In Hindi:
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : बलिवैश्वदेव यज्ञः
महर्षि दयानन्द व्याख्या : यदन्नं पक्वमक्षारलवणं भोजनार्थं भवेत्तेनैव बलिवैश्वदेवकर्म कार्य्यम्—
वैश्वदेवस्य सिद्धस्य गृह्येऽग्नौ विधिपूर्वकम्।
आभ्यः कुर्याद्देवताभ्यो ब्राह्मणो होममन्वहम्॥ मनु॰ अ॰ ३। श्लो॰ ४८॥
भाषार्थ—[अब चौथे बलिवैश्वदेव की विधि लिखी जाती है—अर्थात् जब भोजन सिद्ध हो, तब जो कुछ भोजनार्थ बने उसमें से खट्टा, लवणान्न और क्षार को छोड़कर घृतमिष्टयुक्त अन्न जो कुछ पाकशाला में सिद्ध हो, उसको दिव्यगुणों के अर्थ पाकाग्नि में विधिपूर्वक नित्य होम करे।]१
अथ बलिवैश्वदेवकर्म्मणि प्रमाणम्—
अह॑रहर्ब॒लिमित्ते॒ हर॒न्तोऽश्वा॑येव॒ तिष्ठ॑ते घा॒सम॑ग्ने।
रा॒यस्पोषेण॒ समि॒षा मद॑न्तो॒ मा ते॑ अग्ने॒ प्रति॑वेशा रिषाम॥ १॥ अथर्व॰ कां॰ १९। सू॰ ५५। म॰ ७१॥
पु॒नन्तु॒॑ मा देवज॒नाः पु॒नन्तु॒ मन॑सा॒ धियः॑।
पु॒नन्तु॒ विश्वा॑ भू॒तानि॒ जात॑वेदः पुनी॒हि मा॑॥ २॥ यजु॰ अ॰ १९। मं॰ ३९॥
भाष्यम्—हे (अग्ने)परमेश्वर! ये (अहरहर्बलि॰)भवदाज्ञया बलिवैश्वदेवं नित्यं कुर्वन्तो मनुष्यास्ते (रायस्पोषेण समिषा)चक्रवर्त्तिराज्य-लक्ष्म्या घृतदुग्धादिपुष्टिकारकपदार्थप्राप्त्या च सम्यक् शुद्धेच्छया (मदन्तः)नित्यानन्दप्राप्ताः सन्तः, मातुः पितुराचार्य्यादीनां चोत्तमपदार्थैः प्रीतिपूर्विकां सेवां नित्यं कुर्युः। (अश्वायेव तिष्ठते घासम्)यथाऽश्वस्य सन्मुखे तद्भक्ष्यं तृणवीरुधादि वा तत्पानार्थं जलादि पुष्कलं स्थाप्यते, तथा सर्वेषां सेवनाय बहून्युत्तमानि वस्तूनि दद्युर्यतस्ते प्रसन्ना भवेयुः। (मा ते अग्ने प्रतिवेशा रिषाम)हे परमगुरो अग्ने परमेश्वर! भवदाज्ञातो ये विरुद्धव्यवहारास्तेषु वयं कदाचिन्न प्रविशेम। अन्यायेन कदाचित्प्राणिनः पीडां न दद्याम। किन्तु सर्वान् स्वमित्राणीव स्वयं सर्वेषां मित्रमिवेति ज्ञात्वा परस्परमुपकारं कुर्य्यामेतीश्वराज्ञास्ति॥ १॥
(पुनन्तु॰)अस्यार्थो देवप्रकरणे१ उक्तः॥ २॥
भाषार्थ—हे (अग्ने)परमेश्वर! आपकी आज्ञा से (अहरहर्बलि॰)नित्यप्रति बलिवैश्वदेव कर्म करते हुए लोग (रायस्पोषेण समिषा)चक्रवर्त्तिराज्यलक्ष्मी, घृतदुग्धादि पुष्टिकारक पदार्थों की प्राप्ति और सम्यक् शुद्ध इच्छा से (मदन्तः)नित्य आनन्द में रहें तथा माता, पिता, आचार्य्य आदि की उत्तम पदार्थों से नित्य प्रीतिपूर्वक सेवा करते रहें (अश्वायेव तिष्ठते घासम्)जैसे घोड़े के सामने बहुत से खाने वा पीने के पदार्थ धर दिये