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अथ तृतीयः पितृयज्ञः

In Hindi:

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : पितृयज्ञः

महर्षि दयानन्द व्याख्या : तस्य द्वौ भेदौ स्तः—एकस्तर्पणाख्यो द्वितीयः श्राद्धाख्यश्च। तत्र येन येन कर्मणा विदुषो देवानृषीन् पितॄंश्च तर्पयन्ति सुखयन्ति तत् ‘तर्पणम्’ तथा यत्तेषां श्रद्धया सेवनं क्रियते तच्छ्राद्धं वेदितव्यम्। तदेतत् कर्म विद्वत्सु विद्यमानेष्वेव घटते, नैव मृतकेषु। कुतः, तेषां सन्निकर्षाभावेन सेवनाश-क्यत्वात्। मृतकोद्देशेन यत्क्रियते, नैव तेभ्यस्तत् प्राप्तं भवतीति व्यर्थापत्तेश्च। तस्माद्विद्यमानाभिप्रायेणैतत्कर्मोपदिश्यते। सेव्यसेवकसन्निकर्षात् सर्वमेतत्कर्तुं शक्यत इति।

तत्र सत्कर्त्तव्यास्त्रयः सन्ति—देवाः, ऋषयः, पितरश्च। तत्र

देवेषु प्रमाणम्—

पु॒नन्तु॒ मा देवज॒नाः पु॒नन्तु॒ मन॑सा॒ धियः॑।

पु॒नन्तु॒ विश्वा॑ भू॒तानि॒ जातवेदः पुनी॒हि मा॥ २॥ यजु॰ अ॰ १९। मं॰ ३९॥

द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति। सत्यं चैवानृतं च सत्यमेव देवा अनृतं मनुष्याः, इदमहमनृतात् सत्यमुपैमीति तन्मनुष्येभ्यो देवानुपैति। स वै सत्यमेव वदेत्। एतद्धि वै देवा व्रतं चरन्ति यत् सत्यं, तस्मात् ते यशो यशो ह भवति य एवं विद्वान्त्सत्यं वदति॥ २॥ शत॰ कां॰ १। अ॰ १। ब्रा॰ १। कं॰ ४, ५॥

विद्वाᳬसो हि देवाः॥ ३॥ शत॰ कां॰ ३। अ॰ ७। ब्रा॰ ६। कं॰ १०॥

भाष्यम्—हे (जातवेदः)परमेश्वर! (मा)मां (पुनीहि)सर्वथा पवित्रं कुरु। भवन्निष्ठा भवदाज्ञापलिनो (देवजनाः)विद्वांसः श्रेष्ठा ज्ञानिनो विद्यादानेन (मा)मां (पुनन्तु)पवित्रं कुर्वन्तु। तथा (पुनन्तु मनसा धियः)भवद्दत्तविज्ञानेन भवद्विषयध्यानेन वा नो बुद्धयः पुनन्तु पवित्रा भवन्तु। (पुनन्तु विश्वा भूतानि)विश्वानि सर्वाणि संसारस्थानि भूतानि पुनन्तु भवत्कृपया पवित्राणि सुखानन्दयुक्तानि भवन्तु॥ १॥

(द्वयां वा॰)मनुष्याणां द्वाभ्यां लक्षणाभ्यां द्वे एव संज्ञे भवतः—देवाः, मनुष्याश्चेति। तत्र सत्यं चैवानृतं च कारणे स्तः। (सत्यमेव॰)यत् सत्यवचनं सत्यमानं सत्यं कर्मैतद्देवानां लक्षणं भवति। तथैतदनृतं वचनमनृतं मानमनृतं कर्म चेति मनुष्याणाम्। योऽनृतात् पृथग्भूत्वा सत्यमुपेयात्, स देवजातौ परिगण्यते। यश्च सत्यात् पृथग्भूत्वाऽनृतमुपेयात्, स मनुष्यसंज्ञां लभेत। तस्मात्सत्यमेव सर्वदा वदेन्मन्येत कुर्याच्च। यत् सत्यं व्रतमस्ति, तदेव देवा आचरन्ति। स यशस्विनां मध्ये यशस्वीति देवो भवति, तद्विपरीतो मनुष्यश्च॥ २॥

