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संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ब्रह्मयज्ञ
महर्षि दयानन्द व्याख्या : यह पुस्तक नित्यकर्मविधि का है। इसमें पञ्चमहायज्ञ का विधान है, जिनके ये नाम हैं कि—ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और नृयज्ञ। उनके मन्त्र, मन्त्रों के अर्थ और जो-जो करने का विधान लिखा है, सो-सो यथावत् करना चाहिये। एकान्त देश में अपने आत्मा, मन और शरीर को शुद्ध और शान्त करके, उस-उस कर्म में चित्त लगा के, तत्पर होना चाहिये। इन नित्यकर्मों के फल ये हैं कि—ज्ञानप्राप्ति से आत्मा की उन्नति और आरोग्यता होने से, शरीर के सुख से व्यवहार और परमार्थ कार्य्यों की सिद्धि होना। उससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये सिद्ध होते हैं। इनको प्राप्त होकर मनुष्यों को सुखी होना उचित है।
अथ तेषां प्रकारः। तत्रादौ ब्रह्मयज्ञान्तर्गतसन्ध्याविधानं प्रोच्यते। तत्र सन्ध्याशब्दार्थः—‘सन्ध्यायन्ति सन्ध्यायते वा परब्रह्म यस्यां सा सन्ध्या’। तत्र रात्रिन्दिवयोः सन्धिवेलायामुभयोस्सन्ध्ययोः सर्वैर्मनुष्यैरवश्यं परमेश्वरस्यैव स्तुतिप्रार्थनोपासनाः कार्य्याः।
आदौ शरीरशुद्धिः कर्त्तव्या—
सा बाह्या जलादिना, आभ्यन्तरा रागद्वेषासत्यादित्यागेन।
अत्र प्रमाणम्—
अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनःसत्येन शुध्यति।
विद्यातपोभ्यां भूतात्मा बुद्धिर्ज्ञानेन शुध्यति॥ इत्याह मनुः—अ॰ ५। श्लो॰ १०९॥
शरीरशुद्धेस्सकाशादात्मान्तःकरणशुद्धिरवश्यं सर्वैस्सम्पादनीया। तस्यास्सर्वोत्कृष्टत्वात् परब्रह्मप्राप्त्येकसाधनत्वाच्च।
ततो मार्जनं कुर्यात्—
नैवेश्वरध्यानादावालस्यं भवेदेतदर्थं शिरोनेत्राद्युपरि जलप्रक्षेपणं कर्त्तव्यम्। नो चेन्न।
भाषार्थ—अब सन्ध्योपासनादि पाँच महायज्ञों की विधि लिखी जाती है। और उसमें के मन्त्रों का अर्थ भी लिखा जाता है। पहिले ‘सन्ध्या’ शब्द का अर्थ यह है कि—(सन्ध्यायन्ति॰)भली भाँति ध्यान करते हैं वा ध्यान किया जाय परमेश्वर का जिसमें, वह ‘सन्ध्या’। सो रात और दिन के संयोग समय दोनों सन्ध्याओं में सब मनुष्यों को परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना करनी चाहिये।
पहिले बाह्य जलादि से शरीर की शुद्धि और राग-द्वेष आदि के त्याग से भीतर की शुद्धि करनी चाहिये। क्योंकि मनुजी ने अध्याय ५ के १०६ श्लोक (अद्भिर्गात्राणि इत्यादि)में यह लिखा है कि शरीर जल से, मन सत्य से, जीवात्मा विद्या और तप से और बुद्धि ज्ञान से शुद्ध होती है। परन्तु शरीरशुद्धि की अपेक्षा अन्तःकरण की शुद्धि अवश्य करनी चाहिये। क्योंकि वही सर्वोत्तम और परमेश्वर प्राप्ति का एक साधन है।
तब कुशा वा हाथ से मार्जन करे। अर्थात् परमेश्वर का ध्यान आदि करने के समय किसी प्रकार का आलस्य न आवे, इसलिये शिर और नेत्र आदि पर जल प्रक्षेप करे। यदि आलस्य न हो तो न करना।
पुनर्न्यूनान्न्यूनांस्त्रीन् प्राणायामान् कुर्य्यात्—
आभ्यन्तरस्थं वायुं नासिकापुटाभ्यां बलेन बहिर्निस्सार्य्य यथाशक्ति बहिरेव स्तम्भयेत्। पुनः शनैश्शनैर्गृहीत्वा किञ्चित् तमवरुध्य पुनस्तथैव बहिर्न्निस्सारयेदवरोधयेच्च। एवं त्रिवारं न्यूनातिन्यूनं कुर्य्यात्। अनेनात्ममनसोः स्थितिं सम्पादयेत्।
ततो गायत्रीमन्त्रेण शिखां बद्ध्वा रक्षाञ्च कुर्य्यात्—
इतस्ततः केशा न पतेयुरेतदर्थं शिखाबन्धनम्। प्रार्थितस्सन्नीश्वर-स्सत्कर्मसु सर्वत्र सर्वदा रक्षेन्नः, एतदर्थं रक्षाकरणम्।
भाषार्थ—फिर कम से कम तीन प्राणायाम करे। अर्थात् भीतर के वायु को बल से निकाल कर यथाशक्ति बाहर ही रोक दे। फिर शनैः शनैः ग्रहण करके कुछ चिर भीतर ही रोक के बाहर निकाल दे, और वहाँ भी कुछ रोके। इस प्रकार कम से कम तीन वार करे। इससे आत्मा और मन की स्थिति सम्पादन करे।
इसके अनन्तर गायत्री से शिखा को बाँध के रक्षा करे। इसका प्रयोजन यह है कि इधर-उधर केश न गिरें, सो यदि केशादि पतन न हो तो न करे और रक्षा करने का प्रयोजन यह है कि परमेश्वर प्रार्थित होकर सब भले कामों में सदा सब जगह में हमारी रक्षा करे।
अथाचमनमन्त्रः—
ओं शन्नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ऽ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑।
शंयोर॒भि स्र॑वन्तु नः॥ १॥ —यजुः० ३६।१२
भाष्यम्—‘आप्लृ व्याप्तौ’ अस्माद्धातोरप्शब्दः सिध्यति। अप्शब्दो नियतस्त्रीलिङ्गो बहुवचनान्तश्च। ‘दिवु क्रीडाद्यर्थः’। (शन्नो दे॰)देव्य आपः सर्वप्रकाशकस्सर्वानन्दप्रदस्सर्वव्यापक ईश्वरः, (अभिष्टये)इष्टानन्दप्राप्तये, (पीतये)पूर्णानन्दभोगेन तृप्तये, (नः)अस्मभ्यं, (शम्)कल्याणं, (भवन्तु)अर्थात् भावयतु प्रयच्छतु। ता आपो देव्यः स एवेश्वरः (नः)अस्मभ्यं, (शंयोः)शम् (अभि स्रवन्तु)अर्थात् सुखस्याभितः सर्वतो वृष्ट करोतु।
अप्शब्देनेश्वरस्य ग्रहणम्। अत्र प्रमाणम्—
यत्र॑ लो॒कांश्च॒ कोशां॒श्चापो॒ ब्रह्म॒ जना॑ वि॒दुः।
अस॑च्च॒ यत्र॒ सच्चा॒न्तः स्क॒म्भं तं ब्रू॑हि कत॒मः सि्॑वदे॒व सः॥ अथ॰ कां॰ १०। सू॰ ७। मं॰ १०॥