जाते हैं, वैसे सबकी सेवा के लिये बहुत से उत्तम-उत्तम पदार्थ देवें। जिनसे वे प्रसन्न होके हम पर नित्य प्रसन्न रहें। (मा ते अग्ने प्रतिवेषा रिषाम)हे परमगुरु अग्नि परमेश्वर! आप और आपकी आज्ञा से विरुद्ध व्यवहारों में हम लोग कभी प्रवेश न करें, और अन्याय से किसी प्राणी को पीड़ा न पहुँचावें, किन्तु सबको अपना मित्र और अपने को सबका मित्र समझ के परस्पर उपकार करते रहें॥ १॥
(पुनन्तु॰)इसका अर्थ देवतर्पणविषय में कर दिया है॥ २॥
अथ होममन्त्राः—
ओमग्नये स्वाहा॥ १॥
ओं सोमाय स्वाहा॥ २॥
ओमग्नीषोमाभ्यां स्वाहा॥ ३॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा॥ ४॥
ओं धन्वन्तरये स्वाहा॥ ५॥
ओं कुह्वै स्वाहा॥ ६॥
ओमनुमत्यै स्वाहा॥ ७॥
ओं प्रजापतये स्वाहा॥ ८॥
ओं सह द्यावापृथिवीभ्यां स्वाहा॥ ९॥
ओं स्विष्टकृते स्वाहा॥ १०॥
भाष्यम्—(ओम॰)अग्न्यर्थ उक्तः। (ओं सो॰)सर्वानन्दप्रदो यः सर्वजगदुत्पादक ईश्वरः सोऽत्र ग्राह्यः। [(ओमग्नी॰)प्राणापानाभ्याम्, अनयोरर्थो गायत्रीमन्त्रार्थ उक्तः२।]३ (ओं वि॰)विश्वेदेवा विश्वप्रकाशका ईश्वरगुणाः, सर्वे विद्वांसो वा। (ओं धन्व॰)सर्वरोगनाशक ईश्वरोऽत्र गृह्यते। (ओं कु॰)दर्शेष्ट्यर्थोऽयमारम्भः। अमावास्येष्टिप्रतिपादितायै चितिशक्तये वा॥ १-६॥
(ओम॰)पौर्णमासेष्ट्यर्थोऽयमारम्भः, विद्यापठनानन्तरं मतिर्मननं ज्ञानं यस्याश्चितिशक्तेः सा चितिरनुमतिर्वा। (ओं प्र॰)सर्वजगतः स्वामी रक्षक ईश्वरः। (ओं सह॰)ईश्वरेण प्रकृष्टगुणैः सहोत्पादितयोः पुष्टिकरणाय। (ओं स्विष्ट॰)यः सुष्ठु शोभनमिष्टं सुखं करोति स चेश्वरः॥ ७-१०॥
एतैर्मन्त्रैर्होमं कृत्वाऽथ बलिदानं कुर्य्यात्—
भाषार्थ—(ओम॰)अग्नि शब्दार्थ कह आये हैं। (ओं सो॰)जो सब पदार्थों को उत्पन्न और पुष्ट करने से सुख देनेहारा है, उसको ‘सोम’ कहते हैं। (ओमग्नी॰)जो प्राण सब प्राणियों के जीवन का हेतु, और अपान अर्थात् दुःख के नाश का हेतु है, इन दोनों को ‘अग्नीषोम’ कहते हैं। (ओं वि॰)यहाँ संसार को प्रकाश करने वाले ईश्वर के गुण, अथवा विद्वान् लोगों का ‘विश्वेदेव’ शब्द से ग्रहण होता है। (ओं वा॰)जो जन्ममरणादि रोगों का नाश करनेहारा परमात्मा है वह ‘धन्वन्तरि’ कहाता है। (ओं कु॰)जो अमावास्येष्टि का करना है॥ १-६॥
(ओम॰)जो पौर्णमास्येष्टि वा सर्वशास्त्रप्रतिपादित परमेश्वर की चिति शक्ति है यहाँ उसका ग्रहण है। (ओं प्र॰)जो सब जगत् का स्वामी जगदीश्वर है, वह ‘प्रजापति’ कहाता है। (ओं स॰)ईश्वर से उत्पादित अग्नि और पृथिवी की पुष्टि करने के लिये। (ओं स्वि॰)जो इष्ट सुख करनेहारा परमेश्वर है, वही ‘स्विष्टकृत्’ कहाता है। ये दश अर्थ दश मन्त्रों के हैं॥ ७-१०॥