तस्मादत्र विद्वांस एव देवास्सन्तीति॥ ३॥

भाषार्थ—अब तीसरा पितृयज्ञ कहते हैं। उसके दो भेद हैं—एक तर्पण, दूसरा श्राद्ध। ‘तर्पण’ उसे कहते हैं, जिस कर्म से विद्वान्रूप देव, ऋषि और पितरों को सुखयुक्त करते हैं। उसी प्रकार जो उन लोगों का श्रद्धा से सेवन करना है, सो ‘श्राद्ध’ कहाता है। यह तर्पण आदि कर्म विद्यमान अर्थात् जो प्रत्यक्ष हैं, उन्हीं में घटता है, मृतकों में नहीं। क्योंकि उनकी प्राप्ति और उनका प्रत्यक्ष होना दुर्लभ है। इसी से उनकी सेवा भी किसी प्रकार से नहीं हो सकती। किन्तु जो उनका नाम लेकर देवे वह पदार्थ उनको कभी नहीं मिल सकता, इसलिये मृतकों को सुख पहुँचाना सर्वथा असम्भव है। इसी कारण विद्यमानों के अभिप्राय से तर्पण और श्राद्ध वेद में कहा है। सेवा करने योग्य और सेवा करनेवाले इनके प्रत्यक्ष होने पर यह सब काम हो सकता है।

तर्पण आदि कर्म में सत्कार करने योग्य तीन हैं—देव, ऋषि और पितर। उनमें से देवों में प्रमाण—

(पुनन्तु॰)हे जातवेद परमेश्वर! आप सब प्रकार से मुझको पवित्र करें। जिनका चित्त आप में है, तथा जो आपकी आज्ञा पालते हैं, वे विद्वान् श्रेष्ठ ज्ञानी पुरुष भी विद्यादान से मुझ को पवित्र करें। उसी प्रकार आपका दिया जो विशेष ज्ञान वा आपके विषय का ध्यान उससे हमारी बुद्धि पवित्र हो। (पुनन्तु विश्वा भूतानि)और संसार के सब जीव आपकी कृपा से पवित्र और आनन्दयुक्त हों॥ १॥

(द्वयं वा॰)दो लक्षणों से मनुष्यों की दो संज्ञा होती हैं अर्थात् देव और मनुष्य। वहाँ सत्य और झूठ दो कारण हैं। (सत्यमेव॰)जो सत्य बोलने, सत्य मानने और सत्य कर्म करने वाले हैं वे ‘देव’, और वैसे ही झूठ बोलने, झूठ मानने और झूठ कर्म करने वाले ‘मनुष्य’ कहाते हैं। जो झूठ से अलग होके सत्य को प्राप्त होवें, वे देवजाति में गिने जाते हैं। और जो सत्य से अलग होके झूठ को प्राप्त हों, वे मनुष्य, असुर और राक्षस कहे हैं। इससे सब काल में सत्य ही कहे, माने और करे। सत्यव्रत का आचरण करने वाला मनुष्य यशस्वियों में यशस्वी होने से देव और उससे उलटे कर्म करने वाला असुर होता है॥ २॥

[(विद्वां॰)] इस कारण से यहाँ विद्वान् ही देव हैं॥ ३॥

अथर्षिषु प्रमाणम्—

तं य॒ज्ञं ब॒र्हिषि॒ प्रौक्ष॒न् पुरुषं जा॒तमग्र॒तः।

तेन दे॒वा अयजन्त सा॒ध्या ऋषयश्च॒ ये॥ १॥ य॰ अ॰ ३१। मं॰ ९॥

अथ यदेवानुब्रुवीत। तेनर्षिभ्य ऋणं जायते, तद्ध्येभ्य एतत् करोत्यृषीणां निधिगोप इति ह्यनूचानमाहुः॥ २॥ शत॰ कां॰ १। अ॰ ७। कं॰ ३॥

अथार्षेयं प्रवृणीते। ऋषिभ्यश्चैवैनमेतद्देवेभ्यश्च निवेदयत्ययं महावीर्यो यो यज्ञं प्रापदिति, तस्मादार्षेयं प्रवृणीते॥ ३॥ शत॰ कां॰ १। प्रपा॰ ३। अ॰ ४। कं॰ ३॥