अनेन वेदमन्त्रप्रमाणेनाप्शब्देन परमात्मनोऽत्र ग्रहणं क्रियते॥
एवमनेन मन्त्रेणेश्वरं प्रार्थयित्वा त्रिराचामेत्। जलाभावश्चेन्नैव कुर्यात्। आचमनमप्यालस्यकण्ठस्थकफस्य निवारणार्थम्।
भाषार्थ—अब आचमन करने का मन्त्र लिखते हैं—(ओं शन्नोदेवी इत्यादि)। इसका अर्थ यह है कि—‘आप्लृ व्याप्तौ’ इस धातु से अप् शब्द सिद्ध होता है। वह सदा स्त्रीलिङ्ग और बहुवचनान्त है। ‘दिवु’ धातु अर्थात् जिसके क्रीड़ा आदि अर्थ हैं, उससे देवी शब्द सिद्ध होता है। (देव्यः आपः)सबका प्रकाशक, सबको आनन्द देने वाला और सर्वव्यापक ईश्वर, (अभिष्टये)मनोवाञ्छित आनन्द के लिये, और (पीतये)पूर्णानन्द की प्राप्ति के लिये, (नः)हमको (शम्)कल्याणकारी (भवन्तु)हो, अर्थात् हमारा कल्याण करे। वही परमेश्वर (नः)हम पर (शंयोः)सुख की (अभिस्रवन्तु)सर्वथा वृष्टि करे।
यहाँ ‘अप्’ शब्द से ईश्वर के ग्रहण करने में प्रमाण—(यत्र लोकांश्च॰)जिसमें सब लोक-लोकान्तर, कोश अर्थात् सब जगत् का कारणरूप खजाना, जिसमें असत् अदृश्यरूप आकाशादि और सत् स्थूल प्रकृत्यादि सब पदार्थ स्थित हैं, उसी का नाम अप् है। और वह नाम ब्रह्म का है, तथा उसी को स्कम्भ कहते हैं। वह कौनसा देव और कहाँ है? इसका उत्तर है कि जो (अन्तः)सबके भीतर व्यापक होके परिपूर्ण हो रहा है, उसी को तुम उपास्य, पूज्य और इष्टदेव जानो। इस वेदमन्त्र के प्रमाण से अप् नाम ब्रह्म का है।
इस प्रकार इस मन्त्र से परमेश्वर की प्रार्थना करके तीन आचमन करे, यदि जल न हो तो न करे। आचमन से गले के कफादि की निवृत्ति होना प्रयोजन है।
अथेन्द्रियस्पर्शः—
ओं वाक् वाक्। ओं प्राणः प्राणः। ओं चक्षुः चक्षुः। ओं श्रोत्रं श्रोत्रम्। ओं नाभिः। ओं हृदयम्। ओं कण्ठः। ओं शिरः। ओं बाहुभ्यां यशोबलम्। ओं करतलकरपृष्ठे॥
भाष्यम्—एभिः सर्वत्रेश्वरप्रार्थनया स्पर्शः कार्य्यः। सर्वदेश्वरकृपये-न्द्रियाणि बलवन्ति तिष्ठन्त्वित्यभिप्रायः॥
अथेश्वरप्रार्थनापूर्वकमार्जनमन्त्राः—
ओं भूः पुनातु शिरसि। ओं भुवः पुनातु नेत्रयोः। ओं स्वः पुनातु कण्ठे। ओं महः पुनातु हृदये। ओं जनः पुनातु नाभ्याम्। ओं तपः पुनातु पादयोः। ओं सत्यं पुनातु पुनश्शिरसि। ओं खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र॥
भाष्यम्—ओमित्यस्य, भूर्भुवः स्वरित्येतासां चार्था गायत्रीमन्त्रार्थे द्रष्टव्याः। महरर्थात् सर्वेभ्यो महान्, सर्वैः पूज्यश्च। सर्वेषां जनकत्वाज्जनः परमेश्वरः। दुष्टानां संतापकारकत्वात् स्वयं ज्ञानस्वरूपत्वात्, ‘यस्य ज्ञानमयं तपः’१ इति वचनस्य प्रामाण्यात् तप ईश्वरः। यदविनाशि यस्य कदाचिद् विनाशो न भवेत् तत्सत्यम्। ब्रह्म व्यापकमिति बोध्यम्॥
इतीश्वरनामभिर्मार्जनं कुर्य्यात्।
अथ प्राणायाममन्त्राः—
ओं भूः। ओं भुवः। ओं स्वः। ओं महः। ओं जनः। ओं तपः। ओं सत्यम्॥ इति प्राणायाममन्त्राः। तैत्ति॰ आ॰ प्रंप॰ १०। अनु॰ २७॥
भाष्यम्—एतेषामुच्चारणार्थविचारपुरस्सरं पूर्वोक्तप्रकारेण प्राणा-यामान् कुर्यात्॥
भाषार्थ—अथेन्द्रियस्पर्शः—(ओं वाक् वागित्यादि)। इस प्रकार से ईश्वर की प्रार्थनापूर्वक इन्द्रियों का स्पर्श करे। इसका अभिप्राय यह है कि ईश्वर की प्रार्थना से सब इन्द्रिय बलवान् रहें।
अब ईश्वर की प्रार्थनापूर्वक मार्जन के मन्त्र लिखे जाते हैं—(ओं भूः पुनातु शिरसीत्यादि)। ओंकार, भूः, भुवः और स्वः इनके अर्थ गायत्री मन्त्र के अर्थ में देख लेना। (महः)सबसे बड़ा और सबका पूज्य होने से परमेश्वर को मह कहते हैं। (जनः)सब जगत् के उत्पादक होने से परमेश्वर का जन नाम है। (तपः)दुष्टों को सन्तापकारी और ज्ञानस्वरूप होने से ईश्वर को तप कहते हैं, क्योंकि ‘यस्येत्यादि’ उपनिषद् का वाक्य इसमें प्रमाण है। (सत्यम्)अविनाशी होने से परमेश्वर का सत्य नाम है। और व्यापक होने से ब्रह्म नाम परमेश्वर का है। अर्थात् पूर्व मन्त्रोक्त सब नाम परमेश्वर ही के हैं।
इस प्रकार ईश्वर के नामों के अर्थों का स्मरण करते हुए मार्जन करें।
अब प्राणायाम के मन्त्र लिखते हैं—(ओं भूरित्यादि)। इनके उच्चारण और अर्थ विचारपूर्वक पूर्वोक्त प्रकार के अनुसार प्राणायामों को करे।
इस प्रकार प्राणायाम करके, अर्थात् भीतर के वायु को बल से नासिका के द्वारा बाहर फेंक के, यथाशक्ति बाहर ही रोक के, पुनः धीरे-धीरे भीतर लेके, पुनः बल से बाहर फेंक के रोकने से मन और आत्मा को स्थिर करके, आत्मा के बीच में जो अन्तर्यामीरूप से ज्ञान और आनन्दस्वरूप व्यापक परमेश्वर है, उसमें अपने आप को मग्न करके, अत्यन्त आनन्दित होना चाहिये। जैसा गोताखोर जल में डुबकी मारके शुद्ध होके बाहर आता है, वैसे ही सब जीव लोग अपने आत्माओं को शुद्ध, ज्ञान, आनन्दस्वरूप व्यापक परमेश्वर में मग्न करके नित्य शुद्ध करें।
अथाघमर्षणमन्त्राः—
अथेश्वरस्य जगदुत्पादनद्वारा स्तुत्याऽघमर्षणमन्त्रा अर्थात् पापदूरी-करणार्थाः—
ओ३म् ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत।
ततो॒ रात्र्य॑जायत॒ ततः॑ समु॒द्रोऽ अ॑र्ण॒वः॥१॥
ओं स॒मु॒द्राद॑र्ण॒वादधि॑ संवत्स॒रोऽ अ॑जायत।
अ॒हो॒रा॒त्राणि॑ वि॒दध॒द्विश्व॑स्य मिष॒तो व॒शी॥२॥
ओं सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्।
दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑॥३॥ ऋ॰ अ॰ १०।व॰ ४८। मं॰१-३॥
भाष्यम्—(धाता)दधाति सकलं जगत् पोषयति वा स धातेश्वरः, (वशी)वशं कर्तुं शीलमस्य सः, (यथापूर्वम्)यथा तस्य सर्वज्ञे विज्ञाने जगद्रचनज्ञानमासीत्, पूर्वकल्पसृष्टौ यथा रचनं कृतमासीत्तथैव जीवानां पुण्यपापानुसारतः प्राणिदेहानकल्पयत्। (सूर्याचन्द्रमसौ)यौ प्रत्यक्षविषयौ सूर्यचन्द्रलोकौ (दिवम्)सर्वोत्तमं स्वप्रकाशमग्न्याख्यम् (पृथिवीं)प्रत्यक्षविषयां (अन्तरिक्षम्)अर्थाद् द्वयोर्लोकयोर्मध्यमाकाशं तत्रस्थाँ-ल्लोकांश्च (स्वः)मध्यस्थं लोकम् (अकल्पयत्)यथापूर्वं रचितवान्। ईश्वरज्ञानस्यापरिणामित्वात्, पूर्णत्वादनन्तत्वात्, सर्वदैकरसत्वाच्च नैव तस्य वृद्धिक्षयव्यभिचाराश्च कदाचिद् भवन्ति। अत एव ‘यथापूर्वमकल्पयद्’ इत्युक्तम्।
स एव वशीश्वरः (विश्वस्य मिषतः)सहजस्वभावेन (अहोरात्राणि)रात्रेर्दिवसस्य च विभागं यथापूर्वं (विदधत्)विधानं कृतवान्। तस्य धातुर्वशिनः परमेश्वरस्यैव (अभीद्धात्)अभितः सर्वतः इद्धात् दीप्तात् ज्ञानमयात् (तपसः)अर्थादनन्तसामर्थ्यात् (ऋतम्)यथार्थं सर्वविद्याधिकरणं वेदशास्त्रं, (सत्यम्)त्रिगुणमयं प्रकृत्यात्मकमव्यक्तं, स्थूलस्य सूक्ष्मस्य जगतः कारणं च (अध्यजायत)यथापूर्वमुत्पन्नम्।
(ततो रात्री)या तस्मादेव सामर्थ्यात् प्रलयानन्तरं भवति सा रात्रिः, (अजायत)यथापूर्वमुत्पन्नासीत्। “तम॑ आसी॒त्तम॑सा गू॒ढमग्रे॑ ऋ॰ अ॰ ८। अ॰ ७। व॰ १७। मं॰ ३॥” अग्रे सृष्टेः प्राक् तमोऽन्धकार एवासीत् तेन तमसा सकलं जगदिदमुत्पत्तेः प्राग् गूढं गुप्तमर्थाददृश्यमासीत्।
(ततः समु॰)तस्मादेव सामर्थ्यात् पृथिवीस्थोऽन्तरिक्षस्थश्च महान् समुद्रः (अजायत)यथापूर्वमुत्पन्न आसीत्। (समुद्रादर्णवात्)पश्चात् (संवत्सरः)क्षणादिलक्षणः कालोऽध्यजायत। यावज्जगत् तावत् सर्वं परमेश्वरस्य सामर्थ्यादेवोत्पन्नमित्यवधार्य्यम्॥ १-३॥
एवमुक्तगुणं परमेश्वरं संस्मृत्य पापाद्भीत्वा ततो दूरे सर्वैर्जनैः स्थातव्यम्। नैव कदाचित् केनचित् स्वल्पमपि पापं कर्त्तव्यमितीश्वराज्ञास्तीति निश्चेतव्यम्। अनेनाघमर्षणं कुर्य्यादर्थात्पापानुष्ठानं सर्वथा परित्यजेत्।
भाषार्थ—अब अघमर्षण—अर्थात् हे ईश्वर! तू जगदुत्पादक है, इत्यादि स्तुति करके पाप से दूर रहने के उपदेश के मन्त्र लिखते हैं—(ओं ऋतञ्च सत्यमित्यादि)। इनका अर्थ यह है कि—
(धाता)सब जगत् का धारण और पोषण करने वाला और (वशी)सब को वश करने वाला परमेश्वर, (यथापूर्वम्)जैसा कि उस के सर्वज्ञ विज्ञान में जगत् के रचने का ज्ञान था, और जिस प्रकार पूर्वकल्प की सृष्टि में जगत् की रचना थी, और जैसे जीवों के पुण्य-पाप थे, उनके अनुसार ईश्वर ने मनुष्यादि प्राणियों के देह बनाये हैं। (सूर्याचन्द्रमसौ)जैसे पूर्व कल्प में सूर्य, चन्द्र लोक रचे थे, वैसे ही इस कल्प में भी रचे हैं (दिवम्)जैसा पूर्व सृष्टि में सूर्यादि लोकों का प्रकाश रचा था, वैसा ही इस कल्प में भी रचा है। तथा (पृथिवीम्)जैसी प्रत्यक्ष दीखती है, (अन्तरिक्षम्)जैसा पृथिवी और सूर्य्यलोक के बीच में पोलापन है, (स्वः)जितने आकाश के बीच में लोक हैं, उनको (अकल्पयत्)ईश्वर ने रचा है। जैसे अनादिकाल से लोक-लोकान्तर को जगदीश्वर बनाया करता है, वैसे ही अब भी बनाये हैं और आगे भी बनावेगा, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान विपरीत कभी नहीं होता किन्तु पूर्ण और अनन्त होने से सर्वदा एकरस ही रहता है, उसमें वृद्धि, क्षय और उलटापन कभी नहीं होता। इसी कारण से ‘यथापूर्वमकल्पयत्’ इस पद का ग्रहण किया है।
(विश्वस्य मिषतः)उसी ईश्वर ने सहजस्वभाव से जगत् के रात्रि, दिवस, घटिका, पल और क्षण आदि को जैसे पूर्व थे वैसे ही (विदधत्)रचे हैं। इसमें कोई ऐसी शंका करे कि ईश्वर ने किस वस्तु से जगत् को रचा है? उसका उत्तर यह है कि (अभीद्धात् तपसः)ईश्वर ने अपने अनन्त सामर्थ्य से सब जगत् को रचा है। जो कि ईश्वर के प्रकाश से जगत् का कारण प्रकाशित और सब जगत् के बनाने की सामग्री ईश्वर के आधीन है। (ऋतम्)उसी अनन्त ज्ञानमय सामर्थ्य से सब विद्या का खजाना वेदशास्त्र को प्रकाशित किया, जैसा कि पूर्व सृष्टि में प्रकाशित था। और आगे के कल्पों में भी इसी प्रकार से वेदों का प्रकाश करेगा। (सत्यम्)जो त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुण से युक्त है, जिसके नाम अव्यक्त, अव्याकृत सत्, प्रधान प्रकृति हैं, जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् का कारण है, सो भी (अध्यजायत)अर्थात् कार्यरूप होके पूर्व कल्प के समान उत्पन्न हुआ है। (ततो रात्र्यजायत)उसी ईश्वर के सामर्थ्य से जो प्रलय के पीछे हजार चतुर्युगी के प्रमाण से रात्रि कहाती है, सो भी पूर्व प्रलय के तुल्य ही होती है। इसमें ऋग्वेद का प्रमाण है कि—“जब जब विद्यमान सृष्टि होती है, उसके पूर्व सब आकाश अन्धकाररूप रहता है, और उसी अन्धकार में सब जगत् के पदार्थ और सब जीव ढके हुए रहते हैं, उसी का नाम महारात्रि है।” (ततः समुद्रो अर्णवः)तदनन्तर उसी सामर्थ्य से पृथिवी और मेघमण्डल में जो महासमुद्र है, सो पूर्व सृष्टि के सदृश ही उत्पन्न हुआ है।
(समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत)उसी समुद्र की उत्पत्ति के पश्चात् संवत्सर अर्थात् क्षण, मुहूर्त, प्रहर आदि काल भी पूर्व सृष्टि के समान उत्पन्न हुआ है। वेद से लेके पृथिवीपर्यन्त जो यह जगत् है, सो सब ईश्वर के नित्य सामर्थ्य से ही प्रकाशित हुआ है। और ईश्वर सबको उत्पन्न करके, सब में व्यापक होके अन्तर्यामीरूप से सबके पाप-पुण्यों को देखता हुआ पक्षपात छोड़ के सत्य न्याय से सबको यथावत् फल दे रहा है॥ १-३॥
ऐसा निश्चत जान के ईश्वर से भय करके सब मनुष्यों को उचित है कि मन, कर्म और वचन से पापकर्मों को कभी न करें। इसी का नाम अघमर्षण है, अर्थात् ईश्वर सबके अन्तःकरण के कर्मों को देख रहा है इससे पापकर्मों का आचरण मनुष्य लोग सर्वथा छोड़ देवें।
‘शन्नो देवी’रिति पुनराचामेत्। ततो गायत्र्यादिमन्त्रार्थान् मनसा विचारयेत्। पुनः परमेश्वरेणैव सूर्यादिकं सकलं जगद्रचितमिति परमार्थ-स्वरूपं ब्रह्म चिन्तयित्वा परं ब्रह्म प्रार्थयेत्।
भाषार्थ—‘शन्नो देवीरिति’ इस मन्त्र से तीन आचमन करे। तदनन्तर गायत्र्यादि मन्त्रों के अर्थ विचारपूर्वक परमेश्वर की स्तुति, अर्थात् परमेश्वर के गुण और उपकार का ध्यान कर, पश्चात् प्रार्थना करे। अर्थात् सब उत्तम कामों में ईश्वर का सहाय चाहे, और सदा पश्चात्ताप करे कि मनुष्यशरीर धारण करके हम लोगों से जगत् का उपकार कुछ भी नहीं बनता। जैसा कि ईश्वर ने सब पदार्थों की उत्पत्ति करके सब जगत् का उपकार किया है, वैसे हम लोग भी सब का उपकार करें। इस काम में परमेश्वर हमको सहाय करे कि जिससे हम लोग सबको सदा सुख देते रहें।
तदनन्तर ईश्वर की उपासना करे, सो दो प्रकार की है—एक सगुण और दूसरी निर्गुण। जैसे ईश्वर सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, चेतन, व्यापक, अन्तर्यामी, सब का उत्पादक, धारण करनेहारा, मङ्गलमय, शुद्ध, सनातन, ज्ञान और आनन्दस्वरूप है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पदार्थों का देनेवाला, सब का पिता, माता, बन्धु, मित्र, राजा और न्यायाधीश है। इत्यादि ईश्वर के गुण-विचारपूर्वक उपासना करने का नाम सगुणोपासना है। तथा निर्गुणोपासना इस प्रकार से करनी चाहिये कि ईश्वर अनादि, अनन्त है, जिसका आदि और अन्त नहीं। अजन्मा, अमृत्यु, जिसका जन्म और मरण नहीं। निराकार, निर्विकार जिसका आकार और जिसमें कोई विकार नहीं। जिसमें रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, अन्याय, अधर्म, रोग, दोष, अज्ञान और मलीनता नहीं है। जिसका परिमाण, छेदन, बन्धन, इन्द्रियों से दर्शन, ग्रहण और कम्पन नहीं होता। जो ह्रस्व, दीर्घ और शोकातुर कभी नहीं होता। जिसको भूख, प्यास, शीतोष्ण, हर्ष और शोक कभी नहीं होते। जो उलटा काम कभी नहीं करता, इत्यादि जो जगत् के गुणों से ईश्वर को अलग जान के ध्यान करना, वह निर्गुणोपासना कहाती है।
अथ मनसापरिक्रमा-मन्त्राः—
ओं प्राची॒ दिग॒ग्निरधि॑पतिरसि॒तो र॑क्षि॒तादि॒त्या इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥ १॥
दक्षि॑णा॒ दिगिन्द्रोऽधि॑पति॒स्तिर॑श्चिराजी रक्षि॒ता पि॒तर॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥२॥
प्र॒तीची॒ दिग्वरु॒णोऽधि॑पतिः॒ पृदा॑कू रक्षि॒तान्न॒मिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥३॥
उदी॑ची॒ दिक् सोमोऽधि॑पतिः स्व॒जो र॑क्षि॒ताशनि॒रिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥४॥
ध्रु॒वा दिग्विष्णु॒रधि॑पतिः क॒ल्माष॑ग्रीवो रक्षि॒ता वी॒रुध॒ इष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो जम्भे॑ दध्मः॥५॥
ऊ॒र्ध्वा दिग्बृह॒स्पति॒रधि॑पतिः श्वि॒त्रो र॑क्षि॒ता व॒र्षमिष॑वः। तेभ्यो॒ नमोऽधि॑पतिभ्यो॒ नमो॑ रक्षि॒तृभ्यो॒ नम॒ इषु॑भ्यो॒ नम॑ एभ्यो अस्तु। यो॒स्मान् द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मस्तं वो॒ जम्भे॑ दध्मः॥६॥
अथर्व॰ कां॰ ३। अ॰ ६। सू॰ २७। मं॰ १-६॥
भाष्यम्—(प्राची दि॰)सर्वासु दिक्षु व्यापकमीश्वरं संध्यायामग्न्या-दिभिर्नामभिः प्रार्थयेत्। यत्र स्वस्य मुखं सा प्राची दिक् तथा यस्यां सूर्य उदेति सापि प्राची दिगस्ति। तस्या अधिपतिरग्निरर्थात् ज्ञानस्वरूपः परमेश्वरः, (असितः)बन्धनरहितोऽस्माकं सदा रक्षिता भवतु। यस्यादित्याः प्राणाः किरणाश्चेषवो यैः सर्वं जगद् रक्षति, तेभ्य इन्द्रियाधिपतिभ्यश्शरीर-रक्षितृभ्य इषुरूपेभ्यः प्राणेभ्यो वारं वारं नमोऽस्तु। कस्मै प्रयोजनाय? यः कश्चिदस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तं (वः)तेषां प्राणानां (जम्भे)अर्थाद्वशे दध्मः। यतस्सोऽनर्थान्निवर्त्य स्वमित्रं भवेत्। वयं च तस्य मित्राणि भवेम॥ १॥
(दक्षिणा॰)दक्षिणस्या दिश इन्द्रः परमैश्वर्य्ययुक्तः परमेश्वरो-ऽधिपतिरस्ति, स एव कृपयाऽस्माकं रक्षिता भवतु। अग्रे पूर्ववदन्वयः कर्त्तव्यः॥ २॥
तथा (प्रतीची दिग्॰)अस्या वरुणः सर्वोत्तमोऽधिपतिः परमेश्वरो-ऽस्माकं रक्षिता भवेदिति पूर्ववत्॥ ३॥
(उदीची॰)सोमः सर्वजगदुत्पादकोऽधिपतिरीश्वरोऽस्माकं रक्षिता स्यादिति॥ ४॥