अब बलिदान के मन्त्रों को लिखते हैं—
ओं सानुगायेन्द्राय नमः॥
ओं सानुगाय यमाय नमः॥
ओं सानुगाय वरुणाय नमः॥
ओं सानुगाय सोमाय नमः॥
ओं मरुद्भ्यो नमः॥
ओम् अद्भ्यो नमः॥
ओं वनस्पतिभ्यो नमः॥
ओं श्रियै नमः॥
ओं भद्रकाल्यै नमः॥
ओं ब्रह्मपतये नमः॥
ओं वास्तुपतये नमः॥
ओं विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः॥
ओं दिवाचरेभ्यो भूतेभ्यो नमः॥
ओं नक्तञ्चारिभ्यो भूतेभ्यो नमः॥
ओं सर्वात्मभूतये नमः॥
ओं पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः॥ १-१६॥
भाष्यम्—(ओं सा॰)‘णम प्रह्वत्वे शब्दे च’ इत्यनेन सत्क्रियापुरस्सर-विचारेण मनुष्याणां यथार्थं विज्ञानं भवतीति वेद्यम्। नित्यैर्गुणैस्सह वर्त्तमानः परमैश्वर्यवानीश्वरोऽत्रेन्द्रशब्देन गृह्यते। (ओं॰ सानु॰)पक्षपातरहितो न्यायकारित्वादिगुणयुक्तः परमात्मात्र यमशब्दार्थेर्न वेद्यः। (ओं सा॰)विद्याद्युत्तमगुणविशिष्टः सर्वोत्तमः परमेश्वरोऽत्र वरुणशब्देन ग्रहीतव्यः। (ओं सानुगाय सो॰)अस्यार्थ उक्तः॥
(ओं म॰)य ईश्वराधारेण सकलं विश्वं धारयन्ति चेष्टयन्ति ते अत्र मरुतो गृह्यन्ते। (ओं अद्भ्य॰)अस्यार्थः ‘शन्नोदेवी’रित्यत्रोक्तः। (ओं व॰)वनानां लोकानां पतय ईश्वरगुणाः परमेश्वरो वा। बहुवचनमत्रादरार्थम्। यद्वोत्तमगुणयोगेनेश्वरेणोत्पादितेभ्यो महावृक्षेभ्यश्चेति बोध्यम्। (ओं श्रि॰)श्रीयते सेव्यते सर्वैर्जनैस्सः श्रीरीश्वरस्सर्वसुखशोभावत्वाद् गृह्यते। यद्वा तेनोत्पादिता विश्वशोभा च। (ओं॰ भ॰)भद्रं कल्याणं सुखं कालयितुं शीलमस्याः सा भद्रकालीश्वरशक्तिः।
(ओं ब्र॰)ब्रह्मणः सर्वशास्त्रविद्यायुक्तस्य वेदस्य ब्रह्माण्डस्य वा पतिरीश्वरः। (ओं॰ वा॰)वसन्ति सर्वाणि भूतानि यस्मस्तद्वास्त्वाकाशं तत्पतिरीश्वरः। (ओं वि॰)अस्यार्थ उक्तः। (ओं दि॰)(ओं नक्तं॰)ईश्वरकृपयैवं भवेद् दिवसे यानि भूतानि विचरन्ति रात्रौ च, तान्यस्मासु विघ्नं मा कुर्वन्तु। तैः सहास्माकमविरोधोऽस्तु। एतदर्थोऽयमारम्भः। (ओं स॰)सर्वेषां जीवात्मनां भूतिर्भवनं सत्तेश्वरो नान्यः। (ओं पि॰)अस्यार्थः पितृतर्पणे प्रोक्तः। नम इत्यस्य निरभिमानद्योतनार्थः। परस्योत्कृष्टतया मान्यज्ञापनार्थश्चारम्भः॥ १-१६॥