भाष्यम्—(तं यज्ञम्॰)इति मन्त्रः सृष्टिविद्याविषये१ व्याख्यातः॥ १॥

(अथ यदेवा॰)अथेत्यनन्तरं यत् सर्वविद्यां पठित्वानुवचनमध्यापनं कर्मास्ति, तदृषिकृत्यमस्ति। तेनाध्ययनाध्यापनकर्मणर्षिभ्यो देयमृणं जायते। यत् तेषामृषीणां सेवनं करोति, तदेतेभ्य एव सुखकारी भवति। यः सर्वविद्याविद् भूत्वाध्यापयति तमनूचानमृषिमाहुः॥ २॥

(अथार्षेयं प्रवृणीते॰)यो मनुष्यः पठित्वा पाठनाख्यं कर्म प्रवृणीते, तदार्षेयं कर्मास्ति। य एवं कुर्वन् तेभ्य ऋषिभ्यो देवेभ्यश्चैतत् प्रियकरं वस्तु सेवनं च निवेदयति, सोऽयं विद्वान् महावीर्यो भूत्वा यज्ञं विज्ञानाख्यं (प्रापत्)प्राप्नोति। ते चैनं विद्यार्थिनं विद्वांसं कुर्युः यश्च विद्वानस्ति यश्चापि विद्यां गृह्णाति, स ऋषिसंज्ञां लभते। तस्मादिदमार्षेयं कर्म सर्वैर्मनुष्यैः स्वीकार्यम्॥ ३॥

भाषार्थ—(तं यज्ञं॰)इस मन्त्र का अर्थ भूमिका२ के सृष्टिविद्या विषय में कह दिया है॥ १॥

(अथ यदेवा॰)अब इसके अनन्तर सब विद्याओं को पढ़ के जो पढ़ाना है, वह ‘ऋषिकर्म’ कहाता है। उस पढ़ने और पढ़ाने से ऋषियों का ऋण अर्थात् उनको उत्तम उत्तम पदार्थ देने से निवृत्त होता है। और जो इन ऋषियों की सेवा करता है, वह उनको सुख करने वाला होता है। यही व्यवहार अर्थात् विद्या कोश की रक्षा करने वाला होता है। जो सब विद्याओं को जान के सबको पढ़ाता है, उसको ‘ऋषि’ कहते हैं॥ २॥

(अथार्षेयं प्रवृणीते॰)जो पढ़ के पढ़ाने के लिये विद्यार्थी का स्वीकार करना है, सो आर्षेय अर्थात् ऋषियों का कर्म कहाता है। जो उस कर्म को करता हुआ उन ऋषियों और देवों के लिये प्रसन्न करने वाले पदार्थों का निवेदन तथा सेवा करता है, वह विद्वान् अतिपराक्रमी हो के विशेष ज्ञान को प्राप्त होता है। जो विद्वान् और विद्या को ग्रहण करने वाला है उसका ‘ऋषि’ नाम होता है। इस कारण से इस आर्षेय कर्म को सब मनुष्य स्वीकार करें॥ ३॥

अथ पितृषु प्रमाणम्—

ऊर्जं॒ वह॑न्तीर॒मृतं घृ॒तं पयः॑ की॒लालं॑ परि॒स्रुतम्।

स्व॒धा स्थ॑ त॒र्पय॑त मे पि॒तॄन्॥ १॥ य॰ अ॰ २। मं॰ ३४॥

भाष्यम्—ईश्वरः सर्वान् प्रत्याज्ञां ददाति—सर्वे मनुष्या एवं जानी-युर्वदेयुश्चाज्ञापयेयुरिति—(मे पितॄन्)मम पितृपितामहादीन् आचार्यादींश्च यूयं सर्वे मनुष्याः (तर्पयत)सेवया प्रसन्नान् कुरुत। तथा (स्वधा स्थ)सत्यविद्याभक्तिस्वपदार्थधारिणो भवत। केन केन पदार्थेन ते सेवनीया इत्याह—(ऊर्ज्जं वहन्तीः)पराक्रमं प्रापिकाः सुगन्धिता हृद्या अपस्तेभ्यो नित्यं दद्युः। (अमृतम्)अमृतात्मकानेकविधरसं (घृतम्)आज्यं (पयः)दुग्धं (कीलालम्)अनेकविधसंस्कारैः सम्पादितमन्नं माक्षिकं मधु च (परिस्रुतम्)कालपक्वं फलादिकं च दत्वा पितॄन् प्रसन्नान् कुर्युः॥ १॥