(ध्रुवा दिक्)अर्थादधो दिक्, अस्या विष्णुर्व्यापक ईश्वरोऽधिपतिः, सोऽस्यामस्मान् रक्षेत्। अन्यत् पूर्ववत्॥ ५॥
(ऊर्ध्वा दिक्॰)अस्या बृहस्पतिरर्थाद् बृहत्या वाचो, बृहतो वेदशास्त्रस्य, बृहतामाकाशादीनां च पतिर्बृहस्पतिर्यः सर्वजगतोऽधिपतिः सर्वतोऽस्मान् रक्षेत्। अग्रे पूर्ववद्योजनीयम्। सर्वे मनुष्याः सर्वशक्तिमन्तं सर्वगुरुं न्यायकारिणं दयालुं पितृवत्पालकं सर्वासु दिक्षु सर्वत्र रक्षकं परमेश्वरमेव मन्येरन्नित्यभिप्रायः॥ ६॥
भाषार्थ—(प्राची दिगग्निरधिपतिः)जो प्राची दिक् अर्थात् जिस ओर अपना मुख हो [तथा जिस ओर सूर्य उदय हो,] उस ओर अग्नि जो ज्ञानस्वरूप अधिपति, जो सब जगत् का स्वामी, (असितः)बन्धनरहित, (रक्षिता)सब प्रकार से रक्षा करने वाला, (आदित्या इषवः)जिसके बाण आदित्य की किरण हैं। उन सब गुणों के अधिपति ईश्वर के गुणों को हम लोग वारम्वार नमस्कार करते हैं। (रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु)जो ईश्वर के गुण और ईश्वर के रचे पदार्थ जगत् की रक्षा करनेवाले हैं, और पापियों को बाणों के समान पीड़ा देनेवाले हैं, उनको हमारा नमस्कार हो। इसलिए कि जो प्राणी अज्ञान से हमसे द्वेष करता है, और जिस अज्ञान से धार्मिक पुरुष से तथा पापी पुरुष से हम लोग द्वेष करते हैं, उन सब की बुराई को उन बाणरूप किरण मुखरूप के बीच में दग्ध कर देते हैं कि जिससे किसी से हम लोग वैर न करें, और कोई भी प्राणी हमसे वैर न करे, किन्तु हम सब लोग परस्पर मित्रभाव से वर्त्तें॥ १॥
(दक्षिणा दिगिन्द्रोऽधिपतिः)जो हमारे दाहिनी ओर दक्षिण दिशा है, उसका अधिपति इन्द्र अर्थात् जो पूर्ण ऐश्वर्यवाला है। (तिरश्चिराजी रक्षिता)जो जीव कीट, पतङ्ग, वृश्चिक आदि तिर्य्यक् कहाते हैं, उनकी राजी जो पंक्ति है, उनसे रक्षा करनेवाला एक परमेश्वर है। (पितर इषवः)जिसकी सृष्टि में ज्ञानी लोग बाण के समान हैं। (तेभ्यो नमो॰)आगे का अर्थ पूर्व के समान जान लेना॥ २॥
(प्रतीची दिग् वरुणोऽधिपतिः)जो पश्चिम दिशा अर्थात् अपने पृष्ठ भाग में है, उसमें वरुण जो सबसे उत्तम सबका राजा परमेश्वर है, (पृदाकू रक्षितान्नमिषवः)जो बड़े-बड़े अजगर सर्पादि विषधारी प्राणियों से रक्षा करनेवाला है। जिसके अन्न अर्थात् पृथिव्यादि पदार्थ बाणों के समान हैं, श्रेष्ठों की रक्षा और दुष्टों की ताड़ना के निमित्त हैं। (तेभ्यो नमो॰)इसका अर्थ पूर्व मन्त्र के समान जान लेना॥ ३॥
(उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः)जो अपनी बाईं ओर उत्तर दिशा है, उसमें सोम नाम से अर्थात् शान्त्यादि गुणों से आनन्द करनेवाले जगदीश्वर का ध्यान करना चाहिये। (स्वजो रक्षिताऽशनिरिषवः)जो अच्छी प्रकार अजन्मा और रक्षा करनेवाला है। जिसके बाण विद्युत् हैं। (तेभ्यो नमो॰)आगे पूर्ववत् जान लेना॥ ४॥
(ध्रुवा दिग्विष्णुरधिपतिः)ध्रुव दिशा अर्थात् जो अपने नीचे की ओर है, उसमें विष्णु अर्थात् व्यापक नाम से परमात्मा का ध्यान करना। (कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः)जिसके हरित रङ्गवाले वृक्षादि ग्रीवा के समान हैं। जिसके बाण के समान सब वृक्ष हैं, उनसे अधोदिशा में हमारी रक्षा करे। (तेभ्यो नमो॰)आगे पूर्ववत् जान लेना॥ ५॥
(ऊर्ध्वा दिग्बृहस्पतिरधिपतिः)जो अपने ऊपर दिशा है, उसमें बृहस्पति जो कि वाणी का स्वामी परमेश्वर है, उसको अपना रक्षक जानें। जिसके बाण के समान वर्षा के बिन्दु हैं, उनसे हमारी रक्षा करे। (तेभ्यो॰)आगे पूर्ववत् जान लेना॥ ६॥
अथोपस्थानमन्त्राः—
ओम् उद्व॒यं तम॑स॒स्परि॒ स्वः᳕ पश्य॑न्त॒ऽ उत्त॑रम्।
दे॒वं दे॑व॒त्रा सूर्य॒मग॑न्म॒ ज्योति॑रुत्त॒मम्॥१॥ यजुः० अ॰ ३५।मं॰ १४
भाष्यम्—हे परमात्मन्! (सूर्यम्)चराचरात्मानं त्वां, (पश्यन्तः)प्रेक्षमाणास्सन्तो वयम्, (उदगन्म)अर्थात् उत्कृष्टश्रद्धावन्तो भूत्वा वयं भवन्तं प्राप्नुयाम। कथंभूतं त्वाम्? (ज्योतिः)स्वप्रकाशम् (उत्तमम्)सर्वोत्कृष्टम्, (देवत्रा)सर्वेषु दिव्यगुणवत्सु पदार्थेषु ह्यनन्तदिव्यगुणैर्युक्तं (देवम्)धर्मात्मनां मुमुक्षूणां मुक्तानां च सर्वानन्दस्य दातारं मोदयितारं च, (उत्तरम्)जगत्प्रलयानन्तरं नित्यस्वरूपत्वाद् विराजमानं, (स्वः)सर्वानन्दस्वरूपं (तमसस्परि)अज्ञानान्धकारात् पूथग्भूतं भवन्तं प्राप्तुं वयं नित्यं प्रार्थयामहे। भवान् स्वकृपया सद्यः प्राप्नोतु न इति॥ १॥
भाषार्थ—अब उपस्थान के मन्त्रों का अर्थ करते हैं जिनसे परमेश्वर की स्तुति और प्रार्थना की जाती है—
हे परमेश्वर! (तमसस्परि स्वः)सब अन्धकार से अलग प्रकाशस्वरूप, (उत्तरम्)प्रलय के पीछे सदा वर्त्तमान (देवं देवत्रा)देवों में भी देव अर्थात् प्रकाश करनेवालों में प्रकाशक, (सूर्यम्)चराचर के आत्मा (ज्योतिरुत्तमम्)ज्ञानस्वरूप और सबसे उत्तम आप को जान के (वयम् उदगन्म)हम लोग सत्य से प्राप्त हुए हैं। हमारी रक्षा करनी आपके हाथ है, क्योंकि हम लोग आपके शरण हैं॥ १॥
उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तवः॑।
दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म्॥२॥ —यजुः० अ॰ ३३।मं॰ ३१॥