भाषार्थ—(ओं सा॰)जो सर्वैश्वर्य्ययुक्त परमेश्वर और जो उसके गुण हैं, वे ‘सानुग इन्द्र’ शब्द से ग्रहण होते हैं, (ओं सा॰)जो सत्य न्याय करने वाला ईश्वर और सृष्टि में सत्य न्याय के करने वाले सभासद् हैं, वे ‘सानुग यम’ शब्दार्थ से ग्रहण होते हैं। (ओं सा॰)जो सबसे उत्तम परमात्मा और उसके धार्मिक भक्त हैं, वे ‘सानुग वरुण’ शब्दार्थ से जानने चाहियें। (ओं सा॰)पुण्यात्माओं को आनन्दित करने वाला और जो पुण्यात्मा लोग हैं, वे ‘सानुग सोम’ शब्द से ग्रहण किये हैं।
(ओं मरु॰)जो प्राण अर्थात् जिनके रहने से जीवन और निकलने से मरण होता है, उनको ‘मरुत्’ कहते हैं। इनकी रक्षा अवश्य करनी चाहिये। (ओं अद्भ्यो॰)इसका अर्थ ‘शन्नोदेवी’ इस मन्त्र के अर्थ में लिखा है। (ओं व॰)जिनसे वर्षा अधिक होती और जिनके फलादि से जगत् का उपकार होता है, उनकी भी रक्षा करनी योग्य है। (ओं श्रि॰)जो सब के सेवा करने योग्य परमात्मा है, उसकी सेवा से राज्यश्री की प्राप्ति के लिये सदा उद्योग करना चाहिये। (ओं भ॰)जो कल्याण करने वाली परमात्मा की शक्ति अर्थात् सामर्थ्य है, उसका सदा आश्रय करना चाहिये। १-९॥
(ओं ब्र॰)जो वेद का स्वामी ईश्वर है, उसकी प्रार्थना और उद्योग विद्या-प्रचार के लिये अवश्य करना चाहिये। (ओं वा॰)जो वास्तुपति गृहसम्बन्धी पदार्थों का पालन करनेहारा मनुष्य अथवा ईश्वर है, इनका सहाय सर्वत्र होना चाहिये। (ओं वि॰)इसका अर्थ कह दिया है। (ओं दि॰)जो दिन में विचरने वाले प्राणियों से उपकार लेना और उनको सुख देना है, सो मनुष्यजाति का ही काम है। (ओं नक्तं॰)जो रात्रि में विचरने वाले प्राणी हैं, उनसे भी उपकार लेना और जो उनको सुख देना है, इसलिये यह प्रयोग है। (ओं सर्वात्म॰)सब में व्याप्त परमेश्वर की सत्ता को सदा ध्यान में रखना चाहिये। (ओं पि॰)माता, पिता, आचार्य, अतिथि, पुत्र, भृत्यादिकों को भोजन कराके पश्चात् गृहस्थ को भोजनादि करना चाहिये। ‘स्वाहा’ शब्द का अर्थ पूर्व कर दिया है। और ‘नमः’ शब्द का अर्थ यह है कि आप अभिमान रहित होके दूसरे का मान्य करना॥ १०-१६॥
इसके पीछे छः भागों को लिखते हैं—
शुनां च पतितानां च श्वपचां पापरोगिणाम्।
वायसानां कृमीणां च शनकैर्निर्वपेद् भुवि॥१ ॥ मनु 3-12॥
अनेन षड् भागान् भूमौ दद्यात्। एवं सर्वप्राणिभ्यो भागान् विभज्य दत्त्वा च तेषां प्रसन्नतां सम्पादयेत्।
भाषार्थ—कुत्तों, कङ्गालों, कुष्ठी आदि रोगियों, काक आदि पक्षियों और चींटी आदि कृमियों के लिए छः भाग अलग-अलग बाँट के दे देना और उनकी प्रसन्नता सदा करना।
यह वेद और मनुस्मृति की रीति से बलिवैश्वदेव की विधि लिखी॥
इति बलिवैश्वदेवविधिः समाप्तः।