भाषार्थ—(ऊर्जं वहन्ती॰)[ईश्वर सब को आज्ञा देता है कि] पिता वा स्वामी अपने पुत्र, पौत्र, स्त्री वा नौकरों को सब दिन के लिये आज्ञा देके कहे कि—(तर्पयत मे पितॄन्)जो मेरे पिता पितामहादि, माता मातामहादि तथा आचार्य और इनसे भिन्न भी विद्वान् लोग अवस्था अथवा ज्ञान से वृद्ध, मान्य करने योग्य हों, उन सब के आत्माओं को यथायोग्य सेवा से प्रसन्न किया करो। सेवा करने के पदार्थ ये हैं—(ऊर्जं वहन्ती॰)जो उत्तम उत्तम जल, (अमृतम्)अनेकविधरस, (घृतम्)घी, (पयः)दूध, (कीलालम्)अनेक संस्कारों से सिद्ध किये रोगनाश करने वाले उत्तम उत्तम अन्न [और मधु], (परिस्रुतम्)सब प्रकार के उत्तम उत्तम फल हैं, इन सब पदार्थों से उनकी सेवा सदा करते रहो। जिससे उनका आत्मा प्रसन्न होके तुम लोगों को आशीर्वाद देता रहे कि उससे तुम लोग भी सदा प्रसन्न रहो। (स्वधा स्थ॰)हे पूर्वोक्त पितृलोगो! तुम सब हमारे अमृतरूप पदार्थों के भोगों से सदा सुखी रहो। और जिस जिस पदार्थ की तुम को अपने लिये इच्छा हो, जो हम लोग कर सकें, उस उस की आज्ञा सदा करते रहो। हम लोग मन, वचन, कर्म से तुम्हारे सुख करने में स्थित हैं। तुम लोग किसी प्रकार का दुःख मत पाओ। जैसे तुम लोगों ने बाल्यावस्था और ब्रह्मचर्य्याश्रम में हम लोगों को सुख दिया है, वैसे हम को भी आप लोगों का प्रत्युपकार करना अवश्य चाहिये, जिससे हमको कृतघ्नता दोष न प्राप्त हो॥ १॥

अथ पितॄणां परिगणनम्—

येषां पितृसंज्ञा ये सेवितुं योग्याश्च, ते क्रमशो लिख्यन्ते—

१-सोमसदः। २-अग्निष्वात्ताः। ३-बर्हिषदः। ४-सोमपाः। ५-हविर्भुजः। ६-आज्यपाः। ७-सुकालिनः। ८-यमराजाश्चेति॥

भाष्यम्—(सो॰)सोमे ईश्वरे सोमयागे वा सीदन्ति, ये सोमगुणाश्च ते ‘सोमसदः’ (अ॰)अग्निरीश्वरः सुष्ठुतया आत्तो गृहीतो यैस्ते ‘अग्निष्वात्ताः’। यद्वा अग्नेर्गुणज्ञानात् पृथिवीजलव्योम-यान-यन्त्ररचनादिका पदार्थविद्या सुष्ठुतया आत्ता गृहीता यैस्ते। (ब॰)बर्हिषि सर्वोत्कृष्टे ब्रह्मणि शमदमादिषूत्तमेषु गुणेषु वा सीदन्ति ते ‘बर्हिषदः’। (सो॰)यज्ञेनोत्तम-मौषधिरसं पिबन्तिं पाययन्ति वा ते ‘सोमपाः’॥ १-४॥

(ह॰)हविर्हुतमेव यज्ञेन शोधितवृष्टिजलादिकं भोक्त्तुं भोजयितुं वा शीलमेषां ते ‘हविर्भुजः’। (आ॰)आज्यं घृतम्, यद्वा ‘अज गतिक्षेपणयोः’ धात्वर्थादाज्यं विज्ञानम् तद्दानेन पान्ति रक्षन्ति पालयन्ति रक्षयन्ति ये विद्वांसस्ते ‘आज्यपाः’। (सु॰)ईश्वरविद्योपदेशकरणस्य ग्रहणस्य च शोभनः कालो येषां ते। यद्वा ईश्वरज्ञानप्राप्त्या सुखरूपः सदैव कालो येषां ते ‘सुकालिनः’। (य॰)ये पक्षपातं विहाय न्यायव्यवस्थाकर्त्तारस्सन्ति ते ‘यमराजाः’॥ ५-८॥