भाष्यम्—(केतवः)किरणा विविधजगतः पृथक् पृथग्रचनादिनिया-मका ज्ञापकाः प्रकाशका ईश्वरस्य गुणाः, (दृशे विश्वाय)विश्वं द्रष्टुं (त्यम्)तं पूर्वोक्तं (देवं सूर्यम्)चराचरात्मानं परमेश्वरम् (उद्वहन्ति)उत्कृष्टतया प्रापयन्ति ज्ञापयन्ति प्रकाशयन्ति वै। (उ)इति वितर्के, नैव पृथक् विविधनियमान् दृष्ट्वा नास्तिका अपीश्वरं त्यक्तुं समर्था भवन्तीत्य-भिप्रायः। कथं भूतं देवम्? (जातवेदसम्)जाता ऋग्वेदादयश्चत्वारो वेदा सर्वज्ञानप्रदा यस्मात्, तथा जातानि प्रकृत्यादीनि भूतान्यसंख्यातानि विन्दति। यद्वा जातं सकलं जगद्वेत्ति जानाति यः स जातवेदाः, तं जातवेदसं सर्वे मनुष्यास्तमेवैकं प्राप्तुमुपासितुमिच्छन्त्वित्यभिप्रायः॥
भाषार्थ—(उदु त्यं॰)। (जातवेदसं)जिससे ऋग्वेदादि चार वेद प्रसिद्ध हुए हैं, और जो प्रकृत्यादि सब भूतों में व्याप्त हो रहा है, जो सब जगत् का उत्पादक है, सो परमेश्वर जातवेदा नाम से प्रसिद्ध है। (देवम्)जो सब देवों का देव, और (सूर्यम्)सब जीवादि जगत् का प्रकाशक है (त्वम्)उस परमात्मा को (दृशे विश्वाय)विश्वविद्या की प्राप्ति के लिये हम लोग उपासना करते हैं। (उद्वहन्ति केतवः)‘केतवः’ अर्थात् वेद की श्रुति और जगत् के पृथक् पृथक् रचनादि नियामक गुण उसी परमेश्वर को जनाते और प्राप्त कराते हैं। उस विश्व के आत्मा अन्तर्यामी परमेश्वर ही की हम उपासना सदा करें, अन्य किसी की नहीं॥ २॥
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आप्रा॒ द्यावा॑-पृथि॒वीऽ अ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳसूर्य॑ऽ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च॒ स्वाहा॑॥३॥ — यजुः० अ॰ ७।मं॰ ४२॥
भाष्यम्—स एव देवः सूर्य्यः (जगतः)जङ्गमस्य (तस्थुषः)स्थावरस्य च (आत्मा)अतति नैरन्तर्य्येण सर्वत्र व्याप्नोतीत्यात्मा। तथा (आप्रा॰)द्यौः पृथिवी अन्तरिक्षं चैतदादि सर्वं जगद् रचयित्वा आसमन्ताद् धारयन् सन् रक्षति। (चक्षुः)एष एवैतेषां प्रकाशकत्वाद् बाह्याभ्यन्तरयोश्चक्षुः प्रकाशको विज्ञानमयो विज्ञापकश्चास्ति। अत एव (मित्रस्य)सर्वेषु द्रोहरहितस्य सूर्य्यलोकस्य प्राणस्य वा, (वरुणस्य)वरेषु श्रेष्ठेषु कर्मसु गुणेषु वर्त्तमानस्य च, (अग्नेः)शिल्पविद्याहेतो रूपगुणदाहप्रकाशकस्य विद्युतो भ्राजमानस्यापि चक्षुः सर्वसत्योपदेष्टा प्रकाशकश्च (देवानाम्)स दिव्यगुणवतां विदुषामेव हृदये (उदगात्)उत्कृष्टतया प्राप्तोऽस्ति प्रकाशको वा। तदेव ब्रह्म (चित्रम्)अद्भुतस्वरूपम्। अत्र प्रमाणम्—“आश्चर्य्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्य्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः॥ कठोपनि॰ वल्ली २॥” आश्चर्य्यस्वरूपत्वाद् ब्रह्मणः। तदेव ब्रह्म सर्वेषां चास्माकं (अनीकम्)सर्वदुःखनाशार्थं कामक्रोधादिशत्रुविनाशार्थं बलमस्ति। तद्विहाय मनुष्याणां सर्वसुखकरं शरणमन्यन्नास्त्येवेति वेद्यम्।
(स्वाहा)अथात्र स्वाहाशब्दार्थे प्रमाणम् निरुक्तकारा आहुः—“स्वाहाकृतयः स्वाहेत्येतत्सु आहेति वा, स्वा वागाहेति वा, स्वं प्राहेति वा स्वाहुतं हविर्जुहोतीति वा, तासामेषा भवति। निरु॰ अ॰ ८। खं॰ २०॥” स्वाहाशब्दस्यायमर्थः—(सु आहेति वा)सु सुष्ठु कोमलं मधुरं कल्याणकरं प्रियं वचनं सर्वैर्मनुष्यैः सदा वक्तव्यम्। (स्वा वागाहेति वा)या स्वकीया वाग् ज्ञानमध्ये वर्त्तते, सा यदाह तदेव वागिन्द्रियेण सर्वदा वाच्यम्। (स्वं प्राहेति वा)स्वं स्वकीयपदार्थं प्रत्येव स्वत्वं वाच्यम्, न परपदार्थं प्रति चेति। (स्वाहुतं ह॰)सुष्ठुरीत्या संस्कृत्य संस्कृत्य हविः सदा होतव्यमिति स्वाहाशब्दपर्य्यायार्थाः। स्वमेव पदार्थं प्रत्याह वयं सर्वदा सत्यं वदाम इति, न कदाचित् परपदार्थं प्रति मिथ्या वदेमेति॥ ३॥
भाषार्थ—(चित्रं देवाना॰)। (सूर्य्य आत्मा॰)प्राणी और जड़ जगत् का जो आत्मा है, उसको सूर्य कहते हैं। (आप्रा द्या॰)जो सूर्य और अन्य सब लोकों को बनाके धारण और रक्षण करनेवाला है, (चक्षुर्मित्रस्य)जो मित्र अर्थात् रागद्वेषरहित मनुष्य तथा सूर्यलोक और प्राण का चक्षु प्रकाश करनेवाला है, (वरुणस्या॰)सब उत्तम कामों में जो वर्त्तमान मनुष्य प्राण अपान और अग्नि का प्रकाश करनेवाला है, (चित्रं देवानां)जो अद्भुतस्वरूप विद्वानों के हृदय में सदा प्रकाशित रहता है, (अनीकम्)जो सकल मनुष्यों के सब दुःख नाश करने के लिये परम उत्तम बल है, वह परमेश्वर (उदगात्)हमारे हृदयों में यथावत् प्रकाशित रहे॥ ३॥
ओं तच्चक्षु॑र्दे॒वहि॑तं पु॒रस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑ श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तꣳ शृणु॑याम श॒रदः॑ श॒तं प्र ब्र॑वाम श॒रदः॑ श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥४॥ यजुः० अ॰ ३६।मं॰ २४॥
