)जब सूर्य्य के उदय और अस्त का समय आवे, उसमें नित्य प्रकाशस्वरूप आदित्य परमेश्वर की उपासना करता हुआ, ब्रह्मोपासक ही मनुष्य सम्पूर्ण सुख को प्राप्त होता है। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि दो समय में परमेश्वर की नित्य उपासना किया करें॥ ४॥
इसमें मनुस्मृति की भी साक्षी है कि दो घड़ी रात्रि से लेके सूर्य्योदय पर्य्यन्त प्रातःसन्ध्या, और सूर्य्यास्त से लेकर तारों के दर्शन पर्य्यन्त सायंकाल में सविता अर्थात् सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले परमेश्वर की उपासना गायत्र्यादि मन्त्र के अर्थ-विचारपूर्वक नित्य करें॥ ५॥
(न तिष्ठति तु॰)जो मनुष्य नित्य प्रातः और सायं सन्ध्योपासन को नहीं करता, उसको शूद्र के समान समझ कर द्विजकुल से अलग करके शूद्रकुल में रख देना चाहिये। वह सेवाकर्म किया करे, और उसके विद्या का चिह्न यज्ञोपवीत भी न रहना चाहिये। इससे सब मनुष्यों को उचित है कि सब कामों से इस काम को मुख्य जानकर पूर्वोक्त दो समयों में जगदीश्वर की उपासना नित्य करते रहें॥ ६॥
इत्यग्निहोत्रसन्ध्योपासनप्रमाणानि॥