भाषार्थ—(सो॰)जो ईश्वर और सोमयज्ञ में निपुण, और जो शान्त्यादिगुण सहित हैं, वे ‘सोमसद्’ कहाते हैं। (अ॰)अग्नि जो परमेश्वर वा भौतिक उनके गुण ज्ञात करके जिनने अच्छे प्रकार अग्निविद्या सिद्ध की है, उनको ‘अग्निष्वात्ताः’ कहते हैं। (ब॰)जो सब से उत्तम परब्रह्म में स्थिर होके शम-दम-सत्य-विद्यादि उत्तम गुणों में वर्त्तमान हैं, उनको ‘बर्हिषद्’ कहते हैं। (सो॰)जो यज्ञ करके सोमलतादि उत्तम ओषधियों के रस के पान करने और कराने वाले हैं, तथा जो सोमविद्या को जानते हैं, उनको ‘सोमपाः’ कहते हैं॥ १-४॥

(ह॰)जो अग्निहोत्रादि यज्ञ करके वायु और वृष्टि जल की शुद्धि द्वारा सब जगत् का उपकार करते, और जो यज्ञ से अन्नजलादि की शुद्धि करके खाने पीने वाले हैं, उनको ‘हविर्भुजः’ कहते हैं। (आ॰)आज्य कहते हैं घृत, स्निग्धपदार्थ और विज्ञान को, जो उसके दान से रक्षा करने वाले हैं, उनको ‘आज्यपाः’ कहते हैं। (सु॰)मनुष्य-शरीर को प्राप्त होकर ईश्वर और सत्यविद्या के उपदेश का जिनका श्रेष्ठ समय, और जो सदा उपदेश में ही वर्त्तमान हैं उनको ‘सुकालिनः’ कहते हैं। (य॰)जो पक्षपात को छोड़ के सदा सत्य न्याय व्यवस्था ही करने में रहते हैं, उनको ‘यमराज’ कहते हैं॥ ५-८॥

९-पितृपितामहप्रपितामहाः। १०-मातृपितामहीप्रपितामह्यः। ११-सगोत्राः। १२-[आचार्यादि] सम्बन्धिनः॥

भाष्यम्—(पि॰)ये सुष्ठुतया श्रेष्ठान् विदुषो गुणान् वासयन्तस्तत्र वसन्तश्च, विज्ञानाद्यनन्तधनाः स्वान् जनान् धारयन्तः पोषयन्तश्च चतुॄवशति-वर्षपर्यन्तेन ब्रह्मचर्येण विद्याभ्यासकारिणः स्वे जनकाश्च सन्ति, ते पितरो वसवो विज्ञेया ईश्वरोऽपि। (पिता॰)ये पक्षपातरहिता दुष्टान् रोदयन्तश्च-तुश्चत्वारशद्वर्षपर्य्यन्तेन ब्रह्मचर्यसेवनेन कृतविद्याभ्यासास्ते रुद्राः स्वे पितामहाश्च ग्राह्यास्तथा रुद्र ईश्वरोऽपि। (प्रपि॰)आदित्यवदुत्तमगुण-प्रकाशका विद्वांसोऽष्टचत्वारशद्वर्षेण ब्रह्मचर्येण सर्वविद्यासम्पन्नाः सूर्यवद्विद्याप्रकाशकाः [त आदित्याः] स्वे प्रपितामहाश्च ग्राह्यास्तथाऽऽ-दित्योऽविनाशीश्वरो वात्र गृह्यते। (मा॰)पित्रादिसदृश्यो मात्रादयः सेव्याः॥ ९-१०॥

ये (स॰)स्वसमीपं प्राप्ताः पुत्रादयस्ते श्रद्धया पालनीयाः (आ॰ सं॰)ये गुर्वादिसख्यन्तास्सन्ति ते हि सर्वदा सेवनीयाः॥ ११-१२॥