भाष्यम्—(चक्षुः)यत् सर्वदृक् (देवहितम्)देवेभ्यो हितं दिव्यगुणवतां धर्मात्मनां विदुषां स्वसेवकानां च हितकारि वर्त्तते यत् (पुरस्तात)सृष्टेः प्राक् (शुक्रम्)सर्वजगत्कर्तृ शुद्धमासीद्, इदानीमपि तादृशमेव चास्ति। तदेव (उच्चरत्)अर्थात् उत्कृष्टतया सर्वत्र व्याप्तं विज्ञानस्वरूपं (उद्)प्रलयादूर्ध्वं सर्वसामर्थ्यं स्थास्यति। (तत्)ब्रह्म (पश्येम शरदः शतम्)वयं शतं वर्षाणि तस्यैव प्रेक्षणं कुर्महे। तत्कृपया (जीवेम शरदः शतम्)शतं वर्षाणि प्राणान् धारयेमहि। (शृणुयाम शरदः शतम्)तस्य गुणेषु श्रद्धाविश्वासवन्तो वयं तमेव शृणुयाम। तथा च तद् ब्रह्म तद्गुणांश्च (प्रब्रवाम श॰)अन्येभ्यो मनुष्येभ्यो नित्यमुपदिशेम। (अदीनाः स्याम श॰)एवं च तदुपासनेन, तद्विश्वासेन, तत्कृपया च शतवर्षपर्यन्तमदीनाः स्याम भवेम। मा कदाचित्कस्यापि समीपे दीनता कर्त्तव्या भवेन्नो दारिद्र्यं च। सर्वदा सर्वथा ब्रह्मकृपया स्वतन्त्रा वयं भवेम। तथा (भूयश्च श॰)वयं तस्यैवानुग्रहेण भूयः शताच्छरदः शताद्वर्षेभ्योऽप्यधिकं पश्येम; जीवेम, शृणुयाम, प्रब्राम, अदीनाः स्याम चेत्यन्वयः। अर्थान्नैव मनुष्यास्तमतिकृपालुं परमेश्वरं त्यक्त्वाऽन्यमुपासीरन् याचेरन्नित्यभिप्रायः। “योऽन्यां देवतामुपास्ते पशुरेवꣳस देवानाम्॥ श॰ कां॰ १४। अ॰ ४। २। २२॥” सर्वे मनुष्याः परमेश्वरमेवोपासीरन्। यस्तस्मादन्यस्योपासनां करोति, स इन्द्रियारामो गर्द-भवत्सर्वैश्शिष्टैर्विज्ञेय इति निश्चयः॥ ४॥
कृताञ्जलिरत्यन्तश्रद्धालुर्भूत्वैतैर्मन्त्रैः स्तुवन् सर्वकालसिद्ध्यर्थं परमेश्वरं प्रार्थयेत्।
भाषार्थ—(तच्चक्षुर्देवहितम्)जो ब्रह्म सब का द्रष्टा, धार्मिक विद्वानों का परम हितकारक, तथा (पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्)सृष्टि के पूर्व,पश्चात् और मध्य में सत्यरूप से वर्त्तमान रहता, और सब जगत् का करनेवाला है। (पश्येम शरदः शतम्)उसी ब्रह्म को हम लोग सौ वर्ष पर्य्यन्त देखें, (जीवेम शरदः शतम्)जीवें, (शृणुयाम शरदः शतम्)सुनें (प्रब्रवाम शरदः०)उसी ब्रह्म का उपदेश करें, (अदीनाः स्याम॰)और उसकी कृपा से किसी के अधीन न रहें। (भूयश्च शरदः शतात्)उसी परमेश्वर की आज्ञापालन और कृपा से सौ वर्षों से उपरान्त भी हम लोग देखें, जीवें, सुनें, सुनावें और स्वतन्त्र रहें। अर्थात् आरोग्य शरीर, दृढ़ इन्द्रिय, शुद्ध मन और आनन्द सहित हमारा आत्मा सदा रहे। यही एक परमेश्वर सब मनुष्यों का उपास्यदेव है। जो मनुष्य इसको छोड़ के दूसरे की उपासना करता है, वह पशु के समान होके सब दिन दुःख भोगता रहता है॥ ४॥
इसलिये प्रेम में अत्यन्त मग्न होके, अपने आत्मा और मन को परमेश्वर में जोड़ के, इन मन्त्रों से स्तुति और प्रार्थना सदा करते रहें।
अथ गुरुमन्त्रः—
ओ३म्, (यजु॰ अ॰ ४०। मं॰ १७)भूर्भुवः॒ स्वः᳖। तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒ भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो नः॑ प्रचो॒दया॑त्॥ यजुः० अ॰ ३६।मं॰ ३॥ ऋ॰ मं॰ ३। सू॰ ६२। मं॰ १०॥
एवं त्रिषु वेदेषु समानो मन्त्रः॥
भाष्यम्—अस्य सर्वोत्कृष्टस्य गायत्रीमन्त्रस्य संक्षेपेणार्थ उच्यते—‘अ उ म्’ एतत्त्रयं मिलित्वा ‘ओम्’ इत्यक्षरं भवति। यथाह मनुः—
“अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः।
वेदत्रयान्निरदुहद् भूर्भुवः स्वरितीति च॥”
मनु॰ अ॰ २। श्लोक ७६॥
एतच्च सर्वोत्तमं प्रसिद्धतमं परब्रह्मणो नामास्ति। एतेनैकेनैव नाम्ना परमेश्वरस्यानेकानि नामान्यागच्छन्तीति वेद्यम्। तद्यथा—
अकारेण विराडग्निविश्वादीनि—(विराट्)विविधं चराचरं जगद् राजयते प्रकाशयते स विराट् सर्वात्मेश्वरः। (अग्निः)अच्यते प्राप्यते सत्क्रियते वा वेदादिभिः शास्त्रैर्विद्वद्भिश्चेत्यग्निः परमेश्वरः। (विश्वः)विष्टानि सर्वाण्याकाशादीनि भूतानि यस्मिन् स विश्वः। यद्वा विष्टोस्ति प्रकृत्यादिषु यः स विश्वः। एतदाद्यर्था अकारेण विज्ञेयाः।
उकारेण हिरण्यगर्भवायुतैजसादीनि। तद्यथा—(हिरण्यगर्भः)हिरण्यानि सूर्य्यादीनि तेजांसि गर्भे यस्य, तथा सूर्य्यादीनां तेजसां यो गर्भोऽधिष्ठानं स हिरण्यगर्भः। अत्र प्रमाणम्—‘ज्योतिर्वै हिरण्यं ज्योति-रेषोऽमृतꣳहिरण्यम्॥ श॰का॰ ६। अ॰ ७। ब्रा॰ १। कं॰ २॥ यशो वै हिरण्यम्॥ ऐ॰पं॰ ७। खं॰ १८॥’ (वायुः)यो वाति जानाति धारयत्यनन्तबलत्वात् सर्वं जगत् स वायुः। स चेश्वर एव भवितुमर्हति नान्यः। ‘तद्वायुः’१ इति मन्त्रवर्णनादर्थाद् ब्रह्मणो वायुसंज्ञास्ति। (तैजसः)सूर्य्यादीनां प्रकाशकत्वात्स्वयंप्रकाशत्वात् तैजस ईश्वरः। एतदाद्यर्था उकाराद् विज्ञातव्याः।
मकारेणेश्वरादित्यप्राज्ञादीनि नामानि बोध्यानि। तद्यथा—(ईश्वरः)ईष्टेऽसौ सर्वशक्तिमान् न्यायकारीश्वरः। (आदित्यः)अविनाशित्वादादित्यः परमात्मा। (प्राज्ञः)प्रजानाति सकलं जगदिति प्रज्ञः, प्रज्ञ एव प्राज्ञश्च परमात्वैवेति। एतदाद्यर्था मकारेण निश्चेतव्या ध्येयाश्चेति।
अथ महाव्याहृत्यर्थाः संक्षेपतः—“भूरिति वै प्राणः। भुवरित्यपानः। स्वरिति व्यानः॥ इति तैत्तिरीयोपनिषद्वचनम्। प्रपा॰ ७। अनु॰ ६॥” (भूः)प्राणयति जीवयति सर्वान् प्राणिनः स प्राणः, प्राणादपि प्रियस्वरूपो वा, स चेश्वर एव। अयमर्थो भूशब्दस्य ज्ञेयः। (भुवः)यो मुमुक्षूणां मुक्तानां स्वसेवकानां धर्मात्मनां सर्वं दुःखमपानयति दूरीकरोति सोऽपानो दयालु-रीश्वरोऽस्ति। अयं भुवःशब्दार्थोऽस्तीति बोध्यम्। (स्वः)यदभिव्याप्य व्यानयति चेष्टयति प्राणादि सकलं जगत् स व्यानः, सर्वाधिष्ठानं बृहद् ब्रह्मेति। खल्वयं स्वःशब्दार्थोऽस्तीति मन्तव्यम्। एतदाद्यर्था महाव्याहृतीनां ज्ञातव्याः।
(सवितुः)सुनोति सूयते सुवति वोत्पादयति सृजति सकलं जगत् स सर्वपिता सर्वेश्वरः सविता परमात्मा तस्यः ‘सवितुः प्रसवे’ इति मन्त्र-पदार्थादुत्पत्तेः कर्त्ता योऽर्थोऽस्ति स सवितेत्युच्यत इति मन्तव्यम्। (वरेण्यम्)यद्वरं वर्त्तुमर्हमतिश्रेष्ठं तद्वरेण्यम् (भर्गः)यन्निरुपद्रवं निष्पापं निर्गुणं शुद्धं सकलदोषरहितं पक्वं परमार्थविज्ञानस्वरूपं तद्भर्गः। (देवस्य)यो दीव्यति प्रकाशयति खल्वानन्दयति सर्वं विश्वं स देवः, तस्य देवस्य (धीमहि)तमेव परमात्मानं वयं नित्यमुपासीमहि। कस्मै प्रयोजनाय? तस्य धारणेन विज्ञानादिबलेनैव वयं पुष्टा दृढा सुखिनश्च भवेमेत्यस्मै प्रयोजनाय। तथा च (यः)परमेश्वरः (नः)अस्माकं (धियः)धारणवतीर्बुद्धीः (प्रचोदयात्)प्रेरयेत्।
हे सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, हे नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव, हे अज, हे निराकार, सर्वशक्तिमन्, न्यायकारिन्, हे करुणामृतवारिधे! सवितुर्देवस्य तव यद्वरेण्यं भर्गस्तद्वयं धीमहि। कस्मै प्रयोजनाय? यः सविता देवः परमेश्वरः स नोऽस्माकं धियो बुद्धीः प्रचोदयात्। यो हि सम्यग्ध्यातः प्रार्थितः सर्वेष्टदेवः परमेश्वरः स्वकृपाकटाक्षेण स्वशक्त्या च ब्रह्मचर्यविद्याविज्ञानसद्धर्म-जितेन्द्रियत्वपरब्रह्मानन्दप्राप्तिमतीरस्माकं धीः कुर्य्यादस्मै प्रयोजनाय। तत्परमात्मस्वरूपं वयं धीमहीति संक्षेपतो गायत्र्यर्थो विज्ञेयः॥
एवं प्रातः सायं द्वयोः सन्ध्योरेकान्तदेशं गत्वा शान्तो भूत्वा यतात्मा सन् परमेश्वरं प्रतिदिनं ध्यायेत्।
भाषार्थ—अथ गुरुमन्त्रः—(ओम् भूर्भुवः स्वः)। अकार, उकार और मकार के योग से ‘ओम्’ यह अक्षर सिद्ध है, सो यह परमेश्वर के सब नामों में उत्तम नाम है, जिसमें सब नामों के अर्थ आ जाते हैं। जैसा पिता-पुत्र का प्रेम सम्बन्ध है, वैसे ही ओंकार के साथ परमात्मा का सम्बन्ध है। इस एक नाम से ईश्वर के सब नामों का बोध होता है।
जैसे अकार से—(विराट्)जो विविध जगत् का प्रकाश करनेवाला है। (अग्निः)जो ज्ञानस्वरूप और सर्वत्र प्राप्त हो रहा है। (विश्वः)जिसमें सब जगत् प्रवेश कर रहा है, और जो सर्वत्र प्रविष्ट है। इत्यादि नामार्थ अकार से जानना चाहिये।
उकार से—(हिरण्यगर्भः)जिसके गर्भ में प्रकाश करनेवाले सूर्य्यादि लोक हैं, और जो प्रकाश करनेहारे सूर्य्यादिलोकों का अधिष्ठान है। इससे ईश्वर को ‘हिरण्यगर्भ’ कहते हैं। हिरण्य के नाम ज्योति, अमृत और कीर्त्ति हैं। (वायुः)जो अनन्त बलवाला सब जगत् का धारण करनेहारा है। (तैजसः)जो प्रकाशस्वरूप और सब जगत् का प्रकाशक है। इत्यादि अर्थ उकारमात्रा से जानना चाहिये।
तथा मकार से —(ईश्वरः)जो सब जगत् का उत्पादक, सर्वशक्तिमान् स्वामी और न्यायकारी है। (आदित्यः)जो नाशरहित है। (प्राज्ञः)जो ज्ञानस्वरूप और सर्वज्ञ है। इत्यादि अर्थ मकार से समझ लेना। यह संक्षेप से ओंकार का अर्थ किया गया।
अब संक्षेप से महाव्याहृतियों का अर्थ लिखते हैं—(भूरिति वै प्राणः)जो सब जगत् के जीने का हेतु, और प्राण से भी प्रिय है, इससे परमेश्वर का नाम ‘भूः’ है। (भुवरित्यपानः )जो मुक्ति की इच्छा करने वालों, मुक्तों और अपने सेवक धर्मात्माओं को, सब दुःखों से अलग करके सर्वदा सुख में रखता है, इसलिए परमेश्वर का नाम ‘भुवः’ है। (स्वरिति व्यानः)जो सब जगत् में व्यापक होके सब को नियम में रखता, और सबका ठहरने का स्थान तथा सुखस्वरूप है, इससे परमेश्वर का नाम ‘स्वः’ है। यह व्याहृतियों का संक्षेप से अर्थ लिख दिया।
अब गायत्री मन्त्र का अर्थ लिखते हैं—(सवितुः)जो सब जगत् का उत्पन्न करनेहारा, और ऐश्वर्य्य का देनेवाला है, (देवस्य)जो सबके आत्माओं का प्रकाश करनेवाला और सब सुखों का दाता है, उसका (वरेण्यम्)जो अत्यन्त ग्रहण करने के योग्य, (भर्गः)शुद्ध विज्ञान स्वरूप है, (तत्)उसको (धीमहि)हम लोग सदा प्रेमभक्ति से निश्चय करके अपने आत्मा में धारण करें। किस प्रयोजन के लिये? कि (यः)जो पूर्वोक्त सविता देव परमेश्वर है, वह (नः)हमारी (धियः)बुद्धियों को (प्रचोदयात्)कृपा करके सब बुरे कामों से अलग करके सदा उत्तम कामों में प्रवृत्त करे।
इसलिये सब लोगों को चाहिये कि सत्, चित्, आनन्दस्वरूप, नित्यज्ञानी, नित्यमुक्त, अजन्मा, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, व्यापक, कृपालु, सब जगत् के जनक और धारण करनेहारे परमेश्वर ही की सदा उपासना करें, कि जिससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जो मनुष्यदेहरूप वृक्ष के चार फल हैं, वे उसकी भक्ति और कृपा से सर्वथा सब मनुष्यों को प्राप्त हों। यह गायत्री मन्त्र का अर्थ संक्षेप से हो चुका॥
अथ समर्पणम्—
हे ईश्वर दयानिधे! भवत्कृपयाऽनेन जपोपासनादिकर्मणा धर्मार्थकाममोक्षाणां सद्यः सिद्धिर्भवेन्नः॥
तत ईश्वरं नमस्कुर्यात्—
भाषार्थ—इस प्रकार से सब मन्त्रों के अर्थों से परमेश्वर की सम्यक् उपासना करके आगे समर्पण करे—कि हे ईश्वर दयानिधे! आपकी कृपा से जो-जो उत्तम काम हम लोग करते हैं, वे