भाषार्थ—(पि॰)जो वीर्य के निषेकादि कर्मों को करके उत्पत्ति और पालन करे, और चौबीस वर्ष पर्य्यन्त ब्रह्मचर्य्याश्रम से विद्या को पढ़े, उसका नाम ‘पिता’ और ‘वसु’ है। (पिता॰)जो पिता का पिता हो, और चवालीस वर्ष पर्य्यन्त [ब्रह्मचर्य से विद्याभ्यास कर पक्षपात रहित होकर दुष्टों को रुलाने वाला है, उसका नाम ‘पितामह’ और ‘रुद्र’ है। (प्रपितामहः)जो पितामह का पिता और आदित्य के समान उत्तम गुणों का प्रकाशक अड़तालीस वर्ष पर्य्यन्त]१ ब्रह्मचर्य्याश्रम से विद्या पढ़ के सब जगत् का उपकार करता हो, उसको ‘प्रपितामह’ और ‘आदित्य’ कहते हैं। तथा जो पित्रादिकों के तुल्य पुरुष हैं उनकी भी पित्रादिकों के तुल्य सेवा करनी चाहिये।

(मा॰)पित्रादिकों के समान विद्या स्वभाव वाली स्त्रियों की भी अत्यन्त सेवा करनी चाहिये॥ ९-१०॥

(सगो॰)जो समीपवर्त्ती ज्ञाति के योग्य पुरुष हैं, वे भी सेवा करने के योग्य हैं॥

(आचार्य्यादिसं॰)जो पूर्ण विद्या के पढ़ाने वाले, श्वसुरादि सम्बन्धी तथा उनकी स्त्री हैं, उनकी यथायोग्य सेवा करनी चाहिये॥ ११-१२॥

एतेषां विद्यमानानां सोमसदादीनां सुखार्थं प्रीत्या यत् सेवनं क्रियते तत् तर्पणम्, श्रद्धया यत् सेवनं क्रियते तच्छ्राद्धम्। ये सत्यविज्ञानदानेन जनान् पान्ति रक्षन्ति ते पितरो विज्ञेयाः।

अत्र प्रमाणानि—

‘ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासः’२ इत्यादीनि यजुर्वेदस्यैकोनवशति-तमेऽध्याये सप्तसु सोमसदादिषु पितृषु द्रष्टव्यानि। तथा ये उ समानाः समनसः पितरो यमराज्य३ इत्यादीनि यमराजेषु। ‘पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः’४ इत्यादीनि पितृपितामहप्रपितामहादिषु। एवं ‘नमो वः पितरो रसाय’५ इत्यादीनि पितॄणां सत्कारे च। इति ऋग्यजुरादिवचनानि सन्तीति बोध्यम्। अन्यच्च—

वसून् वदन्ति वै पितॄन् रुद्रांश्चैव पितामहान्।

प्रपितामहांश्चादित्यान् श्रुतिरेषा सनातनी॥ मनु॰ अ॰ ३। श्लो॰ २८४॥

भाषार्थ—जो सोमसदादि पितर विद्यमान अर्थात् जीवते हों, उनको प्रीति से सेवनादि से तृप्त करना ‘तर्पण’ और श्रद्धा से अत्यन्त प्रीतिपूर्वक सेवन करना है, सो ‘श्राद्ध’ कहाता है। जो सत्य विज्ञानदान से जनों को पालन करते हैं वे ‘पितर’ हैं। इस विषय में प्रमाण—

‘ये नः पूर्वे पितरः सोम्यासः’१ इत्यादि मन्त्र सोमसदादि सातों पितरों में प्रमाण हैं। ‘ये समानाः समनसः पितरो यमराज्ये’२ इत्यादि मन्त्र यमराजों, ‘पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः’३ इत्यादि मन्त्र पिता की पितामह प्रपितामहादिकों तथा ‘नमो वः पितरो रसाय’४ इत्यादि मन्त्र पितरों की सेवा और सत्कार में प्रमाण हैं। ये ऋग्-यजुर्वेद आदि के वचन हैं।

और मनुजी ने भी कहा है—‘पितरों को वसु, पितामहों को रुद्र और प्रपितामहों को आदित्य कहते हैं, यह सनातन श्रुति है।’ मनु॰ अ॰ ३। श्लो॰ २८४॥

इति पितृयज्ञविधिः समाप्तः॥